महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 22 : क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — परिवर्तन के पार वह क्या है?
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 22 : क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — परिवर्तन के पार वह क्या है?
कृष्ण के स्वरूप पर विचार करते हुए एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—
यदि संसार निरन्तर बदल रहा है, शरीर बदल रहा है, मन बदल रहा है, विचार बदल रहे हैं और जीवन जन्म से मृत्यु की ओर बढ़ रहा है, तो क्या इस परिवर्तन के पीछे कोई ऐसा तत्त्व है जो स्वयं परिवर्तन से परे है?
और यदि ऐसा कोई तत्त्व है, तो क्या वही आत्मा है?
क्या वही परमात्मा है?
या इन दोनों के बीच भी कोई दार्शनिक अन्तर है?
भगवद्गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय इस प्रश्न को एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण त्रिभाजन के माध्यम से रखता है—
क्षर — अक्षर — पुरुषोत्तम। यहीं से गीता का दर्शन एक नये स्तर पर पहुँचता है।
क्षर और अक्षर
कृष्ण कहते हैं—
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ — भगवद्गीता 15.16
इस लोक में दो प्रकार के पुरुष कहे गए हैं—क्षर और अक्षर।
क्षर हैं सभी भूत अर्थात् परिवर्तनशील प्राणी-सत्ताएँ; और जो कूटस्थ है, वह अक्षर कहा जाता है।
यहाँ दो शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं— क्षर और अक्षर।
क्षर अर्थात् जो क्षरित होता है, बदलता है, नष्ट होता है।
अक्षर अर्थात् जो क्षरण से परे है। यह विभाजन केवल शरीर और आत्मा का सामान्य विभाजन नहीं है।
यह अस्तित्व को समझने की एक गहरी दार्शनिक पद्धति है।
जो कुछ परिवर्तनशील है—वह क्षर है।
जो परिवर्तन के बीच किसी स्थिर आधार की तरह स्थित है—वह अक्षर है।
लेकिन कृष्ण यहीं नहीं रुकते। वे आगे कहते हैं—
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥— भगवद्गीता 15.17
इन दोनों से परे एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा गया है; जो तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर उनका धारण करता है और अविनाशी ईश्वर है।
अब दर्शन का प्रश्न और गहरा हो जाता है। यदि क्षर है और अक्षर है, तो इनके पार पुरुषोत्तम कौन है?
अर्जुन की यात्रा में यह नया प्रश्न क्यों?
अब तक गीता ने अर्जुन को प्रकृति और पुरुष का विवेक कराया।
फिर जीव और परमात्मा का सम्बन्ध बताया।
फिर कृष्ण ने स्वयं को परम सत्ता के रूप में उद्घाटित किया।
विश्वरूप में अर्जुन ने उसी कृष्ण को काल और सम्पूर्ण विश्व के रूप में देखा।
अब प्रश्न है— इस सम्पूर्ण व्यवस्था की अन्तिम दार्शनिक संरचना क्या है?
क्या संसार ही सब कुछ है? क्या केवल उससे अलग कोई आत्मा है?
या आत्मा और संसार दोनों से भी कोई व्यापक परम तत्त्व है?
पन्द्रहवें अध्याय का उत्तर इसी दिशा में जाता है।
क्षर क्या है?
