महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 24 : श्रद्धा — मनुष्य जैसा मानता है, वैसा ही क्यों बनता है?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 24 : श्रद्धा — मनुष्य जैसा मानता है, वैसा ही क्यों बनता है?

दैवी और आसुरी सम्पदा के विवेचन के बाद गीता का प्रश्न और सूक्ष्म हो जाता है।

यदि मनुष्य के भीतर अलग-अलग प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं, तो उनका मूल कहाँ है?

एक मनुष्य सत्य, करुणा और संयम की ओर क्यों जाता है?

दूसरा लोभ, क्रोध और अहंकार की ओर क्यों?

क्या केवल बाहरी परिस्थितियाँ इसके लिए उत्तरदायी हैं?

या मनुष्य के भीतर कोई ऐसी गहरी मान्यता होती है जो धीरे-धीरे उसके विचार, व्यवहार और चरित्र को आकार देती है?

अर्जुन इसी प्रश्न को सामने रखता है।

श्रद्धा का प्रश्न

अर्जुन पूछते हैं—

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ — भगवद्गीता 17.1

हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र-विधि को छोड़कर श्रद्धा से युक्त होकर उपासना करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी है—सात्त्विक, राजसिक या तामसिक?

यह प्रश्न साधारण धार्मिक प्रश्न नहीं है। अर्जुन पूछ रहे हैं—

क्या श्रद्धा अपने आप में पर्याप्त है?

यदि किसी व्यक्ति को किसी बात पर गहरा विश्वास है, तो क्या केवल उस विश्वास के कारण वह सत्य हो जाता है?

कृष्ण का उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म है। 

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥ — भगवद्गीता 17.2

श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी—और वह मनुष्य के स्वभाव से उत्पन्न होती है।

यहाँ गीता श्रद्धा को अन्धविश्वास से अलग एक मनोवैज्ञानिक शक्ति के रूप में देखती है।

श्रद्धा और स्वभाव

भाग 12 में हमने त्रिगुणों को प्रकृति की तीन धाराओं के रूप में देखा था।

सत्त्व—प्रकाश और स्पष्टता की दिशा।

रजस्—गति, इच्छा और सक्रियता की दिशा।

तमस्—जड़ता, आवरण और अज्ञान की दिशा।

अब वही त्रिगुण श्रद्धा के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।

इसका अर्थ है— मनुष्य की श्रद्धा भी उसके अन्तःकरण की संरचना से प्रभावित होती है।

मन जैसा है, संसार की उसकी व्याख्या भी वैसी ही होने लगती है।

जिसका मन भय से भरा है, वह भय की दृष्टि से संसार को देख सकता है।

जिसका मन सत्ता और सफलता की आकांक्षा से संचालित है, वह धार्मिकता को भी उपलब्धि का साधन बना सकता है।

जिसका मन शान्त और विवेकशील है, उसकी श्रद्धा भी अधिक सूक्ष्म हो सकती है।

इसलिए श्रद्धा केवल बाहर से दी हुई चीज नहीं। उसका सम्बन्ध भीतर की संरचना से है।

“यो यच्छ्रद्धः स एव सः”

गीता का एक अत्यन्त प्रसिद्ध वाक्य है— 

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ — भगवद्गीता 17.3

हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके सत्त्व के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।

यहाँ “श्रद्धामयः पुरुषः” अत्यन्त गहरा मनोवैज्ञानिक सूत्र है।

मनुष्य केवल वही नहीं है जो वह बाहर से करता है। वह वह भी है जिसे वह भीतर से सत्य मानता है।

जिसे हम सर्वोच्च मूल्य मानते हैं, उसी के अनुरूप हमारे निर्णय बनने लगते हैं।

यदि किसी के लिए धन सर्वोच्च है, तो धन उसके जीवन का केन्द्र बन जाता है।

यदि प्रतिष्ठा सर्वोच्च है, तो प्रतिष्ठा उसके निर्णयों को नियंत्रित करने लगती है।

यदि ज्ञान सर्वोच्च है, तो उसका जीवन सीखने की दिशा में जाता है।

यदि परम सत्य सर्वोच्च है, तो उसकी चेतना का केन्द्र बदलने लगता है।

इस अर्थ में— श्रद्धा केवल विश्वास नहीं; वह जीवन की दिशा है।

श्रद्धा और आधुनिक मनोविज्ञान

आधुनिक मनोविज्ञान में भी यह देखा जाता है कि मनुष्य अपनी धारणाओं, मूल्यों और विश्वासों के अनुरूप सूचना को ग्रहण और व्याख्यायित करता है।

लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है।

गीता की “श्रद्धा” को किसी एक आधुनिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रत्यक्ष पर्याय मानना उचित नहीं।

दोनों की भाषाएँ अलग हैं। फिर भी एक संवाद सम्भव है।

आधुनिक मनोविज्ञान पूछ सकता है—

“मान्यता व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है?”

गीता पूछती है— “मनुष्य की मूल निष्ठा उसके सम्पूर्ण जीवन को किस प्रकार दिशा देती है?”

