महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 42 : कृष्ण का हस्तक्षेप

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 42 : कृष्ण का हस्तक्षेप

बिना शस्त्र उठाए कृष्ण ने युद्ध की दिशा कैसे बदली?

भीष्म के पतन के बाद महाभारत के युद्ध को केवल सेनाओं और महारथियों के संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

क्योंकि कुरुक्षेत्र में एक ऐसा व्यक्ति भी है जिसने स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प लिया है, फिर भी युद्ध की दिशा पर उसका प्रभाव लगातार दिखाई देता है।

वह है—कृष्ण।

कृष्ण की भूमिका को यदि केवल “भगवान ने पाण्डवों की सहायता की” कहकर समाप्त कर दिया जाए तो महाभारत के एक अत्यन्त सूक्ष्म पक्ष को हम खो देंगे।

और यदि उन्हें केवल एक आधुनिक अर्थ में “रणनीतिक सलाहकार” मान लिया जाए तो भी उनके चरित्र का आधा ही अर्थ समझ में आएगा।

कृष्ण की भूमिका तीन स्तरों पर चलती है—

सारथी के रूप में प्रत्यक्ष उपस्थिति, सलाहकार के रूप में निर्णयों पर प्रभाव और साक्षी के रूप में पूरे संघर्ष की दिशा को समझने वाली चेतना।

यही त्रिस्तरीय भूमिका इस प्रसंग को असाधारण बनाती है।

पाठ : कृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा क्यों की?

कृष्ण ने युद्ध में अपनी सेना और स्वयं के बीच चुनाव का अवसर दिया था।

एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना थी। दूसरी ओर स्वयं कृष्ण—लेकिन बिना शस्त्र उठाए।

अर्जुन ने सेना नहीं चुनी। उसने कृष्ण को चुना। दुर्योधन ने सेना को चुना।

महाभारत की यह घटना केवल भक्ति का प्रसंग नहीं है।

यह युद्ध के दो अलग-अलग मॉडल सामने रखती है।

दुर्योधन के सामने है— सैन्य शक्ति।

अर्जुन के सामने है— दिशा देने वाली बुद्धि।

युद्ध के परिणाम को इस चुनाव से सीधे सिद्ध नहीं किया जा सकता, लेकिन कथा की संरचना स्पष्ट रूप से बताती है कि अर्जुन ने कृष्ण की उपस्थिति को सैन्य संख्या से अधिक महत्त्व दिया।

सारथी होना : एक साधारण पद नहीं

कृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया। पहली दृष्टि में यह आश्चर्यजनक है।

यदुवंशी कृष्ण स्वयं राजनैतिक और सैन्य शक्ति के केन्द्र हैं, फिर भी युद्धभूमि में उनका स्थान योद्धा के पीछे है।

लेकिन सारथी की भूमिका को समझें तो यह स्थिति बहुत गहरी हो जाती है।

सारथी को पता होना चाहिए— रथ कहाँ ले जाना है,

कब रोकना है, किस दिशा से आक्रमण आ रहा है,

किस योद्धा के सामने पहुँचना है, और कब अपने योद्धा को युद्धभूमि का व्यापक दृश्य दिखाना है।

इसलिए अर्जुन का धनुष उसके हाथ में है, लेकिन युद्धभूमि में उसकी गतिशीलता कृष्ण के हाथ में है।

यह केवल प्रतीक नहीं है। युद्ध में स्थान स्वयं एक रणनीतिक संसाधन है।

गीता का आरम्भ भी रणनीति है

यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु है। अर्जुन ने कृष्ण से कहा— सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।

“मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिए।” कृष्ण रथ को वहाँ ले जाते हैं।

फिर अर्जुन सामने अपने सम्बन्धियों को देखता है और उसका मोह उत्पन्न होता है।

यह घटना केवल गीता का दार्शनिक आरम्भ नहीं है। यह युद्धभूमि की दृश्य-सूचना भी है।

कृष्ण अर्जुन को युद्ध की वास्तविकता से दूर नहीं ले जाते।

वे उसे ठीक उस स्थान पर ले जाते हैं जहाँ से वह दोनों पक्षों को देख सके।

अर्थात् निर्णय से पहले— दृश्य।

दृश्य के बाद— प्रश्न।

प्रश्न के बाद— विवेक।

और विवेक के बाद— कर्म।

यह क्रम कृष्ण की भूमिका को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

कृष्ण का पहला हस्तक्षेप : दृष्टि बदलना

कृष्ण ने युद्धभूमि में सबसे पहले कोई शस्त्र नहीं चलाया। उन्होंने अर्जुन की दृष्टि को बदला।

