महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 23 : दैवी और आसुरी सम्पदा — धर्म और अधर्म मनुष्य के भीतर कैसे बनते हैं?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 23 : दैवी और आसुरी सम्पदा — धर्म और अधर्म मनुष्य के भीतर कैसे बनते हैं?

महाभारत का युद्ध बाहर दिखाई देता है।

एक ओर पाण्डव हैं, दूसरी ओर कौरव। एक ओर कृष्ण हैं, दूसरी ओर दुर्योधन।

लेकिन यदि गीता को केवल युद्ध की बाहरी कथा मानकर पढ़ा जाए, तो उसका सबसे गहरा प्रश्न छूट जाता है।

क्योंकि कुरुक्षेत्र केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं है।

वह मनुष्य के भीतर धर्म और अधर्म की सम्भावनाओं का भी संघर्ष है।

भाग 22 में हमने क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का विवेचन किया था। अब प्रश्न यह है कि पुरुषोत्तम की ओर जाने वाली चेतना और उससे विमुख होने वाली चेतना में अन्तर कैसे पहचाना जाए?

गीता इसके लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विभाजन करती है—

दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा।

यहाँ “दैवी” और “आसुरी” को किसी जाति, समुदाय या बाहरी प्राणी के रूप में समझना गीता के आशय को छोटा कर देगा।

यह मनुष्य के भीतर उपस्थित चेतना की प्रवृत्तियों का विवेचन है।

दैवी सम्पदा

गीता के सोलहवें अध्याय का आरम्भ होता है—

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
— भगवद्गीता 16.1–3

अभय, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान में स्थित होना, दान, संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, करुणा, अलोलुपता, कोमलता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अतिमानिता का अभाव—इन गुणों को दैवी सम्पदा कहा गया है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि कृष्ण यहाँ किसी बाहरी पहचान की सूची नहीं दे रहे।

वे व्यवहार और अन्तःकरण की गुणवत्ता बता रहे हैं।

अर्थात् दैवीता जन्म से नहीं, चेतना के गुणों से पहचानी जाती है।

अर्जुन के प्रश्न से इसका सम्बन्ध

अर्जुन ने युद्ध के प्रारम्भ में कहा था—

“मैं अपने ही लोगों को कैसे मारूँ?”

उसका प्रश्न करुणा से उत्पन्न हुआ था, लेकिन उसमें मोह भी मिला हुआ था।

कृष्ण ने उसे यह नहीं कहा कि करुणा गलत है। उन्होंने उसके मोह और धर्मबोध के बीच अन्तर कराया।

यहीं गीता का मनोवैज्ञानिक पक्ष सामने आता है। हर कोमल भावना धर्म नहीं होती।

हर कठोर निर्णय अधर्म नहीं होता। हर त्याग वास्तविक त्याग नहीं होता।

हर धार्मिक अनुष्ठान धर्म की गारंटी नहीं है।

इसलिए गीता बाहरी व्यवहार से अधिक प्रेरणा और चेतना की अवस्था को देखती है।

यही कारण है कि दैवी और आसुरी सम्पदा का विवेचन कुरुक्षेत्र के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

दैवीता क्या है?

यदि दैवी सम्पदा के सभी गुणों को एक सूत्र में बाँधें, तो उनमें एक सामान्य दिशा दिखाई देती है—

अहंकार का संकुचन और चेतना का विस्तार।

अभय का अर्थ केवल भय का अभाव नहीं।

यह उस आन्तरिक असुरक्षा का कम होना है जो मनुष्य को लगातार स्वयं को सिद्ध करने के लिए प्रेरित करती है।

सत्य केवल सही बात बोलना नहीं।

यह वास्तविकता को अपने पक्ष में मोड़ने की आवश्यकता से मुक्त होना भी है।

अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा न करना नहीं।

यह दूसरे को केवल अपने स्वार्थ की वस्तु न मानना भी है।

अद्रोह केवल शत्रुता का अभाव नहीं।

यह दूसरे की असफलता से अपने अहंकार को पोषण न देना भी है।

और नातिमानिता—अत्यधिक आत्म-महत्त्व का अभाव—पूरे विवेचन की धुरी जैसा दिखाई देता है।

मनुष्य जितना स्वयं को सम्पूर्ण सत्य का केन्द्र मानता है, उतना ही उसका दृष्टिकोण संकुचित होता जाता है।

आसुरी सम्पदा — बाहरी राक्षस नहीं

इसके विपरीत कृष्ण कहते हैं—

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥— भगवद्गीता 16.4

दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान—ये आसुरी सम्पदा के लक्षण हैं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होता है। आसुर कोई बाहर रहने वाला प्राणी नहीं।

आसुरी वृत्ति मनुष्य के भीतर की चेतना की अवस्था है।

दुर्योधन इसलिए केवल ऐतिहासिक पात्र नहीं रह जाता। वह एक मनोवैज्ञानिक प्रश्न भी बन जाता है—

जब मनुष्य अपने अहंकार को सत्य से ऊपर रख देता है, तब उसके भीतर क्या घटता है?

