भीष्मपर्व — भाग 21 : कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि — अठारह अक्षौहिणी सेना वास्तव में कैसे व्यवस्थित हुई?
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 20 : जीव और ईश्वर — एक, भिन्न या सम्बन्धित?
पिछले भागों में हमने कृष्ण को मानव, योगेश्वर और परम तत्त्व—इन तीन स्तरों पर समझने का प्रयास किया। फिर अवतार का प्रश्न आया।
अब एक और प्रश्न सामने है—
यदि कृष्ण परम सत्ता हैं, तो अर्जुन कौन है?
यदि परमात्मा एक है और जीव अनेक हैं, तो दोनों का सम्बन्ध क्या है?
क्या जीव परमात्मा से अलग है?
क्या जीव उसी परमात्मा का अंश है?
क्या दोनों मूलतः एक ही हैं?
या फिर जीव और ईश्वर का सम्बन्ध ऐसा है जिसमें एकता और भिन्नता दोनों किसी न किसी स्तर पर सत्य हैं?
गीता इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दार्शनिक सूत्र में नहीं देती। बल्कि उसके अनेक श्लोक मिलकर एक बहुस्तरीय दृष्टि बनाते हैं।
Text — दो स्तरों का संकेत
गीता कहती है—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥— भगवद्गीता 15.7
“जीवलोक में स्थित जीव मेरा ही सनातन अंश है।”
यहाँ “अंश” शब्द सबसे महत्वपूर्ण है।
यदि अंश का अर्थ भौतिक टुकड़ा लिया जाए, तो परमात्मा को विभाज्य मानना पड़ेगा।
यदि अंश का अर्थ सम्बन्ध, आश्रितता या अभिव्यक्ति लिया जाए, तो अर्थ अलग हो जाता है।
इसीलिए इस एक शब्द से कोई अंतिम दार्शनिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं।
गीता के दूसरे स्थान पर कृष्ण कहते हैं—
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
— भगवद्गीता 13.2
“हे भारत! सभी क्षेत्रों में मुझे भी क्षेत्रज्ञ जानो।”
यहाँ प्रश्न और गहरा हो जाता है।
यदि प्रत्येक शरीर में क्षेत्रज्ञ है और कृष्ण कहते हैं कि सभी क्षेत्रों में मुझे भी क्षेत्रज्ञ जानो, तो क्या व्यक्तिगत चेतना के पीछे एक सार्वभौम चेतना है?
यही वह बिन्दु है जहाँ गीता केवल जीव की चर्चा नहीं करती, बल्कि सभी जीवों के आधार की चर्चा करती है।
Context — अर्जुन और कृष्ण का सम्बन्ध
अर्जुन कृष्ण को केवल भगवान् के रूप में नहीं जानता।
वे उसके मित्र हैं।
वे उसके सम्बन्धी हैं।
वे उसके सारथी हैं।
वे उसके सलाहकार हैं।
और युद्धभूमि में वही कृष्ण उसके गुरु बन जाते हैं।
इसलिए गीता का संवाद केवल गुरु–शिष्य संवाद नहीं है।
उसमें मित्रता, विश्वास, श्रद्धा और आध्यात्मिक समर्पण सभी साथ उपस्थित हैं।
यही कारण है कि गीता के अन्त में अर्जुन का परिवर्तन केवल किसी दार्शनिक सिद्धान्त को स्वीकार कर लेना नहीं है।
उसकी दृष्टि बदलती है।
आरम्भ में वह कहता है—
न योत्स्य इति गोविन्द।
मैं युद्ध नहीं करूँगा।
अन्त में—
करिष्ये वचनं तव।
— भगवद्गीता 18.73
“मैं आपके वचन का पालन करूँगा।”
लेकिन इन दोनों वाक्यों के बीच केवल आदेश और आज्ञापालन नहीं है।
बीच में दृष्टि का रूपान्तरण है।
Concept — जीव क्या है?
गीता में जीव केवल शरीर नहीं है।
शरीर बदलता है।
मन बदलता है।
विचार बदलते हैं।
भावनाएँ बदलती हैं।
परिचय बदलते हैं।
फिर भी व्यक्ति अपने भीतर निरन्तरता का अनुभव करता है।
गीता इस निरन्तरता को आत्मा की दृष्टि से देखती है।
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।— भगवद्गीता 2.20
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
यहाँ आत्मा को शरीर से भिन्न सत्ता माना गया है।
लेकिन अभी प्रश्न समाप्त नहीं होता।
व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा में सम्बन्ध क्या है?