क्षर को सबसे पहले प्रत्यक्ष अनुभव से समझा जा सकता है। शरीर बदलता है। बालक युवा होता है। युवा वृद्ध होता है। कोशिकाएँ बदलती हैं। विचार बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। स्मृतियाँ बदलती हैं। सम्बन्ध बदलते हैं। सभ्यताएँ बदलती हैं। राज्य बदलते हैं।
और अन्ततः सम्पूर्ण दृश्य जगत परिवर्तन के अधीन है।
इस अर्थ में क्षरता अस्तित्व की परिवर्तनशीलता है। महाभारत स्वयं क्षरता का विराट आख्यान है।
हस्तिनापुर की सत्ता बदलती है। राजवंश समाप्त होते हैं। महान योद्धा मरते हैं। सम्बन्ध टूटते हैं। विजेता भी अन्ततः मृत्यु के सामने खड़ा होता है।
भीष्म जैसे महायोद्धा भी शरशय्या पर पड़े हैं।
द्रोण, कर्ण, अभिमन्यु जैसे महापुरुष भी काल से बच नहीं पाते।
महाभारत का पूरा युद्ध मानो एक ही तथ्य को सामने रखता है— जो दिखाई देता है, वह स्थायी नहीं है।
यही क्षर है।
अक्षर — परिवर्तन के बीच अपरिवर्तन
लेकिन यदि सब कुछ बदलता है, तो परिवर्तन का बोध किसे है?
यदि विचार बदलता है, तो विचार के बदलने को जानने वाला क्या स्वयं उसी क्षण बदल गया?
यदि मन में क्रोध आता है और चला जाता है, तो उस क्रोध के आने-जाने को देखने वाली चेतना क्या स्वयं क्रोध बन गई?
ध्यान के पिछले भागों में हम इसी साक्षी की ओर बढ़ चुके हैं।
गीता अब उसे एक व्यापक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में रखती है।
कूटस्थ अक्षर—जो परिवर्तनशील प्रवाह के बीच स्थिर आधार के रूप में समझा जाता है।
यहाँ “कूटस्थ” शब्द भी महत्वपूर्ण है।
कूट का एक अर्थ निहाई या ऐसा स्थिर आधार है जिस पर प्रहार होते हैं, लेकिन वह स्वयं उसी प्रकार परिवर्तित नहीं होता।
इसलिए अक्षर को समझने का एक मार्ग है— परिवर्तन को जानने वाली स्थिर चेतना।
लेकिन यहाँ भी सावधानी चाहिए।
गीता के इस पद को सीधे किसी एक बाद के दार्शनिक सिद्धान्त के बराबर रख देना उचित नहीं होगा। अलग-अलग वेदान्त परम्पराएँ क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम की व्याख्या अलग प्रकार से करती हैं।
मूल पाठ पहले है; दार्शनिक व्याख्या उसके बाद।
सांख्य का पुरुष और गीता का अक्षर
सांख्य में पुरुष परिवर्तनशील प्रकृति से भिन्न है। प्रकृति में महत्, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ और अन्य विकार आते हैं।
पुरुष स्वयं विकाररहित चेतन तत्त्व है। गीता में भी ऐसा विभाजन मिलता है।
लेकिन गीता यहीं रुकती नहीं। वह कहती है— उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः।
एक और पुरुष है—उत्तम पुरुष।
यही बिन्दु गीता को सांख्य के पार एक व्यापक ईश्वर-दर्शन की ओर ले जाता है।
इसलिए गीता को केवल सांख्य का पुनर्लेखन मानना पर्याप्त नहीं।
गीता सांख्य के अनेक तत्त्वों को ग्रहण करती है, लेकिन उन्हें एक व्यापक ईश्वर-केन्द्रित और योग-केन्द्रित दर्शन में पुनर्संगठित करती है।
पुरुषोत्तम — तीसरा आयाम
कृष्ण आगे कहते हैं—
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥— भगवद्गीता 15.18
मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ; इसलिए लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।
यहाँ कृष्ण अपने स्वरूप को केवल अक्षर के रूप में नहीं रखते।
वे कहते हैं— क्षर से परे और अक्षर से भी परे। इसका अर्थ क्या है?
यही इस अध्याय का सबसे कठिन प्रश्न है।
यदि क्षर संसार है और अक्षर उससे परे चेतन आधार है, तो पुरुषोत्तम क्या इन दोनों को धारण करने वाला परम तत्त्व है?
गीता की संरचना इस दिशा में संकेत करती है।
इसलिए पुरुषोत्तम को केवल “एक और व्यक्ति” मान लेना भी पर्याप्त नहीं।
यहाँ कृष्ण अपने स्वरूप को सम्पूर्ण अस्तित्व के परम आधार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
यदि अक्षर ही अविनाशी है तो उससे भी ऊपर क्या?
