मैं अपने ही सवालों से अगर डर जाता,

ग़ज़ल

मैं अपने ही सवालों से अगर डर जाता,
तो शायद अपनी नज़र में भी सँवर जाता।

जिसे खोने का मुझे उम्र से ज़्यादा डर था,
वो अगर साथ रहा होता तो मैं मर जाता।

मैं अपने घर की तरफ़ लौटना तो चाहता था,
मगर हर मोड़ पे कोई नया शहर जाता।

वो एक ख़त जो मेरे पास आज भी बाक़ी है,
उसे पढ़ता तो कई साल पीछे उतर जाता।

मैं अपने हिस्से की ख़ामोशियाँ लिए बैठा,
कोई पुकारता दिल से तो मैं ठहर जाता।

बहुत करीब था मंज़र, मगर समझ न सका,
ज़रा-सा और जो रुकता तो देख पाता।

मेरी हथेली में कुछ रेखाएँ अधूरी थीं,
उन्हें पढ़ता तो शायद ख़ुद को पढ़ पाता।

कई मकान बनाए, कई शहर बदले मैंने,
मगर जहाँ मेरा दिल था, वहीं न घर पाया।

जो लोग मेरे थे, उनसे ही दूर होता गया,
किसी को अपना समझता तो कुछ बचा पाता।

अब इस मुकाम पे आकर यही समझ आया
जो वक़्त बीत गया, उसको कौन लौटा पाता।

मुकेश

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