महाभारत — कर्णपर्व — भाग ७ : रथ का पहिया, शाप और कर्ण-वध
महाभारत — कर्णपर्व — भाग ७ : रथ का पहिया, शाप और कर्ण-वध
कर्ण और अर्जुन का युद्ध अब अपने निर्णायक क्षण में पहुँच चुका था।
दोनों ओर से बाणों की वर्षा हो रही थी। तभी कर्ण के रथ का एक पहिया पृथ्वी में धँस गया।
कर्ण ने युद्ध कुछ समय रोकने का आग्रह किया और रथ से उतरकर पहिया निकालने लगा।
यहीं महाभारत की कथा एक साधारण युद्ध-द्वंद्व से निकलकर धर्म और युद्ध-नियम के प्रश्न में प्रवेश करती है।
कर्ण का आग्रह
कर्ण ने अर्जुन से कहा कि वह तब तक प्रहार न करे जब तक वह अपने रथ का पहिया निकाल न ले।
उसका तर्क युद्ध की उस मर्यादा पर आधारित था जिसमें असावधान या असहाय योद्धा पर आक्रमण करना अनुचित माना जाता था।
अर्जुन के हाथ में गांडीव था, लेकिन निर्णायक निर्णय कृष्ण ने प्रभावित किया।
कृष्ण ने कर्ण को उसके पुराने कर्मों की याद दिलाई।
उन्होंने पूछा—जब अभिमन्यु अकेला था, उसका धनुष टूट चुका था, उसका रथ नष्ट हो चुका था और अनेक महारथियों ने मिलकर उसे घेरा था, तब युद्ध की मर्यादा कहाँ थी?
द्रौपदी के अपमान के समय कर्ण की भूमिका भी कृष्ण ने स्मरण कराई।
इस प्रकार कृष्ण का तर्क था—
जिस युद्ध में कर्ण ने स्वयं मर्यादा के उल्लंघन का समर्थन किया, उसी मर्यादा की सुरक्षा की माँग वह अपने लिए नहीं कर सकता।
कर्ण के शाप
रथ का पहिया धँसना महाभारत की कथा में केवल आकस्मिक घटना नहीं है।
इसके पीछे कर्ण के दो प्रमुख शापों को जोड़ा गया है।
परशुराम का शाप—कर्ण ने अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर उनसे ब्रह्मास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था। जब निर्णायक समय आया तो परशुराम के शाप के कारण वह उस ज्ञान को स्मरण नहीं कर सके।
दूसरा शाप एक ब्राह्मण से जुड़ा है। कर्ण के बाण से अनजाने में उसकी गाय मारी गई थी। ब्राह्मण ने शाप दिया कि जिस प्रकार उसकी गाय असहाय होकर मरी, उसी प्रकार युद्ध में कर्ण का रथ भी संकट में पड़ेगा।
अब दोनों प्रसंग एक ही क्षण में जैसे एकत्र हो जाते हैं—
अस्त्र का ज्ञान संकट में → रथ का पहिया संकट में।
महाभारत की कथा इसे कर्मफल की संरचना के रूप में प्रस्तुत करती है।
क्या पहिया वास्तव में पृथ्वी में धँस सकता था?
यहाँ कथा को वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जा सकता है।
कुरुक्षेत्र जैसी विशाल युद्धभूमि में हजारों रथों, हाथियों और घोड़ों की आवाजाही से भूमि अत्यन्त असमतल हो सकती थी।
रथ का पहिया— कीचड़, नरम मिट्टी, गड्ढे या युद्ध से क्षतिग्रस्त भूमि में फँस सकता था।
इसलिए पहिए का धँसना भौतिक रूप से असम्भव घटना नहीं है।
लेकिन इसे उसी क्षण कर्ण के पुराने शापों से जोड़ना कथा की धार्मिक-कर्मात्मक व्याख्या है, वैज्ञानिक कारण नहीं।
दोनों स्तरों को अलग रखना ही शोध की दृष्टि से उचित है।
अन्तिम प्रहार
कर्ण अभी रथ का पहिया निकालने में लगा था। अर्जुन के सामने वह निर्णायक क्षण था।
कृष्ण ने अर्जुन को प्रहार करने के लिए प्रेरित किया। अर्जुन ने अपना धनुष उठाया और घातक बाण छोड़ा।
बाण ने कर्ण का जीवन समाप्त कर दिया।
इस प्रकार कुरुक्षेत्र का सबसे प्रतीक्षित द्वंद्व समाप्त हुआ।
कर्ण गिर गया।
लेकिन उसके साथ केवल एक महान योद्धा नहीं गिरा।
कौरव पक्ष का सबसे बड़ा आश्रय भी समाप्त हो गया।
कर्ण-वध : क्या यह धर्मसम्मत था?
यही कर्णपर्व का सबसे कठिन प्रश्न है।
यदि युद्ध के नियम को केवल उस क्षण की स्थिति से देखें तो प्रश्न उठता है—
क्या रथ का पहिया निकाल रहे योद्धा पर प्रहार करना उचित था?
लेकिन यदि सम्पूर्ण युद्ध-क्रम देखें तो दूसरी तस्वीर सामने आती है।
अभिमन्यु-वध में युद्ध-नियमों का उल्लंघन हुआ था।
द्रौपदी के अपमान में कर्ण की भूमिका थी।
कौरव-पाण्डव युद्ध पहले ही अनेक मर्यादाओं को पार कर चुका था।
इसलिए कृष्ण का तर्क तत्कालीन युद्ध को उसके सम्पूर्ण नैतिक इतिहास के भीतर रखता है।
महाभारत यहाँ कोई सरल फैसला नहीं देता।
वह पाठक को ऐसी स्थिति में खड़ा करता है जहाँ—
नियम और प्रतिशोध, धर्म और रणनीति, न्याय और युद्ध-वास्तविकता—एक-दूसरे में उलझ जाते हैं।
कर्ण की मृत्यु के बाद
कर्ण के मारे जाने के बाद पाण्डवों को तत्काल यह ज्ञात नहीं था कि वे अपने ज्येष्ठ भ्राता को मार चुके हैं।
कुंती ने कर्ण का जन्म-रहस्य अपने भीतर रखा था।
इसलिए कर्ण की मृत्यु के साथ एक ऐसी त्रासदी जन्म लेती है जिसका प्रभाव युद्ध समाप्त होने के बाद सामने आएगा।
जब पाण्डवों को ज्ञात होगा कि कर्ण वास्तव में कुंती का ज्येष्ठ पुत्र था, तब उनके लिए विजय का अर्थ भी बदल जाएगा।
कुरुक्षेत्र में उन्होंने अपने ही भाई का वध किया था।
और इस प्रकार कर्णपर्व की सबसे बड़ी विडम्बना सामने आती है—
जिस व्यक्ति को पाण्डव जीवनभर अपना शत्रु समझते रहे, वह वास्तव में उन्हीं का ज्येष्ठ भ्राता था।
कर्ण का शरीर कुरुक्षेत्र में गिर चुका था।
लेकिन उसका प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुआ था।
कर्ण कौन था—सूतपुत्र, अंगराज, दुर्योधन का मित्र, कुंती का पुत्र, महान धनुर्धर, या इन सभी पहचानों से परे एक ऐसा मनुष्य जिसे परिस्थितियों ने लगातार अपने विरुद्ध खड़ा किया?
इन प्रश्नों का उत्तर अब युद्धभूमि से बाहर जाकर खोजना होगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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