न जाने क्यों वो अब मुझसे मिला करती नहीं,
न जाने क्यों वो अब मुझसे मिला करती नहीं,
मेरी आवाज़ को पहले-सा सुना करती नहीं।
कभी छोटी-सी बातों पर झगड़ती थी बहुत,
अब तो नाराज़ भी होती है, लड़ा करती नहीं।
उसकी आँखों में कोई बात ठहरी है मगर,
पूछने पर भी वो मुझसे कुछ कहा करती नहीं।
मैं समझता हूँ कि कुछ दर्द है सीने में कहीं,
वो मगर दर्द किसी से भी कहा करती नहीं।
उसके कमरे में वही ख़त, वही तस्वीरें हैं,
बस वो पहले की तरह उनको पढ़ा करती नहीं।
मैंने देखा है उसे शाम ढले खिड़की पर,
दूर तक देखती रहती है, बुला करती नहीं।
शायद अब उसको किसी चीज़ की चाहत ही नहीं,
या कोई बात है जो मुझसे कहा करती नहीं।
एक रिश्ता था जो आवाज़ से पहचाना जाता,
अब वो आवाज़ भी सुनती है, रुका करती नहीं।
मुकेश
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