महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ३ : अहिंसा — क्या धर्म का अर्थ केवल न मारना है?

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ३ : अहिंसा — क्या धर्म का अर्थ केवल न मारना है?

अनुशासनपर्व में भीष्म के उपदेश अब धर्म के एक ऐसे सिद्धांत की ओर बढ़ते हैं, जिसने भारतीय चिंतन को बहुत गहराई से प्रभावित किया—अहिंसा।

युद्ध अभी समाप्त हुआ था।

चारों ओर मृत्यु की स्मृति थी। ऐसे समय में भीष्म का अहिंसा पर बोलना अपने आप में एक गहरा विरोधाभास है।

जिस कुरुक्षेत्र में धर्म की स्थापना के लिए युद्ध हुआ, उसी युद्ध के बाद धर्म के स्वरूप पर चर्चा करते हुए अहिंसा को इतना महत्व क्यों दिया गया?

यहीं महाभारत की जटिलता सामने आती है।

अहिंसा को केवल यह कह देना कि “किसी जीव को मत मारो” उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है।

मनुष्य केवल शस्त्र से हिंसा नहीं करता।

वह वाणी से भी चोट पहुँचा सकता है।

विचार से किसी को अपमानित कर सकता है।

सत्ता का दुरुपयोग कर सकता है।

किसी निर्बल के अधिकार को दबा सकता है।

और कभी-कभी अपनी उदासीनता से भी दूसरे के दुःख को बढ़ा सकता है।

इसलिए हिंसा का पहला क्षेत्र शरीर नहीं, मानवीय संबंध हैं।

अहिंसा और वाणी

महाभारत बार-बार वाणी की शक्ति को पहचानता है।

एक कठोर शब्द दिखाई नहीं देता, लेकिन उसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है।

शस्त्र शरीर को घायल करता है; शब्द कभी-कभी मन की ऐसी संरचना को घायल कर देता है जिसका घाव बाहर दिखाई ही नहीं देता।

इसलिए सत्य बोलना पर्याप्त नहीं।

प्रश्न यह भी है कि सत्य किस प्रकार बोला जा रहा है।

यदि सत्य का उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना है, तो सत्य भी अहंकार का उपकरण बन सकता है।

यहाँ अनुशासन आवश्यक हो जाता है—

वाणी में सत्य हो, लेकिन सत्य में करुणा भी हो।

अहिंसा और आत्मसंयम

भीष्म के चिंतन में अहिंसा का संबंध केवल बाहरी व्यवहार से नहीं, इन्द्रियों और इच्छाओं के नियंत्रण से भी जुड़ता है।

मनुष्य जब अपनी इच्छा को ही अंतिम सत्य मान लेता है, तब दूसरे मनुष्य उसके लिए साधन बन जाते हैं।

वहीं से शोषण शुरू होता है।

कामना → आग्रह → अधिकार-बोध → विरोध → क्रोध → हिंसा।

यह क्रम हर व्यक्ति में समान रूप से नहीं चलता, लेकिन मानवीय संघर्षों में ऐसी मनोवैज्ञानिक श्रृंखलाएँ दिखाई देती हैं।

इसलिए हिंसा को रोकने का सबसे गहरा उपाय केवल बाहरी दण्ड नहीं है।

उस इच्छा को समझना भी है जो हिंसा की ओर ले जाती है।

यही कारण है कि आत्मसंयम और अहिंसा एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।

क्या अहिंसा और युद्ध विरोधी हैं?

यह महाभारत का कठिन प्रश्न है।

यदि अहिंसा को हर परिस्थिति में पूर्णतः हिंसारहित व्यवहार माना जाए, तो कुरुक्षेत्र का युद्ध उसके साथ असंगत दिखाई देगा।

लेकिन महाभारत स्वयं इस विरोधाभास से बचता नहीं।

वह धर्म को परिस्थिति से जोड़कर देखता है।

युद्ध में भी सभी कर्म समान नहीं माने जाते। युद्ध के नियम बनाए जाते हैं। शस्त्रधारी और अशस्त्रधारी की स्थिति अलग मानी जाती है। सोए हुए, निहत्थे या असहाय व्यक्ति के प्रति आचरण को लेकर मर्यादाएँ बनती हैं।

यानी युद्ध के भीतर भी अनुशासन की आवश्यकता स्वीकार की गई।

यह एक महत्वपूर्ण बात है।

यदि हिंसा की परिस्थिति उत्पन्न हो भी जाए, तब भी मनुष्य के लिए हर प्रकार का हिंसक व्यवहार उचित नहीं हो जाता।

युद्ध को स्वीकार करने और हिंसा को अनियंत्रित छोड़ देने में अंतर है।

अहिंसा का व्यापक अर्थ

इस दृष्टि से अहिंसा को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है—

कायिक अहिंसा — शरीर से अनावश्यक चोट न पहुँचाना।
वाचिक अहिंसा — वाणी से अनावश्यक पीड़ा न पहुँचाना।
मानसिक अहिंसा — दूसरे के प्रति द्वेष और विनाशकारी वृत्ति को न पालना।

तीसरा स्तर सबसे कठिन है।

क्योंकि शरीर को रोकना संभव है, वाणी को भी नियंत्रित किया जा सकता है; लेकिन मन में उठने वाली प्रतिक्रिया को देखना कहीं अधिक कठिन है।

यहीं से अहिंसा आत्मानुशासन बनती है।

युद्ध समाप्त, हिंसा नहीं

कुरुक्षेत्र समाप्त हो चुका था।

लेकिन भीष्म जानते थे कि युद्ध समाप्त होने से हिंसा समाप्त नहीं होती।

यदि मनुष्य के भीतर लोभ, क्रोध, अहंकार और प्रतिशोध जीवित हैं, तो वही संघर्ष किसी दूसरे रूप में फिर जन्म ले सकता है।

इसलिए युद्ध के बाद समाज को केवल पुनर्निर्माण नहीं चाहिए था।

उसे मानसिक पुनर्निर्माण भी चाहिए था।

युधिष्ठिर को राज्य मिला था; अब उन्हें यह सीखना था कि सत्ता को हिंसा का विस्तार बनने से कैसे रोका जाए।

यहीं अनुशासनपर्व का संदेश व्यक्तिगत साधना से राजधर्म तक पहुँचता है।

जिस मनुष्य ने स्वयं को नियंत्रित नहीं किया, उसके हाथ में सत्ता दूसरों के लिए भय बन सकती है।

और जो स्वयं पर अनुशासन रखता है, वही शक्ति को उत्तरदायित्व में बदल सकता है।

अनुशासनपर्व की कथा अब धीरे-धीरे इसी बड़े प्रश्न की ओर बढ़ेगी—

मनुष्य अपने भीतर की इच्छाओं, क्रोध और लोभ पर शासन किए बिना क्या वास्तव में किसी राज्य पर शासन कर सकता है?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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