महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २१ : आत्मज्ञान — जानना नहीं, स्वयं को जानना
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २१ : आत्मज्ञान — जानना नहीं, स्वयं को जानना
आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार कर लेना आत्मज्ञान नहीं है।
किसी शास्त्र में पढ़ लेना कि आत्मा शरीर से भिन्न है, यह भी आत्मज्ञान नहीं है। किसी गुरु से सुन लेना कि आत्मा नित्य है, यह भी अभी आत्मज्ञान नहीं है।
युधिष्ठिर के सामने अब यही अगला प्रश्न उपस्थित होता है—जिसे आत्मा कहा जा रहा है, उसका प्रत्यक्ष बोध कैसे हो?
शान्तिपर्व के मोक्षधर्म में ज्ञान की चर्चा इसी कारण केवल सूचना के रूप में नहीं होती। वहाँ ज्ञान का अर्थ है—अज्ञान के कारण बने हुए उस भ्रम का हटना, जिसमें मनुष्य स्वयं को शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और उनसे उत्पन्न सुख-दुःख के साथ पूर्णतः अभिन्न मान लेता है।
ज्ञान और सूचना में अन्तर
मनुष्य संसार के बारे में बहुत कुछ जान सकता है और फिर भी अपने विषय में अज्ञानी रह सकता है।
वह राज्य चला सकता है, शास्त्र पढ़ सकता है, युद्ध जीत सकता है, धन अर्जित कर सकता है और अनेक विषयों का ज्ञाता हो सकता है; लेकिन यदि वह यह नहीं देख पाता कि उसके भीतर इच्छा, भय, क्रोध, मोह और अहंकार कैसे काम करते हैं, तो उसका ज्ञान अभी बाहरी क्षेत्र में ही है।
महाभारत इसी अन्तर को पकड़ता है।
मोक्षधर्म के एक अध्याय में ज्ञान के साधनों और ज्ञानी के लक्षणों की चर्चा करते हुए कहा गया है—
सृजते तु गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञस्त्वधितिष्ठति। गुणान् विक्रियतः सर्वानुदासीनवदीश्वरः॥
अर्थात् प्रकृति के गुण अपनी-अपनी क्रियाएँ करते हैं और क्षेत्रज्ञ उनका अधिष्ठान होकर उन्हें साक्षीभाव से देखता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण दार्शनिक संकेत है।
क्रिया और क्रिया के साक्षी को एक नहीं माना गया।
शरीर चलता है, इन्द्रियाँ विषयों की ओर जाती हैं, मन सोचता है, बुद्धि निर्णय करती है—लेकिन क्षेत्रज्ञ इन परिवर्तनों को जानता है।
यही आत्मज्ञान की पहली दिशा है। “मैं” की जाँच
मनुष्य जब कहता है— “मैं दुखी हूँ।” तो सामान्य अनुभव में यह बिल्कुल स्वाभाविक है।
लेकिन आत्मज्ञान पूछता है— दुःख किसमें उत्पन्न हुआ?
शरीर में? मन में? स्मृति में? किसी इच्छा के टूटने में?
या उस अहंकार में जिसने किसी घटना को “मेरे साथ” जोड़ लिया?
