महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४७ अभिमन्यु का अंतिम संघर्ष : जब युद्ध ने अपने ही नियमों को तोड़ दिया

 महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४७

अभिमन्यु का अंतिम संघर्ष : जब युद्ध ने अपने ही नियमों को तोड़ दिया

तेरहवें दिन का युद्ध अब उस बिन्दु पर पहुँच चुका था जहाँ वीरता और युद्धनीति के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया था।

अभिमन्यु का धनुष काट दिया गया। उसका रथ नष्ट हो चुका था।
घोड़े और सारथि मारे जा चुके थे। तलवार और ढाल भी नष्ट हो चुके थे।
और उसके हाथ में बचा था—एक रथ का पहिया।

भाग ४६ में हमने देखा कि यह पहिया केवल एक टूटा हुआ रथचक्र नहीं था। वह उस क्षण एक योद्धा के पास बची हुई अंतिम प्रतिरोध-शक्ति था।

अब प्रश्न यह था— क्या निहत्थे हो चुके अभिमन्यु को युद्धभूमि में एक योद्धा की तरह लड़ने दिया जाएगा?

यहीं से द्रोणपर्व की कथा केवल अभिमन्यु-वध की कथा नहीं रह जाती।
यह युद्ध के धर्म की परीक्षा बन जाती है।

रथचक्र हाथ में लेकर अभिमन्यु

अभिमन्यु ने रथ का पहिया उठा लिया और द्रोण की ओर बढ़ा।

यह दृश्य महाभारत की युद्ध-कथा के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में से एक है। बाद की परम्परा ने इसे लगभग प्रतीक बना दिया—एक ऐसा योद्धा जिसके पास अब कोई व्यवस्थित शस्त्र नहीं था, फिर भी वह पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था।

द्रोणपर्व के वर्णन में उसके हाथ में उठे चक्र की तुलना अत्यन्त प्रभावशाली रूप में की गई है। वह युद्धभूमि में ऐसा दिखाई देता है मानो स्वयं कोई दिव्य शक्ति शस्त्र लेकर आगे बढ़ रही हो। उसके सामने उपस्थित योद्धाओं को उसका यह रूप भयभीत करता है। 

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।

अभिमन्यु अभी भी जीवित है। उसकी युद्धक्षमता समाप्त नहीं हुई है।

उसके पास अब धनुष नहीं है, लेकिन उसकी इच्छाशक्ति और शारीरिक सामर्थ्य शेष है।

और यही कारण है कि उसके विरोधियों को उसे रोकने के लिए फिर सामूहिक प्रयास करना पड़ता है।

रथचक्र भी टूट गया

अभिमन्यु जिस चक्र को लेकर आगे बढ़ता है, कौरव योद्धा उसे भी अपने अस्त्रों से काट देते हैं।

अब अभिमन्यु के पास धनुष नहीं। रथ नहीं। घोड़े नहीं। सारथि नहीं। तलवार नहीं। ढाल नहीं। रथचक्र भी नहीं।

फिर भी वह रुकता नहीं। वह गदा उठा लेता है।

यहीं कथा का अगला चरण आरम्भ होता है।

द्रोणपर्व के वर्णन में अभिमन्यु गदा लेकर अश्वत्थामा की ओर बढ़ता है। अश्वत्थामा उसके आक्रमण से बचने के लिए अपने रथ से हट जाता है। अभिमन्यु की गदा से उसके रथ और उसके घोड़ों को भारी क्षति पहुँचती है। इसके बाद अभिमन्यु अन्य योद्धाओं पर भी आक्रमण करता है। 

यह तथ्य लोकप्रिय कथा की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।

अभिमन्यु केवल करुणा उत्पन्न करने वाला असहाय बालक बनकर नहीं मरता।

वह अन्तिम क्षण तक सक्रिय योद्धा बना रहता है।

अभिमन्यु और दुःशासन-पुत्र

अब उसके सामने आता है—दुःशासन का पुत्र। दोनों के हाथों में गदा है।

युद्धभूमि में दो योद्धा आमने-सामने खड़े हैं। यहाँ कथा का स्वर अचानक बदल जाता है।

कुछ क्षण पहले तक अनेक महारथी एक अकेले योद्धा को घेरकर उसके अस्त्र समाप्त कर रहे थे। अब संघर्ष दो योद्धाओं के बीच गदा-युद्ध का रूप ले लेता है।

दोनों एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं। अन्ततः दोनों गदा के प्रहार से भूमि पर गिर पड़ते हैं।

और यहीं वह क्षण आता है जिसने अभिमन्यु-वध को महाभारत के सबसे विवादास्पद युद्ध-प्रसंगों में स्थान दिया।

