महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 44 : तेरहवाँ दिन — चक्रव्यूह, अभिमन्यु और युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा

 महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 44 : तेरहवाँ दिन — चक्रव्यूह, अभिमन्यु और युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा

भीष्म के पतन के बाद द्रोणाचार्य के सेनापतित्व में युद्ध का स्वरूप बदल चुका था।

अब युद्ध केवल दो विशाल सेनाओं का प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं था। सेनापति किसी विशिष्ट लक्ष्य को सामने रखकर पूरी सेना की गति को नियंत्रित कर रहा था।

वह लक्ष्य था—युधिष्ठिर को जीवित पकड़ना।

ग्यारहवें और बारहवें दिन अर्जुन को संशप्तकों के माध्यम से मुख्य युद्धक्षेत्र से दूर रखने की रणनीति अपनाई गई। बारहवें दिन द्रोण ने गरुड़-व्यूह जैसी संगठित रचना के माध्यम से युधिष्ठिर तक पहुँचने का प्रयास किया, लेकिन अर्जुन की उपस्थिति और पाण्डवों की रक्षा-व्यवस्था के कारण सफलता नहीं मिली। अगले दिन रणनीति और कठोर हुई।

तेरहवाँ दिन इसलिए केवल अभिमन्यु-वध का दिन नहीं है।

यह उस प्रश्न की परीक्षा है कि—

जब किसी सेना के मुख्य रक्षक को उसके केन्द्र से अलग कर दिया जाए, तब उसकी रक्षा-व्यवस्था कितनी देर तक टिक सकती है?

अर्जुन को युद्ध के दूसरे छोर पर ले जाना

तेरहवें दिन फिर संशप्तकों ने अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारा। अर्जुन उनके पीछे दक्षिण दिशा की ओर चला गया।

यह घटना केवल वीरता की चुनौती नहीं थी। इसके भीतर स्पष्ट सैन्य परिणाम था— अर्जुन युधिष्ठिर के पास नहीं था।

और यही वह परिस्थिति थी जिसकी द्रोण को आवश्यकता थी।

द्रोणाचार्य ने अब एक ऐसा व्यूह बनाया जिसका केन्द्र तक पहुँचना सरल नहीं था।

वह था— चक्रव्यूह

लोकप्रिय परम्परा में चक्रव्यूह को एक गोलाकार, घूमती हुई और लगभग रहस्यमय संरचना के रूप में बताया जाता है। लेकिन मूल युद्ध-वर्णन को केवल ज्यामितीय चित्र मान लेना पर्याप्त नहीं होगा।

व्यूह का अर्थ केवल आकृति नहीं है।

वह चलती हुई सैन्य संरचना है।

उसमें अग्रभाग, प्रवेश-बिन्दु, भीतर की परतें, रक्षक और प्रतिआक्रमण की व्यवस्था होती है।

इसलिए चक्रव्यूह को समझने का बेहतर तरीका यह है—

यह ऐसी बहुस्तरीय युद्ध-व्यवस्था थी जिसमें भीतर जाने वाला योद्धा क्रमशः अलग-अलग रक्षा-स्तरों से टकराता था।

इसी कारण उसका भेदन केवल शक्ति का प्रश्न नहीं था।

उसके लिए— प्रवेश का ज्ञान | भीतर की दिशा का ज्ञान | सहयोगी सेना की गति | पुनः बाहर आने का मार्ग

—सभी आवश्यक थे।

युधिष्ठिर के सामने संकट

द्रोण का व्यूह देखकर पाण्डव सेना के सामने समस्या उत्पन्न हुई। अर्जुन वहाँ नहीं था।

युधिष्ठिर को ज्ञात था कि चक्रव्यूह का भेदन अत्यंत कठिन है।

तभी अभिमन्यु सामने आता है। यहाँ मूल पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सुभद्रापुत्र अभिमन्यु स्वयं स्वीकार करता है कि उसे व्यूह में प्रवेश करने की विधि ज्ञात है, लेकिन संकट आने पर उससे निकलने की पूर्ण विधि का ज्ञान नहीं है।

द्रोणपर्व के संस्कृत पाठ में उसका कथन आता है—

उपदिष्टो हि मे पित्रा योगोऽनीकस्य भेदने । नोत्सहे तु विनिर्गन्तुमहं कस्याञ्चिदापदि ॥

