महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 16 : आत्मा और परमात्मा
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 16 : आत्मा और परमात्मा — व्यक्तिगत चेतना और सार्वभौम चेतना का सम्बन्ध क्या है?
ध्यान में जब मन को देखने का अभ्यास आरम्भ होता है, तब एक स्वाभाविक प्रश्न सामने आता है—जो मन को देख रहा है, वह कौन है?
यदि शरीर देखा जा सकता है, तो देखने वाला शरीर नहीं है। यदि विचारों को देखा जा सकता है, तो देखने वाला विचार नहीं है। यदि भावनाएँ आती-जाती हैं और उनका भी निरीक्षण सम्भव है, तो निरीक्षक स्वयं उन भावनाओं तक सीमित नहीं हो सकता।
यहीं से गीता का प्रश्न केवल मन की शान्ति का प्रश्न नहीं रहता। वह चेतना के मूल तक पहुँच जाता है।
क्या प्रत्येक जीव में स्थित चेतना अलग-अलग है, अथवा उसके पीछे कोई एक व्यापक चेतना है?
गीता इसी प्रश्न को व्यक्ति और परम सत्ता के सम्बन्ध के रूप में उठाती है।
मूल पाठ की ओर
भगवान् कहते हैं— मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ — भगवद्गीता 7.7
अर्थात्, हे धनञ्जय! मुझसे परे कोई अन्य परम तत्त्व नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत मुझमें उसी प्रकार गुँथा हुआ है जैसे सूत्र में मणियों का समूह।
यहाँ कृष्ण स्वयं को केवल किसी व्यक्तिगत देवता के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहे। कथन का दार्शनिक स्तर इससे अधिक व्यापक है—समस्त दृश्य सत्ता के पीछे एक ऐसी आधारभूत सत्ता है जिसमें सब कुछ स्थित है।
यह वही प्रश्न है जो ध्यान में भीतर उठता है और विश्व के स्तर पर फिर सामने आता है।
भीतर—चेतना किस पर आधारित है?
बाहर—समस्त जगत किस आधार पर स्थित है?
गीता इन दोनों प्रश्नों को अलग-अलग नहीं रखती।
युद्धभूमि में यह प्रश्न क्यों?
कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सामने दो स्तरों का संकट है।
एक ओर उसका व्यक्तिगत संकट है—अपने सम्बन्धियों, गुरुजनों और मित्रों के विरुद्ध युद्ध।
दूसरी ओर कृष्ण उसे व्यक्ति से ऊपर उठाकर उस व्यापक व्यवस्था को देखने के लिए कहते हैं जिसमें जीवन, प्रकृति, कर्म और मृत्यु सभी जुड़े हुए हैं।
इसलिए गीता का ईश्वर केवल पूजा का विषय नहीं बनता। वह जगत् की अन्तर्सम्बद्धता का दार्शनिक आधार बन जाता है।
अर्जुन स्वयं को एक व्यक्ति के रूप में देख रहा है।
कृष्ण उसे उस व्यक्ति के पीछे स्थित व्यापक सत्ता को देखने के लिए प्रेरित करते हैं।
यहीं से जीवात्मा और परमात्मा का प्रश्न जन्म लेता है।
आत्मा क्या है?
गीता एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथन करती है—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥ — भगवद्गीता 15.7
यहाँ “ममैवांशः” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है।
सामान्य अर्थ में इसका अनुवाद किया जाता है—“मेरा ही अंश”।
लेकिन “अंश” को यदि भौतिक वस्तु के टुकड़े के अर्थ में लिया जाए तो अनेक दार्शनिक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।
परम सत्ता यदि अनन्त है तो उसका कोई टुकड़ा कैसे हो सकता है?
इसलिए भारतीय दार्शनिक परम्पराओं ने “अंश” की अलग-अलग व्याख्याएँ की हैं। कहीं इसे तत्त्वतः अभिन्नता के संकेत के रूप में समझा गया, कहीं आश्रित सत्ता या सम्बन्ध के रूप में, और कहीं जीव तथा ईश्वर के वास्तविक भेद को स्वीकार करते हुए।
इसलिए गीता का यह शब्द एक गहरी दार्शनिक चर्चा का द्वार खोलता है; इसे एक ही बाद की दार्शनिक व्याख्या में सीमित करना उचित नहीं होगा।
परन्तु मूल प्रश्न स्पष्ट है—
जीव का अस्तित्व स्वतन्त्र और पूर्णतः निरपेक्ष है या किसी परम सत्ता पर आश्रित है?
