महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–१ : युद्ध के बाद का महाभारत — विजय के बीच मृत्यु का मौन

 महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–१ : युद्ध के बाद का महाभारत — विजय के बीच मृत्यु का मौन

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था।

अठारह अक्षौहिणी सेना में से लगभग सब कुछ नष्ट हो चुका था। जिन राजाओं, महारथियों और योद्धाओं के नाम लेकर युद्ध आरम्भ हुआ था, उनमें से अधिकांश अब जीवित नहीं थे।

कौरवों की ओर से भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, भूरिश्रवा, जयद्रथ और दुर्योधन जैसे प्रमुख योद्धा समाप्त हो चुके थे। पाण्डवों की ओर से भी अनेक पुत्र, पौत्र, मित्र और सहयोगी मारे जा चुके थे।

और अब एक विचित्र स्थिति थी— युद्ध जीतने वाला पक्ष भी शोक में था और हारने वाला पक्ष भी।

यहीं से महाभारत का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आरम्भ होता है।

अब तक कथा का केन्द्र था— राज्य किसे मिलेगा?

अब प्रश्न बदल जाता है— राज्य मिल जाने के बाद बचा क्या?

यही प्रश्न स्त्रीपर्व को महाभारत के युद्ध-वर्णन से आगे ले जाकर मनुष्य के भीतर के युद्ध का पर्व बना देता है।

धृतराष्ट्र की प्रतीक्षा

हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके सामने युद्ध का परिणाम आने वाला था।

वे जन्म से अंधे थे, परन्तु युद्ध ने उनके अंधत्व को केवल शारीरिक नहीं रहने दिया था। उनके सौ पुत्र युद्धभूमि में मारे जा चुके थे।

गान्धारी के लिए भी वही स्थिति थी।

जिस स्त्री ने अपने पति के अंधत्व को अपना अंधत्व बनाकर जीवन बिताया, वही अब अपने सौ पुत्रों के शवों की कल्पना के सामने खड़ी थी।

यहाँ महाभारत एक असाधारण मनोवैज्ञानिक स्थिति निर्मित करता है—

जिस युद्ध को राजधर्म, क्षात्रधर्म और न्याय के नाम पर लड़ा गया था, उसका अंतिम दृश्य राजसभा में नहीं, शोक करती हुई स्त्रियों के बीच दिखाई देता है।

युद्ध का राजनीतिक परिणाम पुरुषों ने निर्धारित किया था।

लेकिन उसका मानवीय परिणाम सबसे अधिक स्त्रियों ने भोगा।

संजय फिर से कथावाचक बनते हैं

स्त्रीपर्व का आरम्भिक वातावरण हमें उस संजय की ओर फिर ले जाता है जिसने धृतराष्ट्र को युद्ध की घटनाएँ सुनाई थीं।

लेकिन अब उसके वर्णन का स्वर बदल गया है। 

पहले संजय युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी-वर्णन कर रहे थे—

कौन किससे लड़ा, किसने किसका वध किया, किस अस्त्र का प्रयोग हुआ, कौन-सा महारथी किस प्रकार गिरा।

अब वही युद्ध एक दूसरी दृष्टि से दिखाई देता है।

अब प्रश्न यह नहीं है कि— किसने किसे मारा?

प्रश्न यह है कि— किस-किसका जीवन उस हत्या के साथ समाप्त हो गया?

यही स्त्रीपर्व का मूल परिवर्तन है।

हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र की ओर

धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती और राजपरिवार की स्त्रियाँ कुरुक्षेत्र की ओर जाती हैं।

यह यात्रा केवल मृतकों को देखने की यात्रा नहीं है।

यह उस युद्ध के परिणाम का सामना करने की यात्रा है जिसे अब तक दूर से सुना जा रहा था।

कुरुक्षेत्र अब युद्धभूमि नहीं रह गया। वह एक विशाल शवभूमि बन चुका है।

जहाँ कभी शंख बज रहे थे, वहाँ अब विलाप है। जहाँ रथ दौड़ रहे थे, वहाँ अब टूटे हुए रथ पड़े हैं।

जहाँ ध्वज फहरा रहे थे, वहाँ अब धूल और रक्त है।

और जहाँ योद्धा अपने पराक्रम पर गर्व कर रहे थे, वहीं अब उनके शरीर पहचान से बाहर पड़े हैं।

महाभारत यहाँ युद्ध के सौन्दर्य और वीरता के पीछे छिपे हुए मृत्यु के वास्तविक दृश्य को सामने लाता है।

स्त्रियों का विलाप — केवल शोक नहीं

स्त्रीपर्व में स्त्रियों का विलाप अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

इसे केवल भावुकता समझना महाभारत की संरचना को छोटा कर देना होगा।

ये स्त्रियाँ प्रश्न भी करती हैं। वे पूछती हैं— यह युद्ध किसके लिए था?

यदि पुत्र ही नहीं रहे तो राज्य किसके लिए?

यदि पति नहीं रहे तो विजय का अर्थ क्या?

यदि वंश ही नष्ट हो गया तो राजसत्ता किसका संरक्षण करेगी?

यहाँ महाभारत पहली बार युद्ध के पुरुष-केन्द्रित तर्क के सामने स्त्री-दृष्टि को रखता है।

पुरुषों की भाषा में युद्ध था— धर्म, अधिकार, प्रतिशोध, राज्य और प्रतिष्ठा।

स्त्रियों की भाषा में उसका परिणाम था— वियोग, विधवापन, पुत्र-विनाश और वंश का टूटना।

दोनों दृष्टियाँ महाभारत में साथ उपस्थित हैं।

एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न

यहाँ से हमारे शोध की एक बड़ी दिशा खुलती है—

यदि युद्ध का उद्देश्य धर्म की स्थापना था, तो क्या धर्म की विजय का मूल्य इतना अधिक हो सकता है कि विजेता और पराजित दोनों पक्ष अपनी अगली पीढ़ी खो दें?

महाभारत इसका सरल उत्तर नहीं देता। वह हमें निर्णय सुनाने के बजाय दृश्य दिखाता है।

यही महाभारत की विशेषता है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था— “क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ…”

अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार किया गया।

लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद वही कुरुक्षेत्र हमें एक दूसरा प्रश्न पूछता हुआ दिखाई देता है—

क्या धर्म केवल युद्ध के समय पहचाना जाता है, या युद्ध के परिणाम को देखकर भी धर्म की परीक्षा होती है?

स्त्रीपर्व इसी दूसरी परीक्षा का आरम्भ है।

आगे की कथा

अब धृतराष्ट्र और गान्धारी कुरुक्षेत्र पहुँचेंगे। उनके सामने उनके पुत्रों के शव होंगे।

गान्धारी का शोक धीरे-धीरे क्रोध और शाप में परिवर्तित होगा।

और इसी क्रम में महाभारत का एक अत्यन्त गूढ़ प्रसंग सामने आएगा— गान्धारी का कृष्ण को दिया हुआ शाप।

यह केवल एक स्त्री का व्यक्तिगत क्रोध नहीं है। यह प्रश्न है कि—

जब कृष्ण युद्ध रोक सकते थे, तो उन्होंने उसे किस सीमा तक रोका, किस सीमा तक स्वीकार किया, और युद्ध के बाद गान्धारी की दृष्टि में उस विनाश के लिए उनकी क्या भूमिका थी?

इसी प्रश्न से स्त्रीपर्व का अगला महत्त्वपूर्ण चरण आरम्भ होगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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