महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 41 : छठे से दसवें दिन तक
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 41 : छठे से दसवें दिन तक
व्यूहों का परिवर्तन, भीष्म का प्रचण्ड युद्ध और शरशय्या की ओर बढ़ता कुरुक्षेत्र
पहले पाँच दिनों तक दोनों सेनाएँ एक-दूसरे की शक्ति को परख चुकी थीं।
अब युद्ध केवल प्रारम्भिक संघर्ष नहीं रह गया था।
भीष्म का अनुभव, पाण्डवों के महारथियों की क्षमता, कृष्ण की रणनीतिक दृष्टि और दोनों सेनाओं की विशालता—इन सबका वास्तविक परीक्षण हो रहा था।
छठे से दसवें दिन तक की कथा इसलिए विशेष महत्त्व रखती है कि इसी अवधि में एक प्रश्न धीरे-धीरे निर्णायक बनता है—
भीष्म को युद्धभूमि से हटाए बिना क्या पाण्डव सेना आगे बढ़ सकती है?
छठा दिन : युद्ध की तीव्रता
छठे दिन तक दोनों पक्षों को एक-दूसरे की युद्ध-क्षमता का पर्याप्त अनुभव हो चुका था।
अब आक्रमण अधिक योजनाबद्ध होते हैं।
भीष्म का लक्ष्य पाण्डव सेना की संरचना को तोड़ना है, जबकि पाण्डव पक्ष का उद्देश्य उनके आक्रमण को रोकते हुए अपनी सेना को सुरक्षित रखना है।
महाभारत के युद्ध-वर्णन में इस समय रथ, गज, अश्व और पदाति—सभी के सम्मिलित संघर्ष दिखाई देते हैं।
यहाँ व्यूह का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। यदि सेना केवल भीड़ हो तो उसका कोई केन्द्र नहीं होता।
व्यूह उस भीड़ को दिशा और संरचना देता है।
युद्ध का दृश्य
महाभारत युद्ध को केवल घटनाओं की सूचना के रूप में नहीं लिखता; वह युद्ध का दृश्य उपस्थित करता है।
बाणों की वर्षा, ध्वजों का टूटना, रथों का विनाश, हाथियों का आक्रमण और सैनिकों की भगदड़—ये सभी युद्ध के दृश्यात्मक तत्व हैं।
युद्ध-वर्णन में बार-बार आने वाली एक शैली है—बाणों की तुलना वर्षा से।
यह केवल अलंकार नहीं। एक साथ छोड़े गए असंख्य बाणों की कल्पना कराने का यह काव्यात्मक माध्यम भी है।
लेकिन हमें यह सावधानी रखनी होगी कि काव्यात्मक अतिशयोक्ति को प्रत्यक्ष सांख्यिकीय विवरण न माना जाए।
सातवाँ दिन : मोर्चों का फैलाव
सातवें दिन तक युद्ध और अधिक व्यापक हो जाता है। अब युद्ध का केन्द्र केवल भीष्म और अर्जुन नहीं हैं।
विभिन्न मोर्चों पर अलग-अलग महारथी सक्रिय हैं। यही महाभारत की युद्ध-रचना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
एक विशाल युद्ध में सभी सैनिक एक ही स्थान पर नहीं लड़ सकते।
इसलिए अनेक मोर्चे बनते हैं। एक मोर्चे पर कोई महारथी शत्रु को रोक रहा है।
दूसरे पर कोई सेना आगे बढ़ रही है। तीसरे पर किसी व्यूह का प्रतिरोध हो रहा है।
इस दृष्टि से महाभारत का युद्ध आधुनिक अर्थ में “एक युद्ध” नहीं, बल्कि एक ही युद्धक्षेत्र में चल रहे अनेक समानान्तर संघर्षों का समुच्चय है।
आठवाँ दिन : भीष्म का प्रहार
आठवें दिन भीष्म की युद्ध-क्षमता फिर अत्यन्त प्रबल दिखाई देती है।
वे पाण्डव सेना पर तीव्र आक्रमण करते हैं। यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात है।
भीष्म का लक्ष्य केवल किसी एक महारथी को पराजित करना नहीं है।
एक सेनापति के रूप में उनका प्रभाव सेना के बड़े भाग पर पड़ता है।
यही कारण है कि महाभारत में उनके आक्रमण को बार-बार व्यापक सैन्य संकट के रूप में चित्रित किया जाता है।
भीम की भूमिका
इसी युद्ध में भीम का चरित्र अर्जुन से अलग दिखाई देता है।
अर्जुन की मुख्य शक्ति धनुर्विद्या और दूर से अत्यन्त सटीक आक्रमण है।
भीम की युद्ध-शैली अधिक प्रत्यक्ष, आक्रामक और शारीरिक शक्ति पर आधारित दिखाई जाती है।
यह महाभारत की युद्ध-व्यवस्था में योद्धाओं की विशेषीकृत भूमिका की ओर संकेत करता है।
