महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 7 : स्थितप्रज्ञ — युद्धभूमि पर स्थिर बुद्धि की खोज

 महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 7 : स्थितप्रज्ञ — युद्धभूमि पर स्थिर बुद्धि की खोज

कृष्ण अर्जुन को आत्मा, स्वधर्म और कर्मयोग के विषय में समझा चुके हैं।

उन्होंने कहा— समत्वं योग उच्यते।

सफलता और असफलता के बीच समत्व ही योग है।

लेकिन अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है— जिस मनुष्य की बुद्धि परिणामों से विचलित न हो, वह वास्तव में कैसा होता है?

अर्जुन यही पूछता है—

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥

“हे केशव! जिसकी प्रज्ञा स्थिर है और जो समाधि में स्थित है, उसकी पहचान क्या है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?”

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। अर्जुन अब केवल युद्ध का उत्तर नहीं चाहता।

वह ऐसी चेतना की पहचान जानना चाहता है जो कठिन परिस्थिति में भी स्थिर रह सके।

कृष्ण का उत्तर — इच्छा से आरम्भ

कृष्ण कहते हैं—

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

“हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को छोड़ देता है और आत्मा में ही आत्मा से संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।”

यहाँ स्थितप्रज्ञ की पहली पहचान किसी बाहरी आचरण से नहीं दी गई।

न वस्त्र। न आश्रम। न कोई विशेष धार्मिक चिह्न। पहचान है—

कामना की आंतरिक निर्भरता से मुक्ति।

मनुष्य सामान्यतः सुख को बाहर खोजता है— वस्तु में, सम्मान में, संबंध में, विजय में, सत्ता में, प्रशंसा में।

कृष्ण जिस स्थिरता की बात कर रहे हैं, उसका केंद्र बाहर नहीं है। आत्मन्येवात्मना तुष्टः।

अर्थात् आत्मा में ही आत्मा से संतुष्ट। यह गीता की आत्मनिर्भर चेतना का पहला स्पष्ट चित्र है।

क्या स्थितप्रज्ञ भावशून्य है? नहीं।

कृष्ण आगे कहते हैं— दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

“दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा समाप्त हो गई है और जो राग, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।”

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है।

दुःख का अनुभव समाप्त होना और दुःख से मन का टूट जाना—दो अलग बातें हैं।

स्थितप्रज्ञ को दुःख महसूस ही नहीं होता—ऐसा गीता नहीं कहती।

वह दुःख में उद्विग्न होकर अपनी बुद्धि नहीं खोता। इसी तरह सुख का अनुभव होना समस्या नहीं है।

समस्या है— सुख के प्रति स्पृहा। अर्थात् मन का सुख पर निर्भर हो जाना।

इसलिए स्थितप्रज्ञ कोई भावहीन मनुष्य नहीं। वह भावों का स्वामी है, उनका दास नहीं।

राग, भय और क्रोध

कृष्ण ने तीन शब्द साथ रखे— राग।भय।क्रोध। इन तीनों का संबंध भी समझना चाहिए।

जिस वस्तु या व्यक्ति से अत्यधिक राग है, उसके खोने का भय पैदा होता है।

भय से सुरक्षा की तीव्र इच्छा पैदा होती है। और जब वह इच्छा बाधित होती है, तो क्रोध उत्पन्न हो सकता है।

इस दृष्टि से— राग → भय → क्रोध  मन की एक संभावित श्रृंखला बन सकती है।

कृष्ण स्थितप्रज्ञ की पहचान बताते हुए इस पूरे चक्र से दूरी की बात करते हैं।

यह केवल आध्यात्मिक विचार नहीं है। मानवीय निर्णय में भी इसका गहरा महत्व है।

जिस निर्णय के पीछे अत्यधिक राग या भय हो, उसमें बुद्धि के संतुलित रहने की संभावना कम हो सकती है।

अर्जुन का वर्तमान संकट भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है।

उसका स्वजनों के प्रति राग और करुणा इतनी प्रबल है कि वह अपने कर्तव्य के निर्णय से हटने लगा है।

“यः सर्वत्रानभिस्नेहः” 

कृष्ण आगे कहते हैं— 

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

“जो हर परिस्थिति में अत्यधिक आसक्ति से मुक्त है और शुभ-अशुभ की प्राप्ति पर न अत्यधिक प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है—उसकी प्रज्ञा स्थिर है।”

यहाँ फिर वही सूत्र आता है— समत्व।

लेकिन समत्व का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अच्छे और बुरे में अंतर करना ही छोड़ दे।

यदि ऐसा होता तो धर्म-विवेक भी समाप्त हो जाता।

समत्व का अर्थ है— परिस्थिति के मूल्यांकन में बुद्धि रहे, लेकिन परिणाम से मन की पहचान न बँधे।

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन्द्रियाँ और मन

इसके बाद गीता मन और इन्द्रियों के संबंध को सामने लाती है—

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

“जब मनुष्य कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।”

यहाँ इन्द्रिय-निग्रह को इन्द्रियों का विनाश नहीं समझना चाहिए।

कछुआ आवश्यकता पड़ने पर अपने अंग बाहर भी निकालता है।

इसलिए उपमा का संकेत है— स्वेच्छा से नियंत्रण।

इन्द्रियाँ सक्रिय रहें, लेकिन मन उनका दास न बने।

यह बात कर्मयोग के लिए आवश्यक है। क्योंकि संसार में रहकर कर्म करना है। भागना नहीं है।

केवल विषय छोड़ देने से?

