आदिपर्व की एक गहरी समस्या जनमेजय का नागयज्ञ : प्रतिशोध, नाग-परंपरा और अंतःशुद्धि का प्रतीक?

 आदिपर्व की एक गहरी समस्या

जनमेजय का नागयज्ञ : प्रतिशोध, नाग-परंपरा और अंतःशुद्धि का प्रतीक?

जनमेजय के नागयज्ञ से महाभारत की कथा का आरम्भ होना पहली दृष्टि में असामान्य लगता है।

महाभारत यदि कुरुवंश की महान कथा है, तो कथा सीधे पांडवों से क्यों नहीं शुरू होती?

क्यों जनमेजय, क्यों परीक्षित की मृत्यु, क्यों तक्षक, क्यों नाग, और क्यों यज्ञाग्नि?

यहीं से एक गहरी व्याख्यात्मक सम्भावना खुलती है। लेकिन पहले मूल कथा को देखना आवश्यक है।

मूल कथा में नागयज्ञ क्यों हुआ?

महाभारत के आदिपर्व के आस्तीकपर्व में कारण बिल्कुल स्पष्ट है।

तक्षक के विष से परीक्षित की मृत्यु होती है। उसके बाद जनमेजय प्रतिशोध की भावना से नागों का विनाश करने के लिए सर्पसत्र आरम्भ करते हैं। स्वयं जनमेजय का कथन है कि वह तक्षक को उसी प्रकार अग्नि में डालना चाहता है जैसे तक्षक ने उसके पिता को विषाग्नि से मारा था। 

अर्थात् पाठ के प्रत्यक्ष स्तर पर नागयज्ञ का प्रथम अर्थ आध्यात्मिक साधना नहीं, प्रतिशोध है।

यह बात हमें स्पष्ट रूप से स्वीकार करनी चाहिए। यही हमारे शोध की पहली सावधानी होगी।

लेकिन फिर नागों का चयन ही क्यों?

यहीं प्रश्न रोचक होता है। महाभारत के नाग केवल एक-दो साँप नहीं हैं।

वासुकि, तक्षक, शेष, ऐरावत आदि नामों के साथ एक विस्तृत नाग-परंपरा प्रस्तुत होती है।

कद्रू से नागों की उत्पत्ति, नागों का अपना वंश, उनका भय, उनका शाप और उनका विनाश—इन सबको एक संगठित कथा के रूप में रखा गया है।

और आस्तीक स्वयं नागवंश से संबंधित हैं—उनकी माता नागकन्या जरत्कारु हैं और पिता ऋषि जरत्कारु।

इसलिए जब आस्तीक यज्ञ रोकते हैं तो वह केवल “एक ब्राह्मण राजा को समझाने” नहीं आते।

वह दो वंशों के बीच सेतु बनकर आते हैं। एक ओर मानव/राजवंश। दूसरी ओर नागवंश। और इसीलिए आस्तीक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या नागवंश वास्तव में था?

यहाँ बहुत सावधानी चाहिए। “नाग” के तीन अलग-अलग अर्थों को एक नहीं मानना चाहिए।

पहला — पौराणिक नाग -

महाभारत में नाग सर्परूप, अलौकिक शक्तियों से युक्त प्राणी हैं।

दूसरा — नाग एक सांस्कृतिक/जातीय समुदाय

भारतीय इतिहास और साहित्य में “नाग” नाम से विभिन्न समुदायों और परंपराओं के उल्लेख मिलते हैं।

तीसरा — ऐतिहासिक नाग राजवंश

प्राचीन भारत में नाग नाम वाले ऐतिहासिक राजवंशों के प्रमाण भी मिलते हैं, विशेषकर मध्य भारत और उत्तर भारत की कुछ राजनीतिक परंपराओं में।

लेकिन इन ऐतिहासिक नाग राजवंशों को सीधे महाभारत के तक्षक-वसुकि वाले नागवंश का ऐतिहासिक प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

अर्थात्: 

ऐतिहासिक “नाग” मिलते हैं; इससे महाभारत के प्रत्येक नाग को ऐतिहासिक मानव समुदाय सिद्ध नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार आधुनिक “नागा” समुदायों को महाभारत के नागों का सीधा वंशज मानना भी बिना प्रमाण के निष्कर्ष होगा।

यहाँ आगे अलग से इतिहास, पुरातत्त्व, अभिलेख और भाषाशास्त्र के आधार पर शोध किया जा सकता है।

क्या नाग और कुण्डलिनी को जोड़ा जा सकता है?