यहीं दार्शनिक कठिनाई पैदा होती है। यदि अक्षर अविनाशी है, तो पुरुषोत्तम उससे ऊपर कैसे?
क्या दो अविनाशी तत्त्व हो सकते हैं?
या “अक्षर” का अर्थ यहाँ किसी विशिष्ट दार्शनिक स्तर पर है और “पुरुषोत्तम” उसका भी परम आधार है?
यही कारण है कि इस श्लोक की व्याख्या परम्पराओं में भिन्न हुई।
अद्वैत परम्परा में इसे परम ब्रह्म की ओर संकेत करते हुए समझा जाता है।
विशिष्टाद्वैत में पुरुषोत्तम को सर्वोच्च व्यक्तिगत परमात्मा और जीव-जगत् के आधार के रूप में समझा जाता है।
द्वैत में ईश्वर की सर्वोच्चता और जीव-जगत् से वास्तविक भिन्नता पर बल रहता है।
अर्थात्— श्लोक एक है, लेकिन दार्शनिक व्याख्या की दिशाएँ अनेक हैं।
महाभारत के शोध में इस बहुलता को समस्या नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की बौद्धिक परम्परा की विशेषता के रूप में देखना चाहिए।
एक अस्तित्व-मानचित्र
यदि गीता के इन तीन शब्दों को एक अस्तित्व-मानचित्र की तरह देखें, तो एक संरचना बनती है—
क्षर — जो बदल रहा है।
अक्षर — जो परिवर्तन के बीच स्थिर आधार के रूप में है।
पुरुषोत्तम — जो क्षर और अक्षर दोनों का परम आधार है।
अब इसे मनुष्य के अनुभव में रखें।
शरीर बदल रहा है—क्षर।
मन बदल रहा है—क्षर।
विचार बदल रहे हैं—क्षर।
व्यक्तित्व बदल रहा है—क्षर।
इन सबको जानने वाली चेतना—अक्षर की दिशा में प्रश्न खोलती है।
लेकिन वह चेतना स्वयं किस परम सत्ता में स्थित है?
यह प्रश्न पुरुषोत्तम की ओर ले जाता है।
यहीं गीता का दर्शन व्यक्तिगत आत्मबोध से सार्वभौम सत्ता तक पहुँचता है।
पुरुषोत्तम और कृष्ण
अब भाग 18 में उठाया गया प्रश्न फिर सामने आता है—
कृष्ण कौन हैं?
भाग 18 में हमने देखा कि कृष्ण स्वयं को सम्पूर्ण अस्तित्व के उद्गम के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अब पन्द्रहवें अध्याय में वे कहते हैं—
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ।
दोनों कथनों को साथ रखें तो गीता में कृष्ण की स्थिति और स्पष्ट होती है।
कृष्ण केवल ऐतिहासिक कथा के भीतर उपस्थित व्यक्ति नहीं रह जाते।
गीता के दार्शनिक स्तर पर वे पुरुषोत्तम के रूप में स्वयं को उद्घाटित करते हैं।
यही वह बिन्दु है जहाँ कृष्ण-कथा और ब्रह्मविद्या एक-दूसरे में प्रवेश करती हैं।
पुरुषोत्तम को जानने का परिणाम
कृष्ण आगे कहते हैं—
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥— भगवद्गीता 15.19
जो मोह से मुक्त होकर मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह मुझे सम्पूर्ण भाव से भजता है।
यहाँ फिर ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
पहले प्रश्न था— भक्ति या ज्ञान?