दुर्योधन और आसुरी वृत्ति

महाभारत में दुर्योधन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है—अपने अधिकार और इच्छा को सर्वोच्च मानना।

वह पाण्डवों के साथ सत्ता बाँटने के प्रश्न को स्वीकार नहीं करता।

कृष्ण शान्ति का प्रस्ताव लेकर आते हैं। अन्ततः पाँच ग्राम तक की बात सामने आती है।

लेकिन संघर्ष का समाधान नहीं होता। यहाँ महाभारत और गीता को साथ रखकर एक गहरी संरचना दिखाई देती है।

जब “मुझे क्या चाहिए” इतना शक्तिशाली हो जाए कि “धर्म क्या है” उसका महत्व खो दे, तब संघर्ष अपरिहार्य होने लगता है।

इसे केवल दुर्योधन पर लागू करना पर्याप्त नहीं। यही प्रश्न हर मनुष्य के लिए है।

जहाँ इच्छा विवेक पर अधिकार कर लेती है, वहाँ भीतर का कुरुक्षेत्र प्रारम्भ हो जाता है।

आसुरी चेतना की मनोवैज्ञानिक श्रृंखला

गीता पहले भी एक ऐसी श्रृंखला बता चुकी है—

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ — भगवद्गीता 2.62–63

विषय पर बार-बार विचार → संग → कामना → क्रोध → मोह → स्मृति का भ्रम → बुद्धि का नाश → पतन।

अब सोलहवें अध्याय की आसुरी सम्पदा को इस श्रृंखला से जोड़ें।

आसुरी वृत्ति अचानक उत्पन्न नहीं होती। वह धीरे-धीरे बन सकती है।

अत्यधिक इच्छा → अधिकार-बोध → अहंकार → विरोध → क्रोध → कठोरता → विवेक का क्षय।

इस प्रकार गीता केवल नैतिक उपदेश नहीं देती।

वह मनुष्य के भीतर अधर्म के बनने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी सामने रखती है।

 क्या दैवी और आसुरी मनुष्य दो अलग प्रकार हैं?

नहीं तो प्रश्न उठेगा कि क्या मनुष्य जन्म से ही दैवी या आसुरी होता है?

गीता की संरचना को देखें तो ऐसा निष्कर्ष आवश्यक नहीं।

एक ही व्यक्ति में क्रोध भी हो सकता है और करुणा भी।

वह किसी परिस्थिति में सत्य बोल सकता है और दूसरी परिस्थिति में स्वयं को धोखा दे सकता है।

वह दान कर सकता है और उसी समय अहंकार भी पाल सकता है।

इसलिए दैवी और आसुरी सम्पदा को स्थायी जातीय या जैविक पहचान मानना उचित नहीं।

वे चेतना के गुणों और प्रवृत्तियों के रूप में अधिक सार्थक हैं। इसीलिए साधना सम्भव है।

यदि मनुष्य अपनी वृत्तियों को देख सकता है, तो उन्हें बदल भी सकता है। यही गीता की आशावादी धारणा है।

तीन द्वार

कृष्ण आगे एक अत्यन्त कठोर सूत्र देते हैं— 

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ — भगवद्गीता 16.21

काम, क्रोध और लोभ—ये आत्मविनाश के तीन द्वार हैं।

यहाँ “नरक” को केवल मृत्यु के बाद किसी स्थान के रूप में पढ़ना आवश्यक नहीं।

जीवन में भी ऐसी मानसिक अवस्थाएँ होती हैं जहाँ मनुष्य अपने ही भीतर पीड़ा, संघर्ष और विनाश पैदा करता है।

कामना पूरी न हो तो क्रोध। क्रोध बढ़े तो विवेक कम। लोभ बढ़े तो पर्याप्तता की अनुभूति समाप्त।

फिर प्राप्त वस्तु भी शान्ति नहीं देती। 

इस प्रकार मनुष्य बाहरी रूप से सफल होकर भी भीतर से असन्तुलित हो सकता है।

यही गीता की दृष्टि से वास्तविक पतन है।

धर्म का आन्तरिक विज्ञान

अब तक के भागों को जोड़ें तो गीता का धर्म किसी एक बाहरी नियम तक सीमित नहीं रहता।

कर्मयोग पूछता है—कर्म कैसे किया जाए?

ज्ञानयोग पूछता है—कर्ता कौन है?

ध्यानयोग पूछता है—मन को कैसे देखा जाए?

