महाभारत - आदिपर्व का विवेचन प्रथम पर्व : आरम्भ में ही पूरा महाभारत उपस्थित है

आदिपर्व का विवेचन

प्रथम पर्व : आरम्भ में ही पूरा महाभारत उपस्थित है

आदि का अर्थ है—आरम्भ, प्रथम, मूल या प्रारंभिक।

लेकिन महाभारत का आदिपर्व केवल कथा की शुरुआत नहीं है।

यह एक विचित्र ढंग से पूरे महाभारत का बीज अपने भीतर रखता है।

यहाँ जनमेजय हैं, सर्पसत्र है, ऋषियों की सभा है, उग्रश्रवा सौति हैं, शौनक हैं, वैशंपायन हैं, भरतवंश है, कुरुवंश है, पांडव-कौरव हैं, देवता और नाग हैं, राजवंश और ऋषिवंश हैं, जन्म और मृत्यु हैं, प्रतिज्ञाएँ हैं, विवाह हैं, वनवास की भूमिका है और अंततः अर्जुन-सुभद्रा तथा खांडववन तक कथा पहुँचती है।

इसलिए आदिपर्व को केवल— “पांडवों के जन्म से लेकर उनके विवाह तक की कहानी”

कहना उसके स्वरूप को बहुत छोटा कर देना होगा।

आदिपर्व का कथात्मक नक्शा

परंपरागत विभाजन में आदिपर्व के भीतर अनेक उपपर्व हैं। उपलब्ध परंपराओं में संख्या और अध्याय-विभाजन में अंतर मिलता है; एक प्रचलित संरचना में इसे 18 उपपर्वों में प्रस्तुत किया जाता है और 234 अध्याय तथा 8,884 श्लोक बताए जाते हैं। 

इसके बड़े कथात्मक खंडों को इस प्रकार समझना अधिक उपयोगी है:

क्रमउपपर्वमुख्य विषय
1अनुक्रामणिकामहाभारत का परिचय और उसकी व्यापक रूपरेखा
2पर्वसंग्रहअठारह पर्वों और उनकी विषय-सूची का संकेत
3पौष्यउत्तंक और गुरु-दक्षिणा की कथा
4पौलोमभृगुवंश और उसके आख्यान
5आस्तीकजनमेजय का सर्पसत्र और आस्तीक द्वारा उसका अवसान
6अंशावतरणदेवताओं आदि के पृथ्वी पर अवतरण की भूमिका
7संभवकुरुवंश, पांडव-कौरव और अनेक जन्मकथाएँ
8जातुगृहलाक्षागृह और पांडवों का बच निकलना
9हिडिम्बवधभीम और हिडिम्ब का प्रसंग
10बकवधएकचक्रा और बकासुर-वध
11चैत्ररथअर्जुन, चित्ररथ और अन्य प्रसंग
12स्वयंवरद्रौपदी का स्वयंवर
13वैवाहिकद्रौपदी का पांडवों से विवाह
14विदुरागमन–राज्यलम्भपांडवों की पुनर्स्थापना और राज्य-विभाजन
15अर्जुनवनवासअर्जुन का वनगमन
16सुभद्राहरणअर्जुन और सुभद्रा
17हरणाहरणउसके बाद की राजनीतिक/पारिवारिक स्थिति
18खांडवदाहअर्जुन-कृष्ण और खांडववन

यह सूची स्वयं बता देती है कि आदिपर्व का केंद्र केवल एक परिवार नहीं है। इसकी कथा लगातार राजवंश, ऋषिवंश, देव-मानव संबंध, जन्म, कर्म, विवाह और सत्ता के बीच चलती है। 

कथा कहाँ से आरंभ होती है?