अर्थात्—मेरे पिता ने मुझे इस सेना-व्यूह को भेदने की विधि बताई है; किंतु किसी विपत्ति में उससे बाहर निकलने की विधि में मैं समर्थ नहीं हूँ।

यह श्लोक अभिमन्यु की कथा का सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बिन्दु है।

वह अपनी सीमा छिपाता नहीं। वह यह नहीं कहता कि— “मैं सब कुछ जानता हूँ।” 

वह कहता है— प्रवेश जानता हूँ, निर्गमन नहीं। फिर भी वह पीछे नहीं हटता।

अभिमन्यु का निर्णय

युधिष्ठिर और अन्य पाण्डवों की परिस्थिति ऐसी थी कि किसी को व्यूह का द्वार खोलना ही था।

अभिमन्यु आगे बढ़ता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है।

अभिमन्यु को केवल “बालक” कहकर उसकी भूमिका को छोटा कर देना मूल कथा की शक्ति को कम करता है।

महाभारत उसे अत्यंत प्रशिक्षित रथी और असाधारण युद्धकौशल वाला योद्धा प्रस्तुत करता है।

वह द्रोण की सेना में प्रवेश करता है और व्यूह की पहली रक्षा-रेखा को तोड़ देता है।

मूल पाठ में उसके प्रवेश और युद्ध का वर्णन अत्यंत ऊर्जस्वित है। वह अकेला भीतर जाकर लगातार युद्ध करता है और अनेक प्रमुख योद्धाओं को चुनौती देता है।

यहाँ चक्रव्यूह का पहला वास्तविक रहस्य सामने आता है—

व्यूह की शक्ति उसकी दीवार में नहीं, उसके पीछे आने वाली सहायता को रोकने में थी।

जयद्रथ — चक्रव्यूह का दूसरा द्वार

अभिमन्यु अकेला भीतर चला गया। लेकिन उसके पीछे पाण्डव योद्धा भी प्रवेश करना चाहते थे।

यहीं जयद्रथ की भूमिका निर्णायक हो जाती है। जयद्रथ ने पाण्डवों को उस मार्ग से आगे बढ़ने से रोक दिया।

यही घटना पूरे प्रसंग का रणनीतिक केन्द्र है।

यदि पाण्डव सेना अभिमन्यु के पीछे उसी समय भीतर प्रवेश कर जाती, तो परिस्थिति अलग हो सकती थी।

लेकिन अभिमन्यु और उसके पीछे आने वाली सेना के बीच दूरी पैदा हो गई।

इस प्रकार द्रोण का व्यूह केवल सामने से चुनौती नहीं दे रहा था—

उसने एक योद्धा को भीतर खींच लिया और उसके सहयोगियों को बाहर रोक दिया।

युद्धनीति की दृष्टि से यही वह क्षण है जब अभिमन्यु की वीरता और उसकी असुरक्षित स्थिति एक साथ पैदा होती हैं।

एक योद्धा भीतर, पूरी सेना बाहर

यहाँ से अभिमन्यु की कथा को केवल भावनात्मक बलिदान की कथा के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है।

इसे सैन्य दृष्टि से भी पढ़ना चाहिए। स्थिति लगभग ऐसी थी—

अर्जुन दूर | युधिष्ठिर पीछे | अभिमन्यु भीतर | पाण्डव सेना बाहर | जयद्रथ बीच में | द्रोण की सेना चारों ओर

अर्थात् अभिमन्यु की सबसे बड़ी समस्या शत्रु की संख्या नहीं थी।

उसकी सबसे बड़ी समस्या थी— सहयोग से कट जाना।

युद्ध में अकेला शक्तिशाली योद्धा भी तब संकट में पड़ सकता है जब उसकी पुनःपूर्ति, सहायता और पीछे हटने का मार्ग समाप्त हो जाए।

अभिमन्यु का युद्ध

अब महाभारत का वर्णन केवल एक युद्ध नहीं रह जाता। अभिमन्यु लगातार आगे बढ़ता है।

वह कौरव सेना के भीतर गहरी क्षति पहुँचाता है। उसके सामने आने वाले योद्धा उससे संघर्ष करते हैं।

वह रथों, घोड़ों और सैनिकों पर प्रहार करता है। द्रोणाचार्य स्वयं उसके युद्धकौशल को देखते हैं।

एक महत्वपूर्ण बात यहाँ सामने आती है—

जिस व्यूह को द्रोण ने बनाया था, उसी व्यूह के भीतर सबसे बड़ी चुनौती द्रोण को अभिमन्यु से मिलती है।

