महाभारत — विराटपर्व — भाग 9 : त्रिगर्तों का आक्रमण —

 महाभारत — विराटपर्व — भाग 9 : त्रिगर्तों का आक्रमण — जब अज्ञातवास की शक्ति पहली बार युद्धभूमि में उतरती है

कीचक के वध के बाद विराटपर्व का केन्द्र फिर बदलता है।

अब तक संघर्ष मुख्यतः विराटनगर के भीतर था—द्रौपदी, कीचक और पाण्डवों की छिपी हुई शक्ति के बीच।

अब संघर्ष राज्य की सीमा के बाहर पहुँचता है।

त्रिगर्तराज सुशर्मा विराट के राज्य पर आक्रमण करता है और गौधन हरण करने लगता है।

यह केवल पशुधन की चोरी नहीं है।

यह विराट की राजकीय प्रतिष्ठा, आर्थिक शक्ति और सैन्य सामर्थ्य पर सीधा आघात है।

और इसी आक्रमण के कारण पहली बार पाण्डवों को अपने छद्मवेश के भीतर रहते हुए युद्ध करना पड़ता है।

यहीं विराटपर्व का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है—

जिस शक्ति को छिपाने के लिए पाण्डवों ने अज्ञातवास स्वीकार किया था, उसी शक्ति से अब उन्हें अपने आश्रयदाता की रक्षा करनी है।

TEXT — मूल महाभारत-पाठ

महाभारत के पाठक्रम में दुर्योधन की सभा में पहले गुप्तचरों की सूचना आती है। उसके बाद कौरव पक्ष में यह विचार होता है कि विराट की स्थिति का लाभ उठाया जा सकता है।

त्रिगर्तराज सुशर्मा पहले से विराट से वैर रखता था।

कीचक की मृत्यु ने विराट की सैन्य व्यवस्था को भी कमजोर कर दिया था।

इसी परिस्थिति में त्रिगर्तराज अपनी सेना लेकर मत्स्य देश की ओर बढ़ता है।

महाभारत के अध्याय-विन्यास में इसके बाद क्रम आता है—

सुषर्मा का मत्स्यदेश की ओर जाना → सेना का प्रस्थान → विराट और सुषर्मा का युद्ध → विराट की पराजय/बंदीकरण → पाण्डवों का हस्तक्षेप।

महाभारत की कथा का सार स्वयं आदिपर्व के विराटपर्व-संग्रह में इस प्रकार दिया गया है कि त्रिगर्तों द्वारा विराट के गौधन के पहले हरण के बाद भयंकर युद्ध हुआ, विराट शत्रु के हाथ पड़ गया और भीम ने उसे मुक्त किया।

गौधन ही क्यों?

आज के पाठक के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि प्राचीन राजकीय संघर्ष में गौधन केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था।

वह वास्तविक आर्थिक संपत्ति था।

गौ— दूध देती थी, घी देती थी, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी थी, यज्ञीय व्यवस्था में उपयोगी थी,

और बड़ी संख्या में गौधन किसी राज्य की समृद्धि का परिचायक था।

इसलिए किसी राज्य का गौधन हरण करना केवल चोरी नहीं था।

वह उस राज्य की आर्थिक नस पर प्रहार था।

इसीलिए महाभारत में गौधन-हरण को युद्ध की एक रणनीति के रूप में बार-बार देखा जाता है।

विराटपर्व में भी यही होता है।

CONTEXT — कीचक की मृत्यु के बाद विराट क्यों कमजोर था?

यहाँ पिछले प्रसंग से सम्बन्ध जोड़ना आवश्यक है। कीचक विराट का सेनापति था।

वह केवल एक व्यक्ति नहीं था; उसकी सैन्य शक्ति के कारण विराट की बाहरी सुरक्षा भी मजबूत थी।

अब— कीचक मृत है। उसके अनेक सम्बन्धी भी मृत हैं।

अर्थात् विराट की सैन्य संरचना को अचानक बड़ा आघात लगा है।

त्रिगर्तराज सुशर्मा के लिए इससे बेहतर अवसर क्या हो सकता था?

