महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 17 : भक्ति — ज्ञान के बाद हृदय का प्रश्न
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 17 : भक्ति — ज्ञान के बाद हृदय का प्रश्न
कुरुक्षेत्र में अर्जुन की यात्रा अब एक विशेष मोड़ पर पहुँच चुकी है।
उसने शरीर और आत्मा का प्रश्न सुना। कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध पूछा। कर्तापन और प्रकृति को समझा। त्रिगुणों को देखा। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेचन सुना। बन्धन और मोक्ष का प्रश्न उठाया। ध्यान के द्वारा मन को स्थिर करने का मार्ग जाना और फिर व्यक्तिगत चेतना तथा परम सत्ता के सम्बन्ध पर विचार किया।
लेकिन मनुष्य केवल जानने वाला प्राणी नहीं है। वह प्रेम करता है, श्रद्धा करता है, समर्पित होता है।
यहीं से एक नया प्रश्न जन्म लेता है—
यदि परम सत्य को जान लिया जाए, तो उसके साथ मनुष्य का सम्बन्ध क्या होगा?
क्या सत्य केवल जानने की वस्तु है?
या उसके साथ कोई ऐसा सम्बन्ध भी सम्भव है जिसमें ज्ञान हृदय में उतर जाए?
गीता इस प्रश्न का उत्तर भक्ति के माध्यम से देती है।
भक्ति का प्रथम दार्शनिक सूत्र
गीता कहती है—
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥
— भगवद्गीता 12.8
मन को मुझमें स्थापित करो और बुद्धि को मुझमें समर्पित करो; तब तुम मुझमें ही निवास करोगे।
यहाँ भक्ति को केवल भावुकता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया।
कृष्ण पहले मन की बात करते हैं और फिर बुद्धि की।
मन का सम्बन्ध आकर्षण, भावना और चित्तवृत्तियों से है। बुद्धि का सम्बन्ध निर्णय और विवेक से है।
इसलिए गीता की भक्ति में केवल भाव नहीं है और केवल विचार भी नहीं है।
मन और बुद्धि दोनों का केन्द्र परिवर्तन भक्ति का महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
अर्जुन के लिए भक्ति क्यों आवश्यक हुई?
अर्जुन का संकट केवल यह नहीं था कि उसे क्या करना चाहिए।
उसकी समस्या यह भी थी कि वह स्वयं को उस कर्म के केन्द्र में रखकर देख रहा था।
“मैं मारूँगा।”
“मेरे अपने मारे जाएँगे।”
“मुझे यह युद्ध करना है।”
इस “मैं” के चारों ओर उसका सम्पूर्ण संकट निर्मित हो रहा था।
कर्मयोग ने उसे फलासक्ति से हटाया। ज्ञानयोग ने उसे कर्तापन पर विचार कराया।
ध्यानयोग ने उसे मन को देखने का अभ्यास दिया। अब भक्ति उस “मैं” को एक और दिशा देती है—
अपने अस्तित्व का केन्द्र स्वयं से हटाकर परम सत्ता में रखना।
इस अर्थ में भक्ति ज्ञान और कर्म से अलग कोई चौथा विषय मात्र नहीं है।
वह दोनों के भीतर प्रवेश करने वाली दृष्टि बन सकती है।
भक्ति क्या है?
“भक्ति” शब्द की व्युत्पत्ति सामान्यतः √भज् धातु से मानी जाती है—जिसमें भाग लेना, सम्बन्ध रखना, सेवा करना, अर्पित होना आदि अर्थ-क्षेत्र आते हैं।
इसलिए भक्ति को केवल “ईश्वर से प्रेम” कह देना पर्याप्त नहीं होगा।
गीता में भक्ति का एक व्यापक अर्थ दिखाई देता है—
अपने अस्तित्व, कर्म, बुद्धि और भाव को परम सत्ता के साथ सम्बन्धित कर देना।
इसीलिए कृष्ण कहते हैं—
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
— भगवद्गीता 9.27
जो कुछ तुम करते हो, खाते हो, यज्ञ में अर्पित करते हो, दान देते हो अथवा तप करते हो—उसे मुझे अर्पित करो।
यहाँ भक्ति पूजा-स्थल की सीमा से बाहर निकल आती है। जीवन स्वयं उपासना का क्षेत्र बन जाता है।
काम वही है, लेकिन उसके पीछे का सम्बन्ध बदल जाता है।
ज्ञान और भक्ति — विरोध या समन्वय?
