महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २३ : योग — चित्त की गति को साधने की विद्या

 महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २३ : योग — चित्त की गति को साधने की विद्या

सांख्य ने मनुष्य को यह समझने का प्रयास किया कि जीवन में कौन-से तत्त्व कार्य कर रहे हैं और उनके बीच क्या भेद है। अब प्रश्न है—उस समझ को जीवन की अनुभूति कैसे बनाया जाए?

यहीं से शान्तिपर्व में योग का प्रवेश होता है।

यदि मनुष्य जानता है कि क्रोध उसे भीतर से विचलित करता है, फिर भी क्रोध के क्षण में स्वयं को रोक नहीं पाता, तो केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं हुआ। यदि वह जानता है कि इच्छा अनन्त है, फिर भी प्रत्येक इच्छा के पीछे दौड़ता रहता है, तो बौद्धिक समझ अभी जीवन में रूपान्तरित नहीं हुई।

योग इसी दूरी को कम करने का प्रयत्न है।

योग का क्षेत्र शरीर से अधिक मन है

योग को केवल आसन या शारीरिक अभ्यास मानना शान्तिपर्व के संदर्भ को बहुत छोटा कर देगा।

यहाँ योग मुख्यतः चित्त, इन्द्रिय, श्वास, ध्यान और अन्तर्मुखता की साधना है।

मनुष्य की सामान्य चेतना निरन्तर बाहर की ओर बहती रहती है। आँख दृश्य की ओर, कान ध्वनि की ओर, जिह्वा स्वाद की ओर, मन स्मृति और कल्पना की ओर तथा बुद्धि निर्णय और योजना की ओर सक्रिय रहती है।

योग इस प्रवाह को जबरन नष्ट नहीं करता।

वह पहले उसे देखना सिखाता है।

फिर उसे नियंत्रित करना।

और अन्ततः उसे ऐसी स्थिरता तक ले जाना चाहता है जहाँ मन स्वयं साधक के लिए बाधा न रह जाए।

इन्द्रियों से मन की ओर

शान्तिपर्व के योगविचार में इन्द्रियसंयम को अत्यन्त महत्व दिया गया है।

इन्द्रियाँ अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं। मन उनके अनुभवों को जोड़ता है। विषयों की स्मृति फिर नई इच्छा को जन्म देती है। इच्छा पुनः मन को उसी विषय की ओर ले जाती है।

इस चक्र को समझे बिना ध्यान सम्भव नहीं।

इसीलिए योग का पहला कार्य संसार छोड़ना नहीं, बल्कि इन्द्रियों और मन के बीच चलने वाली स्वचालित प्रतिक्रिया को पहचानना है।

किसी वस्तु को देखना एक बात है। उसे देखकर तत्काल इच्छा उत्पन्न होना दूसरी।

इच्छा को अपना आदेश मान लेना तीसरी। योग इन तीनों अवस्थाओं के बीच अन्तर पैदा करता है।

प्रत्याहार — भीतर लौटने की क्षमता

योग की साधना में एक महत्वपूर्ण अवस्था है—प्रत्याहार।

इन्द्रियों का विषयों से पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि विषयों पर उनकी निर्भरता का क्षय।

जैसे कछुआ आवश्यकता पड़ने पर अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही साधक आवश्यकता पड़ने पर इन्द्रियों को भीतर की ओर लौटा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि वह संसार को देखना बन्द कर देता है।

अर्थ यह है कि संसार उसके मन को अपनी इच्छा से संचालित नहीं करता।

यही अन्तर साधारण जीवन और साधित जीवन के बीच है। 

सामान्य मनुष्य कहता है— “मुझे यह दिखाई दिया, इसलिए मैं आकर्षित हुआ।”

योगी धीरे-धीरे उस क्रम को उलटता है— “मैंने देखा; आकर्षण उत्पन्न हुआ; मैंने आकर्षण को भी देखा।”

यहाँ देखने वाला और देखे जाने वाले के बीच दूरी बनने लगती है।

धारणा — मन को एक दिशा देना

मन की सबसे बड़ी समस्या उसका चंचल होना मात्र नहीं है।

उसकी समस्या यह है कि वह एक क्षण में अनेक दिशाओं में बिखर जाता है।

एक विचार दूसरे को जन्म देता है। स्मृति से कल्पना आती है। कल्पना से इच्छा। इच्छा से भय। भय से भविष्य की योजना। फिर कोई पुरानी घटना स्मृति में लौट आती है।

