महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 27 : वर्ण — जन्म की व्यवस्था, गुण-कर्म की व्यवस्था या सामाजिक संरचना?

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 27 : वर्ण — जन्म की व्यवस्था, गुण-कर्म की व्यवस्था या सामाजिक संरचना?

स्वधर्म के प्रश्न के बाद गीता स्वयं एक और कठिन प्रश्न के सामने ले जाती है—मनुष्य का स्वभाव और उसका कर्म किस प्रकार निर्धारित होते हैं?

क्या मनुष्य का कर्म उसके जन्म से तय होता है?

क्या समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार जन्मजात वर्ग हैं?

या यह विभाजन मनुष्य के गुण और कर्म पर आधारित है?

और यदि गीता गुण और कर्म की बात करती है, तो बाद के भारतीय समाज में वर्ण और जाति की जटिल व्यवस्था कैसे विकसित हुई?

यह प्रश्न केवल सामाजिक इतिहास का नहीं है। यह गीता के प्रकृति, गुण, स्वभाव, कर्म और स्वधर्म सम्बन्धी पूरे दर्शन को समझने के लिए आवश्यक है।

भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं— 

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ (गीता 4.13)

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण पद है— गुणकर्मविभागशः।

अर्थात् चार वर्णों का विभाजन गुण और कर्म के आधार पर बताया गया है।

यहाँ “जन्म” शब्द इस श्लोक में नहीं है।

लेकिन केवल इस एक श्लोक से यह निष्कर्ष निकाल देना भी उचित नहीं होगा कि प्राचीन भारतीय समाज में जन्म का कोई महत्व नहीं था। ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था एक दार्शनिक सूत्र से कहीं अधिक जटिल थी।

इसलिए हमें तीन अलग-अलग स्तरों को अलग रखना होगा—

गीता का दार्शनिक वर्ण-विचार, धर्मशास्त्रीय सामाजिक व्यवस्था और ऐतिहासिक जाति-व्यवस्था।

इन तीनों को एक ही मान लेना शोध की पहली भूल होगी।

गुण और वर्ण

अठारहवें अध्याय में कृष्ण चारों वर्णों के कर्मों का वर्णन करते हैं— 

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ (गीता 18.42)

ब्राह्मण के स्वभावजन्य कर्मों में शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य बताए गए हैं।

फिर— 

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ (गीता 18.43)

क्षत्रिय के स्वभावजन्य कर्मों में शौर्य, तेज, धृति, दक्षता, युद्ध से न पलायन, दान और नेतृत्व-संबंधी गुण आते हैं।

वैश्य के लिए— कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। (गीता 18.44)

और शूद्र के लिए— परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥ (गीता 18.44)

यहाँ फिर एक शब्द महत्वपूर्ण है— स्वभावजम्। अर्थात् स्वभाव से उत्पन्न।

गीता की भाषा में वर्ण को केवल जन्म की पहचान के रूप में पढ़ना इसलिए पर्याप्त नहीं है।

वर्ण का मूल दार्शनिक प्रश्न

यदि हम गीता के क्रम को देखें तो पहले प्रकृति आती है।

प्रकृति से गुण। गुणों से स्वभाव। स्वभाव से कर्म। और कर्म से स्वधर्म।

इस क्रम में— गुण → स्वभाव → कर्म → स्वधर्म एक आन्तरिक सम्बन्ध दिखाई देता है।

वर्ण की चर्चा इसी पृष्ठभूमि में आती है। इसलिए गीता का मूल प्रश्न यह प्रतीत होता है कि—

मनुष्य की प्रकृति और उसके सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच क्या सम्बन्ध है?

यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।

किसी समाज में सभी मनुष्यों की क्षमताएँ, रुचियाँ और कार्य समान नहीं होते। लेकिन असमान क्षमता का अर्थ अनिवार्य रूप से असमान मानवीय मूल्य नहीं है।

यहीं गीता का एक महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है।

कर्म का मूल्य और मनुष्य का मूल्य

कृष्ण कहते हैं— स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। (गीता 18.45)

अपने-अपने कर्म में स्थित होकर मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

यहाँ कर्म की सामाजिक प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण है—

कर्म का निष्ठापूर्वक और समर्पित ढंग से किया जाना।

यदि समाज में कोई कार्य अत्यन्त प्रतिष्ठित और दूसरा साधारण माना जाए, तो भी गीता का कर्मयोग यह कहता है कि कर्म की आध्यात्मिक सार्थकता केवल बाहरी प्रतिष्ठा से निर्धारित नहीं होती।

यही कारण है कि कृष्ण कहते हैं— श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

अपने कर्म का अपूर्ण निर्वाह भी दूसरे के कर्म के अनुकरण से श्रेष्ठ हो सकता है।

यहाँ सामाजिक पदानुक्रम की अपेक्षा आत्मानुकूल कर्म और निष्ठा पर बल दिखाई देता है।

फिर जन्म कहाँ आता है?

