महाभारत — भीष्मपर्व — कुरुक्षेत्र : युद्ध के पहले का मौन
महाभारत — भीष्मपर्व — कुरुक्षेत्र : युद्ध के पहले का मौन
उद्योगपर्व में शांति का अंतिम प्रयास विफल हो चुका था। कृष्ण हस्तिनापुर गए। उन्होंने समझाया।
संधि का प्रस्ताव रखा गया। पाण्डवों ने अपने अधिकार को न्यूनतम सीमा तक घटा दिया।
पाँच गाँव।
दुर्योधन इसके लिए भी तैयार नहीं हुआ।
अब वह क्षण आ गया था जहाँ शब्दों की सीमा समाप्त हो चुकी थी।
दोनों पक्ष युद्ध के लिए तैयार होने लगे।
दो सेनाएँ, एक वंश
कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ एकत्रित होती हैं।
एक ओर कौरवों की विशाल सेना। दूसरी ओर पाण्डवों की सेना।
यह केवल दो राजाओं की सेनाएँ नहीं हैं। एक ही वंश के लोग दो ओर खड़े हैं।
भीष्म कौरव-पक्ष में हैं। द्रोण कौरव-पक्ष में हैं। कृपाचार्य कौरव-पक्ष में हैं। कर्ण दुर्योधन के पक्ष में है।
और दूसरी ओर— अर्जुन। भीम। युधिष्ठिर। नकुल। सहदेव। द्रौपदी के पुत्र। अभिमन्यु। और उनके साथ कृष्ण।
युद्ध की सबसे बड़ी विडम्बना यही है— शत्रु बाहर से नहीं आया है।
शत्रु वही है जिसे कभी अपना कहा गया था।
कृष्ण ने शस्त्र क्यों नहीं उठाया?
उद्योगपर्व का वह प्रसंग यहाँ अपना वास्तविक अर्थ प्राप्त करता है।
कृष्ण ने दोनों पक्षों को विकल्प दिया था— एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना,
दूसरी ओर— निःशस्त्र कृष्ण। अर्जुन ने कृष्ण को चुना। दुर्योधन ने सेना।
अब वही निर्णय कुरुक्षेत्र में सामने है। कृष्ण के हाथ में अस्त्र नहीं है।
उनके हाथ में है— सारथि की लगाम।
यह छोटा-सा परिवर्तन आगे आने वाली पूरी गीता को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
कृष्ण युद्ध नहीं लड़ रहे। लेकिन वे उस व्यक्ति के साथ हैं जिसे युद्ध करना है।
युद्ध प्रारम्भ होने से पहले
दोनों सेनाएँ सज चुकी हैं। शंख बजते हैं। ध्वज फहराते हैं।
योद्धा अपने-अपने स्थान पर खड़े हैं। तभी अर्जुन कृष्ण से कहते हैं— “सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।”
अर्थात्— हे अच्युत! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए।
यह केवल युद्ध-व्यवस्था का निर्देश नहीं है।
यही वह क्षण है जहाँ महाभारत की पूरी बाहरी कथा अचानक अर्जुन के भीतर प्रवेश करती है।
अर्जुन क्या देखता है?
कृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाते हैं। अर्जुन सामने देखता है। वहाँ केवल सैनिक नहीं हैं।
वहाँ हैं— भीष्म। द्रोण। कृपाचार्य। भाई। बन्धु। मित्र। गुरु। पितामह। और अचानक युद्ध का अर्थ बदल जाता है।
कुछ क्षण पहले तक सामने— शत्रु-सेना थी।
अब दिखाई देता है— अपना परिवार। यहीं अर्जुन का मन टूटता है।
यह विषाद अचानक क्यों नहीं आया?
