महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 16 : पाण्डव पक्ष की शक्ति और राजनीतिक गठबंधन
महाभारत — उद्योगपर्व — भाग 16 : पाण्डव पक्ष की शक्ति और राजनीतिक गठबंधन — सात अक्षौहिणियों के पीछे कौन था?
उद्योगपर्व के पिछले प्रसंग में हमने देखा कि कौरव पक्ष की ग्यारह अक्षौहिणियाँ केवल दुर्योधन के व्यक्तिगत समर्थकों की सेना नहीं थीं। उनमें हस्तिनापुर की राजनिष्ठा, प्रतिज्ञा, कृतज्ञता, पारिवारिक सम्बन्ध और राजनीतिक परिस्थितियाँ—अनेक प्रकार की निष्ठाएँ काम कर रही थीं।
अब वही प्रश्न पाण्डव पक्ष के सामने रखिए—
सात अक्षौहिणियों के पीछे कौन-सी राजनीतिक शक्तियाँ थीं और वे पाण्डवों के साथ क्यों खड़ी हुईं?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पाण्डवों के पास संख्या कम थी, लेकिन उनका राजनीतिक आधार बहुत गहरा और विविध था।
पाण्डवों की शक्ति केवल पाँच भाइयों की शक्ति नहीं थी
यदि महाभारत को केवल पारिवारिक कथा मानकर पढ़ें तो युद्ध में दो परिवार दिखाई देते हैं—पाण्डव और कौरव।
लेकिन उद्योगपर्व तक आते-आते यह तस्वीर बदल चुकी है।
पाण्डव अब अकेले निर्वासित राजकुमार नहीं हैं।
उनके साथ— पाञ्चाल, मत्स्य, चेदि, केकय, यादवों का एक भाग तथा अनेक अन्य राजकीय शक्तियाँ जुड़ चुकी हैं।
इस परिवर्तन का एक बड़ा कारण स्वयं वनवास और अज्ञातवास के दौरान बने सम्बन्ध हैं।
अर्थात् वनवास केवल पाण्डवों को राज्य से दूर ले जाने वाला काल नहीं था।
उसने उनके राजनीतिक सम्बन्धों का विस्तार भी किया।
पाञ्चाल — पाण्डव शक्ति का प्रमुख आधार
पाण्डव पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्तियों में पाञ्चाल का स्थान है।
द्रुपद और पाण्डवों का सम्बन्ध केवल द्रौपदी के विवाह से नहीं बना था।
द्रुपद और द्रोण की पुरानी शत्रुता भी कुरु राजनीति की पृष्ठभूमि में उपस्थित थी।
द्रौपदी के स्वयंवर के बाद पाञ्चाल और पाण्डवों का सम्बन्ध वैवाहिक गठबंधन में बदल गया।
फिर द्रौपदी के पुत्र और धृष्टद्युम्न जैसे योद्धा इस सम्बन्ध को अगली पीढ़ी तक ले गए।
विशेष रूप से धृष्टद्युम्न का पाण्डव सेना का सेनापति बनना बताता है कि पाञ्चाल केवल सहयोगी राज्य नहीं था।
वह पाण्डव युद्ध-संरचना के केन्द्रीय सैन्य स्तम्भों में था।
मत्स्य — आश्रय से गठबंधन तक
विराटपर्व में हमने देखा कि अज्ञातवास के अन्तिम वर्ष में पाण्डवों ने मत्स्यराज विराट के राज्य में शरण ली।
यह सम्बन्ध आगे चलकर राजनीतिक गठबंधन में बदल गया।
अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह केवल पारिवारिक प्रसंग नहीं था।
उसने पाण्डवों और मत्स्य के सम्बन्ध को स्थायी बना दिया।
अब विराट केवल वह राजा नहीं था जिसके राज्य में पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास पूरा किया था।
वह युद्ध में उनका सहयोगी था। इस प्रकार—
आश्रय → विश्वास → वैवाहिक सम्बन्ध → राजनीतिक गठबंधन की एक पूरी प्रक्रिया दिखाई देती है।
महाभारत की राजनीति को समझने में यह क्रम अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
चेदि — पुरानी मित्रता का विस्तार
चेदि के धृष्टकेतु का पाण्डव पक्ष में होना भी उल्लेखनीय है।
