महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 26 : स्वधर्म — यदि गुण प्रकृति चलाती है, तो मनुष्य की स्वतंत्रता कहाँ है?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 26 : स्वधर्म — यदि गुण प्रकृति चलाती है, तो मनुष्य की स्वतंत्रता कहाँ है?

कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के सामने सबसे कठिन प्रश्न केवल यह नहीं था कि युद्ध करना उचित है या अनुचित। उससे भी गहरा प्रश्न था—यदि मनुष्य के विचार, प्रवृत्तियाँ, संस्कार और कर्म प्रकृति के गुणों से प्रभावित होते हैं, तो फिर उसके निर्णय की स्वतंत्रता कहाँ है?

यदि सत्त्व, रजस् और तमस् ही मनुष्य को चलाते हैं, तो अर्जुन को निर्णय लेने के लिए क्यों कहा जा रहा है? और यदि सब कुछ प्रकृति कराती है, तो कर्म का फल, उत्तरदायित्व और धर्म किसके लिए?

यहीं भगवद्गीता का स्वधर्म का सिद्धान्त सामने आता है।

कृष्ण अर्जुन को केवल युद्ध करने का आदेश नहीं देते। वे पहले उसे प्रकृति, गुण, कर्म, बुद्धि, आत्मा और समत्व की दृष्टि समझाते हैं। उसके बाद स्वधर्म का प्रश्न आता है।

पाठ -भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं— 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ (गीता 3.35)

और अठारहवें अध्याय में यही विचार फिर आता है—

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ (गीता 18.47)

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण शब्द है—स्वभावनियतम्

अर्थात् ऐसा कर्म जो मनुष्य के स्वभाव से नियत या संबद्ध है।

लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है। स्वधर्म का अर्थ केवल जन्म से प्राप्त सामाजिक पहचान नहीं है। गीता के व्यापक संदर्भ में यह व्यक्ति की प्रकृति, क्षमता, प्रवृत्ति, परिस्थिति और उसके उत्तरदायित्व से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

प्रसंग

अर्जुन योद्धा है। लेकिन उसका संकट केवल इसलिए नहीं है कि युद्ध कठिन है।

उसके सामने अपने गुरु हैं, पितामह हैं, संबंधी हैं और मित्र हैं। युद्धभूमि में खड़े होकर उसके भीतर करुणा, मोह, कर्तव्य, भय और नैतिक संशय एक साथ सक्रिय हो जाते हैं।

इसलिए कृष्ण पहले अर्जुन को यह नहीं कहते कि— “तुम योद्धा हो, इसलिए लड़ो।”

वे उसकी दृष्टि बदलते हैं।

आत्मा की नित्यता, शरीर की परिवर्तनशीलता, कर्मयोग, समत्व, ज्ञान, प्रकृति, गुण, ध्यान, भक्ति और पुरुषोत्तम तक की यात्रा के बाद प्रश्न फिर कर्मभूमि पर लौटता है।

यह महत्त्वपूर्ण है।

गीता संसार से बाहर निकलने का दर्शन नहीं बनाती; वह ज्ञान प्राप्त करके संसार में कैसे कर्म किया जाए, इसका दर्शन बनती है।

स्वधर्म और स्वभाव

अठारहवें अध्याय में कृष्ण कहते हैं— 

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥ (गीता 3.33)

मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद भी अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करता है।

यहाँ एक गहरी बात छिपी है। ज्ञान का अर्थ यह नहीं कि प्रकृति समाप्त हो गई।

ज्ञान का अर्थ है— प्रकृति को प्रकृति के रूप में देखना।

पहले मनुष्य कहता है—  “मैं क्रोधित हूँ।” धीरे-धीरे वह देख सकता है— “मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न हुआ है।”

पहले— “मैं ऐसा ही हूँ।”

फिर— “मेरी प्रकृति ऐसी है, लेकिन मैं केवल अपनी प्रकृति नहीं हूँ।” यहीं से स्वतंत्रता का प्रारम्भ होता है।

प्रकृति कर्म कराती है, पर निर्णय कौन करता है?