दोनों प्रश्नों में एक रोचक समानता है, लेकिन दोनों के दार्शनिक आधार समान नहीं हैं।

श्रद्धा का परीक्षण — उपासना से आगे

गीता श्रद्धा को केवल पूजा की पद्धति से नहीं जोड़ती। वह भोजन, यज्ञ, तप और दान तक उसके प्रभाव को देखती है।

सात्त्विक भोजन—

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ — भगवद्गीता 17.8

राजसिक भोजन अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन, उष्ण आदि बताया गया है।

तामसिक भोजन को बासी, अरुचिकर और अशुद्ध कहा गया है।

आज इन वर्गीकरणों को आधुनिक पोषण-विज्ञान की वैज्ञानिक तालिका मान लेना उचित नहीं होगा।

इनका मूल उद्देश्य केवल भोजन की कैलोरी या पोषण-संरचना बताना नहीं है।

गीता भोजन को चेतना और जीवन-पद्धति से जोड़ती है।

अर्थात्— हम क्या ग्रहण करते हैं, वह केवल शरीर ही नहीं, हमारी जीवन-शैली को भी प्रभावित करता है।

यज्ञ — बाहरी अनुष्ठान से आन्तरिक भाव तक

गीता तीन प्रकार के यज्ञ की बात करती है। 

सात्त्विक यज्ञ कर्तव्य-बोध और फलासक्ति के अभाव से जुड़ा है।

राजसिक यज्ञ फल और प्रदर्शन की इच्छा से।

तामसिक यज्ञ विधि-विहीनता और विवेकहीनता से।

यहाँ फिर वही सूत्र लौटता है— कर्म की बाहरी आकृति से अधिक उसकी आन्तरिक प्रेरणा महत्त्वपूर्ण है।

दो व्यक्ति एक ही दान कर सकते हैं। एक वास्तव में सहायता के लिए।

दूसरा प्रसिद्धि के लिए। बाहर से दोनों का कर्म समान दिखाई दे सकता है।

लेकिन चेतना की दिशा अलग है। यही गीता के कर्म-दर्शन की सूक्ष्मता है।

क्या श्रद्धा गलत भी हो सकती है?

यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि श्रद्धा मनुष्य की पहचान बनाती है, तो क्या हर श्रद्धा सम्मान के योग्य है?

गीता का उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” की दिशा में जाता है।

क्योंकि श्रद्धा भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक हो सकती है।

अर्थात्— विश्वास की तीव्रता सत्य का प्रमाण नहीं है।

कोई व्यक्ति किसी बात पर अत्यन्त दृढ़ विश्वास कर सकता है और फिर भी वह विश्वास अज्ञान, भय, लोभ या अहंकार से उत्पन्न हो सकता है।

यह बिन्दु आज के समय में विशेष महत्त्वपूर्ण है। धार्मिक क्षेत्र में भी। राजनीतिक क्षेत्र में भी। सामाजिक क्षेत्र में भी।

व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी।

किसी विचार के प्रति अत्यधिक भावनात्मक निष्ठा उस विचार की सत्यता सिद्ध नहीं करती।

गीता श्रद्धा को भी विवेक और गुणों के अधीन रखती है।

श्रद्धा और अन्धविश्वास में अन्तर

यहाँ एक आवश्यक अन्तर सामने आता है।

श्रद्धा किसी सत्य, मूल्य या उच्चतर सत्ता के प्रति गहरी आन्तरिक निष्ठा हो सकती है।

अन्धविश्वास वह स्थिति हो सकती है जिसमें व्यक्ति प्रमाण, विवेक और अनुभव की जाँच को पूरी तरह छोड़ देता है।

दोनों को एक मान लेना उचित नहीं। गीता में श्रद्धा ज्ञान से अलग नहीं है।

सत्रहवें अध्याय में ही कृष्ण कहते हैं— ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।

और पूरे गीता-संवाद में बार-बार श्रद्धा को विवेक, यज्ञ, तप, दान और आत्मसंयम से जोड़ा जाता है।

इसलिए गीता की स्वस्थ श्रद्धा वह नहीं जो प्रश्नों से डरती है। वह वह श्रद्धा है जो प्रश्न से गहरी होती जाती है। 

तप — श्रद्धा की अगली परीक्षा

कृष्ण शरीर, वाणी और मन के तप का भी विवेचन करते हैं।

शरीर का तप—

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ — भगवद्गीता 17.14

वाणी का तप— 

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ — भगवद्गीता 17.15

और मन का तप—

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥ — भगवद्गीता 17.16

यहाँ गीता एक अत्यन्त आधुनिक प्रतीत होने वाला प्रश्न पूछती है—

क्या हमारी आध्यात्मिकता हमारे शरीर, वाणी और मन में दिखाई देती है?

यदि कोई व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान करता है लेकिन उसकी वाणी लगातार दूसरों को पीड़ा देती है, तो तप कहाँ है?

यदि वह शास्त्र पढ़ता है लेकिन मन में अहंकार बढ़ता जाता है, तो स्वाध्याय का परिणाम क्या हुआ?