चेदि और पाण्डवों के सम्बन्धों की पृष्ठभूमि पहले से महाभारत में बनती रही थी।
विशेषकर कृष्ण और शिशुपाल के प्रसंग के बाद चेदि की राजनीतिक स्थिति में परिवर्तन आया।
धृष्टकेतु का पाण्डव पक्ष में होना इस बात का प्रमाण है कि पुराने राजकीय सम्बन्ध और वैर युद्ध के समय नए राजनीतिक समीकरण बना सकते थे।
यहाँ भी युद्ध किसी एक दिन में गठित नहीं हुआ। उसके पीछे वर्षों की राजनीति थी।
केकय — एक ही राजवंश का विभाजन
केकय राजकुमारों का प्रसंग विशेष ध्यान देने योग्य है। महाभारत में केकय सम्बन्धी योद्धाओं का दोनों पक्षों से सम्बन्ध मिलता है।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—
राजवंश का एक होना आवश्यक नहीं कि उसकी राजनीतिक निष्ठा भी एक ही हो।
यही बात यादवों में और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
इसलिए “पाण्डव बनाम कौरव” को दो पूर्णतः अलग और एकरूप राजनीतिक समुदायों के रूप में देखना उचित नहीं।
यादव शक्ति — कृष्ण और सेना का अलग होना
पाण्डव पक्ष की सबसे रोचक राजनीतिक विशेषता यादवों के प्रसंग में दिखाई देती है।
कृष्ण पाण्डवों के साथ हैं। सात्यकि भी पाण्डव पक्ष में है। लेकिन कृष्ण की नारायणी सेना दुर्योधन को मिली।
कृतवर्मा कौरव पक्ष में है। बलराम युद्ध से अलग रहते हैं।
एक ही व्यापक यादव राजनीतिक-सांस्कृतिक संसार के भीतर तीन अलग निर्णय दिखाई देते हैं—
कृष्ण — पाण्डव पक्ष
कृतवर्मा/नारायणी सेना — कौरव पक्ष
बलराम — युद्ध से बाहर
यह तथ्य महाभारत की राजनीति को समझने के लिए अत्यन्त मूल्यवान है।
यहाँ रक्त-संबंध या वंश से अधिक महत्वपूर्ण है— व्यक्ति का अपना राजनीतिक निर्णय।
सात्यकि — केवल योद्धा नहीं, राजनीतिक सम्बन्ध का प्रतिनिधि
सात्यकि का पाण्डव पक्ष में होना विशेष महत्व रखता है।
वह कृष्ण से जुड़ा है और अर्जुन का भी निकट सम्बन्धी तथा शिष्य है।
उसकी उपस्थिति पाण्डवों और यादवों के बीच बने राजनीतिक सम्बन्ध को सैन्य रूप देती है।
लेकिन सात्यकि की भूमिका केवल संख्या बढ़ाने की नहीं है।
वह पाण्डव पक्ष में उस यादव शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जिसने कृष्ण के साथ राजनीतिक रूप से खड़े होने का निर्णय किया।
अभिमन्यु और उत्तरा — गठबंधन की अगली पीढ़ी
विराटपर्व में सम्पन्न विवाह का महत्व यहाँ फिर सामने आता है।
अभिमन्यु—अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र। उत्तरा—मत्स्यराज विराट की पुत्री।
उनका विवाह दो परिवारों का सम्बन्ध मात्र नहीं था।
यह यादव–पाण्डव–मत्स्य सम्बन्धों को एक साथ जोड़ता है।
आगे चलकर उत्तरा के गर्भ में परीक्षित का जन्म इसी राजनीतिक और वंशगत निरन्तरता को आगे ले जाता है।
इस दृष्टि से उद्योगपर्व का युद्ध-पूर्व समय केवल वर्तमान युद्ध की तैयारी नहीं कर रहा।
वह यह भी निर्धारित कर रहा है कि युद्ध के बाद राजनीतिक वंश किस प्रकार जीवित रहेगा।
पाण्डव पक्ष की शक्ति का दूसरा केन्द्र — धृष्टद्युम्न
पाण्डवों के पास केवल प्रसिद्ध व्यक्तिगत योद्धा नहीं थे।
उनके पास संगठित सैन्य नेतृत्व भी था।
धृष्टद्युम्न को सेनापति बनाना अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय था।