दुःशासन-पुत्र पहले उठता है। अभिमन्यु अभी उठ ही रहा था।

और उसी अवस्था में उसके मस्तक पर गदा का प्रहार किया जाता है।

द्रोणपर्व के उपलब्ध पाठ में यह घटना इसी प्रकार आती है—दुःशासन-पुत्र पहले उठकर अभिमन्यु के उठने से पहले उसके सिर पर गदा से प्रहार करता है। 

इस प्रकार अभिमन्यु का जीवन समाप्त होता है।

लेकिन वास्तविक शोध-प्रश्न यहीं से आरम्भ होता है

लोकप्रिय स्मृति में इसे प्रायः इस रूप में कहा जाता है— 

“सात महारथियों ने मिलकर एक बालक को मार डाला।”

लेकिन शोध के लिए यह वाक्य पर्याप्त नहीं है। हमें तीन अलग-अलग स्तरों को अलग करना होगा—

मूल पाठ → युद्ध की वास्तविक घटनात्मक संरचना → बाद की लोक-स्मृति।

मूल पाठ में अनेक महारथियों द्वारा अभिमन्यु को घेरना, उसके अस्त्रों का क्रमशः नष्ट किया जाना और अन्ततः दुःशासन-पुत्र द्वारा गदा से उसका वध—इन घटनाओं का वर्णन मिलता है। 

लेकिन “सात योद्धाओं ने मिलकर एक ही समय में उसे मारा” जैसी लोकप्रिय संक्षिप्त अभिव्यक्ति पूरे घटनाक्रम की जटिलता को समेट देती है।

इसलिए शोध में कथा को नारे में बदलने से बचना आवश्यक है।

युद्ध-धर्म की पहली परीक्षा

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न है—

क्या एक साथ अनेक महारथियों द्वारा एक योद्धा को घेरना युद्ध-धर्म के अनुरूप था?

इस प्रश्न का उत्तर केवल आधुनिक नैतिकता से नहीं दिया जा सकता।

हमें उस समय की युद्ध-व्यवस्था को समझना होगा।

महाभारत का युद्ध केवल व्यक्तिगत द्वंद्वों का क्रम नहीं था। इसमें विशाल सेनाएँ, व्यूह, रथी, महारथी, गज, अश्व और पदाति—सभी सम्मिलित थे।

फिर भी महाभारत बार-बार युद्ध के नियमों की चर्चा करता है।

इसीलिए अभिमन्यु-वध का प्रसंग इतना महत्वपूर्ण बन जाता है।

क्योंकि यहाँ समस्या केवल यह नहीं है कि— अभिमन्यु मारा गया।

समस्या यह है कि—

उसे जिस क्रम में युद्ध से बाहर किया गया, क्या वह स्वयं महाभारत द्वारा स्थापित युद्ध-मर्यादाओं के अनुरूप था?

द्रोण की भूमिका

यहाँ द्रोणाचार्य की भूमिका सबसे अधिक जटिल हो जाती है।

वे अभिमन्यु की असाधारण युद्धक्षमता को जानते थे।

द्रोण ने स्वयं पहले उसकी वीरता को स्वीकार किया था। और जब अभिमन्यु को रोकना कठिन हुआ, तब उसकी शक्ति को समाप्त करने के लिए रणनीति अपनाई गई।

परम्परागत पाठ में कर्ण द्वारा पीछे से अभिमन्यु का धनुष काटे जाने की घटना आती है और द्रोण उसके धनुष, घोड़ों तथा पार्श्व-सुरक्षा को नष्ट करने की रणनीति बताते हैं। (Green Message)

यहाँ एक गहरी विडम्बना दिखाई देती है—

द्रोणाचार्य युद्ध के आचार्य हैं,
और उन्हीं की युद्धनीति एक ऐसे प्रसंग को जन्म देती है जिसमें युद्ध-मर्यादा स्वयं प्रश्न बन जाती है।

यही द्रोणपर्व की केंद्रीय त्रासदी है।

अभिमन्यु : व्यक्ति से अधिक एक प्रश्न

यदि हम अभिमन्यु को केवल “वीर बालक” के रूप में देखते हैं तो कथा भावुक हो जाती है।

यदि हम उसे केवल “युद्ध में मारा गया योद्धा” मानते हैं तो कथा सामान्य हो जाती है।

लेकिन यदि हम उसे युद्ध-व्यवस्था की परीक्षा के रूप में देखते हैं, तब महाभारत का यह प्रसंग असाधारण हो उठता है।

अभिमन्यु के पास युद्ध के आरम्भ में पूर्ण साधन थे।

फिर एक-एक करके उसके साधन समाप्त होते गए—

धनुष → रथ → घोड़े → सारथि → तलवार → ढाल → रथचक्र → गदा-युद्ध।

यह क्रम केवल कथा नहीं है।

यह एक योद्धा के सैन्य-विघटन की क्रमिक प्रक्रिया है।

और यही कारण है कि इस प्रसंग को आधुनिक सैन्य-विज्ञान की दृष्टि से भी पढ़ा जा सकता है।