सभी महारथी एक ही प्रकार से युद्ध नहीं करते। किसी की शक्ति धनुष है। किसी की गदा। किसी की रथ-चालन क्षमता। किसी की सेना-संगठन क्षमता।
युद्ध में व्यक्तिगत विशेषज्ञता भी एक सैन्य संसाधन है।
नौवाँ दिन : निर्णायक संकट
नौवें दिन तक पाण्डव पक्ष के सामने स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है।
भीष्म अभी भी युद्ध के केन्द्र में हैं। उनकी आयु बहुत अधिक है, लेकिन युद्ध में उनकी सक्रियता असाधारण है।
यही महाभारत का एक रोचक विरोधाभास है—
शारीरिक आयु बढ़ रही है, लेकिन युद्धक्षमता कथा में लगभग अप्रभावित दिखाई देती है।
इसे सीधे ऐतिहासिक तथ्य मानने से पहले हमें महाकाव्य की वीर-परम्परा को समझना होगा।
महाभारत अपने महान योद्धाओं को सामान्य मानवीय सीमा से ऊपर उठाकर प्रस्तुत करता है।
यह महाकाव्य की शैली है।
कृष्ण का हस्तक्षेप
नौवें दिन कृष्ण और अर्जुन के सम्बन्ध का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग आता है।
भीष्म का युद्ध इतना प्रबल हो जाता है कि कृष्ण अत्यन्त उद्विग्न होकर रथ से उतर पड़ते हैं और शस्त्र उठाने की ओर बढ़ते हैं।
भीष्म उन्हें देखकर प्रसन्न होते हैं। उनकी इच्छा ही मानो यह है कि कृष्ण स्वयं उनके सामने आएँ।
लेकिन अर्जुन कृष्ण को रोकता है। यह प्रसंग केवल भावनात्मक नहीं है।
यह कृष्ण की प्रतिज्ञा और युद्ध की वास्तविक स्थिति के बीच तनाव को दिखाता है।
कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी।
फिर भी परिस्थिति उन्हें उस सीमा तक ले जाती है जहाँ वे स्वयं युद्ध में उतरने को तैयार दिखाई देते हैं।
अर्जुन उन्हें रोकता है।
यहाँ महाभारत का कृष्ण केवल उपदेश देने वाला दार्शनिक नहीं रह जाता।
वह रणनीतिक सहभागी भी है।
दसवाँ दिन : प्रश्न का उत्तर
अब युद्ध अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुँचता है।
पाण्डव पक्ष समझ चुका है कि सामान्य युद्ध में भीष्म को निर्णायक रूप से परास्त करना अत्यन्त कठिन है।
लेकिन भीष्म की अपनी एक प्रतिज्ञा और एक नैतिक सीमा है।
वे शिखण्डी के सामने उसी प्रकार युद्ध नहीं करना चाहते। यहीं से शिखण्डी का प्रसंग निर्णायक बनता है।
लेकिन इसे समझने से पहले शिखण्डी के चरित्र को समझना आवश्यक है।
शिखण्डी केवल एक युद्ध-रणनीतिक पात्र नहीं है। उसके पीछे अम्बा की पूरी कथा है।
अर्थात् दसवें दिन का युद्ध अचानक पैदा नहीं हुआ। उसकी जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं।
शिखण्डी और भीष्म
भीष्म शिखण्डी को सामने देखकर पूर्ण शक्ति से युद्ध नहीं करते। अर्जुन शिखण्डी को आगे रखते हैं।
फिर अर्जुन के बाण भीष्म के शरीर को भेदने लगते हैं।
यहीं महाभारत का युद्ध एक असाधारण नैतिक और सैन्य परिस्थिति में पहुँचता है।
भीष्म जानते हैं कि अर्जुन सामने है।
वे यह भी जानते हैं कि वे जिस परिस्थिति में खड़े हैं, उसमें उनका युद्ध-धर्म और उनकी व्यक्तिगत प्रतिज्ञा एक-दूसरे से टकरा रहे हैं।
और अन्ततः— भीष्म धरती पर नहीं गिरते। वे बाणों पर गिरते हैं।
शरशय्या
महाभारत का यह दृश्य सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के सबसे प्रसिद्ध युद्ध-दृश्यों में से एक है।
भीष्म के शरीर में इतने बाण लगे हैं कि वे धरती को स्पर्श नहीं करते।
अर्जुन उनकी इच्छा के अनुसार बाणों की शय्या को व्यवस्थित करता है।
यहाँ युद्ध अचानक दर्शन में बदल जाता है।
जो व्यक्ति दस दिनों तक युद्ध का सेनापति था, वही अब मृत्यु और जीवन के बीच स्थित होकर शेष महाभारत का एक महान द्रष्टा बन जाता है।
युद्धभूमि में भीष्म की भूमिका समाप्त नहीं होती।
उनका सेनापतित्व समाप्त होता है; उनका ज्ञान नहीं।
इस प्रसंग का सबसे बड़ा प्रश्न
भीष्म को शिखण्डी के माध्यम से परास्त करना क्या केवल सैन्य रणनीति थी?
