महाभारत में राजाओं के चार व्यसन
यदि महाभारत के केवल द्यूत-पर्व को अलग करके न देखा जाए, बल्कि उसके आख्यानों और उपाख्यानों में बार-बार आने वाले प्रसंगों को साथ रखकर देखा जाए, तो एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है—
महाभारत में “व्यसन” केवल व्यक्तिगत चरित्र-दोष नहीं है; वह राजसत्ता के विवेक को नष्ट करने वाली मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक शक्ति है।
और द्यूत इन चार व्यसनों में सबसे विशिष्ट दिखाई देता है, क्योंकि शिकार, मद्य और कामासक्ति मुख्यतः व्यक्ति को गिराते हैं, जबकि द्यूत व्यक्ति के साथ-साथ परिवार, राज्य, संबंध और अंततः समाज को भी जुए में लगा देता है।
महाभारत स्वयं चार व्यसनों को स्पष्ट रूप से गिनाता है—
चत्वार्याहुर्नरश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम्।
मृगयां पानमक्षांश्च ग्राम्ये चैवातिसक्तताम्॥
अर्थात् राजाओं के चार व्यसन हैं— मृगया, पान, अक्ष/द्यूत और ग्राम्य-विषयों में अतिशय आसक्ति।
आइए इन्हें महाभारत के आख्यानों और उपाख्यानों के भीतर खोजें।
महाभारत में राजाओं के चार व्यसन
— आख्यान और उपाख्यानों के भीतर एक तुलनात्मक विवेचन
१. मृगया — शिकार से आरम्भ होकर हिंसा तक
महाभारत में शिकार अपने-आप में निषिद्ध नहीं है। क्षत्रिय के लिए मृगया एक राजकीय और युद्धाभ्यास-संबंधी गतिविधि भी है। समस्या तब पैदा होती है जब मृगया विवेक को ढँक देती है।
इसका सबसे मार्मिक उदाहरण है—
पाण्डु और किन्दम ऋषि
पाण्डु वन में शिकार कर रहे हैं। वे एक मृग को देखते हैं और बिना पर्याप्त विवेक के बाण चला देते हैं। बाद में पता चलता है कि वह मृग वास्तव में ऋषि किन्दम था, जो अपनी पत्नी के साथ मैथुनरत था। ऋषि पाण्डु को शाप देते हैं कि जिस क्षण वे अपनी पत्नी के प्रति कामभाव से प्रेरित होकर उसके समीप जाएँगे, उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी।
यह प्रसंग अत्यन्त गहरा है।
यहाँ चार व्यसनों में से दो—मृगया और काम—एक-दूसरे में प्रवेश कर जाते हैं।
मृगया ने पाण्डु की दृष्टि को इतना आक्रामक बना दिया कि— जीव → लक्ष्य बन गया।
और परिणाम यह हुआ कि शिकार करते-करते उन्होंने केवल एक पशु नहीं मारा, बल्कि एक ऋषि के जीवन में हस्तक्षेप कर दिया।
इसका परिणाम आगे पूरे कुरुवंश पर पड़ता है।
अर्थात्— मृगया → अविवेक → हिंसा → शाप → वंश-संकट
यह महाभारत की व्यसन-चेतना का पहला बड़ा सूत्र है।
पान — जब मदिरा विवेक को विस्थापित करती है
पान का सबसे भयावह सामूहिक उदाहरण महाभारत के अंत में मिलता है—
यादवों का प्रभास-विनाश
यह प्रसंग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ मद्य केवल किसी एक व्यक्ति की कमजोरी नहीं है।
