महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 5 : अशोच्यानन्वशोचस्त्वं — शोक की पहली दार्शनिक परीक्षा

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 5 : अशोच्यानन्वशोचस्त्वं — शोक की पहली दार्शनिक परीक्षा

अर्जुन ने अपना गाण्डीव रख दिया है।

उसने युद्ध न करने का निर्णय घोषित कर दिया है और कृष्ण से कहा है—

धर्मसम्मूढचेताः।
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥

“मेरा चित्त धर्म के विषय में मोहित है। मैं आपका शिष्य हूँ; मुझे शिक्षा दीजिए।”

अब कृष्ण के सामने केवल एक योद्धा नहीं है।

उनके सामने ऐसा मनुष्य है जो धर्म के दो परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले रूपों के बीच फँस गया है।

एक ओर—

गुरु, पितामह, भाई और स्वजन।

दूसरी ओर—

क्षत्रिय का युद्ध और न्याय की स्थापना।

कृष्ण का उत्तर इसी मूल भ्रम को संबोधित करता है।

“अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्”

कृष्ण कहते हैं—

श्रीभगवानुवाच।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

“तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जिनके लिए शोक करना उचित नहीं, और बातें प्रज्ञावानों जैसी कर रहे हो। ज्ञानी जीवित और मृत—दोनों के लिए इस प्रकार शोक नहीं करते।”

यह गीता का पहला दार्शनिक प्रहार है।

लेकिन इसे समझने में सावधानी आवश्यक है।

कृष्ण अर्जुन की करुणा का उपहास नहीं कर रहे।

वे यह नहीं कह रहे कि मृत्यु का कोई दुःख नहीं होता।

वे अर्जुन की शोक-धारणा की आधारभूमि को चुनौती दे रहे हैं।

अर्जुन की दृष्टि में—

मृत्यु = व्यक्ति का अंत।

कृष्ण आगे प्रश्न उठाते हैं—

क्या व्यक्ति की वास्तविक सत्ता केवल देह तक सीमित है?

यहीं से आत्मा का प्रश्न आता है।

“न त्वेवाहं जातु नासम्…”

कृष्ण कहते हैं—

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥

“ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, तुम नहीं थे या ये राजा नहीं थे; और ऐसा भी नहीं कि आगे हम सब नहीं रहेंगे।”

यहाँ गीता एक अत्यंत गंभीर दार्शनिक प्रस्ताव रखती है—

अस्तित्व को केवल वर्तमान देह से नहीं मापा जा सकता।

कृष्ण अपने लिए, अर्जुन के लिए और युद्धभूमि में उपस्थित राजाओं के लिए एक निरंतर अस्तित्व की बात करते हैं।

यहाँ से “आत्मा” को केवल धार्मिक विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्व की समस्या के रूप में पढ़ा जा सकता है।

मनुष्य कौन है?

क्या वह केवल शरीर है?

यदि शरीर बदलता है, तो क्या व्यक्ति पूरी तरह समाप्त हो जाता है?

यही प्रश्न आगे विकसित होता है।

बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था

कृष्ण कहते हैं—

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

“जिस प्रकार इस देह में देही को बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था प्राप्त होती है, उसी प्रकार वह दूसरी देह को प्राप्त होता है; धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।”

यहाँ कृष्ण एक बहुत निकट अनुभव से तर्क प्रारम्भ करते हैं।

बालक का शरीर बदलता है।

युवा का शरीर बदलता है।

वृद्ध का शरीर बदलता है।

फिर भी मनुष्य अपने को वही व्यक्ति मानता है।

अर्थात्—

देह में परिवर्तन होता है, लेकिन आत्म-पहचान की निरंतरता बनी रहती है।

कृष्ण इसी अनुभव को मृत्यु के प्रश्न तक ले जाते हैं।

यदि जीवन में निरंतर परिवर्तन के बावजूद “मैं” की अनुभूति बनी रहती है, तो केवल देह-परिवर्तन को अस्तित्व का पूर्ण अंत मानना क्या पर्याप्त है?

गीता का तर्क यहीं से आगे बढ़ता है।

सुख-दुःख का स्पर्श

फिर कृष्ण कहते हैं—

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

“इन्द्रियों के विषयों से शीत-उष्ण और सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं; वे आते-जाते और अनित्य हैं। हे भारत! उन्हें सहन करो।”

यहाँ आत्मा की चर्चा के साथ एक दूसरी बात जुड़ती है—

अनुभव की अनित्यता।

ठंड आती है और जाती है।

गर्मी आती है और जाती है।

सुख आता है और जाता है।

दुःख आता है और जाता है।

लेकिन अर्जुन ने वर्तमान दुःख को ऐसा अनुभव कर लिया है मानो वही अंतिम सत्य हो।

कृष्ण उसकी दृष्टि को वर्तमान भाव से उठाकर परिवर्तन के व्यापक नियम की ओर ले जाते हैं।

“नासतो विद्यते भावः”

इसके बाद आता है—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥

“असत् का स्थायी अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है; तत्त्वदर्शियों ने दोनों का सत्य देखा है।”

यह गीता के सबसे अधिक दार्शनिक वाक्यों में से एक है।

यहाँ प्रश्न केवल आत्मा और शरीर का नहीं है।

यह प्रश्न है—

सत् क्या है?

और—

जो बदलता है, उसकी सत्ता किस अर्थ में है?