मनुष्य वर्तमान में बैठा होता है, लेकिन उसका मन अतीत और भविष्य में घूम रहा होता है।

योग इस बिखराव को धारणा के द्वारा सीमित करता है।

किसी एक विषय, मन्त्र, श्वास, प्रतीक या आत्मविचार पर मन को स्थिर रखना—मन को एकाग्र होने का अभ्यास देता है।

धारणा का उद्देश्य केवल ध्यान में सुविधा प्राप्त करना नहीं है।

वह मन को यह सिखाती है कि—

विचार मेरे भीतर उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन प्रत्येक विचार का अनुसरण करना आवश्यक नहीं।

यह आत्म-अनुशासन की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है।

ध्यान — प्रयत्न से सहजता की ओर

जब मन बार-बार एक ही विषय पर लौटने लगता है, तब धारणा धीरे-धीरे ध्यान में बदलती है।

धारणा में साधक मन को बार-बार वापस लाता है।

ध्यान में लौटाने का प्रयत्न कम होता जाता है।

विषय और मन के बीच एक निरन्तरता उत्पन्न होती है।

यही कारण है कि ध्यान केवल आँखें बन्द करके बैठ जाना नहीं है।

यदि शरीर स्थिर है लेकिन मन में इच्छाओं, भय, योजनाओं और स्मृतियों का तूफान चल रहा है, तो बाहरी स्थिरता को ध्यान नहीं कहा जा सकता।

ध्यान का वास्तविक क्षेत्र चित्त की निरन्तरता है।

प्राण और मन

शान्तिपर्व में योग के प्रसंगों में प्राण की साधना का भी उल्लेख मिलता है।

प्राचीन योगपरम्परा में श्वास और मन को परस्पर सम्बद्ध माना गया। जब मन उत्तेजित होता है तो श्वास की गति भी बदलती है; और श्वास को नियमित करने से मन की उत्तेजना कम की जा सकती है।

इसे आधुनिक विज्ञान के सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा, क्योंकि प्राचीन योग की “प्राण” अवधारणा आधुनिक जैव-विज्ञान के “ऑक्सीजन” या केवल श्वसन-क्रिया के समान नहीं है।

लेकिन अनुभव की दृष्टि से श्वास पर ध्यान देने की साधना मन को वर्तमान क्षण में स्थिर करने का एक व्यावहारिक माध्यम बन सकती है।

इसलिए योग में प्राणायाम केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है।

उसका लक्ष्य अन्ततः चित्त की स्थिरता है।

ध्यान में सबसे बड़ा अवरोध

योग की कठिनाई बाहरी संसार नहीं है। सबसे बड़ा अवरोध स्वयं मन की आदतें हैं।

कामना कहती है—“यह चाहिए।” स्मृति कहती है—“ऐसा पहले हुआ था।”

भय कहता है—“आगे ऐसा हो सकता है।” अहंकार कहता है—“मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”

और मन प्रत्येक आवाज को अपना सत्य मान लेता है।

योग इन आवाजों को दबाने के बजाय उन्हें पहचानना सिखाता है।

विचार आया—उसे देखा।

इच्छा आई—उसे देखा।

क्रोध आया—उसे देखा।

भय आया—उसे देखा।

और फिर मन को उसी विचार के पीछे बह जाने से रोका।

यहीं साक्षीभाव साधना का उपकरण बन जाता है।

यहाँ पिछली चर्चा की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसका व्यावहारिक रूप सामने आता है—साक्षीभाव अब दार्शनिक अवधारणा नहीं रहता; वह अभ्यास बन जाता है।

समाधि — चित्त की गहरी स्थिरता

योग की चरम अवस्थाओं का वर्णन करते हुए शान्तिपर्व में मन के पूर्ण निग्रह और आत्मस्थिति की चर्चा आती है।

समाधि को केवल बेहोशी या विचारशून्यता समझना उचित नहीं।

वह ऐसी अवस्था है जिसमें चित्त की सामान्य चंचलता अत्यन्त क्षीण हो जाती है और साधक का ध्यान बाहरी विषयों से हटकर अपने मूल आधार की ओर स्थिर होता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।

महाभारत में योग की अनेक धाराएँ मिलती हैं। इसलिए समाधि की एक ही तकनीकी परिभाषा सम्पूर्ण शान्तिपर्व पर आरोपित करना उचित नहीं होगा। कहीं ध्यान, कहीं प्राणायाम, कहीं इन्द्रियनिग्रह और कहीं आत्मचिन्तन को प्रमुखता दी गई है।

अर्थात् योग एक ही पद्धति नहीं, साधना की अनेक परम्पराओं का व्यापक क्षेत्र है।

योग और सांख्य का सम्बन्ध

यहीं शान्तिपर्व की दार्शनिक समृद्धि सामने आती है।

सांख्य पूछता है— वास्तविकता की संरचना क्या है?