पूरा एक वीर समुदाय इसके प्रभाव में आता है।
प्रभास में यादवों का उत्सव चलता है। मदिरापान के बाद सात्यकि और कृतवर्मा के बीच पुरानी युद्ध-स्मृतियाँ और आरोप उभरते हैं। सात्यकि मद्य के प्रभाव में कृतवर्मा का अपमान करता है; फिर विवाद बढ़ता है और वही उत्सव यादव-विनाश में बदल जाता है।
यहाँ महाभारत एक अत्यन्त आधुनिक मनोवैज्ञानिक बात कहता हुआ दिखाई देता है—
मद्य नई शत्रुता पैदा नहीं करता; वह भीतर दबे हुए द्वेष के ऊपर से नियंत्रण की परत हटा देता है।
अर्थात्—
मद्य → संयम का क्षय → दबी हुई स्मृति → वाणी का आक्रमण → हिंसा → सामूहिक विनाश।
और यह बात और भी गंभीर है कि यादव पहले से ही विनाश के संकेतों से घिरे हुए थे। यहाँ पान उस अन्तर्निहित विघटन का उत्प्रेरक बनता है।
ग्राम्य-विषय में अतिसक्ति — काम का प्रश्न
यहाँ एक सूक्ष्म सावधानी आवश्यक है।
महाभारत यह नहीं कहता कि स्त्री स्वयं व्यसन है।
श्लोक में है— ग्राम्ये चैवातिसक्तताम्
अर्थात् इन्द्रिय अथवा काम-विषयों में अतिशय आसक्ति।
इसलिए इसे आधुनिक भाषा में “स्त्री-विषयक व्यसन” कहने के बजाय कामासक्ति अथवा इन्द्रिय-सुख की अति कहना अधिक सटीक होगा।
इसका सबसे महान आख्यान है—
ययाति
ययाति अत्यन्त शक्तिशाली, यशस्वी और धर्मज्ञ राजा हैं। लेकिन उनका संकट ज्ञान की कमी नहीं है।
ज्ञान होते हुए भी इच्छा का समाप्त न होना उनका संकट है।
ययाति अपने पुत्र से यौवन माँगते हैं क्योंकि उनकी कामनाएँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। अन्ततः वे स्वयं अनुभव से उस सत्य तक पहुँचते हैं कि— काम भोग से समाप्त नहीं होता; भोग कामना को और बढ़ा सकता है।
महाभारत में ययाति के माध्यम से यह बात आती है कि पृथ्वी का सम्पूर्ण धान्य, सोना, पशु और स्त्रियाँ भी एक मनुष्य की तृष्णा को तृप्त नहीं कर सकतीं। अन्ततः ययाति संतोष को स्वीकार करते हैं। (Sacred Texts)
यहाँ महाभारत का सूत्र है— भोग → तृप्ति नहीं → अधिक भोग की इच्छा → असंतोष।
ययाति का आख्यान इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह यह बताता है— व्यसन का मूल वस्तु में नहीं, “अधिक” में है।
और फिर आता है — द्यूत
यहीं महाभारत का सबसे बड़ा प्रयोग शुरू होता है।
क्योंकि मृगया, मद्य और कामासक्ति के विपरीत— द्यूत में मनुष्य स्वयं अपनी हानि को चुनता हुआ दिखाई देता है।
यही उसकी भयावहता है।
नलोपाख्यान — द्यूत का मनोवैज्ञानिक मॉडल
वनपर्व में बृहदश्व युधिष्ठिर को नलोपाख्यान सुनाते हैं।
नल कोई दुराचारी राजा नहीं हैं।
वे— धर्मज्ञ हैं, प्रजापालक हैं, वीर हैं, यशस्वी हैं, और दमयंती के पति हैं। फिर भी द्यूत उन्हें पराजित करता है।
