महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १३ : राजकीय अधिकारी — योग्य व्यक्ति, उत्तरदायित्व और प्रशासन की शुचिता
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १३ : राजकीय अधिकारी — योग्य व्यक्ति, उत्तरदायित्व और प्रशासन की शुचिता
राजा कितना ही संयमी, न्यायप्रिय और दूरदर्शी क्यों न हो, वह अकेला राज्य नहीं चला सकता। राज्य का वास्तविक संचालन अनेक व्यक्तियों के माध्यम से होता है—मंत्री, सेनापति, दूत, न्यायाधिकारी, कोषाध्यक्ष, नगराधिकारी और दूसरे राजकीय अधिकारी। इसलिए राजधर्म का प्रश्न केवल यह नहीं है कि राजा कैसा हो, बल्कि यह भी है कि राजा अपने साथ किन लोगों को रखे और उन्हें किस प्रकार उत्तरदायी बनाए।
भीष्म के सामने युधिष्ठिर का प्रश्न इसी व्यावहारिक धरातल पर आता है। शासन में व्यक्ति का चयन स्वयं शासन की गुणवत्ता का निर्धारण करता है।
महाभारत में कहा गया है—
एककार्ये नियुक्तः स्याद् द्वौ वा त्रय एव वा। न तेऽन्योन्यं सहन्ते हि कर्मणां विघ्नकारिणः॥
अर्थ यह है कि किसी कार्य के लिए उत्तरदायित्व स्पष्ट होना चाहिए। एक ही कार्य पर अनेक अधिकारियों को इस प्रकार नियुक्त कर देना कि वे एक-दूसरे के अधिकार में हस्तक्षेप करते रहें, प्रशासन में संघर्ष और निष्क्रियता उत्पन्न कर सकता है। शान्तिपर्व के इस विचार में प्रशासनिक उत्तरदायित्व की एक महत्वपूर्ण समझ दिखाई देती है।
यहाँ एक सूक्ष्म बात है। इसका अर्थ यह नहीं कि शासन में सामूहिक परामर्श नहीं होना चाहिए। भीष्म स्वयं मंत्रणा और योग्य सलाहकारों के महत्व को स्वीकार करते हैं। अंतर मंत्रणा और उत्तरदायित्व के बीच है। निर्णय पर अनेक लोग विचार कर सकते हैं, लेकिन किसी कार्य का उत्तरदायित्व अस्पष्ट नहीं होना चाहिए।
यही किसी भी प्रशासन की पहली कसौटी है—कौन सलाह देगा, कौन निर्णय करेगा और कौन परिणाम के लिए उत्तरदायी होगा।
योग्य अधिकारी की पहचान
भीष्म के अनुसार मंत्री में केवल राजा के प्रति निष्ठा पर्याप्त नहीं है। उसे बुद्धिमान, संयमी, सत्यनिष्ठ, समय और परिस्थिति को समझने वाला तथा अपने कर्तव्य के प्रति सजग होना चाहिए। वह ऐसा व्यक्ति नहीं होना चाहिए जो केवल राजा को प्रसन्न करने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग करे।
एक मंत्री के विषय में शान्तिपर्व में अनेक गुण गिनाए गए हैं—इन्द्रियनिग्रह, लोभ से मुक्त होना, स्थान और काल की समझ, कार्यकुशलता, नीति का ज्ञान, मधुर व्यवहार, साहस, विनय और अपने स्वामी के हित में निरन्तर कार्य करने की क्षमता।
इसमें एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सिद्धान्त छिपा है।
राजा को अपने आसपास प्रशंसकों की नहीं, योग्य व्यक्तियों की आवश्यकता है।
प्रशंसा करने वाला व्यक्ति राजा को प्रसन्न रख सकता है; लेकिन सही सलाह देने वाला व्यक्ति राज्य को सुरक्षित रखता है।
इसीलिए भीष्म ऐसे व्यक्तियों को महत्व देते हैं जो राजा को उचित बात कह सकें। मंत्रिपरिषद का उद्देश्य राजा की इच्छा को दोहराना नहीं, बल्कि उसे ऐसी सूचनाएँ और विचार उपलब्ध कराना है जिनके आधार पर वह सही निर्णय ले सके। शान्तिपर्व में मंत्रियों के लिए विनय, आत्मसंयम, सत्य और उचित बात कहने का साहस विशेष रूप से उल्लेखित है।
निष्ठा और चाटुकारिता में अंतर
प्राचीन राजव्यवस्था में राजा के प्रति निष्ठा आवश्यक थी। लेकिन निष्ठा का अर्थ अंधसमर्थन नहीं था।
यदि अधिकारी राजा के प्रत्येक निर्णय को सही बताने लगे, तो राजा के पास अपनी भूल पहचानने का कोई साधन नहीं बचेगा। तब प्रशासन धीरे-धीरे वास्तविकता से कट जाता है।
यहाँ महाभारत का राजनीतिक दर्शन आधुनिक प्रशासन से एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछता दिखाई देता है—
क्या सत्ता के निकट होना सत्य बोलने की क्षमता को समाप्त कर देता है?