भारतीय परम्परा में कभी-कभी ज्ञान और भक्ति को दो अलग मार्गों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
ज्ञान कहता है— “तत्त्व को जानो।”
भक्ति कहती है— “परम सत्ता से सम्बन्ध स्थापित करो।”
पहली दृष्टि में दोनों अलग दिखाई देते हैं। लेकिन गीता की संरचना अधिक जटिल है।
कृष्ण कहते हैं—
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
— भगवद्गीता 18.55
भक्ति के द्वारा मुझे तत्त्वतः जाना जा सकता है। यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है—
भक्ति ज्ञान का विरोध नहीं करती; वह ज्ञान तक पहुँचने का माध्यम भी बन सकती है।
लेकिन इसका उलटा भी विचारणीय है।
यदि भक्ति में विवेक नहीं है, तो वह अन्धश्रद्धा बन सकती है।
और यदि ज्ञान में हृदयगत परिवर्तन नहीं है, तो वह केवल बौद्धिक संचय बन सकता है।
गीता का मार्ग इन दोनों अतियों के बीच एक समन्वय खोजता है।
भक्ति और उपनिषद्
उपनिषदों की भाषा प्रायः प्रश्न, विचार और आत्मबोध की भाषा है।
“मैं कौन हूँ?”
“ब्रह्म क्या है?”
“जिससे सब उत्पन्न होता है वह क्या है?”
गीता उसी ज्ञानपरम्परा को स्वीकार करते हुए उसे जीवन के संघर्ष में रखती है।
इसलिए गीता का प्रश्न केवल यह नहीं है कि— “ब्रह्म क्या है?”
बल्कि— “ब्रह्म को जानने के बाद मनुष्य कैसे जिए?”
भक्ति इस प्रश्न का उत्तर देती है। वह ज्ञान को सम्बन्ध में बदलती है।
वह तत्त्व को जीवन में उतारती है।
भक्ति का मनोवैज्ञानिक पक्ष
मनुष्य का मन जिस वस्तु को सर्वोच्च मानता है, धीरे-धीरे उसी के अनुरूप स्वयं को ढालता है।
यदि धन सर्वोच्च मूल्य है तो विचार धन के चारों ओर घूमने लगते हैं।
यदि प्रतिष्ठा सर्वोच्च मूल्य है तो व्यवहार प्रतिष्ठा-केन्द्रित हो जाता है।
यदि सत्ता सर्वोच्च मूल्य है तो सम्बन्ध भी सत्ता की दृष्टि से देखे जाने लगते हैं।
गीता इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को आध्यात्मिक दिशा देती है।
यदि परम सत्ता को जीवन का सर्वोच्च केन्द्र बनाया जाए, तो मन की प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं।
इसलिए भक्ति का एक अर्थ है— मन के सर्वोच्च आकर्षण का पुनर्संयोजन।
यह केवल पूजा की क्रिया नहीं है। यह मूल्य-व्यवस्था का परिवर्तन है।
यदि ईश्वर सर्वत्र है तो भक्ति किसकी?
यह प्रश्न सरल नहीं है।
यदि वही परम सत्ता प्रत्येक जीव में है, तो फिर “मैं” किसकी भक्ति कर रहा हूँ?
और यदि भक्त तथा भगवान् सर्वथा एक हैं, तो भक्ति करने वाला कौन है?
यहीं भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराएँ अलग-अलग उत्तर देती हैं।
अद्वैत की दृष्टि में भक्ति साधना के स्तर पर ईश्वर-जीव सम्बन्ध को स्वीकार करते हुए अन्ततः अद्वैत ज्ञान की ओर ले जा सकती है।
विशिष्टाद्वैत में जीव और ईश्वर का सम्बन्ध शाश्वत आश्रित-अंगी सम्बन्ध के रूप में समझा जाता है।
द्वैत में जीव और ईश्वर का भेद वास्तविक माना जाता है और भक्ति उसी सम्बन्ध का आधार बनती है।
इसलिए “भक्ति” शब्द एक ही दार्शनिक निष्कर्ष को अनिवार्य नहीं करता।
गीता का पाठ बहुस्तरीय है; बाद की परम्पराएँ उसके भीतर अपने-अपने दार्शनिक तन्त्र विकसित करती हैं।
महाभारत के शोध में इस अन्तर को बनाए रखना आवश्यक है।
भक्ति और समर्पण
गीता का सबसे चर्चित वाक्य है—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
— भगवद्गीता 18.66
यहाँ “शरणागति” का प्रश्न उठता है।
क्या इसका अर्थ सामाजिक, नैतिक और कर्तव्यगत धर्मों का त्याग है?