इसलिए कीचक-वध का राजनीतिक परिणाम यहाँ पहली बार दिखाई देता है।

द्रौपदी के लिए कीचक का मरना सुरक्षा था।

विराट राज्य के लिए वही घटना सैन्य कमजोरी बन गयी।

यह महाभारत की कथा-रचना का एक महत्वपूर्ण बिन्दु है— 

एक ही घटना किसी व्यक्ति के लिए मुक्ति और किसी राज्य के लिए संकट बन सकती है।

पाण्डवों की स्थिति

अब पाण्डव विराट के आश्रित हैं। उन्होंने विराट के यहाँ भोजन, सम्मान और जीवन की सुरक्षा पायी है।

युधिष्ठिर के सामने इसलिए केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का प्रश्न नहीं है।

उन पर एक प्रकार का ऋण भी है। यही भावना आगे निर्णायक बनती है।

जब विराट युद्ध में फँसता है, तब युधिष्ठिर भीम से कहते हैं कि जिस राजा ने उन्हें अपने राज्य में सुरक्षित रखा और उनकी इच्छाओं की पूर्ति की, उसके संकट में सहायता करना उचित है।

महाभारत का मूल भाव है— “यथा नः स सुखं दत्तवान् तथा तस्य परित्राणं कर्तव्यम्।”

अर्थात् विराट ने हमें सुखपूर्वक रहने का अवसर दिया है; अब उसका संकट दूर करना हमारा कर्तव्य है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण नैतिक सूत्र दिखाई देता है— आश्रय केवल सुविधा नहीं, उत्तरदायित्व भी पैदा करता है।

CONCEPT — अज्ञातवास और कृतज्ञता का संघर्ष

यही इस प्रसंग की वास्तविक समस्या है। यदि पाण्डव युद्ध में उतरते हैं— तो उनकी पहचान खुल सकती है।

यदि वे युद्ध में नहीं उतरते— तो विराट को उसके संकट में छोड़ देंगे।

इसलिए उनके सामने दो धर्म हैं— अज्ञातवास की प्रतिज्ञा और आश्रयदाता के प्रति कर्तव्य।

युधिष्ठिर का निर्णय इस तनाव को सन्तुलित करता है।

वे सीधे यह नहीं कहते कि— “हम पाण्डव हैं, इसलिए विराट के लिए युद्ध करेंगे।”

वे अपने छद्मवेश को बनाए रखते हुए पाण्डवों की शक्ति का उपयोग करते हैं।

यहीं विराटपर्व का मूल दर्शन उभरता है— 

धर्म केवल अपने वचन की रक्षा नहीं; अपने ऊपर आए हुए उत्तरदायित्व की रक्षा भी है।

विराट का युद्ध और उसका बंदी होना

त्रिगर्तों से युद्ध होता है। युद्ध तीव्र होता जाता है।

सुशर्मा और उसके भाई विराट की सेना पर भारी पड़ते हैं।

अन्ततः विराट का रथ नष्ट होता है और वह शत्रु के हाथों बंदी बना लिया जाता है।

महाभारत का वर्णन बताता है कि सुशर्मा विराट को जीवित पकड़कर अपने रथ पर ले जाता है।

यह दृश्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। विराट अब केवल पराजित राजा नहीं है।

वह बंदी राजा है। और उसके राज्य की प्रतिष्ठा सीधे पाण्डवों के सामने आ खड़ी होती है।

भीम की पहली प्रतिक्रिया — वृक्ष या शस्त्र?

