महाभारत — विराटपर्व — भाग 7 : उपकीचक और द्रौपदी — जब अन्याय सामूहिक हिंसा बन जाता है

 महाभारत — विराटपर्व — भाग 7 : उपकीचक और द्रौपदी — जब अन्याय सामूहिक हिंसा बन जाता है

कीचक के वध के बाद पहली दृष्टि में लगता है कि संकट समाप्त हो गया। वह व्यक्ति जो विराटराज की सत्ता के भीतर अपनी शक्ति के बल पर द्रौपदी का अपमान कर रहा था, भीम के हाथों मारा जा चुका है। किन्तु महाभारत यहीं कथा समाप्त नहीं करता।

क्योंकि प्रश्न केवल यह नहीं था कि कीचक दोषी था या नहीं

बड़ा प्रश्न यह था—

क्या कीचक के मर जाने से उस व्यवस्था का अधर्म भी समाप्त हो गया, जिसने उसे इतना शक्तिशाली बना दिया था?

विराटपर्व का अगला प्रसंग इसका उत्तर अत्यन्त कठोर रूप में देता है।

TEXT — मूल महाभारत-पाठ

कीचक के भाई और उसके सम्बन्धी उसके मृत शरीर को देखते हैं। उनके भीतर शोक के साथ प्रतिशोध उत्पन्न होता है। और उनका लक्ष्य कीचक का हत्यारा भीम नहीं, बल्कि द्रौपदी बनती है।

महाभारत में उनका विचार है कि इस स्त्री के कारण कीचक मारा गया है और इसलिए इसे भी कीचक के साथ जला दिया जाए।

द्रौपदी को पकड़ लिया जाता है और उसे कीचक के शव के साथ बाँध दिया जाता है।

यहाँ कथा अचानक अत्यन्त भयावह हो जाती है।

जिस स्त्री के साथ अपराध हुआ था, वही अपराध की दोषी घोषित कर दी जाती है।

द्रौपदी अपने गन्धर्व-पति के नाम से पुकारती है— जयस्यन्तु च मां कृष्णां कीचकस्य च बान्धवाः।

और वह भीम को संकेत करती हुई सहायता के लिए पुकारती है।

मूल कथा में उसकी पुकार का प्रभाव तत्काल होता है। भीम, जो उस समय अपनी पहचान छिपाए हुए है, द्रौपदी की रक्षा के लिए निकल पड़ता है।

भीम का आगमन — पहचान छिपी हुई, शक्ति नहीं

यहाँ विराटपर्व की एक अत्यन्त सुन्दर रचनात्मक विशेषता दिखाई देती है।

भीम को न तो अपना नाम बताना है, न अपने वास्तविक रूप में सामने आना है।

लेकिन द्रौपदी संकट में है। 

अतः भीम नगर से बाहर निकलता है और एक वृक्ष उखाड़ लेता है।

महाभारत का वर्णन बताता है कि उसके वेग से वृक्ष गिरने लगते हैं और उसके हाथ में उखड़ा हुआ वृक्ष देखकर कीचक के सम्बन्धी भयभीत हो जाते हैं।

महाभारत के वर्णन में यह दृश्य इस प्रकार आता है कि वे उसे किसी प्रचण्ड गन्धर्व के समान आते हुए देखते हैं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है। वे भीम को पहचान नहीं पाते।

वे यह नहीं कहते— “यह तो विराट का रसोइया वल्लव है।”

बल्कि उन्हें विश्वास होता है कि कोई अदृश्य या अलौकिक शक्ति उनके सामने आ गयी है।

यही वह बिन्दु है जहाँ पूर्व के प्रसंगों में निर्मित गन्धर्व-पति की कथा एक रणनीतिक सुरक्षा-कवच बन जाती है।

CONTRADICTION — अपराधी मरा, लेकिन पीड़िता अपराधी बन गई

यह इस पूरे प्रसंग का सबसे कठोर प्रश्न है। कीचक ने द्रौपदी का अपमान किया।

द्रौपदी ने उसका विरोध किया। भीम ने कीचक को मार दिया।

अब कीचक के सम्बन्धी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि कीचक का अपराध उसके विनाश का कारण था।

