महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–२ : कुरुक्षेत्र में गान्धारी — शोक से शाप तक
महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–२ : कुरुक्षेत्र में गान्धारी — शोक से शाप तक
कुरुक्षेत्र में युद्ध समाप्त हो चुका था।
जिस भूमि पर कुछ ही समय पहले शंख, धनुष, रथ और अस्त्रों की ध्वनि थी, अब वहाँ मृत्यु का मौन था।
धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती और हस्तिनापुर की स्त्रियाँ उस युद्धभूमि पर पहुँचीं जहाँ उनके अपने ही लोग पड़े थे।
यहाँ महाभारत की दृष्टि अचानक बदल जाती है।
अब कोई योद्धा नहीं है। कोई विजय-घोष नहीं है। कोई पक्ष और विपक्ष नहीं है।
अब केवल परिणाम है।
और परिणाम के सामने युद्ध के सारे तर्क बहुत छोटे दिखाई पड़ने लगते हैं।
गान्धारी की आँखों के सामने कुरुवंश
गान्धारी ने अपने जीवन में आँखों पर पट्टी बाँध ली थी।
परन्तु स्त्रीपर्व में वह प्रसंग अत्यन्त प्रतीकात्मक हो जाता है।
जिस स्त्री ने जीवन भर अपने पति के अंधत्व को साझा किया, अब उसके सामने पूरा कुरुवंश जैसे अंधकार में पड़ा था।
दुर्योधन का शरीर वहाँ था। दुःशासन का शरीर वहाँ था। विकर्ण सहित उसके अन्य पुत्र वहाँ थे।
भूरिश्रवा, जयद्रथ, कर्ण और असंख्य राजाओं तथा योद्धाओं के शव चारों ओर पड़े थे।
गान्धारी के लिए ये केवल युद्ध में मारे गये योद्धा नहीं थे। वे उसके पुत्र थे।
और यहीं महाभारत हमें एक अत्यन्त मानवीय सत्य के सामने खड़ा करता है—
दोषी व्यक्ति भी किसी का पुत्र हो सकता है। दुर्योधन के कर्मों का मूल्यांकन एक प्रश्न है।
गान्धारी का उसके प्रति मातृशोक दूसरा। महाभारत इन दोनों को एक-दूसरे से मिटाता नहीं है।
शोक का कोई पक्ष नहीं होता
युद्ध में पक्ष होते हैं। शोक में नहीं।
कौरवों की स्त्रियाँ अपने मृत परिजनों के लिए रो रही थीं।
पाण्डवों की स्त्रियाँ भी अपने मृत पुत्रों और संबंधियों के लिए रो रही थीं।
युद्धभूमि पर पड़े शरीर यह नहीं बता रहे थे कि कौन कौरव था और कौन पाण्डव।
मृत्यु ने दोनों पक्षों के बीच की रेखा समाप्त कर दी थी।
यही कारण है कि स्त्रीपर्व को केवल “कौरव-पक्ष के शोक” का पर्व मानना उचित नहीं होगा।
यह वास्तव में समूचे कुरुवंश के विनाश का पर्व है।
गान्धारी और कृष्ण
इसी वातावरण में गान्धारी की दृष्टि कृष्ण की ओर जाती है।
यह स्त्रीपर्व का सबसे संवेदनशील प्रसंगों में से एक है।
गान्धारी जानती हैं कि कृष्ण युद्ध में किसी साधारण व्यक्ति की तरह उपस्थित नहीं थे।
वे दोनों पक्षों के बीच संवाद का प्रयास कर चुके थे। वे शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर गये थे।
उन्होंने युद्ध टालने का प्रयास किया था। लेकिन युद्ध हुआ।
और अब उनके सामने कुरुवंश समाप्त पड़ा था।
गान्धारी के भीतर प्रश्न उठता है— यदि कृष्ण इतने समर्थ थे, तो यह विनाश क्यों हुआ?
यही प्रश्न उनके शोक को क्रोध में बदल देता है।
यहाँ महाभारत कृष्ण को एक कठिन नैतिक प्रश्न के सामने रखता है
कृष्ण ने पाण्डवों का साथ दिया। लेकिन उन्होंने स्वयं शस्त्र धारण नहीं किया।
उन्होंने युद्ध से पहले शान्ति का प्रस्ताव भी रखा। दुर्योधन ने उसे स्वीकार नहीं किया।
इसलिए घटनाओं को केवल इस रूप में देखना कि “कृष्ण ने युद्ध कराया”, महाभारत के पूरे प्रसंग को समेट नहीं देता।
दूसरी ओर, गान्धारी के दृष्टिकोण को भी केवल “मातृक्रोध” कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
उनके सामने वास्तविक विनाश था। उनके सौ पुत्र मर चुके थे। उनका वंश टूट चुका था।
उनके लिए कृष्ण उस विनाश के साक्षी भी थे और ऐसी शक्ति भी, जो घटनाओं को प्रभावित करने में सक्षम मानी जाती थी।
इसलिए उनका प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं था। वह प्रश्न था—
इतनी शक्ति होने पर भी विनाश को रोका क्यों नहीं गया?