महाभारत की सबसे रोचक बात यह है कि आदिपर्व की शुरुआत सीधे कुरुक्षेत्र से नहीं होती।

हम पहुँचते हैं— नैमिषारण्य।

शौनक आदि ऋषि एक दीर्घ यज्ञ में उपस्थित हैं। उसी समय उग्रश्रवा सौति वहाँ आते हैं।

ऋषि उनसे पूछते हैं कि वे कहाँ से आए हैं और क्या सुना है।

और यहीं से महाभारत की कथा सुनाई जाने लगती है।

यह छोटा-सा कथात्मक ढाँचा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

महाभारत हमें पहले ही बता देता है कि वह एक बार घटित होकर समाप्त हो जाने वाली कथा नहीं है।

वह— सुनी जाती है, फिर सुनाई जाती है।

यानी महाभारत के भीतर कथा का प्रसारण भी कथा का हिस्सा है।

जनमेजय कहाँ है?

फिर कथा एक और समय में जाती है। जनमेजय का सर्पसत्र चल रहा है।

उस यज्ञ के प्रसंग में आस्तीक की कथा आती है।

फिर उसी के भीतर नागों की कथा आती है।

फिर गरुड़ की कथा आती है।

फिर कश्यप और विनता-कद्रू की कथा।

फिर समुद्रमंथन।

यहाँ हमें वही विशेषता दिखाई देती है जिसे हमने अध्याय 3 में सामान्य सिद्धांत के रूप में नहीं दोहराना है।

अब हम उसे जीवित उदाहरण के रूप में देख सकते हैं: एक कथा दूसरी कथा को जन्म देती है।

आस्तीक : एक छोटा प्रसंग, बड़ा अर्थ

जनमेजय अपने पिता परीक्षित की मृत्यु के कारण नागों से प्रतिशोध लेना चाहते हैं।

सर्पसत्र आरंभ होता है। मंत्रों के द्वारा सर्प अग्नि में गिरने लगते हैं।

लेकिन आस्तीक आते हैं और यज्ञ रुकवा देते हैं।

यह प्रसंग केवल “सर्पयज्ञ रोक दिया गया” इतना भर नहीं है।

इसके भीतर— प्रतिशोध, वंशीय स्मृति, हिंसा, क्षमा, ब्राह्मणत्व, वचन और, विनाश की सीमा जैसे प्रश्न उपस्थित होते हैं।

और विशेष बात यह है कि महाभारत की अपनी कथा का जन्म भी इसी सर्पसत्र की सभा में हो रहा है।

यह संरचनात्मक रूप से अत्यंत सुंदर है।

एक राजा अतीत के प्रतिशोध में यज्ञ कर रहा है और उसी वातावरण में उसे अपने वंश की विशाल कथा सुनाई जा रही है।

संभवपर्व : यहाँ से महाभारत का विशाल मानवीय संसार खुलता है

इसके बाद कथा कुरुवंश की ओर बढ़ती है।

भरत। कुरु। शांतनु। गंगा। देवव्रत। सत्यवती। चित्रांगद। विचित्रवीर्य। व्यास। धृतराष्ट्र। पांडु। विदुर। और फिर पांडव तथा कौरव।

यहाँ एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है। महाभारत अपने नायकों को अचानक मंच पर नहीं लाता।

वह उनके पीछे वंश और पूर्वजों का संसार खड़ा करता है।

इससे पांडव-कौरव संघर्ष व्यक्तिगत विवाद नहीं रह जाता।

वह एक लंबी ऐतिहासिक-स्मृतिगत प्रक्रिया का परिणाम दिखाई देने लगता है।

भीष्म : एक व्यक्ति से अधिक एक घटना

आदिपर्व में भीष्म की प्रतिज्ञा केवल चरित्र-निर्माण का प्रसंग नहीं है।

देवव्रत अपने पिता शांतनु के लिए ऐसी प्रतिज्ञा लेते हैं जो उनके निजी जीवन को ही बदल देती है।

वह क्षण आगे की पूरी कुरुवंशीय कथा पर छाया डालता है।

यहाँ हमारे शोध के लिए एक विशेष बात सामने आती है: 