या यह उस व्यक्ति की अपनी प्रतिज्ञाओं और सीमाओं का परिणाम था? या दोनों?
यही महाभारत की जटिलता है।
यदि हम केवल सैन्य दृष्टि से देखें तो पाण्डवों ने भीष्म की एक विशिष्ट सीमा को पहचानकर उसका उपयोग किया।
यदि केवल नैतिक दृष्टि से देखें तो भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के कारण एक विशेष परिस्थिति में युद्ध की पूर्ण शक्ति का उपयोग नहीं करते।
और यदि साहित्यिक दृष्टि से देखें तो अम्बा की पुरानी पीड़ा दसवें दिन युद्धभूमि में लौटती है।
तीनों स्तर एक साथ मौजूद हैं।
व्यूह से व्यक्ति तक
पहले हमने पूछा था— व्यूह क्या है?
अब दसवें दिन एक और बात स्पष्ट होती है— सबसे विशाल व्यूह भी अन्ततः मनुष्य के निर्णय पर निर्भर करता है।
भीष्म की सेना विशाल थी। उनकी युद्ध-क्षमता असाधारण थी।
लेकिन उनकी एक व्यक्तिगत प्रतिज्ञा ने युद्ध की रणनीति बदल दी।
अर्थात्—
रणनीति केवल सेना से नहीं बनती; व्यक्ति की प्रतिज्ञा भी कभी-कभी पूरी सेना की दिशा बदल देती है।
यह महाभारत के युद्ध-विज्ञान की एक अत्यन्त गहरी बात है।
दस दिनों का निष्कर्ष
पहले दस दिनों को एक साथ देखें तो युद्ध की एक स्पष्ट यात्रा दिखाई देती है।
पहला चरण — सेनाओं का आमना-सामना और शक्ति-परीक्षण।
दूसरा चरण — दोनों पक्षों की रणनीतिक प्रतिक्रिया।
तीसरा चरण — भीष्म का लगातार दबाव।
चौथा चरण — पाण्डवों द्वारा भीष्म की सीमा की खोज।
पाँचवाँ चरण — शिखण्डी के माध्यम से भीष्म का पतन।
इस प्रकार दसवाँ दिन केवल एक महान योद्धा के गिरने का दिन नहीं है।
यह युद्ध की रणनीति के एक पूरे चरण का अन्त है। अब कौरव सेना के सामने नया प्रश्न है—
भीष्म के बाद सेनापति कौन होगा? और यहीं से महाभारत युद्ध एक नए चरण में प्रवेश करेगा।
भीष्म के बाद द्रोणाचार्य सेनापति बनेंगे। उनके साथ युद्ध की रणनीति भी बदलेगी।
व्यूह और अधिक जटिल होंगे।
और फिर महाभारत हमें उस युद्ध की ओर ले जाएगा जिसमें अभिमन्यु, चक्रव्यूह और जयद्रथ की कथा सामने आएगी।
लेकिन उससे पहले शरशय्या पर पड़े भीष्म का प्रसंग हमें यह समझाएगा कि मृत्यु के सामने खड़ा योद्धा युद्ध से बड़ा कैसे हो जाता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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