यदि ऐसा होता है, तो समस्या केवल राजा की नहीं रहती; पूरा सलाहतंत्र दोषपूर्ण हो जाता है।
इसलिए योग्य मंत्री वह है जो राजा का विरोध करने के लिए विरोध न करे, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर राजा को अप्रिय सत्य भी बता सके।
अधिकारी की योग्यता केवल ज्ञान नहीं
शान्तिपर्व में अधिकारी के लिए केवल विद्वत्ता पर्याप्त नहीं मानी गई। ज्ञान के साथ व्यवहारिक बुद्धि भी अपेक्षित है।
स्थान, काल और परिस्थिति को समझना—यह गुण बार-बार सामने आता है। युद्ध के समय जो निर्णय उचित हो सकता है, शान्ति के समय वही निर्णय अनुचित हो सकता है। संकट में कठोरता आवश्यक हो सकती है, लेकिन सामान्य परिस्थिति में वही कठोरता प्रजा पर अनावश्यक भार बन सकती है।
इसलिए प्रशासन में नियम के साथ विवेक भी आवश्यक है।
यहाँ महाभारत का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यावहारिक हो जाता है। शासन केवल शास्त्र पढ़कर नहीं चलता; उसे वास्तविक परिस्थितियों को समझना पड़ता है।
अधिकारी स्वयं भी परीक्षा में है
राजा के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल बाहरी शत्रु नहीं है। भीतर का भ्रष्ट प्रशासन भी राज्य को कमजोर कर सकता है।
जो अधिकारी राज्य के धन को अपना धन समझने लगे, जो पद का उपयोग निजी लाभ के लिए करे, जो न्याय को प्रभावित करे या जो राजा को वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ रखे—वह व्यक्ति केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं करता; वह राज्य की संरचना को भीतर से कमजोर करता है।
इसीलिए भीष्म प्रशासन में ऐसे लोगों की नियुक्ति पर बल देते हैं जो लोभ से नियंत्रित न हों और अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहें।
यहाँ राजकोष, न्याय, सेना और प्रजा—चारों एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
भ्रष्ट अधिकारी राजकोष को नुकसान पहुँचा सकता है; राजकोष की कमजोरी सेना और प्रशासन को प्रभावित कर सकती है; कमजोर प्रशासन प्रजा की सुरक्षा घटा सकता है; और असुरक्षित प्रजा राज्य के प्रति विश्वास खो सकती है।
इस प्रकार प्रशासन की छोटी-सी विकृति धीरे-धीरे पूरे राज्य की संरचना को प्रभावित कर सकती है।
युधिष्ठिर के शासन में उत्तरदायित्व का प्रयोग
महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर राज्य संभालते हैं, तब विभिन्न व्यक्तियों को विभिन्न उत्तरदायित्व सौंपे जाने का वर्णन भी मिलता है। भीम को युवराज, संजय को वित्तीय व्यवस्था, नकुल को सेना से संबंधित कार्य, अर्जुन को शत्रु-दमन और दण्ड से संबंधित दायित्व तथा सहदेव को राजा के निकट रहने का कार्य दिया गया बताया गया है। (Wisdom Library)
यह प्रसंग केवल नियुक्तियों की सूची नहीं है। इसमें शासन की एक कार्यात्मक संरचना दिखाई देती है।
राज्य का प्रत्येक कार्य राजा स्वयं नहीं करता; वह योग्य व्यक्तियों को दायित्व देता है। लेकिन दायित्व सौंपना और उत्तरदायित्व समाप्त कर देना एक बात नहीं है।
Delegation का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का सुव्यवस्थित वितरण है।
महाभारत के राजधर्म में यही बात बार-बार उभरती है—राजा को कार्य करने वाले लोगों की आवश्यकता है, लेकिन उन लोगों की गुणवत्ता और आचरण पर निगरानी रखना भी उसी का दायित्व है।
