महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 46 : अभिमन्यु का रथ-विनाश — युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा
महाभारत — द्रोणपर्व — भाग 46 : अभिमन्यु का रथ-विनाश — युद्धनीति की निर्णायक परीक्षा
तेरहवें दिन का युद्ध अब उस सीमा पर पहुँच चुका था जहाँ अभिमन्यु का पराक्रम केवल व्यक्तिगत वीरता का विषय नहीं रह गया था। वह चक्रव्यूह के भीतर कौरव सेना की एक के बाद एक परतों को भेदता हुआ आगे बढ़ रहा था। दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण उसके हाथों मारा जा चुका था और उसके बाद द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्बल और कृतवर्मा जैसे महारथियों ने उसे घेरने का प्रयास किया था।
लेकिन अभिमन्यु अभी भी युद्ध कर रहा था।
यहीं से महाभारत का यह प्रसंग केवल वीरता की कथा नहीं रह जाता; यह युद्ध में नियम, रणनीति और सामूहिक शक्ति के प्रश्न को सामने लाता है।
अभिमन्यु को रोकना क्यों कठिन था?
अभिमन्यु के पास उस समय पूर्ण सैन्यदल नहीं था। उसके पीछे पाण्डवों की पूरी सेना नहीं थी। फिर भी वह लगातार आगे बढ़ रहा था।
उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी—गति और आक्रमण की निरन्तरता।
वह किसी एक महारथी से लम्बे समय तक उलझकर अपनी गति समाप्त नहीं करता। वह एक लक्ष्य को भेदता, दूसरे की ओर बढ़ता और कौरवों की आन्तरिक व्यवस्था में नया छेद पैदा कर देता।
द्रोणाचार्य के सामने समस्या अब यह नहीं थी कि अभिमन्यु को परास्त कौन करेगा।
समस्या यह थी कि उसे रोका कैसे जाए।
क्योंकि जब कोई योद्धा गतिशील रहता है तो उसके विरुद्ध संख्या का लाभ भी तुरंत प्रभावी नहीं होता। अनेक योद्धाओं को एक साथ इस प्रकार व्यवस्थित करना पड़ता है कि वे उसकी गति को समाप्त कर सकें।
यहीं से अभिमन्यु के विरुद्ध रणनीति बदलती है।
कर्ण का पहला निर्णायक प्रहार
महाभारत के अनुसार कर्ण ने अभिमन्यु से सीधे युद्ध किया। अभिमन्यु के प्रहारों से कर्ण पहले ही दबाव में आ चुका था।
तब द्रोणाचार्य ने कर्ण को अभिमन्यु की शक्ति का एक विशेष पक्ष बताया—उसका धनुष।
धनुष उसके युद्ध का मूल साधन था। जब तक धनुष उसके हाथ में था, वह दूर से लगातार प्रहार कर सकता था।
इसलिए अभिमन्यु को सामने से परास्त करने के बजाय उसकी युद्ध-क्षमता के साधन को नष्ट करने की योजना बनाई गई।
महाभारत में द्रोण का निर्देश आता है—
धनुश्चास्य हरेत्कर्णः पृष्ठतः पुरुषर्षभ । अश्वानस्य हनिष्यन्ति कृपः सारथिमेव च ॥
अर्थात् कर्ण उसके पीछे से जाकर उसके धनुष को काटे; कृप उसके घोड़ों और सारथि को मारें।
यहाँ युद्ध की रणनीति का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।
लक्ष्य अब अभिमन्यु का शरीर नहीं, उसकी युद्ध-व्यवस्था है।
धनुष काटना, घोड़ों को मारना और सारथि को हटाना—इन तीनों का उद्देश्य एक ही था: अभिमन्यु को गतिहीन और रथहीन बनाना।
धनुष टूट गया, लेकिन युद्ध नहीं रुका
योजना के अनुसार कर्ण ने अभिमन्यु के धनुष को पीछे से काट दिया।
यह क्षण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
एक सामान्य योद्धा के लिए धनुष टूट जाना युद्ध की समाप्ति हो सकता था। लेकिन अभिमन्यु ने तुरंत दूसरा धनुष उठा लिया।
उसने पुनः बाण चलाने शुरू कर दिए। इससे स्पष्ट होता है कि उसकी तैयारी केवल एक अस्त्र पर निर्भर नहीं थी।