यहीं से तीन प्रमुख दार्शनिक सम्भावनाएँ सामने आती हैं।
Comparison — अद्वैत की सम्भावना
अद्वैत वेदान्त अन्ततः जीव और ब्रह्म के अभेद की ओर जाता है।
अविद्या के कारण व्यक्ति स्वयं को सीमित जीव मानता है।
ज्ञान होने पर उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है।
इस दृष्टि से जीव की पृथकता परम सत्य नहीं, बल्कि अज्ञानजन्य अनुभव है।
गीता के—
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु
जैसे वाक्यों को इस दृष्टि से पढ़ा जा सकता है कि सभी जीवों के पीछे एक ही चैतन्य-सत्ता है।
लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि यह शंकराचार्य की दार्शनिक व्याख्या है; गीता के मूल श्लोक और बाद की अद्वैत व्यवस्था को एक ही ऐतिहासिक स्तर मानना उचित नहीं।
विशिष्टाद्वैत की सम्भावना
विशिष्टाद्वैत जीव को परमात्मा से पूर्णतः पृथक स्वतंत्र सत्ता नहीं मानता, लेकिन उसे परमात्मा के साथ अभिन्न भी नहीं कर देता।
जीव परमात्मा पर आश्रित है।
उसका अस्तित्व वास्तविक है।
उसकी व्यक्तिगतता भी वास्तविक है।
लेकिन वह परम सत्ता से अविच्छिन्न सम्बन्ध में स्थित है।
इस दृष्टि से “ममैवांशः” का अर्थ परमात्मा के साथ जीव की गहरी आश्रित-अभिन्नता के रूप में समझा जा सकता है।
यहाँ एकता और भिन्नता दोनों को किसी रूप में स्थान मिलता है।
द्वैत की सम्भावना
द्वैत परम्परा जीव और ईश्वर के भेद को वास्तविक मानती है।
ईश्वर स्वतन्त्र है।
जीव आश्रित है।
जीव कभी परमात्मा का पूर्ण अभेदस्वरूप नहीं बनता।
इस दृष्टि से “ममैवांशः” को भौतिक अंश नहीं, बल्कि ईश्वर पर निर्भर जीव-सत्ता के अर्थ में समझा जा सकता है।
इसलिए एक ही गीता-पाठ से विभिन्न वेदान्त परम्पराएँ अपने-अपने दार्शनिक तन्त्र निर्मित करती हैं।
यह विरोध केवल मतभेद नहीं है।
यह भारतीय दर्शन की एक विशेषता है कि एक ही मूल पाठ पर अनेक संगत दार्शनिक व्याख्याएँ विकसित हुईं।
Contradiction — यदि जीव परमात्मा है तो अज्ञान किसका?
अद्वैत के सामने एक कठिन प्रश्न उठता है।
यदि जीव वास्तव में ब्रह्म ही है, तो अज्ञान किसे हुआ?
यदि ब्रह्म पूर्ण ज्ञानस्वरूप है, तो अज्ञान की सम्भावना कहाँ?
और यदि अज्ञान वास्तविक है, तो अद्वैत कैसे बचता है?
दूसरी ओर यदि जीव और ईश्वर सर्वथा अलग हैं, तो—
ईश्वर का जीव के भीतर होना कैसे समझाया जाए?
और यदि दोनों में कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं, तो भक्ति और मोक्ष का आधार क्या होगा?
इसी प्रकार यदि जीव ईश्वर का अंश है, तो—
क्या परमात्मा विभाज्य है?
ये प्रश्न केवल आधुनिक आलोचना नहीं हैं। भारतीय दर्शन ने सदियों तक इन्हें अत्यन्त सूक्ष्म तर्कों के साथ विचार किया है।
इसलिए गीता के इस प्रश्न को सरल उत्तर में समाप्त करना उचित नहीं होगा।
गीता का एक और महत्वपूर्ण सूत्र
कृष्ण कहते हैं—
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥— भगवद्गीता 18.61
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
यहाँ दो स्तर एक साथ दिखाई देते हैं—
जीव अनुभव कर रहा है।
ईश्वर भीतर स्थित है।
अब प्रश्न उठता है—
यदि ईश्वर भीतर स्थित है, तो मनुष्य अपने कर्मों के लिए कितना स्वतंत्र है?