प्रशासन का सबसे बड़ा संकट — सूचना का विकृत होना
शासन में एक और गहरी समस्या होती है—राजा तक वास्तविक सूचना पहुँचे ही नहीं।
यदि अधिकारी अपने स्वार्थ के अनुसार सूचना छिपाएँ, अपने दोषों को छिपाने के लिए झूठ बोलें या केवल राजा को प्रसन्न करने वाली बातें पहुँचाएँ, तो राजा का निर्णय गलत सूचना पर आधारित हो जाएगा।
तब राजा भले ही व्यक्तिगत रूप से न्यायप्रिय हो, उसका शासन अन्यायपूर्ण परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
इसलिए प्रशासन की शुचिता का अर्थ केवल अधिकारियों का ईमानदार होना नहीं है। इसका अर्थ है—
सूचना का सही प्रवाह, अधिकार की स्पष्ट सीमा, कार्य का निश्चित उत्तरदायित्व और परिणाम की समीक्षा।
महाभारत के राजधर्म में यह विचार आधुनिक प्रशासनिक भाषा में नहीं कहा गया है, लेकिन उसके मूल में प्रशासनिक उत्तरदायित्व की स्पष्ट चेतना दिखाई देती है।
प्राचीन राजतंत्र और आधुनिक लोकतंत्र
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। शान्तिपर्व जिस राजनीतिक व्यवस्था की चर्चा करता है वह आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र नहीं है। वहाँ राजा राज्य का केंद्रीय शासक है। इसलिए उसके विचारों को आज की लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ सीधे समान नहीं किया जा सकता।
फिर भी एक मूल प्रश्न दोनों संदर्भों में विचारणीय है—
सत्ता चाहे किसी एक राजा के हाथ में हो या अनेक संस्थाओं में विभाजित हो, उसे चलाने वाले व्यक्तियों की योग्यता, सत्यनिष्ठा और उत्तरदायित्व कितना महत्वपूर्ण है?
यही वह बिंदु है जहाँ प्राचीन राजधर्म आज के लिए भी अध्ययन का विषय बनता है—न कि इसलिए कि आधुनिक शासन को प्राचीन व्यवस्था में वापस जाना चाहिए, बल्कि इसलिए कि सत्ता और मनुष्य के संबंध का प्रश्न आज भी समाप्त नहीं हुआ है।
प्रशासन का निष्कर्ष
शान्तिपर्व के इस चरण में राजधर्म एक व्यक्ति-केंद्रित विचार से आगे बढ़कर व्यवस्था-केंद्रित विचार बन जाता है।
अच्छा राजा आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
अच्छे मंत्री आवश्यक हैं, लेकिन वे भी पर्याप्त नहीं।
आवश्यक है—योग्य व्यक्ति, स्पष्ट उत्तरदायित्व, सत्य सूचना, परामर्श, निरीक्षण और ऐसा प्रशासन जिसमें पद व्यक्तिगत स्वार्थ का साधन न बन जाए।
यही कारण है कि भीष्म मंत्री और अधिकारियों के गुणों पर इतना विस्तार करते हैं। राज्य की शक्ति केवल राजा के सिंहासन में नहीं होती; वह उन असंख्य लोगों के आचरण में होती है जो राजा के निर्णय को वास्तविक जीवन में लागू करते हैं।
और यहीं से राजधर्म का अगला प्रश्न जन्म लेता है—
जब राजा और अधिकारी निर्णय लेते हैं, तब उस निर्णय को प्रजा के सामने न्यायपूर्ण कैसे बनाया जाए?
अब चर्चा शासन की मशीनरी से आगे बढ़कर राजा, मंत्री और न्याय के बीच संबंध की ओर जाएगी—जहाँ प्रशासन की सफलता का वास्तविक परीक्षण होता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
इस भाग में प्रशासनिक उत्तरदायित्व को आगे बढ़ाया गया है और पिछले भाग के राजा के आत्मसंयम वाले विवेचन को दोहराने से बचाया गया है। अगले भाग में इसी क्रम से राजकीय निर्णय, न्याय और निष्पक्षता पर आगे बढ़ सकते हैं।
Comments
Post a Comment