महाभारत — वनपर्व — हिमालय से आगे : तीर्थयात्रा का विस्तार

 महाभारत — वनपर्व — हिमालय से आगे : तीर्थयात्रा का विस्तार

किरातार्जुनीय प्रसंग को हम पहले ही अलग दृष्टि से देख चुके हैं, इसलिए यहाँ उसे पुनः नहीं दोहराएँगे। हमारी कथा वहीं से आगे बढ़ती है जहाँ पाण्डवों की तीर्थयात्रा हिमालयी प्रदेश में प्रवेश कर चुकी है।

अब यात्रा का स्वर और गंभीर होता जाता है।

पाण्डव केवल तीर्थों के दर्शन नहीं कर रहे—वे ऐसे भूभाग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ मनुष्य, प्रकृति और देवकथा की सीमाएँ एक-दूसरे में मिलती हुई दिखाई देती हैं।

हिमालय में आगे का मार्ग

पाण्डवों का मार्ग अब लगभग इस प्रकार समझा जा सकता है—

प्रयाग - गंगा का ऊपरी प्रदेश- कनखल- हिमालय-विभिन्न ऋषि-आश्रम एवं पर्वतीय तीर्थ-गन्धमादन पर्वत की दिशा यहीं से कथा का एक अत्यंत सुंदर भाग आरम्भ होता है।

गन्धमादन केवल कोई पर्वत नहीं है।

महाभारत के लिए यह ऋषियों, सिद्धों, देवताओं और दुर्लभ वनस्पतियों का प्रदेश है।

गन्धमादन की ओर

पाण्डवों को बताया जाता है कि आगे का मार्ग अत्यंत कठिन है।

ऊँचे पर्वत हैं। घने वन हैं। तेज बहती नदियाँ हैं। कहीं मार्ग दिखाई देता है, कहीं नहीं।

इसलिए तीर्थयात्रा अब केवल धार्मिक कर्म नहीं रह जाती। यह शारीरिक परीक्षा भी बन जाती है।

महाभारत यहाँ प्रकृति को सजावटी पृष्ठभूमि की तरह नहीं रखता।

प्रकृति स्वयं कथा की सक्रिय शक्ति बन जाती है।

मनुष्य की सीमा

यहीं पाण्डवों के सामने एक समस्या आती है। 

जिस मार्ग पर वे जा रहे हैं, वह साधारण मनुष्यों के लिए आसान नहीं।

और इस कठिन यात्रा में भीम की भूमिका विशेष रूप से उभरती है। भीम बलवान हैं।

उन्हें अपनी शक्ति पर स्वाभाविक विश्वास है। और आगे आने वाला प्रसंग इसी स्वभाव की परीक्षा करता है।

वृद्ध वानर से भेंट

एक दिन भीम वन में आगे बढ़ रहे होते हैं। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध वानर दिखाई देता है।

वह रास्ते में पड़ा हुआ है। भीम उससे कहते हैं— “मार्ग से हटो।” लेकिन वृद्ध वानर शांत रहता है।

वह कहता है— “मैं वृद्ध हूँ। स्वयं हट नहीं सकता। तुम मेरी पूँछ को हटाकर आगे निकल जाओ।”

भीम को यह बात सरल लगती है। वे अपनी शक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं।

उन्होंने बड़े-बड़े योद्धाओं से युद्ध किया है।

एक वानर की पूँछ उठाना उनके लिए क्या कठिन होगा?

लेकिन— भीम पूँछ उठाने का प्रयास करते हैं। पूरी शक्ति लगाते हैं।

फिर भी पूँछ हिलती तक नहीं।

भीम पहली बार अपनी शक्ति के सामने खड़े हैं

भीम चकित हैं। वह फिर प्रयास करते हैं। और अधिक बल लगाते हैं। लेकिन परिणाम वही।

अब उन्हें समझ में आता है कि यह कोई साधारण वानर नहीं है।

वह विनम्र होकर पूछते हैं— “आप कौन हैं?”

तब वृद्ध वानर अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करता है।

वह हैं— हनुमान।

हनुमान और भीम

हनुमान और भीम का संबंध केवल कथा का चमत्कार नहीं है।

दोनों को वायु-पुत्र कहा गया है। इसलिए महाभारत यहाँ दो महाशक्तियों को आमने-सामने रखता है—

एक शक्ति जो अपने वर्तमान सामर्थ्य पर गर्व करती है, और

दूसरी शक्ति जो अपनी वास्तविक क्षमता को जानती है, लेकिन उसका प्रदर्शन नहीं करती।

यहीं प्रसंग का दार्शनिक अर्थ खुलता है।

भीम को क्या सीख मिलती है?

हनुमान भीम को कोई युद्ध नहीं सिखाते। कोई नया अस्त्र नहीं देते।

वे केवल उन्हें यह अनुभव कराते हैं कि— जिस शक्ति को मनुष्य अपनी सीमा समझता है, वह सम्पूर्ण शक्ति नहीं होती।

भीम का बल वास्तविक है। लेकिन वह असीम नहीं है। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

क्या यह केवल धार्मिक कथा है?

यदि हम इसे वैज्ञानिक घटना मानकर पूछें—

“क्या वास्तव में किसी वानर ने अपनी पूँछ इतनी भारी कर दी थी कि भीम उसे उठा नहीं सके?”