अर्जुन पहले अपने सामने केवल “स्वजन” देख रहा था।

कृष्ण उसे व्यक्ति से ऊपर उठाकर कर्तव्य, आत्मा, कर्म और धर्म के प्रश्न तक ले जाते हैं।

इसका परिणाम यह नहीं होता कि अर्जुन अपने सम्बन्धियों को पहचानना बन्द कर देता है।

परिणाम यह होता है कि वह सम्बन्ध को निर्णय का अकेला आधार नहीं रहने देता।यही कारण है कि गीता के अन्त में अर्जुन कहता है—

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव। अर्थात् निर्णय अब मोह से नहीं, स्पष्टता से होगा।

दूसरा हस्तक्षेप : युद्धभूमि की स्थिति का ज्ञान

कृष्ण युद्ध के प्रत्येक चरण में अर्जुन के रथ को उस स्थान तक ले जाते हैं जहाँ उसका युद्धकौशल प्रभावी हो सके।

यह बात छोटी दिखाई देती है, लेकिन प्राचीन रथ-युद्ध में इसका बड़ा महत्त्व रहा होगा।

धनुर्धर की क्षमता केवल उसके बाण पर निर्भर नहीं करती।

दूरी, कोण, गति, सामने का योद्धा, रथ की स्थिति और घोड़ों की दिशा—सभी निर्णायक होते हैं।

इस दृष्टि से कृष्ण का सारथित्व युद्ध-क्षेत्र प्रबन्धन का कार्य भी है।

अर्जुन शस्त्र चलाता है। कृष्ण युद्धभूमि उपलब्ध कराते हैं।

तीसरा हस्तक्षेप : निर्णय के क्षण में उपस्थिति

कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि वे अर्जुन को हर बार बताते हैं कि क्या करना है।

बल्कि यह है कि वे निर्णय के क्षण में उपस्थित रहते हैं।

युद्ध में सूचना लगातार बदलती है।

किसी योद्धा की स्थिति बदलती है।

किसी व्यूह का स्वरूप बदलता है।

किसी प्रमुख योद्धा का आक्रमण अचानक तीव्र हो सकता है।

ऐसी स्थिति में पहले से दिया हुआ कोई नियम पर्याप्त नहीं होता।

आवश्यक है— तत्काल परिस्थिति को पढ़ना।

कृष्ण की भूमिका यहीं सबसे अधिक दिखाई देती है।

नौवें दिन का प्रसंग : प्रतिज्ञा की सीमा

नौवें दिन कृष्ण का रथ से उतरना और भीष्म की ओर बढ़ना इसी जटिलता को सामने लाता है।

भीष्म का युद्ध अत्यन्त प्रबल हो रहा है। कृष्ण की प्रतिक्रिया तीव्र है।

लेकिन इस प्रसंग का सूक्ष्म अर्थ केवल इतना नहीं कि “कृष्ण क्रोधित हो गए।”

यहाँ दो प्रतिज्ञाएँ आमने-सामने हैं। एक ओर कृष्ण का शस्त्र न उठाने का संकल्प।

दूसरी ओर भीष्म का युद्धधर्म और अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति आग्रह।

कृष्ण क्षणभर के लिए अपनी घोषित सीमा के निकट पहुँच जाते हैं।

अर्जुन उन्हें रोकता है।

यह प्रसंग कृष्ण को सर्वशक्तिमान निष्क्रिय देवता के रूप में नहीं, बल्कि युद्ध की नैतिक और रणनीतिक सीमा के भीतर सक्रिय निर्णयकर्ता के रूप में दिखाता है।

भीष्म के पतन में कृष्ण की भूमिका

दसवें दिन शिखण्डी को सामने रखकर अर्जुन द्वारा भीष्म पर प्रहार करना केवल अर्जुन की व्यक्तिगत रणनीति नहीं है।

इसके पीछे भीष्म की प्रतिज्ञा की जानकारी है। 

कृष्ण जानते हैं कि भीष्म शिखण्डी के सामने पूर्ण शक्ति से युद्ध नहीं करेंगे।

इस जानकारी को युद्धनीति में बदलना ही कृष्ण की वास्तविक रणनीतिक भूमिका है।

यहाँ कृष्ण स्वयं बाण नहीं चलाते। उन्होंने केवल ऐसी परिस्थिति बनाई जिसमें अर्जुन98765 अपनी क्षमता का उपय का परिणाम अकेले तय कर रहे थे?

