महाभारत — वनपर्व — गन्धमादन से आगे : सौगन्धिक पुष्प, यक्ष-प्रदेश और कुबेर
महाभारत — वनपर्व — गन्धमादन से आगे : सौगन्धिक पुष्प, यक्ष-प्रदेश और कुबेर
गन्धमादन में पाण्डवों का निवास अब केवल यात्रा नहीं रह गया था। हिमालय का यह प्रदेश उनके लिए एक ऐसा संसार बन चुका था जहाँ प्रकृति, ऋषि-परंपरा और लोकविश्वास एक ही कथा-भूमि में दिखाई देते हैं।
भीम–हनुमान प्रसंग को हम पीछे छोड़ चुके हैं। अब कथा वहीं से आगे बढ़ती है जहाँ सौगन्धिक पुष्प की खोज भीम को गन्धमादन के भीतर ले जाती है।
सौगन्धिक पुष्प की खोज
द्रौपदी को प्राप्त हुआ सुगंधित पुष्प उन्हें अत्यंत प्रिय लगता है। वह भीम से ऐसे और पुष्प लाने की इच्छा व्यक्त करती हैं।
भीम निकल पड़ते हैं। लेकिन इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण बात है—
वे उस प्रदेश में प्रवेश कर रहे हैं जो मनुष्यों के सामान्य अधिकार-क्षेत्र से बाहर बताया गया है।
वहाँ पुष्प केवल प्राकृतिक वस्तु नहीं है।
वह एक ऐसे प्रदेश की पहचान है जिसका संरक्षण यक्षों के हाथ में है।
यहीं से एक साधारण-सी इच्छा—एक फूल प्राप्त करने की इच्छा—एक बड़े सांस्कृतिक प्रश्न में बदल जाती है:
प्राचीन भारतीय कल्पना में वन, पर्वत, जल और प्राकृतिक संपदा पर अधिकार किसका था?
यक्षों से सामना
भीम उस क्षेत्र में पहुँचते हैं जहाँ सौगन्धिक पुष्पों की रक्षा यक्ष करते हैं।
वे उन्हें रोकते हैं।
भीम अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटते।
संघर्ष होता है और भीम अपनी शक्ति से अनेक यक्षों को परास्त कर देते हैं।
लेकिन यहाँ कथा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा युद्ध नहीं है।
महाभारत तुरंत हमें कुबेर की ओर ले जाता है।
यक्षों का यह संसार किसी अनियंत्रित राक्षसी संसार की तरह नहीं है।
इसके पीछे एक व्यवस्थित सत्ता है।
उस सत्ता के अधिपति हैं—
कुबेर।
कुबेर कौन हैं?
भारतीय परंपरा में कुबेर को धन का अधिपति माना गया है।
लेकिन महाभारत के संदर्भ में उनका महत्व केवल “धन के देवता” तक सीमित नहीं है।
वे एक ऐसे पर्वतीय संसार के अधिपति के रूप में सामने आते हैं जहाँ—
यक्ष हैं, वन हैं, पर्वत हैं, दुर्लभ संपदा है, और देव-संबद्ध लोक है।
इसलिए कुबेर को केवल धार्मिक प्रतीक मानकर छोड़ देना भी अधूरा होगा।
यहाँ एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रश्न उठता है:
क्या कुबेर और यक्ष-परंपरा में प्राचीन पर्वतीय या वन-आधारित समुदायों की स्मृतियाँ भी संरक्षित हैं?
इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से “हाँ” नहीं दिया जा सकता, लेकिन इसकी संभावना को गंभीरता से शोधा जा सकता है।
यक्षों को “राक्षस” समझना भूल होगी
महाभारत के संसार में अनेक अलौकिक समूह हैं—
देव, दानव, असुर, राक्षस, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर।
इन सबको एक ही श्रेणी में रख देना उचित नहीं।
यक्षों का संबंध विशेष रूप से—
वन, पर्वत, जल, संपदा और सीमित प्राकृतिक प्रदेशों
से दिखाई देता है।
इसलिए यक्ष-कथा के पीछे यदि कोई ऐतिहासिक स्मृति खोजनी हो तो उसका रास्ता मानवशास्त्र और सांस्कृतिक भूगोल से होकर जाएगा, न कि केवल पौराणिक व्याख्या से।
क्या यक्ष वास्तविक मनुष्य थे?