तो हमारे पास इसका कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

इसलिए इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रमाणित नहीं किया जा सकता।

लेकिन दूसरी ओर, कथा के भीतर इसका मनोवैज्ञानिक और चरित्रगत अर्थ बहुत स्पष्ट है।

महाभारत भीम को पराजित नहीं करता। वह उनके अहंकार को सीमित करता है।

यह अंतर समझना आवश्यक है।

और यहाँ एक रोचक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रश्न है

हनुमान की उपस्थिति हमें रामकथा से जोड़ती है। वनपर्व में आगे चलकर रामोपाख्यान भी आता है।

इस प्रकार महाभारत अपने विशाल आख्यान में किसी दूसरी प्राचीन कथा-परंपरा को भी समाहित करता है।

यह बताता है कि महाभारत केवल अपनी कथा नहीं कहता।

वह भारतीय स्मृति में पहले से चल रही कथाओं को भी अपने भीतर स्थान देता है।

यहाँ हम रामोपाख्यान को विस्तार से नहीं खोलेंगे, क्योंकि हमारी शोध-सूची में उसके लिए अलग विस्तृत विवेचन निर्धारित है।

यात्रा फिर आगे बढ़ती है

हनुमान भीम को आशीर्वाद देते हैं। 

वे उन्हें बताते हैं कि आने वाले युद्ध में वे पाण्डवों की सहायता करेंगे।

और यहीं से एक अत्यंत सुंदर सूत्र बनता है—

भीम के पास शारीरिक बल है। 

अर्जुन के पास धनुर्विद्या और दिव्यास्त्र हैं।

युधिष्ठिर के पास धर्म-बुद्धि है।

लेकिन महाभारत उन्हें बार-बार यह सिखाता है कि— इनमें से कोई भी शक्ति अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

गन्धमादन का अगला प्रसंग

पाण्डव आगे बढ़ते हैं और गन्धमादन क्षेत्र में पहुँचते हैं।

यहाँ प्रकृति का वर्णन अत्यंत समृद्ध है।

विभिन्न प्रकार के वृक्ष, पुष्प, सुगंधित वनस्पतियाँ, पर्वतीय झरने और विचित्र जीव-जंतु कथा में आते हैं।

यहीं आगे सौगन्धिक पुष्प का प्रसंग आता है। 

द्रौपदी उस अद्भुत पुष्प की सुगंध और सौंदर्य से आकर्षित होती हैं।

वह भीम से उसे लाने की इच्छा व्यक्त करती हैं।

भीम फिर निकल पड़ते हैं। और यही इच्छा उन्हें एक और असाधारण घटना की ओर ले जाती है।

सौगन्धिक पुष्प — केवल एक पुष्प?

पहली दृष्टि में यह बहुत छोटी कथा लग सकती है।

द्रौपदी ने पुष्प देखा। उन्हें वह पसंद आया। भीम उसे लाने निकल गए।

लेकिन महाभारत में ऐसी छोटी घटनाएँ अक्सर आगे बड़ी कथा का द्वार खोलती हैं।

सौगन्धिक पुष्प की खोज भी भीम को ऐसे प्रदेश में ले जाती है जहाँ—

नाग, यक्ष, गन्धर्व और अन्य अलौकिक प्राणी  कथा के संसार में उपस्थित हैं।

और यहीं हमारी पहले की शोध-दिशा फिर लौटती है— 

क्या महाभारत में ये प्राणी केवल अलौकिक पात्र हैं, या इनके पीछे प्राचीन जनजातीय, स्थानीय अथवा सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी हो सकती हैं?

लेकिन इस प्रश्न को अभी नहीं खोलेंगे।

हमने तय किया है कि देव–दानव–राक्षस–नाग आदि का समेकित अध्ययन अलग से होगा।

पाण्डवों की यात्रा अब कहाँ है?

अब हमारा मार्ग इस प्रकार हो गया है— पुष्कर गया → गंगा–यमुना क्षेत्र → प्रयाग → गंगा का ऊपरी प्रदेश→ कनखल→ हिमालय→ गन्धमादनभीम–हनुमान प्रसंगसौगन्धिक पुष्प का प्रसंग

यहाँ कथा अब केवल तीर्थ-दर्शन नहीं रह गई है। पाण्डवों की यात्रा में— तीर्थ + प्रकृति + आख्यान + चरित्र-परीक्षा चारों एक साथ चल रहे हैं।

अब अगला पड़ाव

सौगन्धिक पुष्प की खोज में भीम आगे बढ़ेंगे।

उनका सामना होगा ऐसे प्राणियों से जिनके बारे में महाभारत का वर्णन आधुनिक पाठक को “अलौकिक” प्रतीत होता है।

लेकिन इस बार हम उन्हें केवल चमत्कार कहकर आगे नहीं बढ़ेंगे।

हम पहले मूल कथा को संक्षेप में रखेंगे, फिर देखेंगे—

कथा में क्या कहा गया है?
भूगोल क्या संकेत देता है?
ऐसे प्राणियों की अवधारणा का सांस्कृतिक आधार क्या हो सकता है?
और कहाँ तक वैज्ञानिक दृष्टि से बात की जा सकती है?

यहीं से हमारी तीर्थयात्रा और आख्यान-शोध फिर एक-दूसरे से जुड़ेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव 

आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र 

(इस ब्लॉग के लेखों  के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है )


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