महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–५ : धृतराष्ट्र का आलिंगन — क्रोध के भीतर छिपा हुआ शोक

 महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–५ : धृतराष्ट्र का आलिंगन — क्रोध के भीतर छिपा हुआ शोक

कुरुक्षेत्र की मृत्यु अभी समाप्त नहीं हुई थी।

युद्धभूमि पर पड़े शवों के बाद अब मृत्यु मनुष्यों के भीतर प्रवेश कर चुकी थी।

धृतराष्ट्र अपने सौ पुत्रों को खो चुके थे। पाण्डव उनके सामने आने वाले थे।

बाहर से यह एक पारिवारिक मिलन था।

लेकिन भीतर एक पिता का शोक था, और उसी शोक के भीतर वर्षों का मोह, क्रोध और असहायता।

धृतराष्ट्र और पाण्डव

जब पाण्डव धृतराष्ट्र के सामने पहुँचे, तब युधिष्ठिर ने स्वयं को उनके सामने प्रस्तुत किया।

धृतराष्ट्र ने उन्हें स्वीकार किया। लेकिन जब भीम का नाम आया, तब स्थिति बदल गई।

भीम वही व्यक्ति था जिसने युद्ध में दुर्योधन को गदा-युद्ध में पराजित किया था और दुःशासन का वध किया था।

धृतराष्ट्र के लिए भीम केवल भतीजा नहीं था। वह उनके पुत्रों के विनाश से जुड़ा हुआ व्यक्ति था।

शोक ने उनके भीतर एक तीव्र आवेग उत्पन्न कर दिया।

और तभी कृष्ण ने स्थिति को समझ लिया। 

कृष्ण का सूक्ष्म हस्तक्षेप

धृतराष्ट्र ने भीम को आलिंगन करने की इच्छा व्यक्त की। कृष्ण जानते थे कि यह सामान्य आलिंगन नहीं हो सकता।

धृतराष्ट्र अत्यन्त शक्तिशाली थे।

उनकी भुजाओं में इतनी शक्ति थी कि यदि क्रोध में उन्होंने भीम को दबाया, तो भीम की मृत्यु संभव थी।

इसलिए कृष्ण ने वास्तविक भीम के स्थान पर लोहे की भीम-प्रतिमा आगे कर दी।

धृतराष्ट्र ने उसे आलिंगन में जकड़ लिया।

क्रोध और शोक के आवेग में उन्होंने उस प्रतिमा को चूर कर दिया।

क्षण भर बाद उन्हें समझ आया कि उन्होंने क्या किया है। उनका क्रोध टूट गया।

और उसके पीछे छिपा हुआ पिता का शोक बाहर आ गया।

यह प्रसंग इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?

यदि इस घटना को केवल एक चमत्कार मानकर आगे बढ़ जाएँ, तो इसके भीतर का मनोविज्ञान छूट जाता है।

धृतराष्ट्र की स्थिति को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है— पिता → शोक → क्रोध।

शोक जब असहनीय हो जाता है, तो कभी-कभी वह क्रोध का रूप ले लेता है।

क्रोध का लक्ष्य भीम था। लेकिन मूल पीड़ा पुत्र-वियोग थी।

इसलिए जब प्रतिमा टूट गई, तब धृतराष्ट्र का क्रोध भी टूट गया।

अंधत्व का एक और अर्थ

धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे।

महाभारत ने उनके अंधत्व को अनेक स्तरों पर प्रयुक्त किया है।

वे आँखों से नहीं देख सकते थे।

लेकिन उनके चरित्र में एक दूसरा अंधत्व भी दिखाई देता है—

पुत्र-मोह का अंधत्व।

उन्होंने दुर्योधन के अनेक अनुचित कर्मों को जानते हुए भी उसके प्रति अपने मोह को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया।

विदुर ने समझाया। भीष्म ने समझाया।

द्रोण, संजय और अन्य लोगों ने भी परिस्थितियों की गंभीरता बताई।

कृष्ण स्वयं शान्ति का प्रस्ताव लेकर आए। फिर भी धृतराष्ट्र अपने पुत्र को रोक नहीं सके।

अब वही मोह उनके सामने विनाश बनकर खड़ा था।

लेकिन क्या केवल धृतराष्ट्र दोषी थे?