यहाँ तीन संभावनाएँ अलग-अलग रखनी चाहिए।
पहली संभावना — पूर्णतः पौराणिक
यक्ष वास्तव में अलौकिक सत्ता हैं और कथा उसी धार्मिक विश्वास को व्यक्त करती है।
दूसरी संभावना — लोकस्मृति
प्राचीन स्थानीय समुदायों, पर्वतीय समूहों या वन-निवासियों की स्मृतियाँ समय के साथ यक्ष-रूप में पौराणिक हो गई हों।
तीसरी संभावना — दोनों का मिश्रण
किसी वास्तविक सामाजिक समूह या प्राकृतिक परिवेश से जुड़ी पुरानी स्मृति बाद में धार्मिक कल्पना के साथ मिलकर यक्ष-लोक बन गई हो।
तीसरी संभावना विशेष रूप से शोधयोग्य है।
लेकिन इसे अभी निष्कर्ष नहीं, शोध-परिकल्पना ही कहना चाहिए।
कुबेर का स्वीकार
भीम के यक्षों से संघर्ष के बाद कुबेर उन्हें शत्रु की तरह नहीं देखते।
यहाँ कथा का एक सूक्ष्म पक्ष सामने आता है।
यदि यक्ष केवल “दुश्मन” होते तो कुबेर और पाण्डवों के बीच संबंध भी वैसा ही होना चाहिए था।
लेकिन ऐसा नहीं होता।
कुबेर पाण्डवों के प्रति अनुकूल रहते हैं।
इससे कथा का संदेश केवल—
“मनुष्य बनाम अलौकिक प्राणी”
नहीं है।
बल्कि— अपरिचित लोक से संघर्ष के बाद उसके साथ संबंध स्थापित करना भी संभव है।
यह महाभारत की व्यापक सामाजिक संरचना से मेल खाता है, जहाँ अलग-अलग समुदाय, वंश और लोक एक-दूसरे से संघर्ष भी करते हैं और संबंध भी बनाते हैं।
सौगन्धिक पुष्प का अर्थ
अब इस पुष्प को केवल वनस्पति मानकर पढ़ना भी पर्याप्त नहीं होगा।
कथा की संरचना में यह पुष्प दुर्लभ वस्तु है।
वह सामान्य मनुष्य की पहुँच से बाहर है।
उसके लिए पर्वत के भीतर जाना पड़ता है।
रक्षकों का सामना करना पड़ता है।
और अंततः उस प्रदेश की सत्ता से सामना होता है।
इस दृष्टि से सौगन्धिक पुष्प एक सुंदर कथात्मक प्रतीक बन जाता है—
दुर्लभ वस्तु → कठिन यात्रा → सीमा का उल्लंघन → संघर्ष → प्राप्ति।
लेकिन यहाँ भी सावधानी रहे:
हम यह नहीं कह सकते कि व्यास ने जानबूझकर “मानसिक इच्छा” का प्रतीक बनाकर ही पुष्प रचा था।
यह हमारी व्याख्या है, मूल पाठ का घोषित अर्थ नहीं।
हिमालय की वास्तविकता और कथा
अब विज्ञान की दृष्टि से एक प्रश्न उठता है।
क्या हिमालय में ऐसी दुर्लभ सुगंधित वनस्पतियाँ वास्तव में थीं?