कृष्ण, अर्जुन, भीम जैसे महायोद्धा होते हुए भी सेनापति का पद धृष्टद्युम्न को दिया गया।
इसका अर्थ है कि सेना का नेतृत्व केवल सबसे शक्तिशाली योद्धा को देना आवश्यक नहीं समझा गया।
सैन्य नेतृत्व एक अलग संस्थागत भूमिका थी।
यही बात आगे युद्ध में सेनाओं की संरचना को समझने में सहायता करती है।
पाण्डव पक्ष में भी निष्ठाएँ एक जैसी नहीं थीं
यहाँ पिछले भाग का निष्कर्ष फिर उपयोगी होता है।
पाण्डवों के साथ खड़े सभी राजा केवल युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा से प्रभावित होकर युद्ध में नहीं आए थे।
किसी का सम्बन्ध विवाह से था। किसी का मित्रता से। किसी का पुराने राजनीतिक सम्बन्ध से।
किसी का कौरवों से पुराने वैर के कारण। किसी का कृष्ण के सम्बन्ध के कारण।
किसी का अपने राजकीय हित के कारण।इसलिए पाण्डव पक्ष को भी “धर्म के लिए स्वतः एकत्र हुई सात अक्षौहिणियाँ” कहना ऐतिहासिक विश्लेषण के लिए अधूरा होगा।
धर्म की धारणा निश्चित रूप से महाभारत के नैरेटिव में केन्द्रीय है, लेकिन राजाओं के अपने राजनीतिक सम्बन्ध भी उतने ही वास्तविक हैं।
संख्या कम थी, पर गठबंधन का स्वरूप अलग था
पाण्डवों की सात अक्षौहिणियाँ कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणियों से कम थीं।
लेकिन इस संख्या को अकेले देखकर पाण्डव पक्ष की शक्ति का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
उनके पास— अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव
के अतिरिक्त— धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, अभिमन्यु, घटोत्कच, धृष्टकेतु, विराट आदि जैसी विभिन्न शक्तियाँ थीं।
इनमें से प्रत्येक की अपनी पृष्ठभूमि और युद्ध में अपनी भूमिका थी।
विशेष रूप से कृष्ण की उपस्थिति पाण्डव पक्ष को एक ऐसी राजनीतिक और रणनीतिक दिशा देती है जिसे केवल अक्षौहिणियों की संख्या में नहीं मापा जा सकता।
कृष्ण की शक्ति — सेना नहीं, निर्णय
उद्योगपर्व के पहले भागों में हमने एक महत्वपूर्ण घटना देखी थी।
दुर्योधन ने कृष्ण की सेना चुनी। अर्जुन ने कृष्ण को। यह निर्णय अब कुरुक्षेत्र में अपने परिणाम के लिए तैयार है।
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है।
इस समय को सीधे गीता के उपदेश के बाद की आध्यात्मिक भाषा में नहीं पढ़ना चाहिए।
युद्ध से पहले अर्जुन का कृष्ण को चुनना मूलतः विश्वास, सम्बन्ध और नेतृत्व की स्वीकृति का राजनीतिक निर्णय भी है।
युद्धभूमि पर बाद में यही सम्बन्ध एक गहरे दार्शनिक संवाद में बदलता है।
अर्थात्—
उद्योगपर्व में कृष्ण का चयन राजनीतिक है; भीष्मपर्व में वही सम्बन्ध दार्शनिक चरम प्राप्त करता है।
यह दोनों पर्वों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु है।
पाण्डव गठबंधन का सबसे बड़ा आधार — सम्बन्धों का जाल
यदि पूरे पाण्डव पक्ष को एक सूत्र में समझना हो तो उसकी शक्ति केवल सात अक्षौहिणियों में नहीं थी।
उसकी वास्तविक शक्ति थी—
इस प्रकार पाण्डवों की शक्ति एक बहु-केंद्रीय गठबंधन के रूप में सामने आती है।
किसी एक राज्य पर उसकी सम्पूर्ण निर्भरता नहीं थी।
विरोधाभास — कम सेना, अधिक सम्बन्ध?