महाभारत की जटिलता यहाँ भी बनी रहती है।

यदि धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को रोका होता तो घटनाएँ बदल सकती थीं—यह एक संभावित ऐतिहासिक-कथात्मक प्रश्न है।

लेकिन युद्ध का निर्माण केवल एक व्यक्ति के निर्णय से नहीं हुआ।

दुर्योधन की महत्वाकांक्षा, शकुनि की भूमिका, कर्ण की निष्ठा, सभा की राजनीति, द्रौपदी का अपमान, पाण्डवों के साथ हुए अन्याय, धृतराष्ट्र की निष्क्रियता और अनेक अन्य घटनाएँ मिलकर उस स्थिति तक पहुँचीं।

इसलिए महाभारत की त्रासदी को केवल एक व्यक्ति की भूल में सीमित करना उसके पूरे घटनाक्रम को सरल बना देना होगा।

भीम का बच जाना

कृष्ण ने भीम को बचाया।

लेकिन इस प्रसंग में कृष्ण का महत्व केवल “चमत्कार करने वाले” व्यक्ति के रूप में नहीं है।

उन्होंने परिस्थिति को पहले पहचाना। उन्होंने धृतराष्ट्र की मनःस्थिति को समझा।

उन्होंने संभावित परिणाम का अनुमान लगाया।

और उन्होंने ऐसा उपाय किया जिसमें धृतराष्ट्र का शोक भी व्यक्त हो सके और भीम का जीवन भी बचा रहे।

यह कृष्ण की उस भूमिका को सामने लाता है जिसे हम पहले भी देखते आए हैं—

जहाँ प्रत्यक्ष संघर्ष को रोकने के लिए सूक्ष्म हस्तक्षेप आवश्यक हो, वहाँ कृष्ण प्रत्यक्ष युद्ध से अधिक मनुष्य की मनःस्थिति को पढ़ते हैं।

धृतराष्ट्र का परिवर्तन

प्रतिमा टूटने के बाद धृतराष्ट्र का क्रोध समाप्त होता है। अब उनके भीतर पश्चात्ताप और करुणा उभरती है।

वे पाण्डवों को स्वीकार करते हैं। यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म बात दिखाई देती है—

धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को पहले भी अपना परिवार माना था, लेकिन पुत्र-मोह ने उस पारिवारिक दृष्टि को बार-बार ढँक दिया था।

अब जब उनका अपना पुत्र-वर्ग समाप्त हो गया, तो वही पारिवारिक सत्य अधिक स्पष्ट हो जाता है।

मोह हटने के बाद संबंध दिखाई देने लगते हैं।

गान्धारी और पाण्डव

इसके बाद पाण्डव गान्धारी के पास जाते हैं। गान्धारी का शोक अभी शांत नहीं हुआ है।

उनके सामने सौ पुत्रों का विनाश है। उनके मन में पाण्डवों के प्रति भी पीड़ा है।

लेकिन युधिष्ठिर उनके सामने आते हैं। 

यह दृश्य महाभारत के सबसे मानवीय क्षणों में से एक बन जाता है।

विजेता सिर झुकाकर शोकाकुल माता के सामने खड़ा है।

और शोकाकुल माता के सामने विजेता होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

अगले भाग में

गान्धारी की दृष्टि युधिष्ठिर के पैरों पर पड़ती है।

फिर एक ऐसी घटना घटती है जिसे महाभारत अत्यन्त सूक्ष्म ढंग से प्रस्तुत करता है—गान्धारी के क्रोध की ऊर्जा और युधिष्ठिर के नाखून का काला पड़ जाना।

यह प्रसंग हमें एक और प्रश्न तक ले जाएगा—

क्या महाभारत शाप और क्रोध को केवल अलौकिक शक्ति के रूप में देखता है, या इनके पीछे मनुष्य की तीव्र मानसिक अवस्था का भी कोई संकेत छिपा है?

इसके बाद गान्धारी का ध्यान अर्जुन, भीम और अन्य पाण्डवों की ओर जाएगा और स्त्रीपर्व का शोक धीरे-धीरे नैतिक प्रश्न और भविष्य के विनाश की ओर बढ़ेगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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