अर्थात् व्यूह की सफलता और अभिमन्यु की व्यक्तिगत वीरता दो अलग प्रश्न हैं।

व्यूह रणनीतिक रूप से सफल हो सकता था, फिर भी उसके भीतर प्रवेश कर चुका योद्धा असाधारण प्रतिरोध कर सकता था। यही हुआ।

युद्ध-धर्म का प्रश्न

अभिमन्यु के अंतिम संघर्ष पर पहुँचते ही महाभारत एक और कठिन प्रश्न खड़ा करता है।

जब अभिमन्यु का रथ नष्ट हो जाता है, उसका धनुष कट जाता है और वह रथहीन हो जाता है, तब उसके साथ अनेक महारथी एक साथ युद्ध करते हैं।

यहाँ बाद की परम्परा में “सात महारथियों ने मिलकर एक बालक को मारा” जैसी प्रसिद्ध अभिव्यक्ति बहुत प्रचलित हुई है।

लेकिन शोध में हमें भावनात्मक निष्कर्ष से पहले मूल पाठ के युद्ध-विवरण को देखना चाहिए।

द्रोणपर्व के पाठ में अभिमन्यु के साथ अनेक प्रमुख योद्धाओं के संघर्ष का क्रम मिलता है और उसका अंत सामूहिक युद्ध-परिस्थिति में होता है। दक्षिणी पाठ की उपलब्ध संस्कृत प्रति में भी कर्ण द्वारा अभिमन्यु पर प्रहार और उसके बाद के संघर्ष का क्रम मिलता है।

इसलिए इसे सरल वाक्य— “सात लोगों ने एक बच्चे को घेरकर मार दिया”

—में सीमित कर देना शोध की दृष्टि से पर्याप्त नहीं होगा।

हमें यह भी देखना होगा कि किस समय कौन-सा अस्त्र था, कौन-सा रथ बचा था, किस योद्धा ने किस पर प्रहार किया और युद्ध की स्थिति क्या थी।

यही पाठ और लोकप्रिय कथा के बीच का अंतर है।

अभिमन्यु की मृत्यु — केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं

अभिमन्यु के मारे जाने का तत्काल सैन्य प्रभाव जितना था, उससे कहीं अधिक उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।

पाण्डव सेना के लिए यह केवल एक युवा योद्धा की मृत्यु नहीं थी।

वह अर्जुन का पुत्र था। सुभद्रा का पुत्र था। कृष्ण का भानजा था। और सबसे महत्त्वपूर्ण—

वह उस दिन पाण्डवों की ओर से उस कार्य को करने गया था जिसे स्वयं अर्जुन की अनुपस्थिति में कोई और करने में सक्षम नहीं था।

इसलिए उसकी मृत्यु के साथ युद्ध का मनोवैज्ञानिक संतुलन बदल गया।

कृष्ण यहाँ क्या करते हैं?

इस प्रसंग में कृष्ण की भूमिका को भी सावधानी से समझना चाहिए। कृष्ण उस समय अर्जुन के साथ थे।

वे स्वयं अभिमन्यु के भीतर जाकर युद्ध नहीं कर रहे थे। अभिमन्यु का निर्णय उसका अपना था।

युधिष्ठिर ने उसे भेजा। पाण्डव सेना उसके पीछे आने का प्रयास करती है।

जयद्रथ उसे रोकता है। द्रोण व्यूह का संचालन करते हैं।

इसलिए अभिमन्यु-वध को केवल “कृष्ण की योजना” कह देना मूल कथा के अनेक मानवीय और रणनीतिक कारणों को छिपा देगा।

लेकिन कृष्ण के लिए यह घटना निर्णायक इसलिए बनती है क्योंकि अब अर्जुन के सामने केवल युद्ध नहीं है—

पुत्र की मृत्यु का प्रत्यक्ष समाचार है। और यहीं से अगले दिन का युद्ध एक नये संकल्प में बदलता है।

अर्जुन की प्रतिज्ञा

जब अर्जुन को अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार मिलता है, तब युद्ध का अगला लक्ष्य अचानक स्पष्ट हो जाता है।

अर्जुन जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा करता है। अब चौदहवें दिन का युद्ध केवल सामान्य युद्ध नहीं रहने वाला।

एक समय-सीमा निर्धारित हो जाती है—

सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध।

इसका अर्थ है कि अगले दिन कौरव सेना के सामने केवल पाण्डवों को रोकने की चुनौती नहीं होगी।

