वो सामने था और ज़माना बदल गया,

 ग़ज़ल

वो सामने था और ज़माना बदल गया,
दिल का तमाम दर्द अचानक बदल गया।

उसकी निगाह पड़ी तो अजब बात हो गई,
जो कुछ था मेरे अंदर, वो मतलब बदल गया।

कल तक जो एक ख़्वाब था आँखों में रात भर,
वो आज मेरी नींद का हिस्सा बदल गया।

मैंने उसे पुकारा तो आवाज़ लौट आई,
फिर जाने किस तरफ़ से ये रस्ता बदल गया।

वो चुप रहा तो कितनी सदाएँ थीं उसके पास,
मैं सुनता रहा तो मेरा सुनना बदल गया।

जिस शहर में उम्र गुज़ारी थी शोर में,
उसके गुज़रते ही वही शहर बदल गया।

पहले तो उसके हिज्र में बेचैन था बहुत,
वो दूर क्या हुआ कि मेरा डर बदल गया।

अब भी वही मकान, वही खिड़कियाँ मगर,
जिसमें वो एक बार रहा—वो घर बदल गया।

मैं सोचता रहा कि मोहब्बत कहाँ गई,
देखा तो मेरे अंदर ही मौसम बदल गया।

मुकेश

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