गीता का उत्तर है—जीव का सम्बन्ध परम सत्ता से मूलभूत है।
व्यक्तिगत चेतना और सार्वभौम चेतना
यहाँ “आत्मा” और “परमात्मा” को समझने के लिए दो स्तर अलग करना आवश्यक है।
जीवात्मा उस चेतना का नाम है जो किसी विशेष जीवित सत्ता के अनुभव से सम्बन्धित है।
परमात्मा उस व्यापक परम सत्ता का द्योतक है जो सभी जीवों और समस्त जगत का आधार मानी जाती है।
लेकिन यह कहना कि दोनों के सम्बन्ध की एक ही दार्शनिक व्याख्या सम्भव है, भारतीय दर्शन की विविधता को नकारना होगा।
अद्वैत वेदान्त जीव और ब्रह्म के सम्बन्ध को अन्ततः अभेद की दिशा में देखता है। विशिष्टाद्वैत जीव को परमात्मा पर आश्रित, किन्तु उससे अविभाज्य सम्बन्ध में देखता है। द्वैत परम्परा जीव और ईश्वर के भेद को वास्तविक मानती है।
गीता का पाठ इन सभी परम्पराओं के लिए दार्शनिक आधार प्रदान करने वाले अनेक वाक्य देता है।
इसलिए शोध की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि गीता वास्तव में क्या कहती है, और उसके बाद यह देखा जाए कि विभिन्न आचार्यों ने उसका अर्थ कैसे विकसित किया।
सांख्य और गीता
सांख्य में पुरुष चेतन है और प्रकृति अचेतन।
अनेक पुरुषों की स्वीकृति सांख्य की विशिष्ट विशेषता है। प्रत्येक पुरुष स्वयं प्रकाशस्वरूप है, जबकि प्रकृति और उसके विकार परिवर्तनशील हैं।
गीता भी प्रकृति और पुरुष की चर्चा करती है, लेकिन उसकी संरचना केवल सांख्य की द्वैत व्यवस्था तक सीमित नहीं रहती।
गीता कहती है—
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ — भगवद्गीता 7.4
और इसके बाद—
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ — भगवद्गीता 7.5
यहाँ जड़ प्रकृति के साथ एक दूसरी, उच्चतर प्रकृति की बात आती है—जीवभूता प्रकृति।
यही बिन्दु गीता को केवल पदार्थ और चेतना के द्वैत से आगे ले जाता है।
प्रकृति केवल बाहरी पदार्थ नहीं है। जीवन भी उसी व्यापक सत्ता के अधीन है।
इस प्रकार गीता में प्रश्न बदल जाता है—
चेतना पदार्थ से उत्पन्न होती है या पदार्थ और जीवन दोनों किसी व्यापक तत्त्व में स्थित हैं?
यह प्रश्न आज भी दर्शन और विज्ञान दोनों के लिए खुला प्रश्न है।
यदि परमात्मा एक है तो जीव अनेक क्यों?
यह गीता के दर्शन की सबसे गहरी समस्याओं में से एक है।
यदि परम सत्ता एक है, तो अनुभव करने वाले जीव अनेक क्यों दिखाई देते हैं?
एक मनुष्य सुखी है, दूसरा दुःखी। एक जानता है, दूसरा अज्ञानी है। एक जन्म लेता है, दूसरा मरता है।
यदि चेतना एक है, तो अनुभव इतने भिन्न क्यों हैं?
गीता इसका उत्तर प्रकृति, शरीर, मन, कर्म और गुणों के माध्यम से देती है।
चेतना की व्यापक सत्ता एक हो सकती है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति अनेक संरचनाओं में अलग-अलग दिखाई देती है।
एक ही सूर्य अनेक जलाशयों में अलग-अलग प्रतिबिम्बित हो सकता है। प्रतिबिम्ब अनेक हैं, प्रकाश का स्रोत एक है।
यह उदाहरण दार्शनिक दृष्टान्त है, वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।
इसी प्रकार गीता का “एक व्यापक आधार—अनेक जीव” सम्बन्ध आधुनिक विज्ञान की किसी स्थापित वैज्ञानिक परिकल्पना का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। यह मूलतः एक दार्शनिक-अध्यात्मिक प्रतिपादन है।
यहीं शोध की ईमानदारी आवश्यक है।
विज्ञान से दर्शन को प्रमाणित करने की जल्दबाजी भी उतनी ही अनुचित है जितनी दर्शन को विज्ञान का विरोधी मान लेना।
“एक में अनेक” की गीता-दृष्टि
अब तक की यात्रा को जोड़ें तो एक क्रम दिखाई देता है।
शरीर—क्षेत्र है।
मन—उस क्षेत्र की एक सूक्ष्म व्यवस्था है।
विचार—मन की गतिविधियाँ हैं।
गुण—प्रकृति की गतिशील शक्तियाँ हैं।
अहंकार—इन सबके साथ “मैं” की पहचान बनाता है।
ध्यान—इस पहचान को देखने की क्षमता विकसित करता है।
और अब प्रश्न आता है— जो देख रहा है, उसका मूल क्या है?