हाँ—हिमालय वनस्पति-विविधता से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है और ऊँचाई के अनुसार अनेक विशिष्ट पुष्प एवं औषधीय पौधे मिलते हैं।
लेकिन— सौगन्धिक पुष्प = अमुक आधुनिक वनस्पति
ऐसा निश्चित रूप से कहना अभी संभव नहीं।
इसलिए हमारे शोध में यह वाक्य उचित होगा:
सौगन्धिक पुष्प की कथा का प्राकृतिक आधार हिमालय की वास्तविक पुष्प-विविधता में खोजा जा सकता है, पर किसी विशिष्ट आधुनिक प्रजाति की पहचान करना प्रमाण से परे अनुमान होगा।
यही वैज्ञानिक संयम है।
गन्धमादन की एक और परत
यहाँ हमारी पिछली चर्चा फिर उपयोगी हो जाती है।
हमने देखा था कि गन्धमादन को सीधे वर्तमान Valley of Flowers अथवा Hemkund Sahib मानना प्रमाणित नहीं है।
लेकिन महाभारत का वर्णन जिस प्रकार के पर्वतीय, पुष्प-समृद्ध और दुर्गम संसार का चित्र बनाता है, उससे इतना अवश्य स्पष्ट है कि कथा की पृष्ठभूमि में हिमालय का वास्तविक प्राकृतिक अनुभव काम कर रहा हो सकता है।
अर्थात्—
भूगोल वास्तविक हो सकता है,
उस पर निर्मित कथा पौराणिक हो सकती है।
दोनों को एक-दूसरे का विरोधी मानना आवश्यक नहीं।
पाण्डवों की यात्रा का अर्थ अब बदल रहा है
ध्यान दीजिए— मैदानों में पाण्डवों ने तीर्थ देखे। नदियों में स्नान किया। ऋषियों से कथाएँ सुनीं। हिमालय में उन्होंने
प्रकृति की सीमा देखी। फिर— अपनी शक्ति की सीमा देखी।
फिर— अपरिचित लोकों की सीमा में प्रवेश किया। इसलिए तीर्थयात्रा अब एक बाहरी यात्रा से अधिक दिखाई देने लगती है।
यह धीरे-धीरे मनुष्य की अपनी सीमाओं की यात्रा भी बन रही है।
लेकिन अभी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बाकी है
यदि यक्षों का अपना प्रदेश है, नागों का अपना संसार है, गन्धर्वों की अपनी परंपरा है, राक्षसों के अपने क्षेत्र हैं,
तो क्या महाभारत का संसार वास्तव में केवल— आर्य राजाओं और उनके युद्धों का संसार है?
या इसके पीछे एक बहुत बड़ा बहु-सांस्कृतिक भारत दिखाई देता है?
जहाँ विभिन्न मानव समूहों, स्थानीय परंपराओं, वन-समुदायों और धार्मिक विश्वासों को एक विशाल कथा में समाहित किया गया?
यही प्रश्न हमारे आगे के शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
और यहीं से अगली कथा की भूमिका बनती है
पाण्डव गन्धमादन में हैं।
लेकिन वनवास का समय केवल तीर्थयात्रा में नहीं बीत रहा।
युधिष्ठिर को बार-बार ऐसी कथाएँ सुनाई जा रही हैं जिनमें धर्म, स्त्री की शक्ति, सत्य, मृत्यु, व्रत, तपस्या और मनुष्य की परीक्षा के प्रश्न आते हैं।
इन्हीं कथाओं में आगे हमें मिलेगा—
सावित्री–सत्यवान
जिसका विवेचन हम पहले की सूची में अलग से निर्धारित कर चुके हैं।
इसलिए वहाँ केवल कथा दोहराना पर्याप्त नहीं होगा।
हम पूछेंगे— महाभारत ने सावित्री की कथा को पाण्डवों के वनवास के बीच क्यों रखा?
और उससे भी बड़ा प्रश्न— जब युधिष्ठिर के सामने अपने परिवार, राज्य और भविष्य को खो देने का संकट है, तब उन्हें एक ऐसी स्त्री की कथा क्यों सुनाई जाती है जिसने मृत्यु के सामने अपने पति को वापस प्राप्त किया?
यहीं से सावित्री–सत्यवान केवल एक सुंदर प्रेमकथा नहीं रह जाएगी।
वह वनपर्व की पूरी दार्शनिक संरचना में एक अर्थपूर्ण हस्तक्षेप बनकर सामने आएगी।
पाण्डवों का वर्तमान शोध-मार्ग
प्रयाग
→ गंगा का ऊपरी प्रदेश → कनखल → हिमालय → गन्धमादन → सौगन्धिक वन → यक्ष-प्रदेश→ कुबेर
और कथा के समानांतर— तीर्थ → प्रकृति → लोकपरंपरा → आख्यान → धर्मचिंतन
का सूत्र लगातार गहरा होता जा रहा है।
अगला भाग: सावित्री–सत्यवान — कथा, मृत्यु और धर्म के बीच महाभारत का एक अद्भुत संवाद।
— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना
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