पहले उसकी mobility समाप्त की गई।
फिर उसकी long-range offensive capability समाप्त की गई।
फिर उसकी defensive capability समाप्त की गई।
और अन्ततः उसे निकट युद्ध में धकेल दिया गया।

अर्थात—

अभिमन्यु को केवल हराया नहीं गया; उसकी युद्ध-क्षमता को चरण-दर-चरण निष्क्रिय किया गया।

इतिहास और मिथक की सीमा

अब एक दूसरा प्रश्न उठता है—

क्या यह घटना ऐतिहासिक रूप से इसी प्रकार हुई थी?

यहाँ हमें सावधान रहना होगा।

महाभारत का वर्तमान पाठ एक दीर्घकालीन पाठ-परम्परा का परिणाम है। विभिन्न संस्करणों और पाठ-परम्पराओं में विवरणों और अध्याय-संरचना में अंतर मिलते हैं। इसलिए किसी एक लोकप्रिय प्रस्तुति को तत्काल ऐतिहासिक प्रत्यक्षदर्शी-वृत्तान्त मानना उचित नहीं होगा।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि अभिमन्यु-वध महाभारत की युद्ध-स्मृति का एक अत्यन्त प्राचीन और केंद्रीय प्रसंग है, और द्रोणपर्व के पाठ में इसका विस्तृत आख्यान मौजूद है। आलोचनात्मक पाठ की डिजिटल परम्परा भी द्रोणपर्व को मूल संस्कृत पाठ के रूप में उपलब्ध कराती है।

अतः शोध की उचित भाषा होगी—

“पाठ में ऐसा वर्णित है”,
न कि बिना प्रमाण के—
“इतिहास में निश्चित रूप से ऐसा ही हुआ था।”

अभिमन्यु की मृत्यु के बाद

अभिमन्यु गिर चुका है।

तेरहवें दिन का युद्ध अपने सबसे करुण बिन्दु पर पहुँच चुका है।

लेकिन महाभारत यहाँ कथा समाप्त नहीं करता।

क्योंकि किसी एक योद्धा की मृत्यु युद्ध को समाप्त नहीं करती।

कभी-कभी वह युद्ध को और अधिक भयंकर बना देती है।

अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार जब अर्जुन तक पहुँचेगा, तब व्यक्तिगत शोक प्रतिज्ञा में बदल जाएगा।

और यहीं से महाभारत का अगला महान प्रश्न जन्म लेगा—

क्या शोक से निकली हुई प्रतिज्ञा न्याय को जन्म देती है या प्रतिशोध को?

अर्जुन अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा करेगा।

अब युद्ध का लक्ष्य केवल विजय नहीं रहेगा।

समय स्वयं युद्ध का एक अस्त्र बन जाएगा।

सूर्यास्त तक जयद्रथ जीवित रहा तो अर्जुन की प्रतिज्ञा विफल मानी जाएगी।

और यदि अर्जुन जयद्रथ को मार देता है, तो उसके पीछे केवल उसका गांडीव नहीं होगा—

कृष्ण की रणनीति भी होगी।

यहीं से द्रोणपर्व का अगला चरण आरम्भ होता है।

कठोर परीक्षा

अभिमन्यु-वध को केवल “अधर्म” कह देना आसान है।

लेकिन शोध की दृष्टि से हमें कुछ कठिन प्रश्न खुले रखने होंगे—

क्या युद्ध में नियम तभी तक टिकते हैं जब तक विजय कठिन न हो?

क्या रणनीतिक आवश्यकता युद्ध-मर्यादा को बदल सकती है?

क्या द्रोणाचार्य की युद्धनीति और द्रोणाचार्य की आचार्य-छवि में कोई अन्तर्विरोध दिखाई देता है?

क्या अभिमन्यु की मृत्यु कौरवों की तत्कालीन सैन्य सफलता थी, या उसने युद्ध को और अधिक प्रतिशोधपूर्ण बना दिया?

और सबसे बड़ा प्रश्न—

जब युद्ध में प्रतिपक्षी को मनुष्य के रूप में देखना समाप्त हो जाता है, तब क्या युद्ध अभी भी “धर्मयुद्ध” कहलाता है?

अभिमन्यु का शरीर युद्धभूमि में गिर चुका था।

लेकिन उसी क्षण एक और चीज जन्म ले चुकी थी—

अर्जुन की प्रतिज्ञा।

और अगले भाग में यही प्रतिज्ञा तेरहवें दिन की मृत्यु को चौदहवें दिन के युद्ध में बदल देगी।

अभिमन्यु की मृत्यु कथा का अंत नहीं है।
वह जयद्रथ-वध की भूमिका है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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