यहाँ एक रोचक शोध-प्रश्न पैदा होता है। कौरवों के पास संख्या अधिक थी।
लेकिन पाण्डवों के पास अनेक ऐसे सम्बन्ध थे जो केवल सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं थे।
द्रौपदी का विवाह पाञ्चाल को जोड़ता है। अज्ञातवास मत्स्य को जोड़ता है।
अभिमन्यु का विवाह मत्स्य और यादव-पाण्डव सम्बन्धों को जोड़ता है।
कृष्ण का व्यक्तिगत सम्बन्ध राजनीतिक नेतृत्व देता है। सात्यकि यादव शक्ति का एक भाग लाता है।
इसलिए पाण्डव गठबंधन को केवल “सात अक्षौहिणियाँ” कहना उसके वास्तविक राजनीतिक विस्तार को छोटा कर देता है।
एक महत्वपूर्ण सावधानी
महाभारत के विभिन्न पाठों और परम्पराओं में सहयोगी राजाओं की सूचियों में पाठान्तर मिलते हैं।
इसलिए प्रत्येक राजा की पहचान को आधुनिक राजनीतिक मानचित्र पर सीधे रख देना उचित नहीं होगा।
जहाँ पाठ स्पष्ट है वहाँ स्पष्ट रूप से कहना चाहिए।
जहाँ क्षेत्र की पहचान सम्भावित है वहाँ “सम्भावित” कहना चाहिए।
और जहाँ प्रमाण अपर्याप्त है वहाँ निष्कर्ष रोक देना चाहिए।
महाभारत के भूगोल पर हमारी पहले की शोध-दृष्टि यहाँ भी लागू होती है—
पाठीय उल्लेख प्रमाण है; आधुनिक स्थान-समानता केवल अतिरिक्त संकेत है।
शोध-निष्कर्ष
उद्योगपर्व के इस चरण तक पाण्डवों की स्थिति में एक मौलिक परिवर्तन हो चुका है।
वन में वे पाँच निर्वासित भाई थे। विराट में वे छिपे हुए राजकुमार थे।
उपप्लव्य में वे अपना अधिकार माँगने वाले राजनीतिक पक्ष बने।
और अब कुरुक्षेत्र में वे सात अक्षौहिणियों के साथ एक व्यापक राजकीय गठबंधन के केन्द्र हैं।
इसलिए युद्ध को केवल हस्तिनापुर के उत्तराधिकार का विवाद कहना अब पर्याप्त नहीं।
यह एक ऐसा संघर्ष बन चुका है जिसमें अनेक राजवंश अपने-अपने सम्बन्धों और हितों के साथ प्रवेश कर चुके हैं।
और फिर भी एक बात निर्णायक है—
दोनों पक्षों में अनेक ऐसे लोग हैं जिनके भीतर व्यक्तिगत सम्बन्ध और युद्ध की राजनीतिक स्थिति परस्पर टकरा रहे हैं।
यही कारण है कि उद्योगपर्व का अन्त केवल सेनाओं के खड़े हो जाने से नहीं होता।
अभी एक अन्तिम राजनीतिक संदेश बाकी है। दुर्योधन की ओर से उलूक पाण्डवों के पास भेजा जाता है।
अब संवाद शान्ति की भाषा से हटकर चुनौती की भाषा में प्रवेश करता है।
यहीं से उद्योगपर्व का अन्तिम चरण आरम्भ होता है—
जब दूत अब सन्धि कराने नहीं, युद्ध की चुनौती लेकर आता है।
अगला भाग होगा—
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