यही हमारे शोध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है।
यदि हम केवल गीता पढ़ें, तो अर्जुन का विषाद अचानक घटित होता हुआ दिखाई दे सकता है।
लेकिन हमने महाभारत की पिछली कथा में देखा— द्यूत हुआ। द्रौपदी का अपमान हुआ। वनवास हुआ।
अज्ञातवास हुआ। शांति के प्रयास हुए। पाँच गाँव तक की बात पहुँची। फिर भी युद्ध की स्थिति बनी।
अर्जुन ने इन सबको देखा था।
लेकिन निर्णायक क्षण तब आया जब उसे वास्तव में उन लोगों के सामने खड़ा होना पड़ा जिन्हें मारना था।
इसलिए— अर्जुन का विषाद युद्ध के विरोध का सामान्य भाव नहीं है।
यह कर्तव्य और आत्मीयता के टकराव का चरम है।
6. गाण्डीव का गिरना
अर्जुन का शरीर काँपने लगता है। मुख सूखता है। रोमांच होता है। गाण्डीव हाथ से ढीला पड़ता है।
वह कृष्ण से कहता है कि— मुझे विजय नहीं चाहिए। राज्य नहीं चाहिए। भोग नहीं चाहिए।
यदि इनके लिए अपने ही लोगों को मारना पड़े तो ऐसी विजय किस काम की?
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
अर्जुन युद्ध से इसलिए नहीं डर रहा कि सामने उससे अधिक शक्तिशाली सेना है।
वह इसलिए टूट रहा है क्योंकि— उसके लिए विजय का अर्थ बदल गया है।
अब विजय = अपने लोगों की मृत्यु। और यही मानसिक परिवर्तन उसे युद्ध से विमुख करता है।
अब हमारा वास्तविक शोध-प्रश्न
यहीं से हमारा अध्ययन अपने सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रवेश करता है।
कृष्ण अर्जुन को क्या उत्तर देंगे? लेकिन उससे भी पहले हमें पूछना चाहिए— अर्जुन का प्रश्न वास्तव में क्या है?
क्या वह केवल युद्ध करने या न करने का प्रश्न है?
या—
धर्म बनाम करुणा?, कर्तव्य बनाम संबंध?, व्यक्ति बनाम समाज?, जीवन बनाम मृत्यु?, कर्म बनाम कर्मफल?, नैतिक निर्णय बनाम व्यक्तिगत भावुकता?
यदि ऐसा है, तो भगवद्गीता केवल युद्ध के समय दिया गया उपदेश नहीं रह जाती।
वह बन जाती है— एक ऐसे मनुष्य के लिए उत्तर की खोज, जो सही और गलत के बीच नहीं, बल्कि दो दिखाई देने वाले सत्यों के बीच फँस गया है।
यहीं से भगवद्गीता
अब तक की पूरी महाभारत एक विशाल पृष्ठभूमि बन चुकी है।
राजनीति ने प्रश्न पैदा किया।
परिवार ने उसे जटिल बनाया।
धर्म-संकट ने उसे गहरा किया।
युद्ध ने उसे अपरिहार्य बना दिया।
और अर्जुन के भीतर वह प्रश्न अंतिम रूप से फूट पड़ा।
कृष्ण का उत्तर इसी प्रश्न से आरम्भ होगा।
इसलिए हमारी शोध-दृष्टि से—
गीता युद्ध के मैदान में कही गई है, लेकिन उसका वास्तविक विषय युद्ध नहीं है।
उसका आरम्भिक विषय है—
“ऐसी परिस्थिति में मनुष्य क्या करे, जब उसका कर्तव्य स्वयं उसके हृदय के विरुद्ध खड़ा दिखाई दे?”
और यहीं से—
भगवद्गीता का आरम्भ होता है।
आगे की हमारी पद्धति
अब हम गीता को सीधे 18 अध्यायों में सामान्य टीका की तरह नहीं पढ़ेंगे।
पहले—
भीष्मपर्व में गीता का स्थान
→ अर्जुन-विषाद की वास्तविक प्रकृति
→ कृष्ण की पहली प्रतिक्रिया
→ फिर प्रथम अध्याय से श्लोक-दर-श्लोक प्रवेश।
और प्रत्येक अध्याय में हम तीन स्तर साथ रखेंगे:
मूल संस्कृत → सरल अर्थ → शोधात्मक विवेचन।
जहाँ आवश्यक होगा वहाँ उपनिषद्, सांख्य, योग, महाभारत के अन्य प्रसंग और बाद की दार्शनिक परंपराओं से तुलना करेंगे—लेकिन बिना अनावश्यक दोहराव के।
— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना
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