हाँ—लेकिन “महाभारत का मूल अर्थ यही था” के रूप में नहीं।

यहाँ दो स्तर बनाने होंगे। 

पाठीय स्तर

आदिपर्व स्वयं यह नहीं कहता कि जनमेजय का नागयज्ञ कुण्डलिनी-जागरण का रूपक है।

इसलिए ऐसा दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता।

प्रतीकात्मक स्तर

भारतीय योग-तांत्रिक परंपराओं में सर्पाकार शक्ति और कुण्डलिनी का संबंध बाद की विकसित साधना-परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसलिए एक व्याख्यात्मक समानता खोजी जा सकती है:

नाग — कुण्डलित शक्ति का प्रतीक
अग्नि — रूपांतरण/तप/शुद्धि का प्रतीक
यज्ञ — आहुति और रूपांतरण की प्रक्रिया
तक्षक — विनाशकारी/विषात्मक शक्ति का प्रतीक
आस्तीक — विवेक द्वारा विनाश की सीमा रोकना

लेकिन यह हमारी प्रतीकात्मक व्याख्या होगी, महाभारतकार का घोषित आशय नहीं। यही अंतर शोध की ईमानदारी बनाए रखेगा।

क्या नागयज्ञ को “कुण्डलिनी का दहन” मान सकते हैं?

मैं इसे थोड़ा बदलकर देखना अधिक सार्थक समझता हूँ।

यदि नाग को कुण्डलिनी या अंतःशक्ति का प्रतीक मानें, तो उसका दहन उचित प्रतीक नहीं लगता।

योग में कुण्डलिनी को नष्ट नहीं किया जाता। उसे जागृत और ऊर्ध्वगामी माना जाता है।

इसलिए यदि हम इस दिशा में प्रतीकात्मक अध्ययन करें तो अधिक सूक्ष्म प्रश्न होगा:

क्या नागयज्ञ भीतर की विषाक्त, प्रतिशोधात्मक और अविवेकी शक्तियों को अग्नि में अर्पित करने की कथा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है?

और फिर आस्तीक का आगमन अत्यंत अर्थपूर्ण हो जाता है। वह नागों को बचाते हैं।

अर्थात्— अग्नि सब कुछ नष्ट नहीं करती; विवेक विनाश की सीमा निर्धारित करता है।

यह व्याख्या कुण्डलिनी की तुलना में अधिक दार्शनिक रूप से सुरक्षित है।

और आपका अग्नि वाला प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है

आपने पूछा— “क्या यज्ञ-अग्नि सारे कर्मों और ज्ञान-अहंकार को जलाकर धर्म में प्रवेश का सूचक हो सकती है?”

प्रतीकात्मक स्तर पर—हाँ, यह एक बहुत सुंदर शोध-परिकल्पना हो सकती है।

लेकिन फिर भी हमें मूल कथा से अलग चिह्नित करना होगा।

अग्नि वैदिक परंपरा में केवल विनाश नहीं है।

वह— देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाली शक्ति है, परिवर्तन का माध्यम है, यज्ञ का केंद्र है, और तप/तेज से भी जुड़ी हुई है।

इसलिए यज्ञ को एक परिवर्तनकारी प्रक्रिया के रूप में पढ़ना सम्भव है।

लेकिन जनमेजय के मामले में एक विडंबना पैदा होती है।

वह यज्ञ कर रहा है— धर्म की विधि से, लेकिन उसका उद्देश्य है— प्रतिशोध।

यहीं महाभारत एक बहुत गहरा प्रश्न खड़ा करता है: क्या वैध विधि से किया गया कर्म अपने आप धर्ममय हो जाता है?

यज्ञ शास्त्रोक्त हो सकता है। ऋत्विज् वेदज्ञ हो सकते हैं। मंत्र सही हो सकते हैं। अग्नि पवित्र हो सकती है।

फिर भी यज्ञ के पीछे यदि प्रतिशोध है, तो क्या वह धर्म है?

यहीं जनमेजय का नागयज्ञ हमारे पूरे शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

आस्तीक क्यों आता है?

