महाभारत — वनपर्व — गया के बाद : तीर्थयात्रा का अगला चरण
महाभारत — वनपर्व — गया के बाद : तीर्थयात्रा का अगला चरण
गया के बाद तीर्थयात्रा का स्वर बदलता है। अब कथा केवल किसी एक तीर्थ की महिमा बताने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पाण्डवों की यात्रा उन्हें ऐसे अनेक स्थलों तक ले जाती है जहाँ नदियाँ, आश्रम, ऋषि, देवकथाएँ और प्राचीन राजवंशों की स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
लेकिन यहाँ हम हर स्थान की लंबी धार्मिक कथा नहीं दोहराएँगे। जहाँ कोई नया ऐतिहासिक या दार्शनिक प्रश्न होगा, वहीं ठहरेंगे।
गया से आगे—गंगा की ओर
लोमश ऋषि पाण्डवों को आगे के तीर्थों का परिचय देते हुए उन्हें गंगा के विभिन्न पवित्र स्थलों की ओर ले जाते हैं।
यहाँ एक विशेष बात ध्यान देने योग्य है। गंगा महाभारत में पहली बार नहीं आ रही।
कथा के आरम्भ में वही गंगा—
देवी है,
भीष्म की माता है,
और शान्तनु की पत्नी है।
अब वनपर्व में वही गंगा— तीर्थ है।
यह परिवर्तन महाभारत की कथा-रचना की दृष्टि से अत्यंत रोचक है।
गंगा—एक नदी से कहीं अधिक
यदि हम केवल प्राकृतिक विज्ञान की दृष्टि से देखें तो गंगा हिमालय से निकलने वाली एक विशाल नदी-प्रणाली है।
लेकिन किसी सभ्यता के लिए नदी केवल जल नहीं होती।
वह— कृषि का आधार, आवागमन का मार्ग, बस्तियों का केंद्र, जल का स्रोत, मृत्यु और अन्त्येष्टि से जुड़ा स्थान, धार्मिक अनुष्ठानों का स्थल भी बन सकती है।
इसलिए गंगा का धार्मिक महत्त्व समझने के लिए उसके भौगोलिक महत्त्व को भी देखना आवश्यक है।
महाभारत की विशेषता
महाभारत ने गंगा को केवल भूगोल के रूप में नहीं रखा।
उसने पहले उसे व्यक्तित्व दिया।
गंगा शान्तनु के सामने एक स्त्री के रूप में आती है।
फिर वही कथा देवताओं और वसुओं से जुड़ती है।
और उसी गंगा का पुत्र आगे चलकर— देवव्रत → भीष्म बनता है।
अब जब पाण्डव गंगा के तीर्थों पर जाते हैं, तो पाठक के सामने एक ही नदी की तीन परतें उपस्थित हो जाती हैं— प्रकृति → देवी → स्मृति। यही महाभारत की कथा-शक्ति है।
लेकिन क्या गंगा को “देवी” मानना वैज्ञानिक तथ्य है?
नहीं—यहाँ हमें फिर वही शोध-पद्धति अपनानी होगी।
गंगा का नदी के रूप में अस्तित्व प्रत्यक्ष भौगोलिक तथ्य है।
गंगा को देवी मानना भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक विश्वास है।
और गंगा से जुड़ी विशिष्ट कथाएँ साहित्यिक एवं पौराणिक परंपराओं का हिस्सा हैं।
तीनों को एक-दूसरे का प्रमाण नहीं बनाया जा सकता।
लेकिन तीनों का ऐतिहासिक सह-अस्तित्व स्वयं अध्ययन का विषय है।
गंगा के तीर्थों का एक दूसरा महत्व
गंगा के किनारे अनेक आश्रमों और ऋषि-परंपराओं का वर्णन मिलता है।
इससे एक बड़ा प्रश्न निकलता है—
क्या प्राचीन भारत में तीर्थ केवल पूजा के केंद्र थे, या वे ज्ञान और शिक्षा के केंद्र भी थे?