गान्धारी का शाप
यहीं गान्धारी कृष्ण को शाप देती हैं।
उनका कथन भविष्य की एक भयावह दिशा खोल देता है—
जिस प्रकार कुरुवंश एक-दूसरे के विनाश में समाप्त हुआ, उसी प्रकार यादववंश भी अंततः आपसी संघर्ष में नष्ट होगा।
महाभारत की कथा में यह शाप आगे चलकर मौसलपर्व की घटनाओं से जुड़ता है।
यहाँ एक रोचक संरचनात्मक बात दिखाई देती है। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुआ।
पाण्डव विजयी हुए।
लेकिन महाभारत विजय पर कथा समाप्त नहीं करता।
वह भविष्य के विनाश का बीज इसी शोकभूमि में रख देता है।
अर्थात्— युद्ध समाप्त हुआ, परन्तु विनाश की प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई।
शाप या इतिहास की चेतावनी?
यहाँ शोध का एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
क्या गान्धारी का शाप केवल धार्मिक-अलौकिक घटना है?
या महाभारत इसके माध्यम से एक गहरा सामाजिक संकेत भी दे रहा है?
यादवों का आगे होने वाला विनाश यदि कथा के प्रतीकात्मक स्तर पर पढ़ा जाए, तो एक विचार सामने आता है—
जो समाज अपनी शक्ति, विजय और आंतरिक अहंकार को नियंत्रित नहीं करता, उसके भीतर का संघर्ष स्वयं उसके विनाश का कारण बन सकता है।
इस अर्थ में गान्धारी का शाप केवल भविष्यवाणी नहीं रह जाता।
वह युद्ध के बाद उत्पन्न नैतिक चेतावनी बन जाता है।
फिर भी इसे ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि महाभारत की कथा-संरचना और प्रतीकात्मक अर्थ के रूप में देखना अधिक उचित है।
कृष्ण की भूमिका का दूसरा पक्ष
गान्धारी के शाप के बाद कृष्ण का मौन भी ध्यान देने योग्य है।
वे प्रतिशाप नहीं देते। वे गान्धारी के शोक को चुनौती नहीं देते।
यहाँ कृष्ण की एक अलग छवि सामने आती है। कुरुक्षेत्र में वे अर्जुन के सारथि थे।
राजनीतिक प्रसंगों में वे रणनीतिकार थे। शान्तिदूत के रूप में वे कूटनीतिक व्यक्तित्व थे।
लेकिन यहाँ वे एक शोकाकुल माता के सामने खड़े हैं। और उसके शाप को स्वीकार करते हैं।
यही परिवर्तन महाभारत के कृष्ण को केवल “नीति-पुरुष” या “ईश्वर” की एकरेखीय छवि से अधिक जटिल बनाता है।
विजय का सबसे कठिन क्षण
पाण्डवों ने युद्ध जीता था।
लेकिन स्त्रीपर्व में उनकी विजय उनके सामने एक प्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है।
क्योंकि जिस राज्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया— उस राज्य के चारों ओर अब विधवाएँ थीं।
उनके अपने पुत्र मारे जा चुके थे। अभिमन्यु नहीं था। द्रौपदी के पुत्र नहीं थे।
कर्ण का रहस्य अभी पूरी तरह उनके सामने नहीं आया था।
धृतराष्ट्र अपने पुत्रों से वंचित थे। गान्धारी अपने सौ पुत्रों से वंचित थीं।
कुन्ती अपने जीवन के सबसे बड़े रहस्य को हृदय में लिये खड़ी थीं।
इसलिए स्त्रीपर्व का सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है—
क्या विजय केवल विरोधी को पराजित करने का नाम है, या विजय के बाद अपने भीतर उठने वाले प्रश्नों का सामना करना भी विजय का हिस्सा है?
महाभारत इसका उत्तर नहीं थोपता। वह हमें अगला दृश्य दिखाता है।
और अगला दृश्य और भी अधिक मार्मिक है—
कुन्ती कर्ण के संबंध में वह सत्य प्रकट करने वाली हैं जिसे उन्होंने जीवन भर छिपाया था।
वहीं से पाण्डवों की विजय का अर्थ उनके लिए ही बदल जाएगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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