यहाँ एक रोचक बात सामने आती है।

भीम कहता है कि वह अपने बाहुबल से शत्रु को पराजित करेगा और विशाल वृक्ष को उखाड़ने की बात करता है।

यह वही भीम है जिसने उपकीचकों के विरुद्ध वृक्ष का प्रयोग किया था।

लेकिन युधिष्ठिर उसे रोकते हैं। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

युधिष्ठिर का उद्देश्य केवल शत्रु को हराना नहीं है।

वह चाहते हैं कि— भीम अपनी असाधारण पहचान प्रकट न करे।

इसलिए वे उसे संयमित करते हैं। अर्थात् विराटपर्व में फिर वही सूत्र आता है—

शक्ति है → शक्ति का आवेग है → लेकिन शक्ति को नियंत्रित करना आवश्यक है।

फिर भी भीम युद्ध करता है

युधिष्ठिर की सावधानी के बाद भी भीम युद्धभूमि में उतरता है।

और यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। अब तक भीम की शक्ति मुख्यतः छिपी हुई थी—

कीचक-वध में वह रात के अन्धकार में थी। उपकीचक-वध में वह गन्धर्व के रूप में समझी गयी।

लेकिन अब वह राजकीय युद्ध में प्रयुक्त हो रही है। फिर भी उसकी वास्तविक पहचान सुरक्षित रहती है।

क्योंकि वह विराट के अन्य योद्धाओं के साथ मिलकर युद्ध कर रहा है।

यहाँ पाण्डवों की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है— 

असाधारण शक्ति का प्रयोग करो, लेकिन उसे ऐसी संरचना में रखो कि उसका स्रोत पहचान में न आए।

विराट की मुक्ति

भीम और अन्य पाण्डव युद्ध में प्रवेश करते हैं। त्रिगर्तों की सेना पर प्रहार होता है।

सुशर्मा पराजित होता है। विराट मुक्त हो जाता है।

और यहाँ युधिष्ठिर की एक और विशेषता सामने आती है।

वह सुशर्मा की हत्या नहीं करवाता। उसे जीवित रखा जाता है।

विराट की मुक्ति के बाद शत्रु पर विजय प्राप्त हो जाती है।

इस प्रकार पहला संकट समाप्त होता है। लेकिन महाभारत का वास्तविक कौशल यहाँ है—

एक संकट समाप्त होते ही दूसरा संकट आरम्भ हो चुका है।

क्योंकि उसी समय दूसरी दिशा में क्या हो रहा है?

जब विराट अपनी सेना के साथ त्रिगर्तों से लड़ रहा है, उसी समय दूसरी दिशा में कौरव सेना मत्स्य देश पर आक्रमण करती है।

यह कोई संयोग नहीं है। यही दुर्योधन की वास्तविक रणनीति है।

एक ओर— त्रिगर्त विराट को दक्षिण दिशा में उलझाते हैं।

दूसरी ओर— कौरव सेना दूसरी दिशा से मत्स्य के गौधन पर आक्रमण करती है।

इस प्रकार विराट के राज्य को दो दिशाओं से दबाया जाता है।

महाभारत के विराटपर्व की पारंपरिक कथा-सार में भी यह क्रम स्पष्ट है—पहले त्रिगर्त गौधन ले जाते हैं, फिर कौरव पुनः गौधन हरण करते हैं और अन्ततः अर्जुन अकेले कौरवों का सामना करता है।

यहाँ पहली बार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि— दुर्योधन का उद्देश्य केवल गौधन नहीं था।

उसका लक्ष्य था— विराट को ऐसी परिस्थिति में डालना जिसमें पाण्डवों को अपनी वास्तविक शक्ति प्रकट करनी पड़े।

CONTRADICTION — विजय मिली, लेकिन संकट समाप्त नहीं हुआ

यहाँ एक महत्वपूर्ण विरोधाभास है। पाण्डवों ने विराट को बचा लिया। वे विजयी हुए।

उनकी पहचान अभी भी छिपी है। दृष्टि से देखें तो सब कुछ सफल है।

लेकिन रणनीतिक स्तर पर यह विजय अधूरी है। क्योंकि कौरवों की दूसरी सेना पहले ही दूसरी दिशा में पहुँच चुकी है।

इसलिए पहली लड़ाई जीतना पर्याप्त नहीं। अब दूसरा प्रश्न है—

विराट की राजधानी और गौधन की रक्षा कौन करेगा?