यहीं गीता व्यक्ति की चेतना को सार्वभौम सत्ता से जोड़ती है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ — भगवद्गीता 6.30
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मेरा और उसका सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होता।
यहाँ “देखना” केवल आँखों से देखना नहीं है। यह दृष्टि का परिवर्तन है।
पहली दृष्टि कहती है— “मैं अलग हूँ और संसार अलग है।”
दूसरी दृष्टि पूछती है— “मेरे और संसार के बीच सम्बन्ध क्या है?”
और गीता तीसरी दृष्टि की ओर ले जाती है— “जिस सत्ता में मैं स्थित हूँ, उसी व्यापक सत्ता में यह सम्पूर्ण जगत भी स्थित है।”
यहीं से आत्मज्ञान केवल व्यक्तिगत मुक्ति का साधन नहीं रहता। वह जीवन-दृष्टि बन जाता है।
यदि दूसरे में भी वही मूल सत्ता है, तो दूसरे के प्रति हमारा व्यवहार बदलना अनिवार्य है।
यही कारण है कि गीता का आत्मज्ञान अन्ततः नैतिकता, कर्म और समत्व से जुड़ता है।
आत्मा को जानना और परमात्मा को जानना
यहाँ एक और महत्वपूर्ण अन्तर है।
परमात्मा के बारे में जानकारी होना और परमात्मा का अनुभव होना एक बात नहीं।
किसी ग्रन्थ को पढ़कर हम कह सकते हैं— “परमात्मा सर्वत्र है।”
लेकिन यदि व्यवहार में हमारा “मैं” निरन्तर अलगाव, अहंकार, द्वेष और स्वार्थ से संचालित हो रहा है, तो वह वाक्य अभी बौद्धिक जानकारी भर है।
गीता का ज्ञान व्यवहार में उतरना चाहता है।
इसीलिए वह ज्ञान के साथ कर्म, ध्यान और भक्ति को जोड़ती है।
इस समन्वय के बिना गीता को केवल दार्शनिक ग्रन्थ मानना उसके व्यापक स्वरूप को छोटा कर देना होगा।
एक और गहरी समस्या — परमात्मा बाहर है या भीतर?
यदि परमात्मा सर्वत्र है, तो क्या उसे किसी बाहरी लोक में खोजा जाए?
गीता का उत्तर इस विभाजन को सरल नहीं रहने देता।
कृष्ण कहते हैं— ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। — भगवद्गीता 18.61
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
यह “हृदय” केवल शरीर का भौतिक अंग नहीं माना जाना चाहिए। यहाँ वह आन्तरिक सत्ता-क्षेत्र है जहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व का अनुभव करता है।
इसलिए गीता की यात्रा बाहर से भीतर और भीतर से सम्पूर्ण की ओर जाती है।
जगत् में परम सत्ता को देखना और अपने भीतर उसी सत्ता की खोज करना—दो अलग यात्राएँ नहीं रह जातीं।
यही इस अध्याय की दार्शनिक शक्ति है।
शोध का प्रश्न
लेकिन यहाँ महाभारत-शोध के लिए एक गंभीर प्रश्न बचता है।
क्या गीता में “परमात्मा” की यह अवधारणा वही है जो बाद के अद्वैत वेदान्त में “निर्गुण ब्रह्म” के रूप में व्यवस्थित होती है?
क्या “ममैवांशो” का अर्थ जीव और ब्रह्म की पूर्ण अभिन्नता है?
क्या “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे” व्यक्तिगत ईश्वर की सत्ता का प्रतिपादन करता है?
या गीता इन सभी स्तरों को एक ही आध्यात्मिक ढाँचे में समाहित करती है?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल आधुनिक शब्दों में नहीं दिया जा सकता।
इसके लिए गीता के मूल पदों, महाभारत के अन्य प्रसंगों, उपनिषदों और बाद की भाष्य-परम्पराओं को साथ रखकर देखना होगा।
यही महाभारत को केवल कथा नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के विकास का एक जीवित दार्शनिक दस्तावेज बनाता है।
अब तक अर्जुन ने पूछा था—मैं कौन हूँ?
फिर प्रश्न हुआ—कर्म कौन करता है?
फिर—प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध क्या है?
फिर—बंधन कैसे होता है?
फिर—मन को कैसे स्थिर किया जाए?
अब प्रश्न और व्यापक हो गया है—
यदि मेरे भीतर चेतना है और सम्पूर्ण अस्तित्व का भी कोई परम आधार है, तो उस सम्बन्ध को अनुभव में कैसे जिया जाए?
यहीं से अगला द्वार खुलता है—
भक्ति क्या है?
क्या भक्ति केवल ईश्वर की उपासना है, या वह व्यक्तिगत “मैं” से सार्वभौम सत्ता की ओर जाने की एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है?
गीता अब ज्ञान और ध्यान के बाद भक्ति को सामने लाती है।
और प्रश्न होगा—क्या ज्ञान के बिना भक्ति अन्धविश्वास बन सकती है, और भक्ति के बिना ज्ञान अहंकार?
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