योग पूछता है— उस सत्य को जीवन में अनुभव करने के लिए चित्त को कैसे तैयार किया जाए?

सांख्य विवेक देता है। योग अनुशासन देता है।

सांख्य तत्त्वों को अलग-अलग देखने की दृष्टि देता है।

योग मन की उस प्रवृत्ति पर काम करता है जो बार-बार उन्हीं तत्त्वों के साथ तादात्म्य बना लेती है।

इसलिए दोनों को केवल विरोधी दर्शन के रूप में देखना शान्तिपर्व की व्यापकता को समझने में बाधा डाल सकता है।

योग का नैतिक आधार

योग केवल ध्यान-कक्ष की साधना नहीं है।

यदि साधक ध्यान में शान्त बैठता है लेकिन बाहर निकलते ही छल, हिंसा, लोभ और क्रोध में डूब जाता है, तो उसकी साधना अधूरी है।

इसीलिए शान्तिपर्व में सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया, संयम और अपरिग्रह जैसी वृत्तियों को योगमार्ग से जोड़ा जाता है।

इनका उद्देश्य केवल सामाजिक नैतिकता नहीं है।

मनुष्य जैसा व्यवहार करता है, वैसा ही उसका चित्त बनता जाता है।

झूठ बोलने वाला मन अपने ही कथनों को छिपाने में ऊर्जा खर्च करता है।

लोभी मन निरन्तर तुलना करता है।

क्रोधी मन घटनाओं को शत्रुता की दृष्टि से देखने लगता है।

हिंसक मन दूसरे को वस्तु की तरह देखने लगता है।

इसके विपरीत सत्य और संयम चित्त में एक प्रकार की आन्तरिक सरलता पैदा करते हैं।

इसलिए योग की नैतिकता बाहर से थोपी गयी व्यवस्था नहीं है।

वह चित्त की स्वच्छता की तैयारी है।

योग का लक्ष्य

अब योग के लक्ष्य को केवल मानसिक शान्ति कह देना पर्याप्त नहीं होगा।

शान्ति योग का परिणाम हो सकती है, लेकिन शान्तिपर्व की दृष्टि में अन्तिम उद्देश्य उससे आगे है।

मन को स्थिर करके साधक उस ज्ञान के लिए तैयार होता है जिसमें स्वयं और संसार के सम्बन्ध को अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा सके।

इसीलिए योग का अन्त केवल ध्यान में नहीं होता। वह विवेकपूर्ण जीवन में दिखाई देना चाहिए।

जो ध्यान में शान्त है लेकिन व्यवहार में असंयमी है, उसकी साधना अभी अधूरी है।

जो कठिन परिस्थिति में भी अपने चित्त को देख सकता है, प्रतिक्रिया और निर्णय के बीच थोड़ी-सी जगह बना सकता है, वही योग की वास्तविक दिशा में आगे बढ़ रहा है।

शान्तिपर्व का अगला मोड़

अब तक हमारी यात्रा राजधर्म से मोक्षधर्म तक पहुँच चुकी है।

राज्य के अनुशासन से व्यक्ति के अनुशासन तक, वैराग्य से आत्मविचार तक, आत्मविचार से प्रकृति के अध्ययन तक और वहाँ से योग की साधना तक।

लेकिन अभी एक निर्णायक प्रश्न बाकी है—

योगी जब मन को साध लेता है, तब उसके लिए मृत्यु का अर्थ क्या रह जाता है?

क्या मृत्यु शरीर का अन्त मात्र है?

मृत्यु के समय इन्द्रियाँ, मन और प्राण किस प्रकार अलग होते हैं?

जीव अपनी पूर्ववृत्तियों को कैसे लेकर आगे बढ़ता है?

और यदि पुनर्जन्म है, तो उस यात्रा में कर्म और संस्कार की क्या भूमिका है?

शान्तिपर्व अब मृत्यु, देहत्याग और जीव की गति के अत्यन्त गहन प्रश्न में प्रवेश करता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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