महाभारत — शल्यपर्व — भाग ३ : भीम–दुर्योधन गदायुद्ध — नियम, प्रतिज्ञा और निर्णायक प्रहार
महाभारत — शल्यपर्व — भाग ३ : भीम–दुर्योधन गदायुद्ध — नियम, प्रतिज्ञा और निर्णायक प्रहार
सरोवर से बाहर आने के बाद दुर्योधन और भीम आमने-सामने खड़े थे।
अब कुरुक्षेत्र का विशाल युद्ध एक छोटे से युद्धक्षेत्र में सिमट चुका था।
दोनों के हाथों में गदाएँ थीं। दोनों गदायुद्ध में प्रशिक्षित थे।
और दोनों के पीछे अठारह दिनों का रक्तरंजित इतिहास था।
गदायुद्ध का आरम्भ
भीम और दुर्योधन ने एक-दूसरे पर तीव्र प्रहार आरम्भ किए।
दुर्योधन की गति और संतुलन उल्लेखनीय था। वह भीम के भारी प्रहारों से बचता और अवसर देखकर प्रत्याक्रमण करता।
भीम की शक्ति अधिक प्रचण्ड थी, लेकिन दुर्योधन की युद्ध-कुशलता उसे बराबरी पर बनाए हुए थी।
युद्ध कभी एक ओर झुकता, कभी दूसरी ओर।
कुछ समय के लिए ऐसा प्रतीत होने लगा कि निर्णायक परिणाम सहज नहीं निकलेगा।
यहाँ महाभारत दोनों योद्धाओं को केवल बलवान नहीं, बल्कि प्रशिक्षित गदायोद्धा के रूप में प्रस्तुत करता है।
बलराम की दृष्टि
बलराम इस युद्ध को देख रहे थे। वे दोनों के गुरु थे।
इसलिए उनके लिए यह केवल पाण्डव और कौरव का युद्ध नहीं था।
यह उनके दो शिष्यों की परीक्षा थी। गदायुद्ध की अपनी मर्यादाएँ थीं।
विशेषतः कमर के नीचे प्रहार करना नियम-विरुद्ध माना जाता था।
इसलिए युद्ध जितना आगे बढ़ रहा था, उतना ही यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो रहा था कि—
विजय नियम से होगी या प्रतिज्ञा से?
भीम की पुरानी प्रतिज्ञा
द्यूतसभा का अपमान भीम की स्मृति में था।
द्रौपदी के सामने दुर्योधन ने अपनी जंघा पर हाथ रखकर उसे अपमानित किया था।
उस समय भीम ने प्रतिज्ञा की थी कि वह युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ेगा।
अब वह क्षण सामने था। लेकिन समस्या यह थी कि—
दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करना गदायुद्ध के नियमों के विरुद्ध था।
अर्थात् भीम के सामने दो अलग-अलग दायित्व खड़े थे—
युद्ध की मर्यादा और पुरानी प्रतिज्ञा।
कृष्ण का संकेत
युद्ध के बीच कृष्ण ने भीम को संकेत किया।
महाभारत की कथा में यह संकेत अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
कृष्ण स्वयं दुर्योधन की जंघा पर हाथ रखकर भीम को उसकी प्रतिज्ञा की ओर संकेत करते हैं।
भीम उस संकेत को समझते हैं। यहाँ कृष्ण स्वयं शस्त्र नहीं उठाते।
वे युद्ध में प्रत्यक्ष प्रहार भी नहीं करते।
लेकिन उनकी रणनीतिक भूमिका एक बार फिर निर्णायक दिखाई देती है।
निर्णायक प्रहार
भीम ने अवसर देखकर अपनी गदा से दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया।
दुर्योधन भूमि पर गिर पड़ा। उसकी जंघा टूट गई।
भीम ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दी।
लेकिन इसी क्षण युद्ध की विजय के साथ एक नैतिक प्रश्न भी खड़ा हो गया।
क्या प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए युद्ध का नियम तोड़ा जा सकता है?
महाभारत इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं देता।
बलराम का क्रोध
दुर्योधन को नियम-विरुद्ध जंघा पर प्रहार से गिरते देखकर बलराम क्रोधित हो उठे।
उन्होंने भीम के इस आचरण का विरोध किया। बलराम की दृष्टि से गदायुद्ध की मर्यादा भंग हुई थी।
वे भीम पर प्रहार करने तक के लिए उद्यत हुए।
तब कृष्ण ने उन्हें रोकते हुए दुर्योधन के पूर्व कर्मों और युद्ध में अपनाए गए आचरण की ओर संकेत किया।
इस प्रकार महाभारत यहाँ दो अलग-अलग नैतिक दृष्टियों को सामने रखता है—
बलराम — युद्ध के नियम की दृष्टि।
कृष्ण — सम्पूर्ण युद्ध-परिस्थिति और पूर्व कर्मों की दृष्टि।
और भीम— प्रतिज्ञा की दृष्टि।
तीन दृष्टियाँ, एक घटना
दुर्योधन की जंघा टूटने की घटना को इसलिए केवल “नियमभंग” या केवल “प्रतिज्ञापूर्ति” कह देना पर्याप्त नहीं है।
एक ही घटना को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है—
नियम: कमर के नीचे प्रहार अनुचित था।
प्रतिज्ञा: भीम ने द्रौपदी के अपमान के समय जंघा तोड़ने का संकल्प लिया था।
युद्ध-संदर्भ: दुर्योधन के नेतृत्व में पहले भी अनेक युद्ध-नियमों के उल्लंघन हुए थे।
महाभारत की शक्ति यही है कि वह पाठक को इन तीनों को साथ देखने के लिए बाध्य करता है।
क्या युद्ध यहीं समाप्त हो गया?
कौरव सेना का सेनापति शल्य मारा जा चुका था।
दुर्योधन भी गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर पड़ा था।
सैन्य दृष्टि से कौरवों की पराजय निश्चित हो चुकी थी।
लेकिन— महाभारत का युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था। रात्रि अभी शेष थी।
अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा अभी जीवित थे।
और आगे जो होने वाला था, वह कुरुक्षेत्र के युद्ध को विजय से प्रतिशोध की ओर ले जाएगा।
दुर्योधन की टूटी जंघा के पास से अब एक नया अध्याय आरम्भ होगा—
अश्वत्थामा का रात्रि-आक्रमण।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
Comments
Post a Comment