महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 8 : स्थितप्रज्ञ से कर्मयोग तक — स्थिर बुद्धि के बाद कर्म का प्रश्न
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 8 : स्थितप्रज्ञ से कर्मयोग तक — स्थिर बुद्धि के बाद कर्म का प्रश्न
अर्जुन का प्रश्न अब केवल युद्ध का नहीं रह गया है।
कृष्ण उसे आत्मा और देह का विवेक दे चुके हैं। स्वधर्म समझाया जा चुका है। सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समत्व रखने की शिक्षा दी जा चुकी है।
इसके बाद अर्जुन एक स्वाभाविक प्रश्न पूछता है—
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
“हे केशव! समाधि में स्थित स्थिरबुद्धि पुरुष की क्या पहचान है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?”
यह प्रश्न गीता के दूसरे अध्याय को एक नए स्तर पर ले जाता है।
अब अर्जुन यह नहीं पूछ रहा कि मुझे क्या करना चाहिए।
वह पूछ रहा है—
जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है, उसका जीवन कैसा होता है?
यही प्रश्न स्थितप्रज्ञ की संकल्पना को जन्म देता है।
स्थितप्रज्ञ कौन है?
कृष्ण उत्तर देते हैं—
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को छोड़ देता है और आत्मा में ही आत्मा द्वारा संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
यहाँ “कामना छोड़ना” का अर्थ इच्छाओं का यांत्रिक दमन नहीं है।
कृष्ण समस्या का केंद्र मन की निर्भरता में देखते हैं।
जब सुख बाहर की वस्तु, व्यक्ति, उपलब्धि या परिणाम पर निर्भर हो जाता है, तब मन अस्थिर होता है।
स्थितप्रज्ञ की विशेषता यह है कि उसकी संतुष्टि का अंतिम आधार बाहरी उपलब्धि नहीं रह जाता।
इसलिए स्थितप्रज्ञ केवल वह व्यक्ति नहीं है जो कम बोलता है, ध्यान करता है या संसार से दूर रहता है।
स्थितप्रज्ञता एक आंतरिक स्थिति है।
सुख-दुःख में समानता
कृष्ण आगे कहते हैं—
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
दुःख में जिसका मन विचलित नहीं होता, सुख में जिसकी स्पृहा समाप्त हो गई है और जो राग, भय तथा क्रोध से मुक्त है—वही स्थिरबुद्धि है।
यहाँ गीता की दृष्टि और स्पष्ट हो जाती है।
स्थितप्रज्ञ वह नहीं है जिसे सुख-दुःख का अनुभव ही न हो।
बल्कि वह ऐसा व्यक्ति है जिसका अंतःकरण अनुभवों से संचालित नहीं होता।
दुःख आता है—लेकिन वह निर्णय को नष्ट नहीं करता।
सुख आता है—लेकिन वह विवेक को बहा नहीं ले जाता।
भय आता है—लेकिन वह कर्तव्य को रोक नहीं देता।
क्रोध आता है—लेकिन वह बुद्धि का स्वामी नहीं बनता।
यही स्थिर बुद्धि है।
इन्द्रियों का प्रश्न
अर्जुन के युद्ध-संकट को देखते हुए यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
कृष्ण कहते हैं—
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
जैसे कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही जब मनुष्य इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट सकता है, तब उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।
लेकिन अगले ही श्लोक में कृष्ण एक गहरी सीमा बताते हैं—
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥
केवल विषयों से दूर रहने पर विषयों की इच्छा पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
उनका “रस” बना रह सकता है।
वह तब समाप्त होता है जब मनुष्य को उससे श्रेष्ठ सत्य का अनुभव होता है।
यहाँ गीता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त सामने आता है—
दमन स्थायी समाधान नहीं है; उच्चतर अनुभूति आकर्षण की दिशा बदलती है।
मन का एक छोटा-सा विचलन
कृष्ण फिर इन्द्रिय-संयम की कठिनाई बताते हैं—
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
विषयों का चिंतन संग पैदा करता है।
संग से कामना।
कामना से क्रोध।
और क्रोध से आगे—
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
यह गीता का अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक क्रम है।
विषय-चिन्तन → संग → कामना → क्रोध → मोह → स्मृति-विभ्रम → बुद्धिनाश → पतन।
यह क्रम केवल आध्यात्मिक साधना के लिए नहीं, अर्जुन के युद्ध-संकट को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
क्योंकि बुद्धि का स्थिर रहना केवल बाहरी परिस्थिति पर निर्भर नहीं है।
वह इस बात पर भी निर्भर है कि मन किस वस्तु का निरंतर चिंतन कर रहा है।
फिर समाधान क्या है?
