महाभारत — सौप्तिकपर्व — भाग १ : विजय के बाद की रात — अश्वत्थामा का प्रतिशोध

 महाभारत — सौप्तिकपर्व — भाग १ : विजय के बाद की रात — अश्वत्थामा का प्रतिशोध

कुरुक्षेत्र का अठारह दिन का युद्ध लगभग समाप्त हो चुका था।

कौरव सेना नष्ट हो चुकी थी। भीष्म, द्रोण, कर्ण और शल्य जैसे प्रमुख योद्धा मारे जा चुके थे। दुर्योधन भी भीम के प्रहार से घायल होकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।

पाण्डवों की विजय लगभग निश्चित थी। लेकिन महाभारत यहीं समाप्त नहीं होता।

क्योंकि युद्ध समाप्त होने और हिंसा समाप्त होने में अन्तर होता है।

यहीं से सौप्तिकपर्व आरम्भ होता है।

रात में तीन योद्धा

अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा—कौरव पक्ष के तीन प्रमुख जीवित योद्धा—दुर्योधन के पास थे।

दुर्योधन की अवस्था देखकर अश्वत्थामा के भीतर प्रतिशोध तीव्र हो उठा।

उसके पिता द्रोण मारे जा चुके थे।  कर्ण नहीं रहा। दुर्योधन मृत्यु के निकट था।

और अब उसके सामने पाण्डव शिविर था।

लेकिन दिन के युद्ध में पाण्डवों का सामना करना अब सम्भव नहीं था।

तब अश्वत्थामा ने रात में आक्रमण करने का निश्चय किया।

उल्लू से मिली रणनीति

महाभारत में एक अत्यन्त अर्थपूर्ण दृश्य आता है। अश्वत्थामा ने रात्रि में एक उल्लू को कौओं पर आक्रमण करते देखा।

कौए वृक्ष पर सो रहे थे। उल्लू ने अन्धकार का लाभ उठाया और एक-एक करके उन्हें मार डाला।

अश्वत्थामा ने इस घटना को केवल प्राकृतिक दृश्य के रूप में नहीं देखा।

उसने इसमें युद्ध की एक रणनीति देखी— शत्रु जब असावधान हो, तभी उस पर प्रहार करो।

यहाँ से उसके विचार में एक निर्णायक परिवर्तन आता है।

वह अब युद्ध के मैदान में विजय प्राप्त करने की योजना नहीं बना रहा था।

वह सोए हुए शत्रु का संहार करना चाहता था।

कृपाचार्य की आपत्ति

अश्वत्थामा ने अपनी योजना बताई। लेकिन कृपाचार्य ने उसे सावधान किया।

युद्ध की अपनी मर्यादाएँ थीं। 

सोए हुए, निहत्थे अथवा युद्ध से बाहर पड़े व्यक्ति की हत्या सामान्य युद्ध-धर्म के अनुरूप नहीं मानी जाती।

इसलिए यह प्रसंग केवल प्रतिशोध का नहीं है। यह महाभारत के एक बड़े प्रश्न को सामने रखता है—

क्या अपने पिता और साथियों की मृत्यु का बदला लेने के लिए युद्ध की मर्यादा छोड़ी जा सकती है?

अश्वत्थामा का उत्तर उसके कर्म में दिखाई देगा।

दुर्योधन की अनुमति

अश्वत्थामा दुर्योधन के पास गया। दुर्योधन उस समय लगभग मृत्युशय्या पर था।

अश्वत्थामा ने पाण्डव शिविर पर रात्रि-आक्रमण का अपना संकल्प बताया।

दुर्योधन ने उसे अनुमति दी। इसके बाद अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा पाण्डव शिविर की ओर चले।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है—पाण्डव उस समय शिविर में नहीं थे। 

रात्रि के उस समय शिविर में मुख्यतः पांचाल और अन्य योद्धा विश्राम कर रहे थे।

यही परिस्थिति आगे होने वाले नरसंहार को सम्भव बनाती है।

शिविर के द्वार पर एक अद्भुत दृश्य

अश्वत्थामा जब पाण्डव शिविर के द्वार पर पहुँचा, तब महाभारत में एक रहस्यमय दृश्य मिलता है।

वहाँ उसे एक भयानक, विराट रक्षक दिखाई देता है। उसका स्वरूप सामान्य मानव जैसा नहीं था।

अश्वत्थामा ने उस पर अस्त्र चलाए। लेकिन वे प्रभावहीन होते गए।

यहाँ कथा फिर सामान्य युद्ध-वर्णन से निकलकर दैवी और आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचती है।

अश्वत्थामा समझता है कि केवल सामान्य अस्त्रों से वह इस शक्ति को पार नहीं कर सकता।

तब वह शिव की आराधना करता है।

और यहीं से सौप्तिकपर्व का सबसे रहस्यमय अध्याय खुलता है—

क्या अश्वत्थामा को वास्तव में शिव का वरदान प्राप्त हुआ था, या यह घटना युद्धग्रस्त चेतना और महाभारत की दैवी कथा-परम्परा का एक प्रतीकात्मक रूप है?

इस प्रश्न को हम अगले भाग में मूल पाठ के आधार पर अलग करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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