वे कारण खोजते हैं— द्रौपदी। 

अर्थात्— अपराधी → पीड़िता को दोषी ठहराता है → अपराधी का समूह उसी दोष को सामूहिक सत्य बना देता है।

यह केवल कीचक की व्यक्तिगत वासना नहीं रही। यह अब समूह की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गयी।

यहीं व्यक्तिगत अधर्म सामूहिक अधर्म में बदलता है।

महाभारत इस मनोविज्ञान को किसी उपदेश के माध्यम से नहीं, बल्कि कथा के माध्यम से दिखाता है।

CONTEXT — कीचक केवल व्यक्ति नहीं था

पिछले प्रसंग में एक बात स्पष्ट हो चुकी थी कि कीचक साधारण व्यक्ति नहीं था।

वह विराट की सेना का सेनापति था और स्वयं यह दावा करता था कि वास्तविक सत्ता उसके हाथ में है।

इसलिए कीचक की मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी।

उसके पीछे उसका परिवार, उसके अनुयायी और उसका राजनीतिक प्रभाव था।

अब उसके सम्बन्धियों की प्रतिक्रिया को इसी संदर्भ में देखना चाहिए।

वे न्याय की खोज नहीं करते। वे यह नहीं पूछते— “कीचक ने क्या किया था?”

वे पूछते हैं— “कीचक को किसने मरवाया?”

यह अन्तर बहुत महत्वपूर्ण है।

जहाँ न्याय अपराध के कारण की खोज करता है, वहाँ प्रतिशोध अपराधी की प्रतिष्ठा बचाने के लिए दोष का स्थानान्तरण करता है।

भीम का दूसरा हस्तक्षेप

द्रौपदी को मुक्त करने के लिए भीम आगे बढ़ता है।

जब वे लोग उसे आते हुए देखते हैं तो भयभीत होकर द्रौपदी को छोड़ देते हैं।

किन्तु भीम वहीं नहीं रुकता।

महाभारत के अनुसार वह उनका पीछा करता है और अपने हाथ में लिए हुए उखड़े वृक्ष से उन्हें मारता है।

यहाँ संख्या विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

मूल कथा में कहा गया है कि भीम ने 105 उपकीचकों को मार डाला। कीचक को मिलाकर मृत सूतों की संख्या 106 बताई गयी है।

महाभारत इस दृश्य को अत्यन्त विराट रूप देता है—उनके शव ऐसे पड़े हैं जैसे आँधी से उखड़े हुए वृक्षों का वन।

यह केवल वीरता का प्रदर्शन नहीं है।

यह विराटपर्व के भीतर शक्ति और संयम के बीच चल रहे तनाव का दूसरा बड़ा परीक्षण है।

भीम ने अपनी पहचान क्यों नहीं खोली?

यहाँ एक महत्वपूर्ण शोध-प्रश्न उठता है। कीचक-वध के समय भीम ने गुप्तता रखी।

अब तो स्थिति और भी कठिन थी। एक साथ 105 लोगों का वध हो गया।

फिर भी पाण्डवों की वास्तविक पहचान तत्काल उजागर नहीं होती।

इसका कारण कथा में पहले से निर्मित मनोवैज्ञानिक वातावरण है।

लोग पहले ही यह मान चुके थे कि द्रौपदी के गन्धर्व पति हैं और वही उसके अपमान का प्रतिशोध लेते हैं।

कीचक की मृत्यु भी इसी विश्वास से समझी गयी थी।

अब उपकीचकों की मृत्यु भी उसी धारणा को और मजबूत करती है।

अर्थात् भीम की वास्तविक शक्ति अज्ञातवास की काल्पनिक पहचान के भीतर छिप जाती है।

यह एक अत्यन्त रोचक रणनीति है—

भीम छिपा है, लेकिन उसकी शक्ति छिप नहीं सकती;
लोग शक्ति को देखते हैं, पर उसके स्रोत को गलत पहचान लेते हैं।

CONCEPT — पीड़ित को दोषी बनाने की प्रवृत्ति

इस प्रसंग का एक गहरा सामाजिक अर्थ है। कीचक ने द्रौपदी को प्राप्त करने की इच्छा की।