पुष्कर उन्हें चुनौती देता है। नल खेल में उतरते हैं। धीरे-धीरे धन, रथ, वस्त्र और सम्पत्ति चली जाती है। प्रजा और मंत्री भी उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, लेकिन नल खेल से बाहर नहीं निकल पाते।
यहाँ महाभारत ने व्यसन की एक अत्यन्त आधुनिक मनोवैज्ञानिक संरचना पकड़ ली है—
पहली अवस्था - मैं खेल रहा हूँ।
दूसरी अवस्था - मैं हार रहा हूँ, इसलिए अब जीतना आवश्यक है।
तीसरी अवस्था - मैंने इतना खो दिया है, अब वापस पाने के लिए खेलना ही पड़ेगा।
चौथी अवस्था - खेल अब मेरे नियंत्रण में नहीं है।
नल के प्रसंग में यही होता है। इसलिए द्यूत का वास्तविक व्यसन पासे में नहीं है।
वह है— हारी हुई वस्तु को वापस पाने की मनोवैज्ञानिक विवशता।
और यहीं युधिष्ठिर–नल की समानता सामने आती है
महाभारत में नलोपाख्यान को युधिष्ठिर के सामने सुनाना अपने-आप में साहित्यिक रूप से अत्यन्त अर्थपूर्ण है।
युधिष्ठिर पहले ही अपना राज्य, धन, भाई और स्वयं को द्यूत में हार चुके हैं।
और बृहदश्व उन्हें नल की कथा सुनाते हैं।
अर्थात् महाभारत युधिष्ठिर से अप्रत्यक्ष रूप से कह रहा है—
“तुम अकेले नहीं हो। यह केवल तुम्हारी कमजोरी नहीं है। यह राजाओं के विवेक को पकड़ लेने वाला व्यसन है।”
और नल की कथा केवल सांत्वना नहीं है।
वह द्यूत से बाहर निकलने की शिक्षा भी है।
नल अन्ततः अक्षविद्या प्राप्त करते हैं और फिर पुष्कर के साथ पुनः द्यूत खेलते हैं। इस बार स्थिति बदल जाती है और नल अपना राज्य वापस प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार नलोपाख्यान का ढाँचा है— द्यूत → पतन → निर्वासन → आत्मज्ञान → अक्षविद्या → पुनरुद्धार।
लेकिन युधिष्ठिर का द्यूत इससे भी अधिक जटिल है
यहाँ महाभारत केवल यह नहीं कहता कि— “युधिष्ठिर को जुआ खेलने की बुरी आदत थी।”
यदि ऐसा होता तो कथा बहुत सरल होती।
समस्या यह है कि युधिष्ठिर के सामने राजधर्म, क्षत्रिय-परंपरा और द्यूत-व्यसन तीनों एक-दूसरे में उलझ जाते हैं।
शकुनि ठीक इसी कमजोरी को पहचानता है।
वह स्पष्ट रूप से कहता है कि युधिष्ठिर को द्यूत प्रिय है, जबकि वे उसमें दक्ष नहीं हैं; इसलिए उन्हें द्यूत के लिए बुलाया जाए।
अर्थात् शकुनि का हथियार केवल पासा नहीं है।
उसका वास्तविक हथियार है— युधिष्ठिर की मनोवैज्ञानिक कमजोरी की पहचान।
यहाँ द्यूत व्यक्तिगत व्यसन से राजनीतिक षड्यंत्र बन जाता है
यही महाभारत की सबसे बड़ी खोज है।
नल के मामले में— व्यक्ति → द्यूत → राज्य का पतन
लेकिन युधिष्ठिर के मामले में—
ईर्ष्या → द्यूत → राजनीतिक षड्यंत्र → राजवंशीय संघर्ष → अपमान → प्रतिशोध → युद्ध।
इसलिए युधिष्ठिर का द्यूत केवल “जुआ खेलना” नहीं है।