अब गीता कहती हुई प्रतीत होती है— पुरुषोत्तम का यथार्थ ज्ञान स्वयं भक्ति में परिणत होता है।
और यह भक्ति अज्ञान से उत्पन्न भय या अन्धविश्वास की भक्ति नहीं है।
वह समझ से उत्पन्न सम्बन्ध है।
मनुष्य पहले पहचानता है कि उसका अस्तित्व किसी व्यापक व्यवस्था से जुड़ा है।
फिर उसी व्यापक सत्ता के प्रति श्रद्धा और समर्पण विकसित होता है।
पुरुषोत्तम और आत्मसन्तुलन की दृष्टि
यहाँ एक ऐसी बात सामने आती है जो हमारे सम्पूर्ण अध्ययन को जोड़ती है।
यदि मनुष्य केवल क्षर को ही सत्य मानता है, तो वह परिवर्तन में फँस जाता है।
शरीर, धन, प्रतिष्ठा, सम्बन्ध, सफलता—सबके साथ उसकी पहचान बनती जाती है।
यदि वह केवल अक्षर की खोज में संसार को नकार देता है, तो जीवन और कर्म से उसका सम्बन्ध कमजोर हो सकता है।
गीता तीसरा मार्ग प्रस्तुत करती है—
क्षर में रहते हुए अक्षर को पहचानना और पुरुषोत्तम में अपना परम आश्रय देखना।
यही समत्व की गहरी भूमि है। यही कर्मयोग को आधार देता है। यही भक्ति को अन्धश्रद्धा बनने से रोकता है।
और यही ज्ञान को केवल बौद्धिक अभ्यास बनने से बचाता है।
महाभारत के लिए इसका अर्थ
अब कुरुक्षेत्र को फिर से देखें। अर्जुन के सामने क्षर संसार है। योद्धा मरेंगे। राज्य बदलेंगे। वंश समाप्त होंगे।
विजय भी क्षणिक होगी।
लेकिन कृष्ण अर्जुन को केवल इस क्षर संसार की गणना करने को नहीं कहते।
वे उसे उस सत्ता की ओर देखते हैं जो इस परिवर्तनशील जगत के पीछे है।
और फिर उससे कर्म करने को कहते हैं।
यहीं गीता का एक अद्भुत विरोधाभास सामने आता है—
जो जानता है कि सब क्षर है, वही सबसे अधिक सजग होकर कर्म करता है।
क्योंकि उसके लिए कर्म का अर्थ व्यक्तिगत स्वार्थ की रक्षा नहीं रह जाता।
कर्म व्यापक व्यवस्था में अपनी भूमिका निभाना बन जाता है। यही अर्जुन के परिवर्तन का आधार है।
शोध की अगली समस्या
लेकिन अभी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बाकी है।
यदि पुरुषोत्तम परम सत्ता है, तो संसार उससे किस प्रकार सम्बन्धित है?
क्या संसार पुरुषोत्तम से उत्पन्न है?
क्या वह उसकी शक्ति है?
क्या वह उसकी प्रकृति है?
क्या जीव उसी परम सत्ता का अंश है?
और यदि सब कुछ उसी से है, तो अधर्म कहाँ से आता है?
यदि परम सत्ता धर्म का आधार है, तो दुर्योधन जैसा अधर्म किस प्रकार उत्पन्न होता है?
यदि कृष्ण स्वयं धर्मसंस्थापन के लिए आते हैं, तो धर्म और अधर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है?
यहीं से गीता का दर्शन पुनः मनुष्य के भीतर लौटता है। क्योंकि अधर्म केवल बाहर का युद्ध नहीं है।
दुर्योधन बाहर भी है और मनुष्य के भीतर भी।
और कृष्ण केवल कुरुक्षेत्र के सारथी नहीं—
मनुष्य की चेतना के भीतर धर्म की दिशा दिखाने वाला विवेक भी हैं।
अब अगला प्रश्न होगा—
“दैवी और आसुरी सम्पदा — मनुष्य के भीतर धर्म और अधर्म कैसे बनते हैं?”
यहीं महाभारत का युद्ध बाहरी कुरुक्षेत्र से निकलकर मानव-चेतना के कुरुक्षेत्र में प्रवेश करेगा।
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