महाभारत में किसी व्यक्ति का महान त्याग भी भविष्य में जटिल परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

इसलिए महाभारत नैतिकता को केवल तत्कालीन फल से नहीं मापता।

जन्मकथाएँ : मनुष्य केवल अपने जन्म से परिभाषित नहीं

आदिपर्व में जन्म से जुड़े अनेक प्रसंग हैं। कौरवों का जन्म। पांडवों का जन्म। कर्ण का जन्म।

द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का यज्ञाग्नि से प्रकट होना।

ये सभी जन्म साधारण जैविक घटनाओं के रूप में नहीं आते।

इनके साथ वंश, देवत्व, कर्म, भविष्य और नियति जुड़े हुए हैं।

विशेषकर कर्ण की कथा बाद के महाभारत को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बीज रखती है।

कर्ण का जीवन आरंभ से ही एक पहचान के संकट से जुड़ जाता है।

लाक्षागृह : कथा में पहला बड़ा राजनीतिक मोड़

पांडवों को वाराणावत भेजना और उनके लिए लाक्षागृह बनवाना कथा को बाल्यावस्था से राजनीतिक संघर्ष में ले जाता है।

यहाँ दुर्योधन की ईर्ष्या, शकुनि की योजना, धृतराष्ट्र की स्थिति और विदुर की गूढ़ चेतावनी सामने आती है।

पांडव बच निकलते हैं। लेकिन इस घटना के बाद एक बात स्पष्ट हो जाती है— कुरुवंश का संघर्ष अब केवल प्रतिस्पर्धा नहीं रहा।

अब उसमें हत्या की योजना प्रवेश कर चुकी है।

हिडिम्ब और बकासुर : बीच में अचानक लोककथा?

यहीं आदिपर्व का कथात्मक विस्तार विशेष रोचक हो जाता है।

मुख्य राजवंशीय कथा के बीच हम हिडिम्ब, हिडिम्बा और भीम तक पहुँचते हैं।

फिर एकचक्रा। फिर बकासुर। पहली दृष्टि में ये प्रसंग मुख्य कथा से अलग दिखाई दे सकते हैं।

लेकिन इन्हीं प्रसंगों में पांडवों का वनवासकालीन जीवन, भीम का बल, स्थानीय समाज से संबंध और सामान्य लोगों की पीड़ा सामने आती है।

इससे राजमहल की कथा लोकजीवन में प्रवेश करती है। यही आदिपर्व की एक बड़ी विशेषता है।

द्रौपदी का स्वयंवर : कथा फिर राजसत्ता में लौटती है

इसके बाद पंचाल आता है। द्रौपदी का स्वयंवर। अर्जुन लक्ष्य भेदते हैं। पांडव द्रौपदी को लेकर लौटते हैं।

कुंती का प्रसिद्ध वचन— “जो लाए हो, मिलकर बाँट लो।”

और फिर द्रौपदी का पाँचों पांडवों से विवाह। यहाँ कथा फिर एक असाधारण मोड़ लेती है।

द्रौपदी का विवाह केवल पारिवारिक प्रसंग नहीं रह जाता। वह पांडवों के राजनीतिक भविष्य का महत्वपूर्ण आधार बनता है।

अर्जुन का वनवास और सुभद्रा

आदिपर्व का उत्तरार्ध एक और दिशा खोलता है। अर्जुन वनवास में जाते हैं।

उलूपी। चित्रांगदा। फिर सुभद्रा। अर्जुन-सुभद्रा का संबंध आगे चलकर अभिमन्यु के जन्म की भूमिका बनता है।

यहाँ भी एक छोटा व्यक्तिगत प्रसंग आगे चलकर महाभारत के युद्ध के भविष्य को प्रभावित करता है।

इससे आदिपर्व की एक गहरी संरचनात्मक विशेषता सामने आती है— आज की छोटी कथा कल की बड़ी घटना का बीज बनती रहती है।