वह राजनीतिक युद्ध का वैकल्पिक प्रारूप है।
पहले युद्ध नहीं हुआ। पहले— पासे फेंके गए।
विदुर इसे पहले ही पहचान लेते हैं
विदुर द्यूत के विरुद्ध बार-बार चेतावनी देते हैं।
उनकी दृष्टि में द्यूत से— धन नष्ट होता है, संबंध टूटते हैं, कठोर वाणी पैदा होती है, शत्रुता बढ़ती है, और अंततः राजवंश संकट में पड़ता है।
वनपर्व में भी द्यूत के विषय में यही कहा गया है कि मनुष्य एक ही दिन में अपनी संपत्ति खो सकता है और फिर कटु वाणी तथा वैर उत्पन्न होते हैं।
इसलिए विदुर का विरोध केवल नैतिक उपदेश नहीं है। वह वास्तव में राजनीतिक जोखिम-विश्लेषण है।
द्यूत का चरम — द्रौपदी
और फिर महाभारत उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ द्यूत केवल धन को नहीं निगलता।
वह— राज्य → धन → भाई → स्वयं युधिष्ठिर → द्रौपदी
तक पहुँच जाता है। यहीं विकर्ण चार व्यसनों का सिद्धान्त सामने रखता है और कहता है कि—
मृगया, पान, द्यूत और स्त्री-विषय में अतिशय आसक्ति राजाओं के व्यसन हैं; इनमें फँसा हुआ व्यक्ति धर्म से विचलित होता है।
वह इसी आधार पर प्रश्न करता है कि स्वयं को हार जाने के बाद युधिष्ठिर को द्रौपदी को दाँव पर लगाने का अधिकार कैसे रहा।
यहाँ महाभारत का सबसे गहरा प्रश्न पैदा होता है—
क्या व्यसन की अवस्था में किया गया निर्णय वैध निर्णय माना जा सकता है?
यह प्रश्न केवल द्रौपदी के अधिकार का प्रश्न नहीं है।
यह राजकीय निर्णय की वैधता का प्रश्न है।
चारों व्यसनों को एक साथ रखकर देखें
| व्यसन | महाभारत का प्रमुख आख्यान | सबसे पहली क्षति | अन्तिम परिणाम |
|---|---|---|---|
| मृगया | पाण्डु–किन्दम | विवेक | वंश-संकट |
| पान | यादव–प्रभास | संयम | सामूहिक विनाश |
| कामासक्ति | ययाति | संतोष | तृष्णा और पतन |
| द्यूत | नल–पुष्कर, युधिष्ठिर–शकुनि | निर्णय-विवेक | राज्य, परिवार और युद्ध |
लेकिन एक और रोचक बात है।
चारों व्यसनों का मनोवैज्ञानिक क्रम
यदि महाभारत के आख्यानों को एक साथ पढ़ें तो इन चारों को केवल चार अलग-अलग दोष नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के चार विचलन के रूप में देखा जा सकता है।
मृगया
देखना → लक्ष्य बनाना → मारना - यहाँ समस्या है आक्रामकता।
पान- पीना → चेतना का धुँधला होना → नियंत्रण खोना - यहाँ समस्या है असंयम।
कामासक्ति - भोग → तृप्ति की अपेक्षा → अतृप्ति - यहाँ समस्या है तृष्णा।
द्यूत - जोखिम → हार → पुनः जोखिम → सर्वस्व-हानि यहाँ समस्या है मोह और निर्णय-विफलता।
और इस दृष्टि से चारों का मूल एक ही है—
इन्द्रिय या मन की किसी एक वृत्ति का स्वामी से स्वामीभूत हो जाना।
लेकिन द्यूत इन चारों से अलग क्यों है?