यदि ऐसा हो तो गीता के पूरे कर्मयोग से विरोध उत्पन्न होगा।
इसलिए इस श्लोक को उसके पूरे सन्दर्भ से अलग पढ़ना उचित नहीं।
गीता के आरम्भ से अन्त तक अर्जुन को कर्म से पलायन नहीं, बल्कि आसक्ति और अहंकार से मुक्त कर्म की ओर ले जाया गया है।
अतः यहाँ “सर्वधर्मान् परित्यज्य” की व्याख्या परम्पराओं में भिन्न रही है।
शोध की दृष्टि से इतना स्पष्ट है कि इसे सीधे-सीधे “सभी सामाजिक कर्तव्यों को छोड़ दो” के अर्थ में पढ़ना गीता की समग्र संरचना से तनाव पैदा करता है।
यहाँ शरणागति का गहरा अर्थ यह भी हो सकता है कि—
अन्तिम आश्रय अपने सीमित अहंकार में नहीं, परम सत्ता में हो।
भक्ति की परीक्षा
लेकिन यहाँ एक और कठिन प्रश्न है।
यदि कोई व्यक्ति ईश्वर का नाम लेता है, पूजा करता है, अनुष्ठान करता है, लेकिन उसके व्यवहार में क्रोध, लोभ, हिंसा, अहंकार और द्वेष बढ़ते जाते हैं—तो क्या वह भक्ति है?
गीता भक्ति की पहचान केवल बाहरी अनुष्ठान से नहीं करती।
कृष्ण कहते हैं—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
— भगवद्गीता 12.13
जो सभी प्राणियों के प्रति द्वेषरहित है, मैत्री और करुणा से युक्त है, ममता और अहंकार से मुक्त है तथा सुख-दुःख में सम है—ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।
यहाँ भक्ति की वास्तविक परीक्षा सामने आती है।
भक्ति का प्रमाण केवल यह नहीं कि मनुष्य भगवान् के बारे में क्या कहता है; बल्कि यह भी है कि भगवान् के नाम पर वह मनुष्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
यह गीता की भक्ति-दृष्टि को अत्यन्त व्यावहारिक बनाता है।
ज्ञान, ध्यान और भक्ति का त्रिकोण
अब तक की यात्रा को एक साथ देखें।
ज्ञान पूछता है—मैं कौन हूँ?
ध्यान दिखाता है—मेरे भीतर क्या चल रहा है?
भक्ति पूछती है—मैं अपने अस्तित्व को किसके प्रति समर्पित कर रहा हूँ?
ज्ञान अज्ञान को चुनौती देता है। ध्यान चित्त की चंचलता को देखता है। भक्ति अहंकार के केन्द्र को बदलती है।
तीनों को एक साथ रखा जाए तो गीता की साधना अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।
मनुष्य पहले जानता है। फिर देखता है। फिर सम्बन्ध बदलता है।
और अन्ततः उसका जीवन बदलना चाहिए। इसलिए गीता की भक्ति केवल भावनात्मक अवस्था नहीं है।
वह चेतना की दिशा बदलने की प्रक्रिया है।
सबसे कठिन प्रश्न
लेकिन अब भी एक प्रश्न अनुत्तरित है।
यदि भगवान् सर्वत्र हैं, यदि वही चेतना का आधार हैं, यदि वे प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं—
तो क्या भगवान् को किसी विशेष रूप में देखना आवश्यक है?
क्या कृष्ण ही परम सत्य हैं?
या कृष्ण उस परम सत्य के मानवीय, साकार और सम्बन्धयोग्य रूप हैं?
और जब कृष्ण कहते हैं—
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
— भगवद्गीता 10.8
तो क्या यहाँ कृष्ण ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में बोल रहे हैं, या स्वयं को उस परम सत्ता के रूप में उद्घाटित कर रहे हैं?
यहीं से गीता का अगला और अत्यन्त महत्वपूर्ण आयाम खुलता है—
कृष्ण कौन हैं?
एक ऐतिहासिक कृष्ण?
एक महाभारतीय नायक?
एक योगेश्वर?
परमात्मा का अवतार?
या स्वयं परम तत्त्व?
यह प्रश्न केवल धार्मिक विश्वास का प्रश्न नहीं है।
यह महाभारत की सम्पूर्ण संरचना को समझने की कुंजी है।
क्योंकि यदि कृष्ण केवल अर्जुन के सारथी हैं, तो गीता का अर्थ एक प्रकार का होगा।
यदि वे योगेश्वर हैं, तो दूसरा।
और यदि वे स्वयं परम तत्त्व के साक्षात् उद्घाटन हैं, तो महाभारत की सम्पूर्ण कथा का दार्शनिक केन्द्र ही बदल जाता है।
अगला भाग इसी प्रश्न की ओर जाएगा—
“कृष्ण कौन हैं? — मानव, योगेश्वर या परम तत्त्व?”
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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