महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 19 : अवतार — परमात्मा मनुष्य क्यों बनता है?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 19 : अवतार — परमात्मा मनुष्य क्यों बनता है?

पिछले भाग में कृष्ण के तीन स्तर सामने आए—मानव कृष्ण, योगेश्वर कृष्ण और परम तत्त्व के रूप में कृष्ण।

अब उसी से एक और कठिन प्रश्न निकलता है।

यदि कृष्ण स्वयं को परम सत्ता का स्वरूप बताते हैं, तो परम सत्ता को मनुष्य के रूप में जन्म लेने की आवश्यकता क्यों है?

जो स्वयं सम्पूर्ण जगत का आधार है, उसे किसी एक शरीर में आने की आवश्यकता क्यों पड़े?

क्या अवतार का अर्थ वास्तव में परमात्मा का पृथ्वी पर जन्म लेना है?

या यह मनुष्य के लिए परम सत्ता को समझने का एक ऐसा रूप है, जिसमें अनन्त सीमित के माध्यम से प्रकट होता है?

गीता इस प्रश्न का उत्तर केवल धार्मिक कथा के रूप में नहीं देती। वह अवतार को धर्म, इतिहास, कर्म और चेतना के प्रश्न से जोड़ती है।

अवतार का मूल सूत्र

गीता में कृष्ण कहते हैं— 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ — भगवद्गीता 4.7–8

जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अपने आपको प्रकट करता हूँ; साधुओं की रक्षा, दुष्कृत्यों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में सम्भव होता हूँ।

यहाँ एक शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है— “सम्भवामि।”

कृष्ण यह नहीं कहते कि कोई बाहरी शक्ति मुझे पृथ्वी पर भेजती है।

वे कहते हैं— “मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।” अवतार की अवधारणा का मूल यहीं है।

यह कथन किस परिस्थिति में आया?

गीता में यह कथन उस समय आता है जब अर्जुन कर्म और ज्ञान के सम्बन्ध को समझने का प्रयास कर रहा है।

कृष्ण उससे पहले कर्मयोग की चर्चा कर चुके हैं।

फिर वे बताते हैं कि यह योग कोई नया विचार नहीं है— इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।

मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् को कहा था।

अर्जुन के लिए यह प्रश्न स्वाभाविक था—

यदि तुम अभी मेरे सामने कृष्ण के रूप में उपस्थित हो, तो तुमने यह योग प्राचीन काल में सूर्यदेव को कैसे बताया?

कृष्ण का उत्तर केवल जन्मों की संख्या का उत्तर नहीं है।

वे कहते हैं— बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥

मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, तुम नहीं जानते।

यहाँ कृष्ण स्वयं को सामान्य जीव से अलग स्तर पर रखते हैं।

सामान्य जन्म और अवतार में अन्तर

सामान्य जीव जन्म लेता है क्योंकि वह कर्म और प्रकृति की व्यवस्था में बँधा हुआ है।

उसका जन्म उसकी इच्छा से पूर्णतः नियंत्रित नहीं होता।

लेकिन कृष्ण कहते हैं— अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥  — भगवद्गीता 4.6

मैं अजन्मा होते हुए भी, अविनाशी आत्मा होते हुए भी और भूतों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधिष्ठित करके अपनी आत्ममाया से प्रकट होता हूँ।

यहीं अवतार और सामान्य जन्म का अन्तर स्थापित होता है।

जीव प्रकृति के अधीन जन्म लेता है।

अवतार प्रकृति पर अधिष्ठान रखते हुए प्रकट होता है।

कम-से-कम गीता की अपनी दार्शनिक भाषा में यह मूल अन्तर है।

लेकिन “आत्ममाया” का अर्थ क्या है—यहीं से विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं में गहरी व्याख्याएँ आरम्भ होती हैं।

अवतार और सामान्य जीव

दोनों मनुष्य के रूप में दिखाई दे सकते हैं। दोनों शरीर धारण करते हैं।

दोनों खाते हैं, चलते हैं, बोलते हैं। दोनों इतिहास में उपस्थित होते हैं।

लेकिन गीता का दावा है कि दोनों के अस्तित्व का आधार एक जैसा नहीं है।

सामान्य जीव— कर्म → जन्म → अनुभव → कर्मफल → पुनर्जन्म

की व्यवस्था में बँधा हुआ माना जाता है।

अवतार— धर्म-संस्थापन → स्वेच्छिक प्राकट्य → लोकसंग्रह की भूमिका में आता है।

इस अन्तर को समझे बिना अवतार की अवधारणा केवल “ईश्वर का जन्म” बनकर रह जाती है।

गीता में यह उससे कहीं अधिक है।

धर्म की रक्षा या धर्म की पुनर्व्याख्या?