यही महाभारत का सबसे रोचक बिंदु है।
मृगया में राजा दूसरे जीव पर नियंत्रण चाहता है।
पान में वह अपने ऊपर का नियंत्रण खोता है।
काम में वह दूसरे व्यक्ति को अपनी इच्छा का विषय बनाता है।
लेकिन द्यूत में—
वह अपनी ही सम्पत्ति, अपना राज्य और अन्ततः अपना अस्तित्व भाग्य और प्रतिद्वंद्वी के हाथ में सौंप देता है।
इसलिए द्यूत में कर्ता और पीड़ित एक ही व्यक्ति बन जाता है।
युधिष्ठिर स्वयं दाँव लगाते हैं। और स्वयं ही हारते हैं।
यही द्यूत को महाभारत में सबसे जटिल व्यसन बनाता है।
एक और अद्भुत बात — द्यूत युद्ध का पूर्वरूप है
महाभारत की पूरी संरचना को देखें—
राजसूय
↓
ईर्ष्या
↓
द्यूत
↓
द्रौपदी का अपमान
↓
वनवास
↓
अज्ञातवास
↓
शान्ति-प्रयास
↓
उद्योग
↓
युद्ध
अर्थात् महाभारत में युद्ध अचानक नहीं आता।
उसका पहला बीज द्यूतसभा में पड़ता है।
इस अर्थ में— कुरुक्षेत्र का युद्ध वास्तव में पासों की उस सभा का विस्तारित परिणाम है।
द्यूत ने जिस संघर्ष को पासों से हल करने का प्रयास किया था, वही अन्ततः शस्त्रों से हल करना पड़ा।
इसलिए महाभारत का “द्यूत” केवल जुआ नहीं है
यहाँ से हमारे शोध के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है।
महाभारत के आख्यानों में द्यूत के कम-से-कम चार स्तर दिखाई देते हैं—
१. द्यूत एक खेल है - मनुष्य मनोरंजन और प्रतिस्पर्धा के लिए खेलता है।
२. द्यूत एक व्यसन है - खेल मनुष्य को खेलने लगता है।
३. द्यूत एक राजनीतिक हथियार है -शकुनि द्यूत को सत्ता प्राप्त करने के उपकरण में बदल देता है।
४. द्यूत एक सभ्यतागत संकट है - जब राजा अपनी निर्णय-क्षमता खो देता है, तो उसका निजी व्यसन पूरे राज्य का भाग्य तय करने लगता है।
और यही कारण है कि महाभारत में द्यूत का प्रसंग इतना बड़ा हो जाता है।
सबसे गहरी बात
महाभारत शायद यह नहीं कह रहा कि— “जुआ मत खेलो।”
उसका प्रश्न इससे बहुत बड़ा है—
“जब किसी मनुष्य की कोई इच्छा उसके विवेक से बड़ी हो जाए, तब क्या उसके द्वारा लिया गया निर्णय अभी भी उसका अपना निर्णय रहता है?”
युधिष्ठिर के प्रसंग में यही प्रश्न है।
नल के प्रसंग में यही प्रश्न है।
ययाति के प्रसंग में यही प्रश्न है।
पाण्डु के प्रसंग में भी यही प्रश्न है।
और यादवों के प्रभास-विनाश में भी।
इसलिए चारों व्यसनों का मूल एक ही दिखाई देता है—
जहाँ मनुष्य किसी वस्तु का उपयोग करता है, वहाँ तक वह स्वतंत्र है।
जहाँ वही वस्तु मनुष्य का उपयोग करने लगे, वहीं “व्यसन” आरम्भ होता है।
और द्यूत इस सिद्धान्त का महाभारत में सबसे पूर्ण और सबसे भयावह रूप है।
एक शोध-योग्य सूत्र
इसे महाभारत-अध्ययन की एक केंद्रीय परिकल्पना बनाया जा सकता है:
मृगया शरीर को जीतने की इच्छा है →
काम दूसरे को पाने की इच्छा है →
पान स्वयं को भूलने की इच्छा है →
द्यूत भाग्य को अपने पक्ष में मोड़ने की इच्छा है।
और चारों के पीछे एक ही शक्ति है— “मैं नियंत्रण में रहूँ।”
महाभारत की विडम्बना यह है कि नियंत्रण पाने की यही इच्छा अन्ततः नियंत्रण खोने का कारण बनती है।
यहीं से द्यूत को केवल नैतिक कथा न मानकर राजनीतिक मनोविज्ञान, निर्णय-विज्ञान और भारतीय व्यसन-चिन्तन के संदर्भ में पढ़ने की एक बहुत बड़ी शोध-दिशा खुलती है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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