राजा विराट तो दक्षिण में है। सेना भी उसके साथ है। राजधानी में बचा है—

राजकुमार उत्तर।

और यहीं विराटपर्व का सबसे प्रसिद्ध युद्ध-प्रसंग आरम्भ होने वाला है।

उत्तर — वीरता की कल्पना और वास्तविक युद्ध

राजकुमार उत्तर को जब पता चलता है कि कौरवों ने विराट का गौधन हरण कर लिया है, तब वह अत्यन्त आत्मविश्वास से युद्ध में जाने की बात करता है।

लेकिन समस्या है— सारथि कौन बनेगा?

यहीं से बृहन्नला का प्रवेश फिर निर्णायक हो जाता है।

जो व्यक्ति अब तक राजमहल की स्त्रियों को नृत्य और संगीत सिखा रहा था—

वही वास्तव में अर्जुन है।

और जो युवक स्वयं को महान योद्धा समझ रहा है— वह अभी युद्ध की वास्तविकता से परिचित नहीं है।

इसलिए अगले प्रसंग में विराटपर्व एक असाधारण मनोवैज्ञानिक परिवर्तन दिखाएगा—

उत्तर का आत्मविश्वास टूटेगा और अर्जुन का वास्तविक व्यक्तित्व प्रकट होगा।

COMPARISON — त्रिगर्त युद्ध और कीचक-वध

इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखना उपयोगी है।

कीचक-वध में भीम ने व्यक्तिगत अन्याय का उत्तर दिया।

त्रिगर्त युद्ध में पाण्डवों ने आश्रयदाता के राजकीय संकट का उत्तर दिया।

पहले— द्रौपदी की रक्षा।

अब— विराट की रक्षा।

इससे पाण्डवों की विराट में स्थिति बदलती है। वे अब केवल छिपे हुए अतिथि नहीं हैं।

वे उस राज्य की सुरक्षा के वास्तविक आधार बन चुके हैं।

लेकिन विराट स्वयं यह नहीं जानता कि उसकी रक्षा कौन कर रहा है।

यही विराटपर्व की विडम्बना है— जिस राज्य को पाण्डव बचा रहे हैं, वही राज्य उनकी वास्तविक पहचान से अनभिज्ञ है।

CREATE — इस प्रसंग का स्वतंत्र निष्कर्ष

इस प्रसंग से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है— 

अज्ञातवास का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने कर्तव्यों से भी अज्ञात हो जाए।

पाण्डवों को अपनी पहचान छिपानी थी। लेकिन उन्हें अपने धर्म को नहीं छिपाना था।

विराट के प्रति उनकी कृतज्ञता ने उन्हें युद्धभूमि में उतारा।

फिर भी उन्होंने ऐसा करते हुए अपनी वास्तविक पहचान को बचाए रखा।

इसलिए— पहचान छिप सकती है; कर्तव्य नहीं।

और यही विराटपर्व की इस अवस्था का सबसे गहरा सूत्र है।

अब कथा निर्णायक मोड़ पर

पहला आक्रमण समाप्त हो चुका है। विराट मुक्त हो गया।

लेकिन उसी समय कौरवों ने दूसरी दिशा से गौधन पर आक्रमण कर दिया है।

अब विराट की राजधानी लगभग असुरक्षित है।

राजकुमार उत्तर युद्ध के लिए तैयार है।

उसका सारथि बनने के लिए बृहन्नला आगे आती है।

और बृहन्नला को देखते हुए कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि—

यह वही अर्जुन है जिसने शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था, इन्द्रलोक में दिव्यास्त्रों का अभ्यास किया था और निवातकवचों का संहार किया था।

अब उसे उसी शक्ति को फिर से प्रकट करना होगा।

लेकिन उससे पहले उसे अपने ही छद्मवेश की सबसे कठिन सीमा पार करनी होगी।

शमी वृक्ष तक जाना। और वहाँ से— गाण्डीव को फिर उठाना।

यहीं से विराटपर्व का अगला और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण चरण आरम्भ होता है—

बृहन्नला से अर्जुन तक — शमी वृक्ष पर छिपी शक्ति का पुनर्जागरण।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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