उसे एक विशिष्ट व्यक्ति को बचाना होगा। और पाण्डवों के सामने भी केवल आक्रमण नहीं होगा।

उन्हें समय के विरुद्ध युद्ध करना होगा। यानी—

तेरहवें दिन चक्रव्यूह ने एक योद्धा को सेना से अलग किया था; चौदहवें दिन समय स्वयं युद्ध का एक नया पात्र बनने वाला है।

चक्रव्यूह का वास्तविक अर्थ

तेरहवें दिन की घटना से चक्रव्यूह के बारे में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है।

चक्रव्यूह केवल “अभेद्य गोलाकार व्यूह” नहीं है। उसकी शक्ति तीन स्तरों में समझी जा सकती है—

प्रवेश को नियंत्रित करना | भीतर गए योद्धा को अलग करना | बाहर की सहायता को रोकना।

अभिमन्यु ने पहला अवरोध तोड़ दिया। जयद्रथ ने दूसरे चरण में पाण्डवों को रोक दिया।

द्रोण और अन्य कौरव योद्धाओं ने भीतर की स्थिति को अपने पक्ष में बनाए रखा।

इस प्रकार एक जटिल सैन्य संरचना ने एक असाधारण योद्धा को अकेला कर दिया।

यहाँ महाभारत हमें युद्ध का एक गहरा सिद्धांत देता है—

व्यक्ति की शक्ति और व्यवस्था की शक्ति एक ही चीज नहीं हैं।

अभिमन्यु व्यक्तिगत रूप से अत्यंत शक्तिशाली था।

लेकिन वह जिस व्यवस्था के भीतर प्रवेश कर गया था, वह उससे बड़ी थी।

इतिहास, आख्यान और प्रश्न

अभिमन्यु का प्रसंग महाभारत के सबसे लोकप्रिय प्रसंगों में से है। इसलिए शोधकर्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि लोकप्रिय कथा को ही मूल पाठ मान लिया जाए।

हमें कम-से-कम तीन स्तर अलग रखने होंगे—

मूल संस्कृत पाठ | विभिन्न पाठ-परम्पराएँ | बाद की लोक एवं धार्मिक व्याख्याएँ।

उदाहरण के लिए “अभिमन्यु को चक्रव्यूह से निकलना नहीं आता था” वाली बात मूल पाठ में उसके अपने कथन से पुष्ट होती है।

लेकिन चक्रव्यूह की आधुनिक चित्रात्मक आकृतियाँ, उसके निश्चित ज्यामितीय रूप और उससे जुड़ी अनेक लोकप्रिय व्याख्याएँ अलग स्रोतों से आती हैं। इसलिए उन्हें मूल महाभारत का प्रत्यक्ष सैन्य-मानचित्र मानना उचित नहीं होगा।

इसी प्रकार “सात महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु को मारा” जैसे लोकप्रिय सूत्र को भी मूल पाठ के क्रम से मिलाकर देखना चाहिए।

महाभारत का शोध तभी आगे बढ़ेगा जब हम— श्रद्धा को बनाए रखते हुए पाठ की परीक्षा करें।

तेरहवें दिन का सबसे बड़ा प्रश्न

अभिमन्यु क्यों मारा गया?

केवल इसलिए नहीं कि वह अकेला था।

केवल इसलिए नहीं कि सामने बहुत से योद्धा थे।

और केवल इसलिए भी नहीं कि चक्रव्यूह कठिन था।

वास्तविक उत्तर अधिक जटिल है—

एक ऐसी रणनीति बनी जिसमें अर्जुन को दूर किया गया, एक बहुस्तरीय व्यूह खड़ा किया गया, प्रवेश करने वाले योद्धा को भीतर अलग किया गया और उसके पीछे आने वाली सहायता को रोका गया।

अभिमन्यु उस रणनीति का शिकार भी था और उसी के भीतर उसका सबसे बड़ा प्रतिरोध भी।

यही कारण है कि तेरहवाँ दिन महाभारत के युद्ध में केवल करुणा का दिन नहीं है।

यह रणनीति बनाम वीरता की परीक्षा का दिन है। और अब चौदहवें दिन प्रश्न और कठोर हो जाता है—

क्या अर्जुन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ तक पहुँच सकेगा?

यहीं से कुरुक्षेत्र का युद्ध पहली बार सीधे समय के विरुद्ध युद्ध में बदलता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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