यहाँ “धर्मसंस्थापनार्थाय” शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

कृष्ण यह नहीं कहते कि मैं केवल किसी एक समुदाय, जाति या संस्था की रक्षा के लिए आता हूँ।

वे कहते हैं— धर्म की स्थापना के लिए। लेकिन धर्म क्या है?

महाभारत के व्यापक संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है।

धर्म में सत्य, कर्तव्य, न्याय, सामाजिक व्यवस्था, व्यक्ति की भूमिका और व्यापक लोकहित—इन सबके प्रश्न जुड़े हुए हैं।

इसीलिए महाभारत में धर्म का निर्णय इतना कठिन है। कई बार दो धर्म आपस में टकराते दिखाई देते हैं।

भीष्म का राजधर्म और व्यक्तिगत नैतिकता। कर्ण का मित्रधर्म और व्यापक न्याय।

अर्जुन का क्षत्रियधर्म और कुलधर्म। युधिष्ठिर का सत्य और राजधर्म।

कृष्ण इसी जटिलता के बीच धर्म की दिशा निर्धारित करते हैं।

इसलिए अवतार का अर्थ केवल अधर्मियों को दण्ड देना नहीं है।

धर्म की सही दृष्टि को पुनर्स्थापित करना भी उसका हिस्सा है।

यदि ईश्वर धर्म स्थापित करता है तो अधर्म उत्पन्न ही क्यों होता है?

यह प्रश्न अवतारवाद की सबसे बड़ी दार्शनिक समस्याओं में से एक है।

यदि परमात्मा सर्वशक्तिमान है, तो अधर्म को बढ़ने ही क्यों दिया जाता है?

यदि संसार ईश्वर के अधीन है, तो धर्म की ग्लानि क्यों?

यदि ईश्वर को बार-बार अवतार लेना पड़ता है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि संसार की व्यवस्था स्वयं पर्याप्त नहीं?

गीता इस प्रश्न का पूर्ण तार्किक समाधान किसी एक सूत्र में नहीं देती।

लेकिन उसका ढाँचा एक संकेत देता है—

मनुष्य को कर्म की स्वतंत्रता और प्रकृति की गतिशीलता के भीतर रखा गया है।

इसलिए इतिहास स्थिर नहीं है। धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष लगातार चलता है।

अवतार उस संघर्ष को समाप्त करने वाला कोई यांत्रिक हस्तक्षेप नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का सिद्धान्त है।

महाभारत की कथा में कृष्ण इसी सिद्धान्त का मानवीय रूप बनते हैं।

अवतार का मनोवैज्ञानिक अर्थ

यदि अवतार को केवल लौकिक चमत्कार की तरह देखा जाए तो प्रश्न सीमित हो जाता है।

लेकिन यदि उसे चेतना के स्तर पर देखें तो एक दूसरा अर्थ खुलता है।

मनुष्य के भीतर भी कभी-कभी धर्म की चेतना क्षीण हो जाती है।

विवेक कमजोर पड़ता है।

वासना, भय, लोभ, मोह और अहंकार बढ़ जाते हैं।

तब भीतर एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता होती है जो व्यक्ति को उसके वास्तविक केन्द्र की ओर वापस ले जाए।

गीता के स्तर पर कृष्ण केवल बाहरी मार्गदर्शक नहीं हैं।

वे अर्जुन की चेतना में विवेक के जागरण का माध्यम भी बनते हैं।

इसलिए अवतार का एक दार्शनिक अर्थ यह हो सकता है—

जब चेतना में धर्म की ज्योति दब जाती है, तब सत्य स्वयं को किसी रूप में प्रकट करता है।

लेकिन यह एक दार्शनिक व्याख्या है; इसे गीता के ऐतिहासिक अर्थ का एकमात्र अर्थ नहीं कहा जा सकता।

कृष्ण और अवतार

महाभारत में कृष्ण का जीवन इस सिद्धान्त का विशेष उदाहरण बन जाता है।

उनका जन्म संकट में होता है। वे सत्ता के अत्याचार के बीच बड़े होते हैं।

कंस-वध के बाद राजनीतिक व्यवस्था बदलती है। द्वारका की स्थापना होती है।

वे अनेक राजवंशों के बीच संतुलन बनाते हैं। फिर हस्तिनापुर की राजनीति में प्रवेश करते हैं।