गीता का एक अत्यन्त प्रसिद्ध वचन है— 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ (गीता 3.27)

प्रकृति के गुण सभी कर्म कराते हैं और अहंकार से मोहित मनुष्य सोचता है— “मैं कर्ता हूँ।”

यदि इस श्लोक को अकेले पढ़ा जाए तो ऐसा लग सकता है कि मनुष्य पूरी तरह नियत है।

लेकिन गीता यहीं नहीं रुकती।

वही कृष्ण अर्जुन से कहते हैं— उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। (गीता 6.5)

और अन्त में— इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ (गीता 18.63)

अर्थात्—  इस सम्पूर्ण ज्ञान पर विचार करके जैसा तुम्हें उचित लगे, वैसा करो।

यहीं गीता का एक अत्यन्त सूक्ष्म संतुलन दिखाई देता है।

प्रकृति मनुष्य को प्रभावित करती है, लेकिन विवेक उसे अपनी प्रकृति को देखने की क्षमता देता है।

नियति और स्वतंत्रता के बीच गीता

मनुष्य के भीतर दो स्तरों को अलग करना आवश्यक है।

एक है— प्रकृति का स्तर।

दूसरा है— द्रष्टा का स्तर।

प्रकृति में संस्कार हैं, गुण हैं, इच्छाएँ हैं, भय हैं, स्मृतियाँ हैं, सामाजिक परिस्थितियाँ हैं और शरीर की सीमाएँ हैं।

इन सबका प्रभाव निर्णय पर पड़ता है।

लेकिन जब मनुष्य इन प्रभावों को देखने लगता है, तब एक नया आयाम खुलता है।

वह अपनी इच्छा का गुलाम न रहकर अपनी इच्छा को देख सकता है।

क्रोध को देख सकता है। लोभ को देख सकता है। भय को देख सकता है। मोह को देख सकता है।

यहीं से साक्षीभाव और विवेक कर्म के भीतर प्रवेश करते हैं।

इसलिए गीता की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि— “मैं जो चाहूँ, वही कर सकता हूँ।”

बल्कि अधिक सूक्ष्म अर्थ यह है—

“मैं अपनी प्रकृति को पहचानकर उसके साथ अचेतन रूप से बहने के बजाय विवेकपूर्वक कर्म कर सकता हूँ।”

स्वधर्म क्या है?

स्वधर्म को तीन स्तरों पर समझना उपयोगी है।

पहला—स्वभाव। मनुष्य की प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ, क्षमताएँ और मानसिक संरचना।

दूसरा—स्वकर्म। उसकी वास्तविक जीवन-भूमिका और उससे जुड़े उत्तरदायित्व।

तीसरा—स्वविवेक।इन दोनों को देखकर उचित कर्म चुनने की क्षमता।

इस दृष्टि से स्वधर्म कोई स्थिर लेबल नहीं है। वह केवल यह नहीं है कि— “मैं कौन-सी जाति में जन्मा हूँ?”

बल्कि प्रश्न है—

“मैं कौन हूँ, मेरी प्रकृति क्या है, मेरी क्षमता क्या है, मेरे सामने कौन-सा उत्तरदायित्व है और इस परिस्थिति में सत्य एवं कल्याण के अनुरूप मेरा कर्म क्या है?”

स्वधर्म बनाम परधर्म

परधर्म का अर्थ केवल दूसरे का धार्मिक कर्म नहीं है।

दार्शनिक स्तर पर इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं—

जो मेरे वास्तविक स्वभाव और उत्तरदायित्व से असंगत है, उसे केवल आकर्षण, अनुकरण या सामाजिक दबाव में अपनाना।

मनुष्य प्रायः दूसरे के जीवन को देखकर अपने जीवन का मूल्यांकन करता है।

दूसरा व्यक्ति अधिक सफल दिखाई देता है। दूसरा अधिक प्रसिद्ध है।

दूसरे का जीवन अधिक सुविधाजनक दिखाई देता है।

और तब मनुष्य अपनी प्रकृति को छोड़कर दूसरे की भूमिका ग्रहण करना चाहता है।

गीता इस प्रवृत्ति से सावधान करती है।

क्योंकि— दूसरे का पूर्ण जीवन जीने से अपने अधूरे धर्म का पालन श्रेष्ठ हो सकता है।

लेकिन क्या स्वधर्म गलत कर्म को भी सही बना देता है?

