अध्याय 3.7 अनेक दृष्टियाँ, एक कथा : महाभारत किसकी दृष्टि से देखा जा रहा है?

अध्याय 3.7

अनेक दृष्टियाँ, एक कथा : महाभारत किसकी दृष्टि से देखा जा रहा है?

महाभारत को पढ़ते हुए एक विचित्र अनुभव होता है।

घटना वही रहती है, लेकिन उसके साथ हमारा संबंध बदलता रहता है।

एक सभा है।
द्यूत खेला जा चुका है।
युधिष्ठिर सब कुछ हार चुके हैं।
द्रौपदी को सभा में बुलाया गया है।

अब प्रश्न उठता है—इस घटना को देखा किसकी आँखों से जाए?

दुर्योधन के लिए यह सत्ता और विजय का क्षण है।

द्रौपदी के लिए यह अपमान और अधिकार का प्रश्न है।

युधिष्ठिर के लिए यह अपने निर्णय और उसके परिणाम का संकट है।

विदुर के लिए यह राजधर्म के पतन का क्षण है।

भीष्म के लिए यह धर्म की ऐसी उलझन है जिसका उत्तर तत्काल स्पष्ट नहीं हो रहा।

घटना एक है। अर्थ अनेक हैं।

यहीं महाभारत की कथा-पद्धति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।

द्यूतसभा : एक घटना, अनेक अनुभव

द्यूतसभा को केवल “द्रौपदी का अपमान” कह देना उसके पूरे कथात्मक तनाव को पकड़ नहीं पाता।

द्रौपदी सभा में प्रश्न करती हैं।

उनका प्रश्न केवल व्यक्तिगत पीड़ा से उत्पन्न नहीं होता। वह सभा में उपस्थित पुरुषों से, राजसत्ता से और उस व्यवस्था से प्रश्न करता है जिसने उन्हें दाँव पर लगाए जाने की स्थिति पैदा की।

दूसरी ओर सभा के वरिष्ठ पुरुष उपस्थित हैं।

वे घटना को देख रहे हैं, लेकिन उनकी प्रतिक्रियाएँ समान नहीं।

यहीं से पाठक के सामने एक असुविधाजनक प्रश्न आता है— किसकी दृष्टि को अंतिम माना जाए?

महाभारत इसका उत्तर किसी एक पात्र के हाथ में नहीं देता। 

वह सभी को बोलने और प्रतिक्रिया देने का अवसर देता है।

द्रौपदी का प्रश्न

द्रौपदी का प्रश्न महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में इसलिए नहीं है कि वह केवल एक विवाद का समाधान माँगती हैं।

उसमें तर्क की एक स्पष्ट संरचना है।

यदि युधिष्ठिर स्वयं को पहले ही हार चुके थे, तो क्या उसके बाद उन्हें द्रौपदी को दाँव पर लगाने का अधिकार था?

यह प्रश्न घटना को अचानक दूसरे स्तर पर ले जाता है।

अब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि— “द्रौपदी के साथ क्या हुआ?”

बल्कि— “किस अधिकार से हुआ?” और यही परिवर्तन महत्वपूर्ण है।

एक पीड़ित व्यक्ति का प्रश्न कानूनी और नैतिक प्रश्न में बदल जाता है।

भीष्म : धर्म का संकट

द्रौपदी के प्रश्न के सामने भीष्म की स्थिति विशेष ध्यान देने योग्य है।

वे धर्म के ज्ञाता माने जाते हैं। लेकिन यहाँ वे तत्काल कोई सरल उत्तर नहीं दे पाते।

यही प्रसंग महाभारत की एक बड़ी विशेषता को सामने लाता है।

जिस व्यक्ति से धर्म का उत्तर अपेक्षित है, वही किसी परिस्थिति में धर्म की सीमा को लेकर दुविधा में पड़ सकता है।

इससे पाठक को एक तैयार उत्तर नहीं मिलता।

उसे स्वयं सोचना पड़ता है— क्या शास्त्र का ज्ञान हर परिस्थिति में तत्काल निर्णय दे सकता है?

यदि नहीं, तो निर्णय का आधार क्या होगा?

विदुर : उसी सभा का दूसरा स्वर

उसी सभा में विदुर की दृष्टि अलग है।

वे आने वाले संकट को पहचानते हैं और धृतराष्ट्र को सावधान करते हैं।

इससे एक ही राजनीतिक परिस्थिति के भीतर दो प्रकार की दृष्टियाँ सामने आती हैं—

सत्ता के भीतर रहकर सत्ता का समर्थन करना, और सत्ता के भीतर रहकर उसके विरुद्ध चेतावनी देना।