यदि उसकी पूजा बढ़ती है लेकिन क्रोध और लोभ भी बढ़ते हैं, तो साधना की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।

दान — देने की चेतना

गीता दान को भी तीन गुणों में देखती है। सात्त्विक दान कर्तव्यबुद्धि से, योग्य स्थान और समय में, फल की अपेक्षा के बिना किया जाता है।

राजसिक दान फल या प्रत्युपकार की अपेक्षा से।

तामसिक दान अनुचित स्थान, समय या पात्रता की उपेक्षा के साथ।

इसका गहरा अर्थ यह है कि— दान का मूल्य केवल दी गई वस्तु की मात्रा में नहीं, देने वाले की चेतना में भी है।

यहाँ फिर कर्म से अधिक भाव की परीक्षा होती है।

श्रद्धा से चरित्र तक

अब एक पूरा मनोवैज्ञानिक क्रम सामने आता है—

श्रद्धा → मूल्य → विचार → निर्णय → कर्म → संस्कार → चरित्र।

मनुष्य जिस पर विश्वास करता है, उसे महत्त्व देता है। जिसे महत्त्व देता है, उसी के आधार पर निर्णय लेता है।

निर्णय बार-बार दोहराए जाएँ तो कर्म की आदत बनती है। आदतें संस्कार बनाती हैं।

और संस्कार धीरे-धीरे चरित्र का निर्माण करते हैं। इसलिए गीता का कथन— “यो यच्छ्रद्धः स एव सः”

केवल धार्मिक वाक्य नहीं है। यह मनुष्य के व्यक्तित्व-निर्माण की एक गहरी दार्शनिक स्थापना है।

कुरुक्षेत्र में श्रद्धा

अब इसे अर्जुन पर लागू करें। अर्जुन की समस्या केवल यह नहीं थी कि उसे युद्ध करना है या नहीं।

उसकी मूल श्रद्धा भी संकट में थी। वह किसे सत्य माने?  कुलधर्म? क्षत्रियधर्म? करुणा? अहिंसा? राजधर्म?

गुरु के प्रति सम्मान? या कृष्ण की व्यापक धर्मदृष्टि?

गीता का पूरा संवाद अर्जुन की श्रद्धा को अन्धअनुकरण से विवेकपूर्ण निष्ठा की ओर ले जाता है।

अन्त में कृष्ण कहते हैं— विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ — भगवद्गीता 18.63

“इस सम्पूर्ण विचार को भली प्रकार विचार करके, जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा करो।”

यह वाक्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कृष्ण अर्जुन से केवल “मेरा आदेश मानो” नहीं कहते।

वे पहले सम्पूर्ण दर्शन देते हैं और अन्त में कहते हैं— विचार करो, फिर निर्णय लो।

यही गीता की श्रद्धा और विवेक का सम्बन्ध है। श्रद्धा विवेक का स्थान नहीं लेती।

वह विवेक को एक उच्चतर दिशा दे सकती है। महाभारत की व्यापक दृष्टि

अब महाभारत में दैवी और आसुरी संघर्ष को फिर देखें।

यह केवल पाण्डव बनाम कौरव नहीं।

एक ही व्यक्ति में भी दोनों प्रवृत्तियाँ हो सकती हैं।

भीष्म के भीतर प्रतिज्ञा की महानता है, लेकिन उसी प्रतिज्ञा के कारण उत्पन्न नैतिक जटिलता भी है।

कर्ण में उदारता और मित्रता है, लेकिन उसी के साथ दुर्योधन के प्रति ऐसी निष्ठा भी है जो उसे धर्म-संकट में खड़ा करती है।

अर्जुन में वीरता है, लेकिन मोह भी।

युधिष्ठिर में धर्मनिष्ठा है, लेकिन द्यूत की दुर्बलता भी।

इसलिए महाभारत मनुष्य को देव और दानव की सरल दो श्रेणियों में बाँटने वाला ग्रन्थ नहीं है।

वह मनुष्य की जटिलता को सामने रखता है।

और शायद यही कारण है कि महाभारत आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

अगला प्रश्न — तीन गुणों से भी आगे?

अब गीता की यात्रा एक और सीमा तक पहुँचती है।

हमने देखा— सत्त्व, रजस् और तमस् मनुष्य की श्रद्धा, कर्म, भोजन, तप और दान तक को प्रभावित करते हैं।

लेकिन यदि सत्त्व भी प्रकृति का ही एक गुण है, तो क्या मनुष्य को अन्ततः सत्त्व में ही स्थिर हो जाना चाहिए?

या सत्त्व को भी पार करना होगा? कृष्ण पहले ही कह चुके हैं— त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

यदि ऐसा है तो प्रश्न अब यह है— जो मनुष्य तीनों गुणों से ऊपर उठ गया, उसकी पहचान क्या होगी?

क्या वह कर्म करता है? क्या वह सुख-दुःख से प्रभावित होता है?

क्या उसमें इच्छा रहती है? क्या वह समाज में सक्रिय रहता है?

और यदि वह गुणातीत है, तो उसकी जीवन-शैली कैसी होती है?

यहीं से अगला भाग उठेगा— “गुणातीत — क्या मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठ सकता है?”

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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