महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २४ : मृत्यु — देह का अन्त या यात्रा का परिवर्तन?

 महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २४ : मृत्यु — देह का अन्त या यात्रा का परिवर्तन?

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका है।

युधिष्ठिर ने मृत्यु को केवल एक दार्शनिक शब्द के रूप में नहीं देखा। उसने अपने सामने पिता-तुल्य भीष्म को बाणों की शय्या पर देखा, गुरु द्रोण को गिरते देखा, कर्ण को खोया, अपने असंख्य बन्धु-बान्धवों को मृत देखा। इसलिए शान्तिपर्व में जब मृत्यु का प्रश्न उठता है, तो वह केवल शरीर और आत्मा का सिद्धान्त नहीं रह जाता।

प्रश्न अत्यन्त मानवीय है—

मनुष्य मरता क्यों है? मृत्यु के बाद क्या होता है? और मृत्यु को समझ लेने से जीवित मनुष्य के जीवन में क्या परिवर्तन आता है?

यही प्रश्न मोक्षधर्म को और भीतर ले जाता है।

मृत्यु का भय कहाँ से आता है?

मनुष्य मृत्यु से इसलिए डरता है क्योंकि वह अपने वर्तमान रूप को स्थायी मान लेता है।

नाम, शरीर, परिवार, पद, सम्पत्ति, सम्बन्ध—इन सबको वह अपने अस्तित्व का स्थायी आधार समझता है। मृत्यु इन सबको एक क्षण में अस्थिर कर देती है।

शान्तिपर्व मृत्यु को जीवन का अपवाद नहीं मानता।

मृत्यु जीवन की व्यवस्था के भीतर ही स्थित है।

जो जन्मा है, उसका शरीर परिवर्तनशील है। बालक का शरीर युवा होता है, युवा का वृद्ध होता है और वृद्ध शरीर अन्ततः समाप्त होता है। मृत्यु इस परिवर्तन की अंतिम दृश्य अवस्था है।

लेकिन महाभारत का प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।

यदि शरीर ही सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं है, तो शरीर के समाप्त होने के बाद उस चेतन सत्ता की क्या गति होती है जिसे जीव कहा जाता है?

मृत्यु में क्या समाप्त होता है?

मोक्षधर्म की दृष्टि में मृत्यु का अर्थ सम्पूर्ण अस्तित्व का विनाश नहीं है।

शरीर पंचभूतों से बना है और मृत्यु के बाद वही तत्त्व अपने मूल तत्त्वों में लौटते हैं। इन्द्रियों की सक्रियता समाप्त होती है, प्राण की देहगत व्यवस्था टूटती है और स्थूल शरीर अपने प्राकृतिक घटकों में विलीन होता है।

लेकिन जीव की यात्रा को महाभारत यहीं समाप्त नहीं मानता।

एक स्थान पर मृत्यु और पुनर्जन्म के सम्बन्ध को समझाते हुए कहा गया है कि जीव अपने कर्म और संस्कारों के अनुसार विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त करता है।

इसलिए महाभारत के लिए मृत्यु एक देह का अन्त है, सम्पूर्ण यात्रा का अनिवार्यतः अन्त नहीं।

जीव की यात्रा

यहाँ “आत्मा” और “जीव” के बीच का अन्तर महत्वपूर्ण हो जाता है।

आत्मा को शुद्ध चेतन आधार माना गया है।

लेकिन जब वही चेतना मन, इन्द्रिय, संस्कार और कर्म की व्यवस्था से सम्बद्ध होकर अनुभव करती है, तब जीव की धारणा सामने आती है।

मृत्यु के बाद इसी जीव की गति की चर्चा होती है।

इसमें केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि संस्कार और मानसिक प्रवृत्तियाँ भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

मनुष्य जैसा सोचता है, जैसा चाहता है और जैसा कर्म करता है, उसी से उसके भीतर एक प्रकार की दिशा निर्मित होती जाती है।