कर्ण ने दूसरा धनुष भी काट दिया। अभिमन्यु ने तीसरा उठा लिया। और वह भी नष्ट कर दिया गया।
इस प्रकार अभिमन्यु की युद्ध-क्षमता को क्रमशः कम किया जा रहा था।
यहाँ महाभारत हमें युद्ध का एक कठोर सत्य दिखाता है—
वीरता और सैन्य-साधन दो अलग चीजें हैं।
योद्धा कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसका रथ, धनुष, घोड़े और सारथि क्रमशः नष्ट कर दिए जाएँ तो उसकी युद्ध-क्षमता घटती जाती है।
लेकिन अभिमन्यु ने यहाँ भी हार नहीं मानी।
रथ भी नष्ट कर दिया गया
जब अभिमन्यु के धनुष और अस्त्रों को नष्ट कर दिया गया, तब उसके रथ पर भी प्रहार हुआ।
उसके घोड़े मारे गए। सारथि मारा गया। रथ टूट गया।
अब अभिमन्यु के पास वह युद्ध-संरचना नहीं रही जिसके सहारे वह चक्रव्यूह में इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ रहा था।
लेकिन यहाँ महाभारत का चरित्र अपने चरम पर दिखाई देता है।
रथ गया, धनुष गया, घोड़े गए—लेकिन योद्धा नहीं गया।
अभिमन्यु रथ से उतर आया। और उसने नया अस्त्र उठाया। चक्रव्यूह के भीतर एक नया युद्ध
अभिमन्यु ने तलवार और ढाल ग्रहण की। वह अब रथी नहीं रहा। वह पैदल योद्धा बन चुका था।
लेकिन उसके सामने अभी भी रथों पर बैठे महारथी थे। युद्ध की दृष्टि से यह बहुत असमान स्थिति थी।
रथ पर बैठा योद्धा गति, ऊँचाई और दूरी—तीनों का लाभ प्राप्त करता है। पैदल योद्धा के पास ये सुविधाएँ नहीं होतीं।
फिर भी अभिमन्यु आगे बढ़ा।
महाभारत उसके इस रूप का वर्णन अत्यन्त प्रभावशाली उपमा से करता है—
सिंहनादं विनद्योच्चैः प्रगृह्य च महद् धनुः । अभ्यधावत तान्सर्वान् यथा सिंहः करीनिव ॥
अर्थात् उसने सिंह के समान गर्जना की और शत्रुओं की ओर उसी प्रकार बढ़ा जैसे सिंह हाथियों की ओर बढ़ता है।
यहाँ काव्य और युद्ध-वास्तविकता दोनों एक साथ उपस्थित हैं।
कवि उसे सिंह कहता है; युद्ध-अध्ययन हमें बताता है कि वह अपनी परिस्थिति के प्रतिकूल जाकर भी initiative अपने हाथ में रखे हुए था।
अभिमन्यु की दूसरी युद्ध-व्यवस्था
तलवार और ढाल लेकर अभिमन्यु ने फिर महारथियों का सामना किया।
उसकी तलवार से शत्रुओं पर प्रहार होने लगे। कौरव योद्धाओं ने उसे चारों ओर से घेरने की कोशिश की।
लेकिन अभिमन्यु की गति अभी भी बनी हुई थी। तब उसकी तलवार भी काट दी गई।
उसकी ढाल भी नष्ट कर दी गई। अब वह पूरी तरह रथहीन, धनुषहीन और तलवार-ढाल से भी रहित था।
लेकिन युद्ध समाप्त नहीं हुआ।
रथ का पहिया बना अस्त्र
अभिमन्यु ने अपने रथ का एक पहिया उठा लिया।
यह दृश्य महाभारत की सबसे प्रसिद्ध युद्ध-छवियों में से एक है।
जिस रथ पर बैठकर वह चक्रव्यूह में प्रवेश किया था, वही रथ अब टूट चुका था। उसी टूटे हुए रथ का पहिया उसके हाथ में आ गया।
एक क्षण के लिए युद्ध का अर्थ बदल जाता है।
जो वस्तु अभी तक वाहन थी, वही अब अस्त्र बन गई।
अभिमन्यु उस पहिए को लेकर कौरव महारथियों की ओर दौड़ा।
उस समय उसके सामने अस्त्र-संपन्न योद्धा थे और उसके हाथ में केवल रथ का पहिया।
लेकिन उसका मनोबल नहीं टूटा।
महाभारत में उसका यह रूप अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है।
वह केवल अपने प्राणों की रक्षा नहीं कर रहा था।
वह अभी भी विरोधी की सैन्य व्यवस्था में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा था।
यहाँ युद्ध-नियम का प्रश्न क्यों उठता है?
अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि अभिमन्यु वीर था या नहीं।
प्रश्न यह है कि उसके साथ युद्ध किस प्रकार किया गया।
यदि किसी योद्धा का धनुष टूट जाए, तो क्या उसके सामने अनेक महारथी एक साथ प्रहार कर सकते हैं?
यदि उसका रथ नष्ट हो जाए, तो क्या रथ पर बैठे योद्धा उसे चारों ओर से मार सकते हैं?
यदि वह पैदल हो जाए, तो क्या युद्ध की समानता बनी रहती है?
इन प्रश्नों का उत्तर देते समय हमें बाद की लोकप्रिय कथा और मूल महाभारत के विवरण में अंतर करना चाहिए।
महाभारत स्वयं घटनाओं को अत्यन्त क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करता है—पहले धनुष काटा गया, फिर घोड़े और सारथि मारे गए, फिर रथ नष्ट हुआ, फिर तलवार-ढाल नष्ट हुए और अंततः अभिमन्यु अन्य अस्त्र ग्रहण करता गया।
इस क्रम को केवल भावनात्मक कथा समझना पर्याप्त नहीं है।
यह एक सैन्य विघटन की प्रक्रिया भी है। अभिमन्यु को एक ही प्रहार में नहीं रोका गया।
उसकी युद्ध-क्षमता को चरण-दर-चरण समाप्त किया गया।
लेकिन अभिमन्यु क्यों नहीं रुका?
यहाँ महाभारत के चरित्र-विज्ञान का प्रश्न आता है। जानता था कि वह अकेला है।
वह जानता था कि उसका रथ नष्ट हो चुका है। फिर भी वह पीछे नहीं हटता।
क्यों?
क्योंकि उसके सामने उस समय व्यक्तिगत जीवन से बड़ा प्रश्न था—युद्ध में अपने पक्ष की स्थिति को बनाए रखना।
यदि वह पीछे हटता, तो कौरव सेना पुनः संगठित हो सकती थी।
यदि वह आगे बढ़ता, तो कौरवों को लगातार उसके विरुद्ध संसाधन लगाने पड़ते।
इस दृष्टि से उसका युद्ध केवल वीरता नहीं, एक प्रकार का रणनीतिक दबाव भी बन चुका था।
द्रोण की रणनीति सफल हुई—लेकिन किस कीमत पर?
द्रोणाचार्य का उद्देश्य उस दिन पाण्डवों की व्यवस्था को तोड़ना था।
अभिमन्यु ने उस व्यवस्था के भीतर घुसकर कौरव सेना को ही अस्थिर कर दिया।
अभिमन्यु को रोकने के लिए कौरव पक्ष को युद्ध की सामान्य संरचना से बाहर जाकर सामूहिक रूप से काम करना पड़ा।
यही वह बिन्दु है जहाँ से तेरहवें दिन का युद्ध केवल सैन्य घटना नहीं रहता।
यह महाभारत के सबसे बड़े धर्म-संकट में बदल जाता है।
और अगले चरण में वह प्रश्न और अधिक कठोर रूप में सामने आता है—
जब अभिमन्यु के पास न धनुष था, न रथ, न घोड़े, न सारथि और न पूर्ण अस्त्र—
तब अन्तिम प्रहार किसने किया?
और क्या उस समय भी वह युद्ध कर रहा था, या एक असमान परिस्थिति में घिर चुका था?
इन प्रश्नों का उत्तर अगले भाग में अभिमन्यु के अंतिम संघर्ष के मूल संस्कृत पाठ के साथ देखना आवश्यक है।
क्योंकि अभिमन्यु की मृत्यु को समझना केवल यह जानना नहीं है कि किसने उसे मारा।
वास्तविक शोध-प्रश्न है—
उसकी युद्ध-क्षमता को किस क्रम में समाप्त किया गया, किस प्रकार उसे अलग-थलग किया गया और उस पूरी प्रक्रिया में युद्ध-धर्म की सीमा कहाँ दिखाई देती है?
यही तेरहवें दिन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक और नैतिक परीक्षा है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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