यहाँ गीता की व्याख्या में एक गंभीर प्रश्न उठता है। यदि कोई कहे—

“मेरा स्वभाव ही क्रोध करना है, इसलिए क्रोध मेरा स्वधर्म है।”

या— “मुझे हिंसा पसंद है, इसलिए हिंसा मेरा स्वधर्म है।”

तो क्या इसे स्वीकार कर लिया जाए? नहीं।

क्योंकि गीता में स्वभाव और धर्म एक ही चीज नहीं हैं।

स्वभाव प्रकृति से उत्पन्न हो सकता है।

लेकिन धर्म का प्रश्न यह है कि उस स्वभाव का नियमन किस प्रकार किया जाए।

इसीलिए गीता गुणों की चर्चा करने के बाद गुणातीत होने की बात करती है।

मनुष्य का स्वभाव उसका प्रारम्भिक तथ्य हो सकता है; वह उसका अंतिम सत्य नहीं है।

स्वधर्म का आन्तरिक रूपान्तरण

यहीं कर्मयोग की शक्ति सामने आती है।

एक ही कर्म दो मनुष्यों द्वारा किया जा सकता है, लेकिन दोनों की आन्तरिक अवस्था भिन्न हो सकती है।

एक व्यक्ति कर्म करता है— फल के लिए।

दूसरा— अहंकार के लिए।

तीसरा— कर्तव्य-बोध से।

और चौथा— समत्व एवं समर्पण से।

बाहरी कर्म समान हो सकता है, लेकिन कर्म की चेतना बदल सकती है।

यही गीता का मौलिक योगदान है।

वह केवल यह नहीं पूछती— “तुम क्या कर रहे हो?”

वह यह भी पूछती है— “तुम किस चेतना से कर रहे हो?”

अर्जुन का वास्तविक परिवर्तन

गीता के प्रारम्भ में अर्जुन कहता है— न योत्स्य इति गोविन्दम्। वह युद्ध नहीं करना चाहता।

लेकिन गीता के अन्त में उसका स्वर बदल जाता है—

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥(गीता 18.73)

अर्थात्—

मेरा मोह नष्ट हो गया है, मेरी स्मृति लौट आई है, मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ; मैं आपके वचन के अनुसार कर्म करूँगा।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अर्जुन की यात्रा केवल—

“मैं युद्ध नहीं करूँगा” से “मैं युद्ध करूँगा”

तक की यात्रा नहीं है।

वास्तविक परिवर्तन है—

मोहित निर्णय से विवेकपूर्ण निर्णय तक।

कृष्ण ने अर्जुन से उसकी स्वतंत्रता नहीं छीनी।

उन्होंने उसे ज्ञान दिया और अन्ततः निर्णय उसी पर छोड़ा।

गुण, स्वधर्म और स्वतंत्रता का सम्बन्धअब पिछले तीन प्रसंग एक सूत्र में जुड़ते हैं।

गुण बताते हैं कि प्रकृति मनुष्य को कैसे प्रभावित करती है।

स्वभाव बताता है कि उस प्रभाव की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति कैसी है।

स्वधर्म बताता है कि उस स्वभाव और परिस्थिति में मनुष्य का उत्तरदायी कर्म क्या हो सकता है।

और विवेक यह सम्भव बनाता है कि मनुष्य प्रकृति के प्रभाव को देखकर उससे अंध रूप से संचालित न हो।