महाभारत इन दोनों को एक ही दृश्य में रखता है।

पाठक को किसी आधुनिक टिप्पणीकार की आवश्यकता नहीं कि वह बताए कि यहाँ संघर्ष है।

संघर्ष स्वयं पात्रों की वाणी से दिखाई देता है।

धृतराष्ट्र : देखने वाला जो देख नहीं रहा

धृतराष्ट्र इस प्रसंग को एक और जटिलता देते हैं।

वे शारीरिक रूप से अंधे हैं, लेकिन महाभारत में उनका अंधत्व केवल शारीरिक स्थिति तक सीमित नहीं रहता।

वे घटनाओं को जानते हैं। उन्हें परिणामों का भय भी है।

फिर भी पुत्र-मोह उन्हें निर्णायक हस्तक्षेप से रोकता है।

इस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर भी दो दृष्टियाँ संघर्ष करती दिखाई देती हैं— जो उचित है उसका ज्ञान और जो प्रिय है उसके प्रति आसक्ति।

महाभारत यहाँ किसी सिद्धांत को पहले नहीं रखता। वह एक मनुष्य की स्थिति दिखाता है।

कर्ण : उसी घटना की दूसरी व्याख्या

कर्ण का दृष्टिकोण भी इस प्रसंग को और जटिल करता है।

वह द्रौपदी के प्रति कठोर भूमिका ग्रहण करता है।

यह वही कर्ण है जिसे बाद की कथा में हम दानवीर, मित्रनिष्ठ और महान योद्धा के रूप में भी देखते हैं।

अब प्रश्न उठता है— क्या किसी पात्र के कुछ श्रेष्ठ गुण उसके किसी अन्य कर्म को स्वतः उचित बना देते हैं?

महाभारत हमें कर्ण को केवल एक रंग में देखने की सुविधा नहीं देता।

उसका चरित्र जितना आकर्षक है, उतना ही नैतिक रूप से कठिन भी।

एक पात्र का मूल्यांकन एक घटना से क्यों नहीं हो सकता?

यहीं महाभारत का चरित्र-लेखन आधुनिक “नायक–खलनायक” की सरल संरचना से अलग दिखाई देता है।

भीष्म महान हैं—लेकिन क्या उनकी सभी भूमिकाएँ निर्विवाद हैं?

कर्ण उदार हैं—लेकिन क्या उदारता उनके सभी कर्मों को धर्मसंगत बना देती है?

युधिष्ठिर धर्मराज कहे जाते हैं—लेकिन क्या द्यूत में उनका निर्णय प्रश्नों से परे है?

अर्जुन महान योद्धा हैं—लेकिन क्या युद्ध में उनके सभी कर्म सरल नैतिक श्रेणी में रखे जा सकते हैं?

कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए कार्य करते हैं—लेकिन उनकी रणनीतियाँ क्या हमेशा सरल नियमों के भीतर समझी जा सकती हैं?

महाभारत इन प्रश्नों को बंद नहीं करता।

वह पात्र को उसके विरोधाभासों सहित सामने रखता है।

दृष्टि बदलते ही अर्थ बदलता है

अब एक सरल प्रयोग किया जा सकता है।

कुरुक्षेत्र को अर्जुन की दृष्टि से देखें।

वहाँ सामने शत्रु नहीं, गुरु, पितामह, भाई-बांधव और संबंधी हैं।

उसी युद्ध को दुर्योधन की दृष्टि से देखें।

वहाँ वह अपने राज्य और अधिकार की रक्षा का संघर्ष देख सकता है।

कृष्ण की दृष्टि से देखें तो समस्या का एक और आयाम सामने आता है।

युधिष्ठिर की दृष्टि से युद्ध का परिणाम अलग है।

द्रौपदी की दृष्टि से उस युद्ध की पृष्ठभूमि में द्यूतसभा और उसका अपमान भी उपस्थित है।

इसलिए— कथा वही है, लेकिन अनुभव का केंद्र बदलते ही उसका अर्थ बदल जाता है।

क्या महाभारत किसी एक पात्र की दृष्टि चुनता है?

यदि महाभारत केवल पांडवों की विजय की कथा होता, तो कथा अपेक्षाकृत सरल हो सकती थी।

लेकिन कौरव पक्ष को भी विस्तृत स्थान मिलता है।

भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा, गांधारी, धृतराष्ट्र—इन सबकी अपनी उपस्थिति है।

इससे विरोधी पक्ष केवल “दूसरे” नहीं रह जाते।

वे भी मनुष्य बनते हैं। उनकी इच्छाएँ हैं। उनके तर्क हैं। उनकी निष्ठाएँ हैं। उनकी भूलें हैं।