खांडववन : आदिपर्व का अंतिम बड़ा मोड़

आदिपर्व के अंतिम चरण में कृष्ण और अर्जुन का संबंध अधिक स्पष्ट रूप से उभरता है।

खांडववन-दाह का प्रसंग आता है। अग्नि की सहायता। अर्जुन का गांडीव और दिव्य आयुध प्राप्त करना।

मय दानव का बचना। और आगे चलकर उसी मय से सभा का निर्माण।

यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि आदिपर्व यहीं समाप्त होते हुए भी अगले बड़े राजनीतिक चरण—सभापर्व—की भूमि तैयार कर देता है।

अर्थात् आदिपर्व केवल आरंभ नहीं करता। वह अगले पर्व को जन्म देता है।

आदिपर्व के प्रमुख आख्यान और उपाख्यान

यदि पाठक के लिए इसे एक अलग दृष्टि से देखें, तो आदिपर्व के भीतर अनेक स्वतंत्र कथात्मक संसार हैं।

प्रमुख रूप से— वंशीय आख्यान भरत, कुरु, शांतनु–गंगा, भीष्म, सत्यवती, पांडु और धृतराष्ट्र

देव–मानव आख्यान 

  • कश्यप, विनता–कद्रू, गरुड़, नाग , समुद्रमंथन

ऋषि-परंपरा

  • भृगुवंश, पौलोम कथा, च्यवन आदि प्रसंग

नैतिक/धर्म-संबंधी आख्यान

  • उत्तंक, आस्तीक, जनमेजय का सर्पसत्र

मुख्य कुरु-कथा

  • पांडव जन्म, कौरव जन्म, लाक्षागृह, हिडिम्ब, बकासुर, , पदी स्वयंवर, पांडव विवाह, अर्जुन का वनवास, सुभद्रा, खांडववन

इसलिए आदिपर्व को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका केवल “मुख्य कथा” और “अन्य उपाख्यान” का कठोर विभाजन करना नहीं है।

कई उपाख्यान मुख्य कथा के अर्थ को तैयार करते हैं।

आदिपर्व की मेरी शोध-दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण विशेषता

मेरी दृष्टि में आदिपर्व का सबसे बड़ा महत्व यह नहीं कि इसमें महाभारत की शुरुआत होती है।

उसका महत्व यह है कि महाभारत आरंभ से ही एक ही प्रकार की कथा बनने से इनकार करता है।

यहाँ—

राजा है और ऋषि भी। देवता हैं और मनुष्य भी। नाग हैं और गरुड़ भी। वंशावली है और प्रेमकथा भी।

युद्ध की तैयारी है और तपस्या भी। राजनीति है और लोककथा भी। जन्म है, प्रतिज्ञा है, विवाह है, प्रतिशोध है और क्षमा भी।

अर्थात् आदिपर्व हमें पहले ही संकेत दे देता है कि आगे आने वाला महाभारत एक घटना की सीधी कथा नहीं होगा।

आदिपर्व की एक और असाधारण बात : कथा के भीतर महाभारत

आदिपर्व की संरचना का शायद सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इसमें महाभारत अपने ही भीतर सुनाया जा रहा है।

सौति → शौनक आदि ऋषि

वैशंपायन → जनमेजय

और उस विशाल कथात्मक संरचना के भीतर अनेक अन्य कथाकार।

इसलिए महाभारत को केवल घटनाओं का संग्रह समझना पर्याप्त नहीं।

यह एक ऐसी रचना है जिसमें— कहानी और कहानी सुनाने की प्रक्रिया दोनों साथ उपस्थित हैं।

यही विशेषता हमारे पूरे शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

श्लोक-संख्या : शोध में इसे कैसे लिखें?