इसलिए गीता की दृष्टि में स्वतंत्रता प्रकृति के न होने में नहीं है।

स्वतंत्रता प्रकृति के प्रति जागरूक होने में है।

सांख्य से तुलना

सांख्य में प्रकृति और पुरुष का भेद मूल है।

प्रकृति परिवर्तनशील है; पुरुष द्रष्टा है।

अज्ञान में पुरुष स्वयं को प्रकृति के कार्यों से जोड़ लेता है।

विवेक से यह भेद स्पष्ट होता है।

गीता इस सांख्य-दृष्टि को स्वीकार करते हुए उसे कर्म और भक्ति के साथ जोड़ती है।

यहाँ केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि—

“मैं प्रकृति नहीं हूँ।”

जीवन में प्रश्न यह भी है—

“जब तक शरीर और प्रकृति सक्रिय हैं, तब तक मैं कैसे कर्म करूँ?”

गीता का उत्तर है— स्वधर्म, कर्मयोग, समत्व और ईश्वरार्पण।

आधुनिक मनुष्य के लिए प्रश्न

आज भी यही प्रश्न हमारे सामने है।

हमारे निर्णयों पर आनुवंशिक प्रवृत्तियाँ, परिवार, शिक्षा, समाज, आर्थिक परिस्थितियाँ, अनुभव, संस्कार और मानसिक आदतें प्रभाव डालती हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य पूर्णतः कठपुतली है।

और इसका अर्थ यह भी नहीं कि मनुष्य परिस्थितियों से पूरी तरह स्वतंत्र है।

मानवीय स्वतंत्रता को शायद इसी मध्य क्षेत्र में समझना अधिक उचित है—

परिस्थितियाँ हमें प्रभावित करती हैं; जागरूकता हमारे प्रत्युत्तर को बदल सकती है।

यही गीता का कर्मयोग आधुनिक भाषा में भी समझा जा सकता है।

साक्षी से कर्ता तक और कर्ता से साक्षी तक

गीता की यात्रा में एक रोचक विरोधाभास दिखाई देता है।

आरम्भ में अर्जुन कहता है— “मैं करूँ या न करूँ?”

फिर कृष्ण बताते हैं— “प्रकृति गुणों द्वारा कर्म कराती है।”

फिर कहते हैं— “कर्तृत्व के अहंकार से मुक्त हो।”

और अन्त में अर्जुन कहता है— “मैं करूँगा।” क्या यह विरोधाभास है? नहीं।

पहला “मैं” था— अहंकार का कर्ता।

अन्तिम “मैं” है— विवेक से निर्णय लेने वाला मनुष्य।

अर्थात् गीता अहंकार को हटाकर कर्म को समाप्त नहीं करती।

वह अहंकार को हटाकर कर्म को शुद्ध करती है।

यही स्वधर्म का गहरा अर्थ है।

सृष्टि की ओर

यदि मनुष्य अपनी प्रकृति से पूरी तरह संचालित नहीं है, लेकिन उससे पूरी तरह स्वतंत्र भी नहीं है, तो मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता कहाँ स्थित है?

उत्तर धीरे-धीरे स्पष्ट होता है—

प्रकृति में प्रवृत्ति है।
चेतना में प्रकाश है।
विवेक में चयन की क्षमता है।
कर्म में उसकी अभिव्यक्ति है।

इसलिए स्वधर्म कोई बंधन नहीं बनना चाहिए।

वह प्रकृति से चेतना की ओर जाने वाला मार्ग बन सकता है।

और यही प्रश्न अब गीता के अगले महत्वपूर्ण चरण को खोलता है—

यदि मनुष्य का स्वधर्म उसके स्वभाव से जुड़ा है, तो समाज में अलग-अलग स्वभाव और कर्मों की व्यवस्था कैसे बनी? क्या वर्ण जन्म से निर्धारित है या गुण और कर्म से?

यहीं से अगला प्रश्न उठता है— वर्ण — जन्म की व्यवस्था, गुण-कर्म की व्यवस्था या सामाजिक संरचना?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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