और यही महाभारत को नैतिक रूप से अधिक जटिल बनाता है।

कथा में दृष्टिकोण का बदलना

महाभारत का पाठक एक ही पात्र के साथ स्थायी रूप से नहीं चलता।

कभी उसे अर्जुन की दुविधा समझ आती है।

कभी कर्ण के जीवन की विडंबना दिखाई देती है।

कभी द्रौपदी के प्रश्न की शक्ति सामने आती है।

कभी युधिष्ठिर की धर्म-संबंधी बेचैनी।

कभी गांधारी का शोक।

कभी विदुर की चेतावनी।

इस परिवर्तन का परिणाम यह है कि पाठक का नैतिक निर्णय स्थिर नहीं रहता।

वह बार-बार अपनी स्थिति की जाँच करता है।

सहानुभूति और निर्णय

किसी पात्र को समझना और उसके कर्म को उचित मानना एक ही बात नहीं है।

महाभारत का पाठ इस अंतर को समझने में सहायता करता है।

कर्ण के प्रति सहानुभूति हो सकती है।

लेकिन उसके प्रत्येक कर्म को उचित मानना आवश्यक नहीं।

दुर्योधन के भीतर अपमान और असुरक्षा को समझा जा सकता है।

लेकिन उससे उसके कर्म स्वतः उचित नहीं हो जाते।

इसी प्रकार युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा को स्वीकार करते हुए उनके निर्णयों की आलोचना भी संभव है।

इस प्रकार— समझना और अनुमोदन करना दो अलग क्रियाएँ हैं।

महाभारत का पाठक कहाँ खड़ा है?

यही इस पूरे प्रश्न का सबसे रोचक पक्ष है।

महाभारत पाठक को किसी एक पात्र के साथ बाँधकर नहीं रखता।

वह उसे घटनाओं के बीच घूमने देता है।

एक प्रसंग में जो व्यक्ति उचित लगता है, दूसरे प्रसंग में वही प्रश्नों के घेरे में आ सकता है।

एक निर्णय तत्काल सही दिखाई देता है।

उसका परिणाम सामने आने पर वही निर्णय संदिग्ध लग सकता है।

इस प्रकार पाठक स्वयं एक प्रकार के नैतिक परीक्षण से गुजरता है।

क्या अनेक दृष्टियाँ सत्य को सापेक्ष बना देती हैं?

यहाँ सावधानी आवश्यक है।

अनेक दृष्टियाँ होने का अर्थ यह नहीं कि महाभारत कहता है— “हर व्यक्ति अपनी दृष्टि से सही है।”

यदि ऐसा होता, तो धर्म, अधर्म, न्याय, अन्याय और उत्तरदायित्व की चर्चा का कोई आधार ही नहीं बचता।

महाभारत का अधिक जटिल स्वरूप यह है कि—

दृष्टियाँ अनेक हो सकती हैं, लेकिन उनके कर्मों के परिणाम भी होते हैं।

इसलिए किसी पात्र की दृष्टि को समझना और उसे अंतिम सत्य मान लेना अलग बातें हैं।

दृष्टियों के बीच पाठक का विवेक

महाभारत पाठक के सामने अनेक आवाजें रखता है।

लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा पात्रों में से कोई एक नहीं करता।

कई बार पाठक को स्वयं— परिस्थिति देखनी होती है, पात्र की स्थिति समझनी होती है, उसके निर्णय को देखना होता है, और फिर परिणाम को सामने रखना होता है।

अर्थात् महाभारत का पाठ केवल सूचना ग्रहण करना नहीं।

यह विवेक की प्रक्रिया भी बन जाता है।

निष्कर्ष

महाभारत की शक्ति केवल इस बात में नहीं कि उसमें बहुत से पात्र हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि उन पात्रों को देखने की दृष्टियाँ भी अलग-अलग हैं।

द्यूतसभा इसका तीखा उदाहरण है।

द्रौपदी वहाँ अधिकार का प्रश्न उठाती हैं।

भीष्म धर्म की जटिलता के सामने खड़े हैं।

विदुर चेतावनी देते हैं।

धृतराष्ट्र जानते हुए भी निर्णायक नहीं हो पाते।

कर्ण एक कठोर पक्ष ग्रहण करता है।

एक ही घटना के भीतर ये अलग-अलग दृष्टियाँ साथ उपस्थित हैं।

इससे पाठक के सामने एक महत्वपूर्ण बौद्धिक चुनौती आती है— क्या किसी महत्त्वपूर्ण मानवीय घटना को केवल एक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है?

महाभारत का उत्तर शायद उसके कथानक में छिपा है, किसी सूत्र-वाक्य में नहीं।

वह हमें घटना के कई साक्षियों के बीच खड़ा करता है और निर्णय की जिम्मेदारी धीरे-धीरे पाठक की ओर स्थानांतरित कर देता है।

यहीं से अगला प्रश्न जन्म लेता है— यदि महाभारत अनेक पात्रों को बोलने देता है, तो क्या उसका मौन भी कुछ कहता है?

कौन बोलता है, कौन चुप रहता है, किस क्षण कोई हस्तक्षेप नहीं करता—इन प्रश्नों से कथा का एक दूसरा पक्ष खुलता है।

अगला भाग — 3.8 : मौन भी कथा है : जहाँ महाभारत बोलता नहीं

— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना

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