यहाँ हमें विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

परंपरागत पर्वसंग्रह में आदिपर्व के लिए 227 अध्याय और 8,884 श्लोक का उल्लेख मिलता है। (Rare Book Society of India)

लेकिन पाठ-परंपराएँ एक समान नहीं हैं। BORI Critical Edition में आदिपर्व का अध्याय-विभाजन 225 अध्याय का है और एक उपलब्ध डिजिटल प्रस्तुति में लगभग 7,197 श्लोक गिने गए हैं। (Vishvas's Website)

स्वयं सुक्थंकर ने संकेत किया है कि अलग-अलग पांडुलिपि-परंपराओं और संस्करणों में आदिपर्व की श्लोक-संख्या में पर्याप्त अंतर है। (Vishvas's Website)

इसलिए शोधग्रंथ में हम लिखेंगे: 

“परंपरागत पर्वसंग्रह के अनुसार आदिपर्व में 227 अध्याय और 8,884 श्लोक हैं; किंतु विभिन्न पाठ-परंपराओं और आलोचनात्मक संस्करणों में अध्याय एवं श्लोक-संख्या भिन्न मिलती है। अतः यहाँ संख्या को पाठ-परंपरा के संदर्भ में ही ग्रहण किया जाना चाहिए।”

यह अधिक विद्वत्तापूर्ण और सुरक्षित तरीका होगा।

आदिपर्व को पढ़ने का सही तरीका - मेरे विचार से पाठक को आदिपर्व पढ़ाते समय तीन स्तर साथ रखने चाहिए:

पहला — कथा - क्या घटित होता है?

दूसरा — संरचना- कथा को इस प्रकार क्यों रखा गया है?

तीसरा — अर्थ- इस कथा के माध्यम से महाभारत अपने बड़े प्रश्नों की भूमि कैसे तैयार करता है?

उदाहरण के लिए— आस्तीक केवल एक कथा है।

लेकिन संरचना में वह प्रतिशोध और विनाश की सीमा का प्रश्न उठाती है।

भीष्म की प्रतिज्ञा केवल त्याग की कथा है। लेकिन आगे के कुरु इतिहास की संरचना उसी से प्रभावित होती है।

कर्ण का जन्म केवल जन्मकथा है। लेकिन आगे चलकर वह पहचान, निष्ठा और नियति के प्रश्न का आधार बनता है।

खांडवदाह केवल अग्नि और वन की कथा नहीं। वह आगे की राजनीतिक और स्थापत्य कथा की भूमिका बनता है।

निष्कर्ष : आदिपर्व वास्तव में “आरंभ” नहीं, “बीज” है

यदि एक वाक्य में आदिपर्व को कहना हो तो मैं कहूँगा— 

आदिपर्व महाभारत की शुरुआत नहीं करता; वह महाभारत के लिए आवश्यक संसार का निर्माण करता है।

वंश यहाँ है। स्मृति यहाँ है। जन्म यहाँ हैं। प्रतिज्ञाएँ यहाँ हैं। संबंध यहाँ हैं। शत्रुताएँ यहाँ हैं। मित्रताएँ यहाँ हैं। देव और मनुष्य यहाँ हैं।

और सबसे बढ़कर— भविष्य के महाभारत के बीज यहाँ हैं।

इसलिए आगे के प्रत्येक पर्व का हमारा विवेचन केवल “इसमें क्या हुआ” बताने वाला सारांश नहीं होना चाहिए। प्रत्येक पर्व के लिए हमें यह देखना चाहिए— 

उस पर्व ने महाभारत में कौन-सी नई दुनिया खोली, कौन-सा नया प्रश्न जोड़ा और आगे की कथा के लिए क्या बदल दिया?

यही दृष्टिकोण पाठक को वास्तव में एक अलग और नया महाभारत दिखा सकता है।

अगला क्रम:
2. सभापर्व — सत्ता, सभा और द्यूत : जब निजी संघर्ष सार्वजनिक राजनीति बन जाता है।

मुकेश श्रीवास्तव 

आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र 

(इस ब्लॉग के लेखों  के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है )

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