मृत्यु उस दिशा को अचानक मिटा नहीं देती।

संस्कार — मृत्यु के पार जाने वाली प्रवृत्ति

मनुष्य जीवन भर असंख्य अनुभव करता है।

कुछ अनुभव समाप्त हो जाते हैं।

कुछ स्मृति बन जाते हैं।

कुछ गहरी आदत बन जाते हैं।

और कुछ इतनी गहराई तक उतरते हैं कि वे उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं।

महाभारत की कर्म-दृष्टि में यही संस्कार मृत्यु के बाद जीव की गति को प्रभावित करने वाले तत्वों में माने जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर घटना का कोई सरल गणितीय कर्मफल निर्धारित किया जा सकता है।

महाभारत स्वयं कर्म को अत्यन्त सूक्ष्म मानता है।

किस कर्म का कौन-सा फल, किस समय और किस प्रकार प्राप्त होगा—इसे मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से पूरी तरह नहीं जान सकता।

यही कारण है कि कर्म का सिद्धान्त केवल पुरस्कार और दण्ड की सरल व्यवस्था नहीं है।

वह कारण और परिणाम की एक गहरी नैतिक संरचना है।

कर्म से बचना और कर्म से मुक्त होना

यहाँ एक महत्वपूर्ण अन्तर है।

कर्म से बचना और कर्मबन्धन से मुक्त होना एक बात नहीं।

मनुष्य जब तक जीवित है, तब तक कोई न कोई कर्म करता रहेगा।

श्वास लेना, बोलना, चलना, विचार करना, निर्णय लेना—ये सब किसी न किसी अर्थ में कर्म हैं।

इसलिए मुक्ति कर्म के पूर्ण अभाव में नहीं खोजी जाती।

मुक्ति उस मानसिक स्थिति में खोजी जाती है जिसमें कर्म अहंकार और आसक्ति की नई गाँठें न बनाता जाए।

इसीलिए शान्तिपर्व में त्याग का अर्थ केवल कर्म छोड़ देना नहीं है।

कर्म करते हुए भी कर्म के स्वामित्व-अहंकार से मुक्त होना अधिक गहरी साधना है।

मृत्यु का ज्ञान जीवन को बदलता है

मृत्यु पर विचार का उद्देश्य भय बढ़ाना नहीं है।

वास्तव में इसका उद्देश्य जीवन को अधिक स्पष्ट करना है।

जिस व्यक्ति को मृत्यु की अनिवार्यता का बोध है, उसके लिए अनावश्यक अहंकार का मूल्य घटने लगता है।

जिसे पता है कि शरीर स्थायी नहीं, वह शरीर को महत्वहीन नहीं मानता; बल्कि उसके प्रति अधिक सजग हो सकता है।

जिसे पता है कि धन साथ नहीं जाएगा, वह धन का उपयोग अलग ढंग से कर सकता है।

जिसे पता है कि सम्बन्ध परिवर्तनशील हैं, वह सम्बन्धों में अधिकार के स्थान पर कृतज्ञता विकसित कर सकता है।

इसलिए मृत्यु-विचार महाभारत में जीवन-विरोधी नहीं है।

वह जीवन को उसकी सीमाओं सहित देखने की विद्या है।

नचिकेता से शान्तिपर्व तक

मृत्यु के इस प्रश्न की भारतीय परम्परा में एक पुरानी प्रतिध्वनि कठोपनिषद् में दिखाई देती है।

नचिकेता मृत्यु के देवता से पूछता है— अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके

कुछ लोग कहते हैं कि मृत्यु के बाद भी अस्तित्व है, कुछ कहते हैं कि नहीं है—सत्य क्या है?