द्रौपदी ने उसे अस्वीकार किया। उसने उसका अपमान किया।

उसका प्रतिरोध हुआ। कीचक मारा गया।

लेकिन उसके सम्बन्धियों की दृष्टि में— दोष द्रौपदी का है।

यह महाभारत का अत्यन्त पुराना लेकिन आज भी प्रासंगिक मानवीय मनोविज्ञान है।

जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति अपने आचरण के कारण पराजित होता है, तब उसका समूह कभी-कभी यह स्वीकार नहीं कर पाता कि— “हमारे व्यक्ति ने गलत किया।”

इसके बजाय वह कहता है— “उसके साथ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दूसरे ने उसे उकसाया।”

यहीं से प्रतिशोध जन्म लेता है। और प्रतिशोध अक्सर न्याय का रूप धारण कर लेता है।

COMPARISON — द्यूतसभा से विराट तक

यह प्रसंग हमें द्यूतसभा की याद दिलाता है। द्यूतसभा में द्रौपदी का अपमान हुआ था।

वहाँ— अपराधी उपस्थित थे, पीड़िता उपस्थित थी, शक्तिशाली पुरुष उपस्थित थे, लेकिन धर्म की रक्षा करने वाली संस्थागत शक्ति निष्क्रिय रही।

विराट में भी लगभग वही स्थिति दोहरती है।

कीचक द्रौपदी का अपमान करता है। राजा विराट उपस्थित है। सभा उपस्थित है। लेकिन राजसत्ता निर्णायक रूप से हस्तक्षेप नहीं करती।

अन्तर केवल इतना है कि इस बार पाण्डव असहाय नहीं हैं। उनकी शक्ति छिपी हुई है।

इसलिए द्यूतसभा के विपरीत विराट में भीतर से प्रतिकार संभव है।

यही विराटपर्व की एक महत्वपूर्ण पुनर्रचना है।

द्यूतसभा में द्रौपदी का प्रश्न अनुत्तरित रह गया था।
विराट में वही प्रश्न शक्ति के माध्यम से उत्तर प्राप्त करता है।

लेकिन— यह राजधर्म की विजय नहीं है। यह फिर भी राज्य के बाहर से आया हुआ न्याय है।

CONTRADICTION — क्या भीम का यह वध धर्म है?

यह प्रश्न टालना नहीं चाहिए। कीचक ने अपराध किया था।

उसका वध व्यक्तिगत प्रतिशोध और द्रौपदी की रक्षा दोनों के रूप में समझा जा सकता है।

लेकिन 105 उपकीचकों का वध? क्या वे सभी अपराधी थे?

या वे केवल कीचक के सम्बन्धी थे?

यदि हम महाभारत के पाठ को बिना आधुनिक नैतिकता आरोपित किए पढ़ें, तो स्पष्ट है कि वे द्रौपदी को जबरन ले जा रहे थे और उसे कीचक के शव के साथ जलाने का प्रयास कर रहे थे।

अर्थात् उस क्षण वे स्वयं हिंसक अपराध में सहभागी हो चुके थे। इसलिए भीम का हस्तक्षेप केवल मृत कीचक का बदला नहीं था।

वह द्रौपदी को तत्काल हिंसक मृत्यु से बचाने का कार्य भी था।

फिर भी संख्या और हिंसा का विस्तार हमें यह सावधानी रखने को बाध्य करता है कि इसे सरल शब्दों में “न्याय की पूर्ण विजय” न कहें।

महाभारत स्वयं मनुष्य को इतनी सरल नैतिक श्रेणियों में नहीं बाँधता।

द्रौपदी — केवल रक्षित स्त्री नहीं

इस पूरे प्रसंग में द्रौपदी की भूमिका भी ध्यान देने योग्य है। वह केवल सहायता की प्रतीक्षा नहीं करती।

कीचक-वध में वही योजना बनाती है। वह कीचक को नृत्यशाला तक लाती है।

वह उसकी मनोवृत्ति को समझती है। और उपकीचक प्रसंग में भी संकट के क्षण में वह अपने गन्धर्व पतियों को पुकारती है।