यहीं इतिहास और दर्शन के बीच दूरी दिखाई देती है। गीता में गुण और कर्म की भाषा है।

लेकिन भारतीय सामाजिक इतिहास में आगे चलकर वर्ण और जाति एक जटिल संरचना में विकसित हुए।

वर्ण अपेक्षाकृत व्यापक वैचारिक वर्गीकरण था।

जाति या जाति-समुदाय स्थानीय, वंशगत, व्यवसायगत, वैवाहिक और सामाजिक नियमों से जुड़े अनेक समुदायों की वास्तविक व्यवस्था बनी।

इसलिए— वर्ण = जाति कह देना ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा।

इसी प्रकार— गीता का वर्ण = आधुनिक जाति-व्यवस्था मान लेना भी उचित नहीं।

दोनों के बीच ऐतिहासिक सम्बन्ध अवश्य है, लेकिन दोनों समान अवधारणाएँ नहीं हैं।

एक महत्वपूर्ण विरोधाभास

यदि वर्ण वास्तव में गुण और कर्म पर आधारित है, तो जन्म से वर्ण निर्धारित करने की सामाजिक परम्पराएँ कैसे बनीं?

यहीं शोध का वास्तविक क्षेत्र शुरू होता है।

किसी भी सामाजिक व्यवस्था में समय के साथ तीन प्रक्रियाएँ हो सकती हैं—

आदर्श → संस्थागत रूप → वंशगत स्थिरीकरण।

किसी भूमिका के लिए विशेष गुण और प्रशिक्षण आवश्यक हो सकते हैं।

फिर वही भूमिका किसी परिवार या समुदाय में पीढ़ियों तक चल सकती है।

धीरे-धीरे व्यवसाय वंशगत हो सकता है। फिर वंशगत व्यवसाय सामाजिक पहचान बन सकता है।

और अंततः वह पहचान जन्म से निर्धारित मानी जाने लग सकती है।

इस प्रकार जो व्यवस्था कभी कार्य-विभाजन रही हो, वह कालान्तर में जन्म-आधारित सामाजिक पहचान बन सकती है।

यह एक ऐतिहासिक सम्भावित प्रक्रिया है; इसे प्रत्येक काल और क्षेत्र पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

महाभारत में ही प्रश्न उपस्थित है

महाभारत इस प्रश्न को सरल नहीं रहने देता।

महाभारत के अनेक प्रसंगों में जन्म, कर्म, ज्ञान, तप, आचरण और सामाजिक पहचान के बीच तनाव दिखाई देता है।

विशेषतः विदुर, कर्ण, एकलव्य और युधिष्ठिर-नहुष संवाद जैसे प्रसंगों में जन्म और गुण के प्रश्न विभिन्न रूपों में सामने आते हैं।

इसलिए महाभारत को केवल एक कठोर, एकरेखीय सामाजिक सिद्धान्त का ग्रन्थ मानना कठिन है।

महाभारत की शक्ति ही यह है कि वह स्वयं अपने भीतर अनेक दृष्टियों का संघर्ष उपस्थित करता है।

एक ओर सामाजिक व्यवस्था है। दूसरी ओर उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाने वाले पात्र हैं।

एक ओर जन्म की पहचान है। दूसरी ओर ज्ञान, आचरण और कर्म की प्रतिष्ठा है।

यही महाभारत की जटिलता है।

कृष्ण की दृष्टि में मनुष्य का अंतिम परिचय

गीता में कृष्ण अन्ततः मनुष्य को उसके वर्ण से भी आगे ले जाते हैं।

चौदहवें अध्याय में वे कहते हैं— 

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ (गीता 14.20)

अर्थात् देह से उत्पन्न तीनों गुणों को पार करके मनुष्य जन्म, मृत्यु और जरा के दुःख से मुक्त होने की दिशा में जाता है।

यदि ऐसा है तो वर्ण मनुष्य का अंतिम आध्यात्मिक परिचय कैसे हो सकता है?

वह तो प्रकृति और सामाजिक कर्म के स्तर पर एक व्यवस्था है।

आत्मा के स्तर पर— न ब्राह्मण, न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र।

आत्मा का प्रश्न इन सामाजिक वर्गों से परे है। यही गीता के दर्शन की एक गहरी परत है।

वर्ण और आध्यात्मिक समानता

गीता पाँचवें अध्याय में कहती है— 

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ (गीता 5.18)

ज्ञानी व्यक्ति विद्या-विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और श्वपाक में समदृष्टि रखता है।

यहाँ “समदर्शिता” का अर्थ यह नहीं कि सभी की सामाजिक भूमिकाएँ बिल्कुल समान हैं।

अर्थ यह है कि ज्ञान की दृष्टि से मूल चेतना का मूल्य बाहरी देह और सामाजिक पहचान से निर्धारित नहीं होता।

यहीं गीता का सामाजिक और आध्यात्मिक स्तर अलग-अलग दिखाई देता है।

सामाजिक भूमिका भिन्न हो सकती है। आध्यात्मिक सत्ता में भेद नहीं।

क्या गुण बदल सकते हैं?

