महाभारत — कर्णपर्व — भाग ८ : कर्ण के बाद — युद्ध का नया मोड़

 महाभारत — कर्णपर्व — भाग ८ : कर्ण के बाद — युद्ध का नया मोड़

कर्ण के पतन के साथ कौरव सेना का सबसे बड़ा युद्ध-आधार समाप्त हो गया। रणभूमि में उसका शरीर पड़ा था और दूसरी ओर अर्जुन तथा कृष्ण अपने रथ पर थे।

लेकिन युद्ध रुका नहीं।

दुर्योधन के लिए यह केवल एक महारथी की मृत्यु नहीं थी। भीष्म, द्रोण और अब कर्ण—तीनों सेनापति क्रमशः समाप्त हो चुके थे।

कौरव पक्ष के पास अब युद्ध को आगे बढ़ाने के लिए नया नेतृत्व चुनना था।

कर्ण की मृत्यु का तत्काल प्रभाव

कर्ण के मारे जाने के बाद कौरव सेना में निराशा फैलती है। अनेक योद्धा पीछे हटने लगते हैं।

दुर्योधन स्वयं भी गहरे संकट में था।

जिस कर्ण पर वह वर्षों से भरोसा करता आया था, वह अब उसके साथ नहीं था।

फिर भी दुर्योधन ने युद्ध समाप्त करने का निर्णय नहीं लिया।

उसने शेष योद्धाओं को संगठित किया और युद्ध जारी रखने की तैयारी की।

यहाँ कुरुक्षेत्र का एक कठोर सत्य सामने आता है—

व्यक्ति गिरता है, लेकिन युद्ध की व्यवस्था तुरंत नहीं गिरती।

भीष्म के बाद द्रोण आए। द्रोण के बाद कर्ण। और अब कौरव सेना को फिर एक सेनापति चाहिए।

शल्य को सेनापति बनाना

कर्ण के बाद दुर्योधन ने शल्य को सेनापति बनाया।

यही शल्य, जो अभी तक कर्ण के रथ के सारथि थे, अब स्वयं सम्पूर्ण कौरव सेना का नेतृत्व करने वाले थे।

यह परिवर्तन अत्यन्त रोचक है।

कर्ण के साथ उनका सम्बन्ध युद्ध के दौरान तनावपूर्ण रहा था। लेकिन अब वही व्यक्ति कौरव सेना का प्रधान सेनानायक बनता है।

शल्यपर्व की शुरुआत यहीं से होती है।

कर्ण की वास्तविक विरासत

कर्ण की मृत्यु के साथ उसका युद्ध समाप्त हो गया, लेकिन उसका चरित्र समाप्त नहीं होता।

उसकी कथा में कई परतें हैं—

कुंती का पुत्र → सूतपुत्र के रूप में जीवन → अंगराज → दुर्योधन का मित्र → अर्जुन का प्रतिद्वंद्वी → कौरव सेनापति → कुरुक्षेत्र में मृत्यु।

इनमें से किसी एक पहचान से कर्ण को समझना कठिन है।

उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि उसने कई अवसरों पर अपने जीवन की दिशा बदल सकने वाली परिस्थितियों के बावजूद अपने चुने हुए पक्ष को नहीं छोड़ा।

कृष्ण ने उसे पाण्डवों के पक्ष में आने का अवसर दिया था।

कुंती ने उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया था।

फिर भी कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा।

इस निर्णय को अलग-अलग दृष्टियों से समझा जा सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि अन्त तक उसकी राजनीतिक निष्ठा कौरव पक्ष के साथ रही।

एक छिपी हुई विडम्बना

कर्ण ने युद्ध में चार पाण्डवों को नहीं मारा।

कुंती को दिए वचन के कारण उसने युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को जीवनदान दिया।

उसकी प्रतिज्ञा ने पाण्डवों की रक्षा की।

लेकिन अर्जुन के विरुद्ध वही कर्ण अन्ततः मारा गया।

इस प्रकार कर्ण की प्रतिज्ञा ने युद्ध के परिणाम को प्रभावित किया।

यदि वह कुंती को वचन न देता, तो युद्ध का स्वरूप अलग हो सकता था—लेकिन यह केवल एक ऐतिहासिक परिकल्पना है, जिसे निश्चित परिणाम के रूप में नहीं कहा जा सकता।

कर्णपर्व का अंतिम प्रश्न

कर्ण के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी केवल उसकी मृत्यु नहीं है।

त्रासदी यह है कि उसकी वास्तविक पहचान उसके जीवन में उसके शत्रुओं के सामने पूर्णतः स्थापित नहीं हुई।

जिसे पाण्डव अपना शत्रु समझकर मार रहे थे, वह उनका ज्येष्ठ भ्राता था।

जिसे कौरव अपना सबसे बड़ा योद्धा मान रहे थे, वह स्वयं अपनी जन्म-पहचान के संघर्ष से गुजर रहा था।

और जिसे दुर्योधन अपना सबसे विश्वसनीय मित्र मानता था, उसके भीतर कुंती और पाण्डवों से जुड़ा एक दूसरा सत्य भी जीवित था।

इसलिए कर्णपर्व का अंत केवल कर्ण की मृत्यु पर नहीं होता।

यह उस प्रश्न पर समाप्त होता है—

मनुष्य को उसका जन्म निर्धारित करता है, उसके कर्म निर्धारित करते हैं, या उसके द्वारा चुनी गई निष्ठाएँ?

कर्ण का जीवन इन तीनों के बीच चलता हुआ दिखाई देता है।

अब युद्ध का नेतृत्व शल्य के हाथ में है।

कौरव सेना अत्यन्त कमजोर हो चुकी है, लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ।

अगला पर्व—शल्यपर्व।

और वहाँ कुरुक्षेत्र अपने अन्तिम चरण में प्रवेश करेगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है