कृष्ण आगे एक अत्यंत सूक्ष्म बात कहते हैं—

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥

“विषयों से दूर रहने वाले व्यक्ति से विषय तो हट सकते हैं, लेकिन उनमें रहने वाला रस बना रह सकता है; परमतत्त्व का दर्शन होने पर वह रस भी समाप्त होता है।”

यहाँ गीता बाहरी संयम और आंतरिक परिवर्तन में अंतर करती है। किसी वस्तु से दूरी बना लेना एक बात है।

उस वस्तु के प्रति भीतर की निर्भरता समाप्त होना दूसरी। इसलिए केवल बाहरी त्याग को स्थितप्रज्ञता नहीं माना गया।

दृष्टि बदलनी होगी। मन ही निर्णायक है

फिर गीता मन के पतन की पूरी श्रृंखला बताती है—

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिंतन → संग → कामना → क्रोध।

आगे—

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से मोह। मोह से स्मृति का भ्रम। स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश।

और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन।

यह गीता के सबसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक अनुक्रमों में से एक है।

अर्जुन के संकट से इसका संबंध

अर्जुन की स्थिति को इस सूत्र से जोड़ना संभव है, लेकिन सावधानी से।

गीता यह नहीं कहती कि अर्जुन किसी विषय-वासना से क्रोध में पहुँचा था।

अर्जुन की परिस्थिति अलग है।

लेकिन उसके भीतर भी एक तीव्र भावनात्मक संबंध उसके निर्णय पर प्रभाव डाल रहा है।

इसलिए कृष्ण जिस व्यापक सिद्धान्त को बता रहे हैं, उसका मूल प्रश्न है—

क्या मन की तीव्र अवस्था बुद्धि को नियंत्रित कर रही है, या बुद्धि मन को?

यही स्थितप्रज्ञ की परीक्षा है।

स्थितप्रज्ञ और युद्धभूमि

यहाँ गीता की कथा-रचना फिर असाधारण हो जाती है।

स्थितप्रज्ञ की चर्चा किसी वनवासी ऋषि के संदर्भ में नहीं हो रही।

वह चर्चा हो रही है— कुरुक्षेत्र में।

अर्थात् आदर्श स्थिरता संसार से भागने में नहीं, संसार के निर्णायक संघर्ष के बीच बुद्धि को स्थिर रखने में खोजी जा रही है।

यही कर्मयोग की वास्तविक पृष्ठभूमि है। “एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ”

द्वितीय अध्याय के अंत में कृष्ण कहते हैं—

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

“हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है; इसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता।”

अर्थात् स्थितप्रज्ञ कोई केवल व्यवहारिक व्यक्तित्व-प्रकार नहीं।

यह एक ऐसी चेतना की स्थिति है जिसमें मनुष्य की दृष्टि अपने वास्तविक अस्तित्व के संबंध में स्थिर हो जाती है।

शोध-निष्कर्ष

द्वितीय अध्याय के इस पूरे प्रसंग को यदि एक सूत्र में समझें तो—

आत्मज्ञान → स्वधर्म → निष्काम कर्म → समत्व → स्थितप्रज्ञता।

लेकिन यह क्रम केवल सिद्धान्तों की सूची नहीं है। कृष्ण अर्जुन की समस्या को धीरे-धीरे पुनर्गठित कर रहे हैं।

अर्जुन पहले पूछ रहा था— “क्या मैं इन्हें मारूँ?”

फिर— “मेरा धर्म क्या है?”

और अब प्रश्न बनता है— “ऐसा मनुष्य कैसे बने जिसकी बुद्धि परिस्थिति से न टूटे?”

यही स्थितप्रज्ञ का प्रश्न है। और यहाँ गीता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है— योगस्थः कुरु कर्माणि।

योग का अर्थ कर्म से पलायन नहीं। स्थिर बुद्धि से कर्म करना है।

यहीं से गीता अगले अध्याय में एक और कठिन प्रश्न उठाती है—

यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, तो कर्म क्यों करें?

और यदि कर्म करना ही है, तो कर्म का बंधन कैसे टूटे?

अर्थात् अगला चरण होगा— ज्ञान और कर्म का संबंध — अर्जुन का तीसरा बड़ा प्रश्न।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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