यदि वर्ण का आधार गुण और कर्म है, तो अगला प्रश्न अनिवार्य है—

क्या गुण स्थायी हैं? ता का उत्तर है—गुण गतिशील हैं।

सत्त्व, रजस् और तमस् निरन्तर परस्पर प्रभाव डालते हैं।

इसलिए मनुष्य की मानसिक अवस्था बदल सकती है।

तमस् से रजस्। रजस् से सत्त्व। और सत्त्व से भी आगे— गुणातीत अवस्था।

इस दृष्टि से मनुष्य को जन्म से स्थायी मानसिक खाँचे में बंद कर देना गीता के गुण-दर्शन के साथ सहज रूप से नहीं बैठता।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि ऐतिहासिक समाज में जन्म का कोई प्रभाव नहीं था।

दार्शनिक सिद्धान्त और सामाजिक व्यवहार को अलग-अलग पढ़ना आवश्यक है।

वर्ण से गुणातीत तक

यहाँ हमारी पिछली चर्चा फिर जुड़ती है।

यदि मनुष्य की पहचान केवल उसके गुणों से है, तो वह गुणातीत होने पर क्या होगा?

यदि उसका स्वधर्म केवल उसकी प्रकृति से निर्धारित है, तो प्रकृति से परे जाने पर उसका क्या होगा?

गीता का उत्तर है— स्वधर्म कर्म के स्तर पर है; आत्मस्वरूप उससे परे है।

मनुष्य कर्म करता है। लेकिन वह केवल कर्म नहीं है। उसकी प्रकृति है।

लेकिन वह केवल प्रकृति नहीं है। उसकी सामाजिक पहचान है।

लेकिन वह केवल सामाजिक पहचान नहीं है। यही गीता मनुष्य को बाहरी पहचान से आन्तरिक चेतना की ओर ले जाती है।

वर्ण-व्यवस्था का आधुनिक पाठ

आज वर्ण की चर्चा करते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है।

पहली अति— प्राचीन व्यवस्था को आधुनिक जाति-व्यवस्था के समान मान लेना।

दूसरी अति— ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव के अस्तित्व को केवल यह कहकर नकार देना कि गीता ने गुण-कर्म कहा है।

दोनों ही इतिहास को सरल बना देते हैं। एक शोधपूर्ण दृष्टि को तीन बातें साथ रखनी होंगी—

गीता का मूल पाठ, महाभारत का व्यापक सामाजिक संदर्भ और भारतीय इतिहास में वर्ण-जाति संस्थाओं का विकास।

इन तीनों को जोड़कर ही प्रश्न का संतुलित उत्तर सम्भव है।

सृष्टि : -वर्ण का मूल प्रश्न अंततः समाज का प्रश्न है।

समाज को कार्य चाहिए। कार्य के लिए क्षमता चाहिए। क्षमता के लिए प्रशिक्षण चाहिए। प्रशिक्षण से विशेषज्ञता आती है। विशेषज्ञता पीढ़ियों में स्थानांतरित हो सकती है।

लेकिन जहाँ कार्य-विभाजन जन्म-विभाजन बन जाता है, वहाँ एक नई सामाजिक समस्या उत्पन्न होती है।

गीता का “गुणकर्मविभागशः” इस प्रश्न को फिर से खोलता है—

क्या मनुष्य को उसके जन्म से पहचाना जाए या उसके गुण, कर्म और आचरण से?

और उससे भी आगे—

क्या किसी सामाजिक पहचान को मनुष्य की अंतिम पहचान माना जा सकता है?

गीता का उत्तर धीरे-धीरे हमें उस बिन्दु तक ले जाता है जहाँ सभी सामाजिक पहचानें पीछे छूटने लगती हैं।

वह बिन्दु है— आत्मस्वरूप।

लेकिन आत्मस्वरूप की यह अनुभूति केवल सामाजिक व्यवस्था के प्रश्न का उत्तर नहीं देती।

वह अगला और अधिक गहरा प्रश्न उठाती है—

यदि आत्मा सभी में एक है, तो सुख-दुःख, पाप-पुण्य, बन्धन-मोक्ष और कर्मफल में भेद क्यों दिखाई देता है?

यहीं से भीष्मपर्व की अगली दार्शनिक यात्रा शुरू होती है—

कर्मफल — यदि आत्मा अकर्ता है, तो कर्म का फल किसे मिलता है?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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