यहाँ शोध की दृष्टि से अत्यन्त सावधान रहना चाहिए।

महाभारत की धार्मिक परम्परा कृष्ण को भगवान और परम तत्त्व के रूप में देखती है।

गीता में भी कृष्ण अपने स्वरूप का अत्यन्त व्यापक उद्घाटन करते हैं।

लेकिन युद्ध के ऐतिहासिक-सैन्य विश्लेषण में हमें प्रश्न अलग रखना होगा।

कौन-से निर्णय कृष्ण ने वास्तव में प्रभावित किए?

किस अवसर पर उनकी सलाह निर्णायक बनी?

कहाँ अर्जुन या अन्य पाण्डव योद्धाओं ने स्वयं निर्णय लिया?

और किन परिस्थितियों में परिणाम अनेक कारणों का संयुक्त प्रभाव था?

इसलिए हर पाण्डव विजय को केवल “कृष्ण की इच्छा” कह देना शोध को सरल तो बनाता है, लेकिन महाभारत की वास्तविक रणनीतिक जटिलता को कम कर देता है।

कृष्ण बनाम भीष्म : दो प्रकार का नेतृत्व

भीष्म और कृष्ण की तुलना यहाँ विशेष अर्थ रखती है।

भीष्म— प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति के केन्द्र हैं।

कृष्ण—निर्णय और दिशा के केन्द्र हैं।

भीष्म स्वयं युद्ध करते हैं। कृष्ण स्वयं शस्त्र नहीं चलाते।

भीष्म सेना का नेतृत्व करते हैं। कृष्ण एक योद्धा का सारथित्व करते हैं।

फिर भी दोनों का प्रभाव केवल उनके हाथ में पकड़े शस्त्र से नहीं मापा जा सकता।

यही महाभारत की नेतृत्व-दृष्टि का एक गहरा पक्ष है।

कभी नेतृत्व आगे चलकर दिखाई देता है, कभी पीछे रहकर दिशा देता है।

सबसे बड़ा प्रश्न : कृष्ण की भूमिका धर्म की है या रणनीति की?

शायद उत्तर है—दोनों स्तरों को अलग-अलग देखना ही उचित है।

धार्मिक दृष्टि से कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए सक्रिय हैं।

दार्शनिक दृष्टि से वे आत्मा, कर्म और परम तत्त्व का उपदेश देते हैं।

राजनीतिक दृष्टि से वे संघर्ष से पहले शान्ति का प्रयास कर चुके हैं।

रणनीतिक दृष्टि से वे युद्ध में पाण्डव पक्ष की निर्णय-क्षमता को प्रभावित करते हैं।

मानवीय दृष्टि से वे अर्जुन के सबसे निकट व्यक्ति बनकर उसके संकट में उपस्थित रहते हैं।

इनमें से किसी एक को स्वीकार करके बाकी को छोड़ देना कृष्ण के महाभारतीय चरित्र को छोटा कर देगा।

कृष्ण का सबसे सूक्ष्म हस्तक्षेप

यदि कृष्ण के पूरे युद्ध-चरित्र को एक वाक्य में संक्षेपित करना हो तो वह यह नहीं होगा कि—

“उन्होंने पाण्डवों को जिताया।” उससे अधिक सूक्ष्म बात यह है—

उन्होंने पाण्डवों को परिस्थितियों को देखने, समय पहचानने और अपने उपलब्ध साधनों का उचित उपयोग करने की दृष्टि दी।

यह निष्कर्ष भी किसी राजनीतिक या धार्मिक निर्णय का स्थान नहीं लेता; यह महाभारत के कथानक में दिखाई देने वाली भूमिका का विश्लेषण है।

युद्ध में कृष्ण का सबसे बड़ा शस्त्र शायद उनका हाथ नहीं, उनकी दृष्टि है।

और यही कारण है कि शस्त्र न उठाने के बावजूद उनका प्रभाव युद्ध के प्रत्येक निर्णायक मोड़ पर दिखाई देता है।

आगे : भीष्म के बाद युद्ध

दसवें दिन भीष्म शरशय्या पर हैं।

लेकिन कुरुक्षेत्र रुकता नहीं। अब कौरव सेना को नया सेनापति चाहिए।

द्रोणाचार्य आगे आते हैं। और यहीं युद्ध की रणनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।

भीष्म की युद्ध-शैली के बाद अब द्रोण की व्यूह-नीति सामने आएगी।

युद्ध का लक्ष्य भी धीरे-धीरे बदलता दिखाई देगा—

अब केवल सेना को दबाना नहीं, बल्कि विशिष्ट योद्धा को अलग करके निर्णायक स्थिति उत्पन्न करना महत्त्वपूर्ण होगा।

यहीं से हम आगे बढ़ेंगे—

द्रोणाचार्य का सेनापतित्व, नये व्यूह और युद्ध के उस चरण की ओर जहाँ अभिमन्यु की कथा जन्म लेती है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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