यहीं मुझे आदिपर्व की सबसे गहरी संरचनात्मक विशेषता दिखाई देती है।

जनमेजय कहता है— तक्षक को जलाओ। अग्नि चलती है। नाग गिरते हैं। तक्षक को भी अग्नि की ओर खींचा जा रहा है। और ठीक उसी समय आस्तीक आता है।

वह धन नहीं माँगता। वह यज्ञ रोकने का वर माँगता है। राजा पहले मना करता है।

लेकिन अंततः आस्तीक की बात स्वीकार करनी पड़ती है। 

और जब तक्षक इन्द्र के आश्रय में है, तब भी आस्तीक के “ठहरो” कहने से उसका पतन रुक जाता है। 

इसे प्रतीकात्मक रूप से पढ़ें तो संरचना कुछ ऐसी दिखाई देती है:

प्रतिशोध → अग्नि → सर्वनाश → विवेक का प्रवेश → सीमा → संरक्षण यह व्याख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्या यही महाभारत की कथा शुरू होने का कारण हो सकता है?

यहाँ हमें एक बहुत रोचक संभावना मिलती है। महाभारत की कथा विजय से नहींप्रतिशोध रोकने से आरंभ होती है।

यह बात साधारण नहीं है। जनमेजय अपने पिता की मृत्यु से उत्पन्न क्रोध में नागों का सर्वनाश चाहता है।

आस्तीक उस सर्वनाश को रोकता है।      और इसी वातावरण में महाभारत की कथा सुनाई जाती है।

इसलिए एक प्रतीकात्मक पाठ संभव है:

 महाभारत की कथा उस क्षण जन्म लेती है जब प्रतिशोध की अग्नि को सीमा दी जाती है।

यह अभी हमारा निष्कर्ष नहीं होना चाहिए। इसे हम शोध-परिकल्पना के रूप में रख सकते हैं।

और यह हमारे पहले प्रश्न—“महाभारत आखिर किस प्रकार का ग्रंथ है?”—से बहुत सुंदर रूप से जुड़ता है।

क्या यह “कर्म-अहंकार का दहन” है?

यहाँ मैं थोड़ा असहमत होते हुए आपकी कल्पना को और मजबूत करना चाहूँगा।

यदि हम सीधे कह दें— “नागयज्ञ = अहंकार का दहन” तो यह बहुत जल्दी किया गया निष्कर्ष होगा।

क्योंकि जनमेजय स्वयं अपने अहंकार से मुक्त होकर यज्ञ नहीं कर रहा। वह तो पिता की मृत्यु के प्रतिशोध से प्रेरित है।

इसलिए अधिक सूक्ष्म प्रतीकात्मक व्याख्या यह होगी: यज्ञ की अग्नि में केवल नाग नहीं जल रहे; राजा का प्रतिशोध भी परीक्षा में है।

और आस्तीक का हस्तक्षेप यह बताता है कि— 

धर्म का मार्ग केवल कर्म करने में नहीं, बल्कि यह जानने में भी है कि कब कर्म रोक देना चाहिए।

यह विचार आगे हमारे “धर्मः सूक्ष्मः” अध्याय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

अब आते हैं सौति पर आपका दूसरा प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है: “सौति आदि क्या केवल कथावाचक थे या गुरु के रूप में थे?”

यहाँ हमें तीन स्तर अलग करने चाहिए।

उग्रश्रवा सौति - वे मुख्य बाहरी कथावाचक हैं।

वे नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों को कथा सुना रहे हैं।

लेकिन वे स्वयं कहते हैं कि यह कथा उन्होंने अपने पिता लोमहर्षण से सुनी थी, जो व्यास के शिष्य थे। वे कहते हैं कि वे उस पूर्व कथन के समय उपस्थित थे और अब शौनक के आग्रह पर वही कथा सुनाते हैं। 

इसलिए उनकी भूमिका केवल “कहानी सुनाने वाले” की नहीं है। वे श्रुति-परंपरा के वाहक हैं।

क्या सौति गुरु थे?