भक्तियोग पूछता है—अस्तित्व का सर्वोच्च सम्बन्ध किससे हो?

पुरुषोत्तम-विचार पूछता है—परम आधार क्या है?

और दैवी–आसुरी विवेचन पूछता है— इस ज्ञान के बाद मनुष्य बनेगा कैसा?

यही प्रश्न निर्णायक है।

यदि ज्ञान से विनम्रता नहीं आती, तो ज्ञान अभी पूर्ण नहीं।

यदि भक्ति से करुणा नहीं आती, तो भक्ति की परीक्षा बाकी है।

यदि ध्यान से प्रतिक्रिया पर नियंत्रण नहीं बढ़ता, तो ध्यान अभी जीवन में उतरा नहीं।

यदि धर्म मनुष्य को अधिक अहंकारी बना दे, तो वह धर्म के नाम पर कुछ और प्राप्त कर रहा है।

इसलिए गीता का धर्म अन्ततः चेतना के रूपान्तरण की माँग करता है।

कुरुक्षेत्र भीतर भी है

अब महाभारत के पात्रों को एक आन्तरिक मानचित्र की तरह पढ़ा जा सकता है।

यह कोई शाब्दिक या पारम्परिक व्याख्या नहीं, बल्कि एक दार्शनिक रूपक है।

दुर्योधन—अहंकार और अधिकार-बोध का प्रतीक बन सकता है।

शकुनि—विकृत रणनीति और छलपूर्ण बुद्धि का रूपक बन सकता है।

कर्ण—निष्ठा, पहचान और अपमान से निर्मित जटिल मनोविज्ञान का प्रश्न उठाता है।

अर्जुन—दुविधाग्रस्त विवेक का प्रतिनिधि बनता है।

भीष्म—प्रतिज्ञा और धर्म के बीच तनाव को सामने रखते हैं।

और कृष्ण—

विवेक को व्यापक धर्मबोध से जोड़ने वाली चेतना के रूप में उपस्थित होते हैं।

फिर कुरुक्षेत्र केवल इतिहास नहीं रहता।

वह मनुष्य के भीतर प्रतिदिन घटने वाली प्रक्रिया का रूपक बन जाता है।

लेकिन यहाँ भी सीमा याद रखना आवश्यक है।

महाभारत को केवल मनोवैज्ञानिक रूपक बना देना भी उसके ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक आयामों को नष्ट कर देगा।

महाभारत कथा भी है, इतिहास-स्मृति भी, दर्शन भी और रूपक की सम्भावना भी।

इनमें से किसी एक को बाकी सब पर थोपना उचित नहीं।

धर्म और आत्मसन्तुलन

यहीं हमारे व्यापक अध्ययन के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूत्र निकलता है—

धर्म केवल बाहरी आचरण का नाम नहीं; धर्म वह दिशा है जिसमें मनुष्य की चेतना अपने भीतर और बाहर संतुलन स्थापित करती है।

अत्यधिक कामना असंतुलन है। अत्यधिक क्रोध असंतुलन है। अत्यधिक लोभ असंतुलन है। अत्यधिक अहंकार असंतुलन है।

लेकिन इसका अर्थ निष्क्रियता नहीं।

दैवी सम्पदा में धैर्य है, पर दुर्बलता नहीं। अहिंसा है, पर अन्याय की स्वीकृति नहीं।

क्षमा है, पर विवेकहीन समर्पण नहीं। त्याग है, पर कर्तव्य से पलायन नहीं।

यही कारण है कि गीता का धर्म सरल “अच्छा बनो” वाला उपदेश नहीं है।

यह परिस्थिति, स्वभाव, कर्म, विवेक और चेतना के बीच संतुलन की माँग करता है।

अगला प्रश्न

अब तक कृष्ण ने अर्जुन को प्रकृति, पुरुष, आत्मा, परमात्मा, भक्ति, पुरुषोत्तम और दैवी–आसुरी वृत्तियों तक पहुँचा दिया।

लेकिन एक बड़ा प्रश्न अभी शेष है।

यदि मनुष्य के भीतर इच्छाएँ, संस्कार और गुण हैं, तो वह निर्णय कैसे करे कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

क्या केवल शास्त्र पर्याप्त है? क्या केवल विवेक पर्याप्त है?

क्या केवल अन्तःकरण की आवाज पर्याप्त है?

गीता इसका उत्तर एक और महत्त्वपूर्ण अवधारणा में देती है— श्रद्धा।

मनुष्य जैसा विश्वास करता है, उसका व्यक्तित्व उसी दिशा में बनने लगता है।

इसलिए अगला प्रश्न होगा—

“श्रद्धा कैसी, मनुष्य वैसा — क्या हमारी आस्था ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है?”

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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