अर्जुन जिस देह और संबंध को अंतिम सत्य मानकर शोक कर रहा है, कृष्ण उसे सत्ता की गहरी संरचना पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।

यहीं गीता का संवाद युद्धभूमि से उठकर दर्शनभूमि बन जाता है।

“अविनाशि तु तद्विद्धि”

कृष्ण आगे कहते हैं—

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

“जिससे यह सब व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो; उस अव्यय का विनाश कोई नहीं कर सकता।”

यहाँ “येन सर्वमिदं ततम्” विशेष ध्यान देने योग्य है।

कृष्ण केवल यह नहीं कह रहे कि आत्मा शरीर के भीतर कोई छोटा-सा अमर तत्व है।

वह सत्ता जिसके द्वारा यह सब व्याप्त है—उसे अविनाशी कहा जा रहा है।

इसलिए गीता में आत्मा का प्रश्न धीरे-धीरे व्यक्तिगत अमरता से उठकर अस्तित्व की मूल सत्ता तक पहुँचता है।

“न जायते म्रियते वा कदाचित्”

आगे कृष्ण कहते हैं—

न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

“यह न कभी जन्म लेता है, न मरता है; यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी इसका वध नहीं होता।”

यहीं कृष्ण अर्जुन के मूल भय को सीधे चुनौती देते हैं।

अर्जुन का तर्क था—

“मैं इन्हें मार दूँगा।”

कृष्ण का उत्तर है—

“तुम किसे मारना कहते हो?”

शरीर का नाश वास्तविक है।

लेकिन क्या शरीर का नाश आत्मा का नाश है?

गीता का उत्तर—

नहीं।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सावधानी भी आवश्यक है।

इस शिक्षण का अर्थ यह नहीं कि “किसी की हत्या से कोई वास्तविक हानि नहीं होती।”

महाभारत में शरीर का विनाश, परिवार का विनाश, सामाजिक व्यवस्था का विनाश—सब वास्तविक परिणाम हैं।

कृष्ण का तर्क आत्मा की अविनश्वरता के स्तर पर है।

इसे सामाजिक या नैतिक हत्या को नगण्य सिद्ध करने के लिए उपयोग करना गीता के तर्क को उसके संदर्भ से बाहर ले जाना होगा।

आत्मा अमर है—तो क्या युद्ध स्वतः धर्मपूर्ण हो गया?

यहीं सबसे बड़ा शोध-प्रश्न पैदा होता है।

यदि आत्मा अविनाशी है, तो क्या किसी भी हिंसा को उचित ठहराया जा सकता है?

गीता ऐसा सरल निष्कर्ष नहीं देती।

कृष्ण को आगे कर्म, स्वधर्म, यज्ञ, आसक्ति, बुद्धियोग और धर्म की विस्तृत चर्चा करनी पड़ती है।

इसका अर्थ है—

आत्मा की अमरता युद्ध का अकेला औचित्य नहीं है।

यह अर्जुन के शोक की एक दार्शनिक परत का उत्तर है।

युद्ध का धर्म अलग प्रश्न है।

आत्मा की सत्ता अलग प्रश्न है।

और कर्म की नैतिकता फिर अलग प्रश्न है।

यही विभाजन गीता को गंभीर दर्शन बनाता है।

अर्जुन के शोक की पहली परीक्षा

अर्जुन की पहली धारणा थी—

“मेरे स्वजन मर जाएँगे, इसलिए युद्ध अनुचित है।”

कृष्ण ने अभी यह नहीं कहा कि—

“युद्ध करो क्योंकि तुम जीतोगे।”

उन्होंने कहा—

मृत्यु को केवल देह के स्तर पर मत देखो।

अर्थात् कृष्ण ने अर्जुन की समस्या को—

राजनीतिक निर्णय → व्यक्तिगत शोक → देह → आत्मा → अस्तित्व

की दिशा में विस्तृत कर दिया।

अब युद्ध का प्रश्न केवल कुरुक्षेत्र का नहीं रहा।

वह मनुष्य के मूल प्रश्न में बदल गया—

मैं कौन हूँ?

और—

मृत्यु वास्तव में किसका अंत है?

शोध-निष्कर्ष

गीता के इस प्रारम्भिक दर्शन को यदि एक वाक्य में रखना हो तो वह यह होगा—

अर्जुन देह के विनाश को अस्तित्व का विनाश मानकर शोक कर रहा है; कृष्ण उसे अस्तित्व की उस सत्ता की ओर देखने को कहते हैं जो देह-परिवर्तन से परे है।

लेकिन यही गीता की पूर्ण शिक्षा नहीं है।

यह केवल पहला दार्शनिक द्वार है।

कृष्ण अभी अर्जुन को यह नहीं बता चुके कि उसे कर्म क्यों करना चाहिए।

उन्होंने पहले यह स्पष्ट करना शुरू किया है कि—

कर्म करने वाला कौन है, मरने वाला कौन है और शोक किस आधार पर किया जा रहा है।

यहीं से अगला प्रश्न और कठिन हो जाता है—

यदि आत्मा अविनाशी है, तो अर्जुन का अपना कर्तव्य क्या है?

यहीं कृष्ण आत्मज्ञान से कर्म की ओर बढ़ेंगे—

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।

और पहली बार गीता का दार्शनिक प्रश्न सीधे क्षत्रिय-धर्म और कर्म के प्रश्न से जुड़ जाएगा।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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