यहाँ “गुरु” शब्द सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। सौति को महाभारत में उपदेशदाता गुरु के रूप में स्थापित करना सही नहीं होगा।

लेकिन वह परंपरा के शिक्षक/प्रेषक की भूमिका अवश्य निभाते हैं। क्योंकि उनके पास ज्ञान है।

वे पूर्वाचार्यों से सुनी हुई कथा को आगे देते हैं। और शौनक उनसे प्रश्न करते हैं।

इसलिए संरचना ऐसी है: व्यास → वैशंपायन → जनमेजय

और दूसरी ओर:

व्यास की परंपरा → लोमहर्षण → उग्रश्रवा सौति → शौनक आदि ऋषि

यह केवल कथावाचन नहीं। यह ज्ञान-संप्रेषण की परंपरा है। और यहाँ एक अद्भुत बात है

आदिपर्व में शौनक केवल श्रोता नहीं हैं। वे लगातार प्रश्न करते हैं।

वे पूछते हैं— यह क्यों हुआ? उसका कारण क्या था? यह व्यक्ति कौन था? आस्तीक ने नागों को क्यों बचाया?

यज्ञ क्यों हुआ? सौति उत्तर देते हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण संरचना बनती है: गुरु/कथावाचक → प्रश्नकर्ता → कथा → पुनः प्रश्न

अर्थात् महाभारत का ज्ञान एकतरफा प्रवचन की तरह नहीं चलता। वह संवाद के रूप में आगे बढ़ता है।

वैशंपायन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण है

जनमेजय के सर्पसत्र में वैशंपायन द्वारा भारत की कथा कही जाती है।

परंपरा में व्यास को मूल रचयिता और वैशंपायन को उसके प्रमुख वक्ता के रूप में रखा गया है।

इसलिए महाभारत स्वयं अपनी कथा को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि—

रचना → स्मरण → श्रवण → पुनर्वाचन  लगातार चलता रहे।

यही कारण है कि हमें महाभारत को केवल “एक लेखक द्वारा लिखी गई किताब” की तरह पढ़ने में सावधानी रखनी चाहिए।

मेरी दृष्टि में आदिपर्व का सबसे गहरा सूत्र यदि इन सभी प्रश्नों को एक साथ रखें—

जनमेजय का प्रतिशोध

नागों का विनाश

यज्ञ-अग्नि

आस्तीक का आगमन

विनाश का रुकना

ऋषियों की सभा

सौति का कथन

भारतवंश की कथा

तो एक अद्भुत संरचना दिखाई देती है।

इसे अभी अंतिम सत्य न मानते हुए मैं एक शोध-परिकल्पना के रूप में इस प्रकार लिखूँगा: 

 महाभारत की कथा उस क्षण से प्रारंभ होती है जब प्रतिशोध की अग्नि को विवेक रोकता है; और उसी रोके गए विनाश के पश्चात् मनुष्य अपने वंश, कर्म, धर्म और इतिहास की कथा सुनने बैठता है।

यदि यह संरचना पाठ के अन्य प्रमाणों से भी पुष्ट होती है, तो यह हमारे शोध का एक अत्यंत मौलिक निष्कर्ष बन सकता है।

लेकिन कुण्डलिनी के विषय में हमारी अंतिम सावधानी

नाग = कुण्डलिनी = जनमेजय का नागयज्ञ ऐसा सीधा समीकरण हम नहीं बनाएँगे।

बल्कि शोध में तीन संभावनाएँ अलग रखेंगे:

ऐतिहासिक प्रश्न:
क्या नाग किसी वास्तविक प्राचीन समुदाय/राजनीतिक समूह का स्मृतिरूप हो सकते हैं?

पौराणिक प्रश्न:
महाभारत नागों को किस प्रकार की सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है?

योगिक-प्रतीकात्मक प्रश्न:
क्या बाद की भारतीय योग-परंपरा में विकसित नाग-कुण्डलिनी प्रतीक के आलोक में इस कथा का कोई नया आध्यात्मिक पाठ सम्भव है?

तीसरे प्रश्न को पहले का प्रमाण नहीं बनाया जाएगा।

यही वैज्ञानिकता हमारे शोध को बचाएगी।

और मेरी दृष्टि में नागयज्ञ का सबसे शक्तिशाली प्रतीक “कुण्डलिनी का दहन” नहीं, बल्कि “प्रतिशोध की अग्नि को विवेक द्वारा सीमित करना” है। कुण्डलिनी की व्याख्या को हम उसके ऊपर एक दूसरे, योगिक अर्थ-स्तर के रूप में रख सकते हैं।

यही अंतर हमारे शोध को साधारण आध्यात्मिक व्याख्या से अलग करेगा।

मुकेश श्रीवास्तव 

आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र 

(इस ब्लॉग के लेखों  के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है )

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