महाभारत में आश्रमों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि तीर्थ-भूगोल और ऋषि-परंपरा कई बार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
इसलिए तीर्थयात्रा को केवल धार्मिक पर्यटन समझना महाभारतीय संदर्भ को छोटा कर देगा।
पाण्डवों की यात्रा का वास्तविक परिवर्तन
अब ध्यान दीजिए कि पाण्डव कहाँ से चले थे। उनका मूल संकट था— राज्य का खोना।
लेकिन तीर्थयात्रा में वे जिन संसारों से गुजर रहे हैं, वहाँ उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक समस्या हर जगह केंद्र में नहीं रहती।
कहीं उन्हें ऋषियों की कथा सुनाई जाती है। कहीं किसी राजा की। कहीं किसी तपस्वी की। कहीं किसी नदी की।
अर्थात्— पाण्डवों का निजी इतिहास धीरे-धीरे एक बड़े सांस्कृतिक इतिहास के भीतर रख दिया जाता है।
यह बात हमारे मूल भगवद्गीता-शोध के लिए उपयोगी है।
आगे एक महत्वपूर्ण तीर्थ—प्रयाग
गंगा की यात्रा हमें स्वाभाविक रूप से प्रयाग की ओर ले जाती है।
आज का प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।
महाभारत की तीर्थ-परंपरा में प्रयाग को अत्यंत पवित्र संगम-क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है।
गंगा और यमुना के संगम के साथ सरस्वती की अदृश्य उपस्थिति की परंपरा भी बाद में अत्यंत प्रसिद्ध हुई।
यहाँ हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात नदी नहीं, बल्कि संगम की अवधारणा है।
संगम का अर्थ
दो नदियाँ मिलती हैं। प्राकृतिक घटना है। लेकिन मनुष्य उसमें प्रतीक देखता है।
दो धाराएँ— एक जल-समूह बन जाती हैं।
इसी दृश्य को धार्मिक चेतना एक दूसरे अर्थ में पढ़ सकती है— भिन्न धाराओं का एक बिंदु पर मिलना।
लेकिन इसे जबरन कोई “आध्यात्मिक विज्ञान” कहना उचित नहीं।
यह पहले एक प्रतीकात्मक सांस्कृतिक व्याख्या है।
प्रयाग का ऐतिहासिक महत्त्व
प्रयाग का महत्त्व केवल महाभारत तक सीमित नहीं है।
बाद के भारतीय इतिहास में भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण बना रहा।
विशेष रूप से प्रयाग प्रशस्ति के कारण गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के इतिहास में प्रयाग का महत्वपूर्ण स्थान है।
इससे हमें एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य मिलता है—
प्रयाग कोई केवल साहित्यिक कल्पना का स्थान नहीं था; वह वास्तविक राजनीतिक और सांस्कृतिक भूगोल में भी महत्वपूर्ण केंद्र था।
यहाँ साहित्य और इतिहास एक-दूसरे को छूते हैं।
लेकिन एक सावधानी
आज का प्रयागराज जिस प्रकार— त्रिवेणी संगम, कुम्भ और विशाल तीर्थ-व्यवस्था
के लिए प्रसिद्ध है, उसकी पूरी वर्तमान संरचना को महाभारत-काल में उसी रूप में उपस्थित मानना उचित नहीं।
तीर्थ की पहचान पुरानी हो सकती है।
उसकी धार्मिक व्याख्या समय के साथ बढ़ सकती है।
और उसके मेले, मंदिर तथा संस्थाएँ अलग-अलग कालों में विकसित हो सकती हैं।
इसलिए फिर वही सिद्धांत: स्थान की प्राचीनता और उसकी वर्तमान धार्मिक संरचना को अलग-अलग जाँचना होगा।
अब कथा में एक नया प्रश्न - पुष्कर में हमने देखा— जल + यज्ञ + देव-परंपरा गया में— मृत्यु + पितृ + स्मृति अब प्रयाग में—
संगम + अनेक धाराएँ + साझा तीर्थ
यहाँ से तीर्थ-यात्रा हमें केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं दिखाती।
वह हमें यह भी दिखाती है कि भारतीय संस्कृति ने भौगोलिक विविधता को सांस्कृतिक संबंधों में बदलने के लिए स्थानों और कथाओं का उपयोग किया।
और पाण्डव आगे बढ़ते हैं
लोमश ऋषि उन्हें एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ की ओर ले जाते हैं।
हर जगह कोई नई कथा उनका इंतजार करती है।
लेकिन अब पाठक भी समझने लगता है कि इन कथाओं को केवल चमत्कार के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं।
कहीं कथा किसी प्राकृतिक स्थान को अर्थ देती है।
कहीं किसी पुराने राजा की स्मृति को बचाती है।
कहीं मृत्यु और पूर्वजों से संबंध स्थापित करती है।
और कहीं विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एक ही भूगोल में जोड़ देती है।
यही तीर्थ-यात्रा का वास्तविक कथात्मक विस्तार है।
आगे का पड़ाव
अब हम प्रयाग से आगे बढ़कर हिमालय और गंगा के उद्गम-क्षेत्र की ओर जाएँगे।
वहाँ कथा में पहली बार पर्वत, नदी और तपस्या एक साथ अत्यंत प्रभावशाली रूप में सामने आएँगे।
और वहीं हमें फिर गंगा–भीष्म की आरम्भिक कथा को दोहराना नहीं पड़ेगा; हम केवल यह देखेंगे कि महाभारत के तीर्थ-भूगोल में हिमालय का स्थान क्या है और पाण्डवों की यात्रा वहाँ किस उद्देश्य से पहुँचती है।
— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना
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