अर्थात् उसकी भूमिका तीन स्तरों पर है— पीड़िता → रणनीतिकार → संकट से निकलने वाली सक्रिय व्यक्तित्व।

महाभारत की द्रौपदी को केवल “अबला” बनाकर पढ़ना इसलिए पाठ के साथ न्याय नहीं करेगा।

कीचक-वध और उपकीचक-वध में अंतर

दोनों घटनाएँ एक साथ पढ़ने पर एक महत्वपूर्ण अन्तर सामने आता है।

कीचक-वध
एक शक्तिशाली व्यक्ति के निजी अधर्म के विरुद्ध नियंत्रित प्रतिकार है।

उपकीचक-वध
उसी अधर्म की सामूहिक रक्षा करने वाले समूह के विरुद्ध हिंसक प्रतिरोध है।

इसलिए कथा का विस्तार भी बढ़ता जाता है— व्यक्ति → परिवार/समूह → सत्ता → सामाजिक व्यवस्था।

महाभारत यहाँ एक सूक्ष्म संकेत देता है:

जब समाज अपराधी को रोकने के बजाय उसकी प्रतिष्ठा की रक्षा करता है, तब अपराध व्यक्तिगत नहीं रहता।

CREATE — इस प्रसंग से नया निष्कर्ष

यहाँ हमारा स्वतंत्र निष्कर्ष महाभारत के पाठ से इस प्रकार निकलता है— 

“अन्याय जब केवल अपराधी के भीतर रहता है, तब वह व्यक्तिगत अधर्म है; लेकिन जब समुदाय अपराधी की प्रतिष्ठा बचाने के लिए पीड़ित को ही दण्डित करने लगे, तब वही अधर्म सामूहिक अधर्म बन जाता है।”

और विराटपर्व इस सामूहिक अधर्म के सामने भीम की शक्ति को खड़ा करता है।

लेकिन महाभारत का गहरा प्रश्न केवल यह नहीं है कि— “भीम ने कितनों को मारा?”

बल्कि यह है— “विराट की राजसत्ता द्रौपदी की रक्षा स्वयं क्यों नहीं कर सकी?”

यही प्रश्न इस प्रसंग को केवल वीरगाथा बनने से रोकता है।

विराटपर्व की अब तक की यात्रा

यदि इस बिन्दु तक विराटपर्व को एक ही धारा में देखें तो क्रम बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है—

वनवास समाप्त → पहचान छिपी → अस्त्र छिपे → कौशल छिपा → विराट में प्रवेश → कीचक की दृष्टि → द्रौपदी का अपमान → कीचक-वध → उपकीचक-वध।

अर्थात् अज्ञातवास की पहली बड़ी परीक्षा बाहरी शत्रु से नहीं हुई।

वह विराट की अपनी सत्ता के भीतर से आई। और यह परीक्षा दो बार हुई—

पहले एक शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में, फिर उस व्यक्ति के पीछे खड़े समूह के रूप में।

इससे विराटपर्व का अगला चरण और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्योंकि अब दुर्योधन के गुप्तचर पाण्डवों की खोज में लगे हैं।

कीचक की मृत्यु स्वयं एक संकेत बन सकती है—

क्या विराट में अचानक प्रकट हुई यह असाधारण शक्ति किसी छिपी हुई पहचान की ओर संकेत कर रही है?

यहीं से कथा निजी संकट से निकलकर पुनः राजनीतिक संकट की ओर मुड़ती है।

निष्कर्ष

वनपर्व में पाण्डवों ने शक्ति अर्जित की थी।
विराटपर्व में उन्होंने शक्ति को छिपाया।
कीचक ने उस छिपी शक्ति को बाहर खींचना चाहा।
उपकीचकों ने उस शक्ति को और अधिक उग्र रूप में बाहर आने के लिए बाध्य किया।

फिर भी पाण्डवों की पहचान बची रही।

इसलिए विराटपर्व का यह चरण केवल कीचक-वध की कथा नहीं है।

यह संयमित शक्ति की पहली वास्तविक परीक्षा है।

शक्ति का होना एक बात है;
उसे कब, कितना और किस उद्देश्य से प्रयोग करना है—यही धर्म की कठिन परीक्षा है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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