यह प्रश्न दुःख को नकारता नहीं। बल्कि उसके स्रोत को देखने की क्षमता पैदा करता है।
इसी प्रकार—
“मेरा शरीर”, “मेरा मन”, “मेरी बुद्धि”, “मेरी इच्छा”, “मेरा राज्य”, “मेरा परिवार”—इन सबमें “मेरा” शब्द एक स्वामी और वस्तु के बीच सम्बन्ध बनाता है।
तब प्रश्न उठता है— जो कहता है “मेरा”, वह कौन है? यही प्रश्न आत्मविचार का आरम्भ है।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
महाभारत की भाषा में इस अन्तर को समझने के लिए क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की धारणा अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्षेत्र वह है जिसमें परिवर्तन होते हैं।
शरीर बदलता है। इन्द्रियाँ बदलती हैं। मन की अवस्थाएँ बदलती हैं। बुद्धि के निर्णय बदलते हैं। सुख-दुःख आते-जाते हैं।
लेकिन क्षेत्रज्ञ इन परिवर्तनों को जानने वाला है।
यहाँ सांख्य और उपनिषद् की विभिन्न धाराओं से संवाद दिखाई देता है। परन्तु महाभारत को केवल बाद के किसी एक व्यवस्थित दर्शन का पूर्वरूप मान लेना उचित नहीं होगा। मोक्षधर्म में सांख्य, योग, आत्मविद्या और ब्रह्मविद्या की अनेक धारणाएँ एक-दूसरे के साथ संवाद करती दिखाई देती हैं।
इसलिए शान्तिपर्व का आत्मज्ञान किसी एक दार्शनिक सूत्र में बंद नहीं किया जा सकता।
ज्ञान का पहला लक्षण — विवेक
आत्मज्ञान की दिशा में सबसे पहले आवश्यकता है विवेक की।
विवेक का अर्थ केवल अच्छे और बुरे का सामान्य निर्णय नहीं है।
यहाँ विवेक का अर्थ है— जो बदलता है और जो परिवर्तन को जानता है, उनमें अन्तर करना।
शरीर बदलता है। विचार बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। इच्छाएँ बदलती हैं। परिस्थितियाँ बदलती हैं।
लेकिन परिवर्तन का ज्ञान तभी सम्भव है जब किसी स्तर पर कोई ऐसा तत्व हो जो उन परिवर्तनों को जान सके।
यहीं से आत्मा की खोज आरम्भ होती है।
ज्ञान का दूसरा लक्षण — इन्द्रियनिग्रह
लेकिन केवल बौद्धिक विवेक पर्याप्त नहीं।
यदि बुद्धि कहती है कि आसक्ति दुःख का कारण है और मन फिर भी प्रत्येक विषय के पीछे दौड़ता रहता है, तो ज्ञान अभी व्यवहार में नहीं उतरा।
शान्तिपर्व में एक अत्यन्त सुन्दर उपमा आती है—
यदा संहरते कामान् कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।तदात्मज्योतिरचिरात् स्वात्मन्येव प्रसीदति॥
अर्थात् जब मनुष्य कछुए की तरह अपनी कामनाओं को भीतर समेट लेता है, तब आत्मज्योति अपने ही स्वरूप में प्रकाशित होकर शान्त होती है।
यहाँ कामनाओं को नष्ट करने की बात नहीं है।
“संहरते” का संकेत है—उन्हें अपने ऊपर शासन न करने देना।
इन्द्रिय-विषय जीवन का हिस्सा हैं। समस्या विषय नहीं, विषय के प्रति ऐसी निर्भरता है जिसमें मनुष्य अपनी शान्ति को उनके अधीन कर देता है।
यही कारण है कि शान्तिपर्व का वैराग्य संसार से भागने का नाम नहीं था। अब आत्मज्ञान उसी वैराग्य को एक आन्तरिक आधार देता है।
ज्ञान का तीसरा लक्षण — समत्व
यदि आत्मा को शरीर और मन की बदलती अवस्थाओं से अलग देखा जाने लगे, तो सुख और दुःख के प्रति दृष्टि भी बदलती है।
सुख आए—तो उसका अनुभव हो, लेकिन उसमें अपनी सम्पूर्ण पहचान न खो जाए।
दुःख आए—तो उसका अनुभव हो, लेकिन “मैं ही दुःख हूँ” ऐसी पूर्ण पहचान न बन जाए।
सम्मान मिले—तो वह मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का प्रमाण न लगे।
अपमान मिले—तो वह उसके अस्तित्व को नष्ट करने वाला सत्य न बन जाए।
इस दृष्टि से समत्व केवल नैतिक अनुशासन नहीं है। वह आत्मज्ञान का व्यावहारिक परिणाम बन जाता है।
ज्ञानी कौन?