क्या सब कुछ ईश्वर करा रहा है?
यदि ऐसा है तो कर्मफल और उत्तरदायित्व का क्या अर्थ?
और यदि मनुष्य स्वतंत्र है, तो ईश्वर की अन्तःस्थिति का अर्थ क्या?
यह प्रश्न अगले भागों में कर्म और पुनर्जन्म के साथ फिर सामने आएगा।
Creation — सम्बन्ध ही शायद मुख्य प्रश्न है
हो सकता है कि “एक या अलग?” यह प्रश्न ही पूर्ण न हो।
क्योंकि सम्बन्ध हमेशा केवल गणितीय समानता या असमानता से निर्धारित नहीं होता।
एक दीपक से अनेक दीपक जल सकते हैं।
प्रकाश अनेक स्थानों पर दिखाई दे सकता है।
स्रोत और अभिव्यक्ति में सम्बन्ध है।
लेकिन उदाहरण स्वयं दार्शनिक प्रमाण नहीं।
गीता का संकेत इतना अवश्य है कि जीव को परम सत्ता से काटकर नहीं समझा जा सकता।
वह शरीर से अधिक है।
उसका अस्तित्व प्रकृति के साथ जुड़ा है।
और उसका अंतिम आधार किसी व्यापक चेतना या परम सत्ता में रखा गया है।
यही बिन्दु हमारे पिछले प्रश्न से जुड़ता है—
व्यक्ति और सम्पूर्ण के बीच सम्बन्ध क्या है?
अर्जुन की समस्या व्यक्तिगत थी।
कृष्ण का उत्तर सार्वभौम।
युद्ध अर्जुन का था।
लेकिन प्रश्न मनुष्य का था।
और उत्तर चेतना का।
अर्जुन का रूपान्तरण
गीता के आरम्भ में अर्जुन अपने सम्बन्धों से बँधा हुआ है।
“ये मेरे हैं।”
“ये गुरु हैं।”
“ये बन्धु हैं।”
इसलिए वह युद्ध को केवल बाहरी घटना नहीं, व्यक्तिगत विनाश के रूप में देखता है।
कृष्ण उसकी दृष्टि का विस्तार करते हैं।
पहले शरीर से आत्मा की ओर।
फिर आत्मा से कर्म की ओर।
फिर कर्म से प्रकृति की ओर।
फिर प्रकृति से परम सत्ता की ओर।
और अन्ततः—
व्यक्तिगत मोह से व्यापक धर्म की ओर।
यही गीता की आन्तरिक यात्रा है।
अर्जुन का समाधान यह नहीं कि उसकी भावनाएँ समाप्त हो गईं।
बल्कि यह कि अब वे उसके निर्णय की एकमात्र आधारशिला नहीं रहीं।
यहीं गीता का “योग” व्यवहार में दिखाई देता है।
अब गीता से बाहर आने का समय
यहाँ हमारी भीष्मपर्व-श्रृंखला का एक चरण पूरा होता है।
हमने गीता के माध्यम से आत्मा, कर्म, ज्ञान, प्रकृति, पुरुष, गुण, ध्यान, भक्ति, ईश्वर, अवतार और जीव–परमात्मा सम्बन्ध को देखा।
अब लगातार गीता के दार्शनिक प्रश्नों में जाना उचित नहीं होगा।
क्योंकि भीष्मपर्व केवल गीता नहीं है।
अब हमें उस विशाल युद्धभूमि पर लौटना है जहाँ कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया था।
वहाँ अठारह अक्षौहिणी सेना नहीं, बल्कि वास्तविक युद्ध-संगठन, व्यूह, सेनापति, योद्धा, शस्त्र, रणनीति और प्रतिदिन बदलती युद्ध-व्यवस्था हमारा विषय बनेगी।
और सबसे पहले प्रश्न होगा—
कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ वास्तव में कैसे व्यवस्थित थीं?
अक्षौहिणी की गणना हम पहले कर चुके हैं; अब देखना होगा कि उस संख्या को युद्धभूमि पर व्यवस्थित कैसे किया गया।
यहीं से भीष्मपर्व का दूसरा और अधिक ऐतिहासिक-पाठात्मक आयाम आरम्भ होगा—
कथा से युद्ध-इतिहास की ओर।
अगला भाग:
भीष्मपर्व — भाग 21 : कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि — अठारह अक्षौहिणी सेना वास्तव में कैसे व्यवस्थित हुई?
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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