कृष्ण केवल खतरे का वर्णन नहीं करते।
वे कहते हैं—
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
जिसका अंतःकरण अपने वश में है और जो राग-द्वेष से मुक्त होकर विषयों में व्यवहार करता है, वह प्रसाद प्राप्त करता है।
यहाँ “प्रसाद” केवल पूजा में मिलने वाला प्रसाद नहीं है।
यहाँ इसका अर्थ है—
अंतःकरण की निर्मल, संतुलित और शांत अवस्था।
यही अवस्था आगे बुद्धि को स्थिर करती है।
“प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते”
कृष्ण कहते हैं—
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥
जब अंतःकरण प्रसन्न और संतुलित होता है, तब बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
यहाँ गीता की दृष्टि अत्यंत स्पष्ट है—
बुद्धि की स्थिरता केवल विचारों से नहीं आती; मन की स्थिति भी बुद्धि को प्रभावित करती है।
इसलिए गीता मन और बुद्धि को अलग-अलग बंद डिब्बों में नहीं रखती।
इन्द्रियाँ मन को प्रभावित करती हैं।
मन बुद्धि को प्रभावित करता है।
और बुद्धि के अस्थिर होने पर निर्णय प्रभावित होता है।
यही अर्जुन की वर्तमान समस्या भी है।
उसके पास ज्ञान है।
अनुभव है।
कर्तव्य का बोध है।
लेकिन भावनात्मक आवेग ने उसकी निर्णय-क्षमता को हिला दिया है।
स्थितप्रज्ञ का अंतिम चित्र
अध्याय के अंत में कृष्ण स्थितप्रज्ञ की स्थिति को एक अत्यंत सुंदर उपमा से समझाते हैं—
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
जैसे अनेक नदियों का जल निरंतर समुद्र में प्रवेश करता है, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है, वैसे ही जिस पुरुष में अनेक कामनाएँ प्रवेश करके भी उसे विचलित नहीं करतीं, वही शांति प्राप्त करता है।
यहाँ समुद्र को केवल “इच्छा-विहीन” व्यक्ति का प्रतीक मानना पर्याप्त नहीं है।
समुद्र में नदियाँ आती रहती हैं। अर्थात्— जीवन चलता रहता है।
विषय आते हैं।
सुख-दुःख आते हैं। लाभ-हानि आते हैं। प्रशंसा-निंदा आती है।
लेकिन भीतर की स्थिति हर आने-जाने वाली वस्तु के साथ अपना स्वरूप नहीं बदलती।
यही स्थितप्रज्ञता है।
“एषा ब्राह्मी स्थितिः”
दूसरे अध्याय के अंत में कृष्ण कहते हैं—
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
“हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करके मनुष्य मोह में नहीं पड़ता।”
यहाँ “ब्राह्मी स्थिति” का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कृष्ण अब अर्जुन के युद्ध-संकट को केवल व्यवहारिक समस्या के रूप में नहीं देख रहे।
उसे ऐसी चेतना की ओर ले जा रहे हैं जिसमें व्यक्ति का निर्णय आत्मबोध और समत्व पर आधारित हो।
लेकिन एक प्रश्न अभी भी खड़ा है— स्थितप्रज्ञ होकर मनुष्य करेगा क्या?
यदि सारी इच्छाएँ छोड़नी हैं, राग-द्वेष से मुक्त होना है और भीतर संतुष्ट रहना है, तो क्या संसार के कर्म भी छोड़ देने चाहिए?
यही प्रश्न अगले अध्याय की शुरुआत में अर्जुन उठाता है। और यहीं से गीता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ आता है।
स्थितप्रज्ञ से कर्मयोग तक
अर्जुन कहता है—
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
यदि आपके मत में ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है।
अर्जुन ने अभी-अभी स्थिर बुद्धि, आत्मतृप्ति, कामनात्याग और शांति का वर्णन सुना है।
अब उसे लगता है—
शायद ज्ञान का अर्थ कर्म से निवृत्ति है।
लेकिन कृष्ण यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट करेंगे—
ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी नहीं हैं।
कर्म छोड़ देना और कर्म में आसक्ति छोड़ देना—दो अलग बातें हैं।
यहीं से गीता का तीसरा अध्याय शुरू होता है और “कर्मयोग” अपनी स्वतंत्र दार्शनिक संरचना ग्रहण करता है।
शोध-निष्कर्ष
द्वितीय अध्याय का स्थितप्रज्ञ-वर्णन गीता का अंतिम लक्ष्य बताकर कर्म से पलायन का मार्ग नहीं खोलता।
इसके विपरीत, यह प्रश्न को और गहरा करता है—
यदि बुद्धि स्थिर हो गई है, तो वह स्थिर बुद्धि संसार में कर्म कैसे करेगी?
यहीं गीता की एक मूलभूत स्थापना सामने आती है—
समत्व का अर्थ कर्म का त्याग नहीं; कर्म के भीतर बुद्धि की स्वतंत्रता है।
स्थितप्रज्ञता भीतर की अवस्था है।
कर्मयोग उस अवस्था को जीवन के कर्म में उतारने की प्रक्रिया है।
इसलिए दूसरे अध्याय का अंत तीसरे अध्याय की शुरुआत बन जाता है।
अर्जुन पहले पूछ रहा था—मैं युद्ध करूँ या न करूँ?
अब उसका प्रश्न और सूक्ष्म हो गया है—
यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों?
और कृष्ण का अगला उत्तर महाभारत के युद्ध को एक नए दार्शनिक धरातल पर ले जाएगा—
“लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ…”
यहीं से प्रश्न उठेगा—
ज्ञान की निष्ठा और कर्म की निष्ठा क्या दो अलग मार्ग हैं, या एक ही सत्य की दो साधनाएँ?
यही हमारा अगला शोध-प्रसंग होगा।
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