महाभारत में ज्ञानी को केवल बहुत शास्त्र जानने वाला नहीं माना गया।
ज्ञान का मूल्य जीवन में दिखाई देना चाहिए।
जिसके भीतर लोभ बढ़ता जा रहा है, क्रोध बढ़ता जा रहा है, अहंकार बढ़ता जा रहा है और फिर भी वह स्वयं को ज्ञानी मानता है, उसके ज्ञान और जीवन के बीच दूरी है।
मोक्षधर्म में ज्ञान के साधनों और ज्ञानी के लक्षणों की चर्चा इसी कारण साथ-साथ आती है। ज्ञान केवल किसी सिद्धान्त की स्वीकृति नहीं; वह दृष्टि का परिवर्तन है।
यहाँ महाभारत की शिक्षा अत्यन्त व्यावहारिक हो जाती है।
ज्ञान वह नहीं जो केवल स्मृति में बढ़े; ज्ञान वह है जो अहंकार को घटाए।
ज्ञान वह नहीं जो दूसरों को छोटा करे; ज्ञान वह है जो अपने अज्ञान को देखने की क्षमता दे।
ज्ञान वह नहीं जो संसार से घृणा उत्पन्न करे; ज्ञान वह है जो आसक्ति से स्वतंत्र होकर संसार में रहने की क्षमता दे।
आत्मज्ञान और राजधर्म का सम्बन्ध
यहाँ शान्तिपर्व की पूरी यात्रा एक वृत्त की तरह जुड़ने लगती है।
आरम्भ में युधिष्ठिर ने पूछा था—राजा का धर्म क्या है?
उत्तर में आया—राजा पहले स्वयं पर शासन करे।
फिर प्रश्न आया—इन्द्रियों को कैसे नियंत्रित किया जाए?
फिर वैराग्य आया। अब आत्मज्ञान आया।
अर्थात् शान्तिपर्व का क्रम केवल राजधर्म से मोक्षधर्म की ओर जाने वाला बाहरी क्रम नहीं है। उसके भीतर एक गहरा सूत्र है—
जो स्वयं पर शासन नहीं कर सकता, वह दूसरों पर शासन करते हुए भी भीतर से पराधीन है।
और जो अपने भीतर के परिवर्तनशील क्षेत्र तथा उसके साक्षी को पहचानने लगता है, उसके लिए सत्ता, धन, विजय और पराजय की परिभाषा बदलने लगती है।
युधिष्ठिर के लिए यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने युद्ध जीतकर भी शान्ति नहीं पाई।
अब उसे ऐसी विजय की खोज करनी है जिसमें किसी दूसरे का पराभव आवश्यक न हो।
आत्मज्ञान से आत्मसाक्षात्कार तक
लेकिन यहाँ भी एक अन्तिम सावधानी आवश्यक है।
आत्मा के बारे में विचार करना और आत्मा का साक्षात्कार करना एक बात नहीं।
“आत्मा नित्य है”—यह एक दार्शनिक कथन है।
“मैं आत्मा हूँ”—यह एक बौद्धिक निष्कर्ष हो सकता है।
लेकिन ऐसी अवस्था जिसमें शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार की निरन्तर गतिविधियों के बीच भी अपने चेतन स्वरूप की स्पष्ट पहचान बनी रहे—महाभारत का मोक्षधर्म आत्मज्ञान को इसी दिशा में ले जाता है।
इसलिए अगला प्रश्न स्वाभाविक है— यदि आत्मा साक्षी है, तो प्रकृति, मन और कर्म उससे कैसे जुड़े?
मनुष्य कर्म करता क्यों है?
गुण कैसे काम करते हैं?
कर्म का बन्धन किसे होता है?
और यदि आत्मा वास्तव में साक्षी है, तो फिर पुनर्जन्म और कर्मफल की व्यवस्था किस स्तर पर घटित होती है?
यहीं से शान्तिपर्व का विवेचन आत्मा से प्रकृति और कर्म के सम्बन्ध की ओर मुड़ता है।
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