शान्तिपर्व का मोक्षधर्म भी इसी मूल मानवीय प्रश्न को अनेक रूपों में उठाता है।

लेकिन दोनों ग्रन्थों को एक ही पाठ या एक ही दार्शनिक प्रणाली मानना उचित नहीं होगा। महाभारत में मृत्यु का प्रश्न कर्म, पुनर्जन्म, योग, सांख्य और मोक्ष के अनेक प्रसंगों से जुड़ जाता है।

इससे एक बात स्पष्ट होती है—

मृत्यु भारतीय दर्शन में केवल जैविक घटना नहीं रही; वह मनुष्य के “मैं कौन हूँ?” प्रश्न का प्रवेश-द्वार बन गई।

मृत्यु और समय

महाभारत का एक और महत्वपूर्ण बोध है—समय किसी के लिए रुकता नहीं।

राजा हो या साधारण मनुष्य, विजेता हो या पराजित—समय सभी को एक ही नियम में रखता है।

कुरुक्षेत्र ने इस सत्य को नग्न रूप में सामने रखा।

जो कल शक्तिशाली थे, आज नहीं हैं।

जो आज शक्तिशाली हैं, वे भी स्थायी नहीं।

इसलिए शान्तिपर्व में राजधर्म की चर्चा के बाद मृत्यु का विवेचन केवल विषय परिवर्तन नहीं है।

यह सत्ता की सीमा का उद्घाटन है। 

राज्य बदलते हैं। वंश बदलते हैं। राजा बदलते हैं। शरीर बदलते हैं। लेकिन मनुष्य का प्रश्न बना रहता है—

इस परिवर्तन के बीच स्थायी क्या है?

मृत्यु को समझने वाला जीवन

मृत्यु की स्मृति मनुष्य को दो दिशाओं में ले जा सकती है।

एक दिशा भय की है—“सब समाप्त होने वाला है।”

दूसरी दिशा विवेक की है—“जो नश्वर है, उसे नश्वर समझकर ही जीना चाहिए।”

महाभारत दूसरी दिशा की ओर संकेत करता है।

नश्वर वस्तु से अनश्वरता की अपेक्षा करना दुःख को जन्म देता है।

परिवर्तनशील शरीर से स्थायी सुरक्षा की अपेक्षा करना असम्भव है।

बदलते सम्बन्धों से पूर्ण स्थायित्व की अपेक्षा करना भी असम्भव है।

और बदलती परिस्थितियों में स्थायी सुख खोजते रहना मन को निरन्तर असंतोष में रखता है।

मृत्यु इस भ्रम को तोड़ती है।

क्या मृत्यु मुक्ति है?

यहाँ सावधानी आवश्यक है।

मृत्यु अपने आप में मुक्ति नहीं है।

यदि मृत्यु ही मुक्ति होती, तो ज्ञान, योग, वैराग्य और आत्मसाधना की आवश्यकता नहीं रहती।

महाभारत की दृष्टि में मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है; मुक्ति ज्ञान और बन्धन के क्षय से सम्बन्धित है।

अर्थात् शरीर छोड़ देना और संसार-बन्धन से मुक्त होना दो अलग अवस्थाएँ हैं।

यही अन्तर आगे के मोक्षधर्म को समझने के लिए निर्णायक है।

मृत्यु से आगे का प्रश्न

अब शान्तिपर्व के सामने अगला प्रश्न खड़ा होता है—

यदि मृत्यु के बाद जीव की गति कर्म और संस्कारों से जुड़ी है, तो कर्मफल की व्यवस्था कैसे चलती है?

क्या प्रत्येक कर्म का फल अनिवार्य है?

क्या शुभ कर्म से सुख और अशुभ कर्म से दुःख का सरल सम्बन्ध है?

यदि ऐसा है, तो मनुष्य के वर्तमान जीवन में दिखाई देने वाली असमानताओं को कैसे समझा जाए?

और सबसे कठिन प्रश्न—

यदि कर्म ही जन्म-जन्मान्तर की गति का कारण है, तो उस कर्मचक्र से बाहर निकलने का मार्ग क्या है?

यहीं से शान्तिपर्व कर्मफल, पुनर्जन्म और संसारचक्र की विस्तृत विवेचना में प्रवेश करेगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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