शान्ति का प्रयास करते हैं।

और अन्ततः युद्धभूमि में अर्जुन के सारथी बनते हैं।

इस सम्पूर्ण यात्रा में कृष्ण केवल उपदेश नहीं देते।

वे स्वयं इतिहास में सक्रिय रहते हैं।

यही कारण है कि कृष्ण का अवतारवाद महाभारत में केवल धार्मिक सिद्धान्त नहीं रहता।

वह इतिहास के भीतर धर्म की सक्रिय भूमिका का प्रश्न बन जाता है।

अवतार और लोकसंग्रह

गीता में कृष्ण का एक और महत्त्वपूर्ण विचार है— लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि। — भगवद्गीता 3.20

अर्थात् लोकसंग्रह को देखते हुए भी कर्म करना चाहिए।

और आगे— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

श्रेष्ठ व्यक्ति जो आचरण करता है, दूसरे उसी का अनुसरण करते हैं।

यहाँ अवतार का एक सामाजिक आयाम सामने आता है।

यदि परम सत्ता मनुष्य के रूप में प्रकट होती है, तो उसका जीवन केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं है।

वह जीवन के लिए उदाहरण बनता है।

इस दृष्टि से कृष्ण का अपना जीवन भी एक संदेश है— धर्म केवल बोलने की वस्तु नहीं।

धर्म को परिस्थितियों में जीना पड़ता है।

क्या अवतार इतिहास बदलता है?

यहाँ फिर इतिहास और दर्शन अलग करने होंगे।

ऐतिहासिक दृष्टि से यह प्रश्न पूछा जा सकता है—

कृष्ण के जीवन से जुड़े कौन से प्रसंग किसी ऐतिहासिक परम्परा के पुराने स्तर का प्रतिनिधित्व करते हैं?

कौन से प्रसंग बाद में विकसित हुए?

द्वारका के पुरातात्त्विक अवशेष कृष्ण के ऐतिहासिक अस्तित्व को किस सीमा तक प्रमाणित कर सकते हैं?

महाभारत की विभिन्न पाठ-परम्पराओं में कृष्ण की भूमिका कैसे बदलती या विस्तृत होती है?

ये सभी शोध के स्वतंत्र प्रश्न हैं।

लेकिन दार्शनिक स्तर पर प्रश्न दूसरा है—

कृष्ण को अवतार मानने से भारतीय धर्म-दृष्टि में मनुष्य और परमात्मा के सम्बन्ध को किस प्रकार समझा गया? दोनों प्रश्नों को मिलाना उचित नहीं।

अवतार का गहरा सूत्र

अब तक की चर्चा को एक सूत्र में बाँधें।

यदि परमात्मा केवल निराकार और अगम्य है, तो मनुष्य उसके साथ सम्बन्ध कैसे बनाए?

यदि परमात्मा केवल किसी दूरस्थ सत्ता के रूप में है, तो मनुष्य के जीवन में उसका प्रभाव कैसे प्रकट होगा?

अवतार इन दोनों के बीच एक सेतु बनाता है।

अनन्त सीमित रूप में दिखाई देता है।

अव्यक्त व्यक्त होता है।

परम मनुष्य के निकट आता है।

और मनुष्य के सामने यह सम्भावना रखता है कि—

जिस सत्य को वह बाहर खोज रहा है, उसका सम्बन्ध उसके अपने जीवन से भी है।

इसीलिए कृष्ण का अवतार केवल कृष्ण की कथा नहीं है।

वह मनुष्य और परम सत्ता के सम्बन्ध की भारतीय कल्पना का एक अत्यन्त गहरा रूप है।

लेकिन यहीं एक और प्रश्न खड़ा होता है—

यदि कृष्ण परम तत्त्व हैं, तो उनके सामने अर्जुन का सम्बन्ध क्या है?

क्या अर्जुन केवल भक्त है? क्या वह जीव है? क्या वह मित्र है? क्या वह साधक है?

या कृष्ण और अर्जुन का सम्बन्ध स्वयं किसी बड़े आध्यात्मिक सिद्धान्त का प्रतीक है?

क्योंकि गीता में परमात्मा उपदेश दे रहा है और जीव प्रश्न पूछ रहा है।

परम और जीव के बीच संवाद हो रहा है। नों अलग हैं, एक हैं, या सम्बन्ध में एक हैं?

यहीं से गीता के भीतर छिपे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत की सम्भावनाओं को मूल श्लोकों के आधार पर अलग-अलग समझना आरम्भ होगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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