महाभारत - आदिपर्व से वनपर्व की ओर वनवास : राजसत्ता से बाहर निकलकर दूसरे संसार में प्रवेश
आदिपर्व से वनपर्व की ओर
वनवास : राजसत्ता से बाहर निकलकर दूसरे संसार में प्रवेश
द्यूतसभा में सब कुछ हारने के बाद पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास और उसके बाद एक वर्ष का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा।
इन्द्रप्रस्थ पीछे छूट गया।
द्रौपदी के साथ पाँचों पाण्डव राजमहल से निकलकर वन की ओर चले।
यह महाभारत की कथा में एक बड़ा परिवर्तन है।
अब तक पाण्डवों का संघर्ष मुख्यतः राजसत्ता, उत्तराधिकार और राजसभाओं के भीतर था। अब वही पात्र वन, आश्रम, ऋषियों और दूसरे जीवन-जगतों के बीच दिखाई देंगे।
जो लोग अभी तक राजसभा में धर्म का प्रश्न पूछ रहे थे, अब उन्हें वन में उसी धर्म को जीना है।
1. वन में प्रवेश
पाण्डव वनवास के दौरान काम्यक वन और द्वैत वन जैसे वन-क्षेत्रों में रहते हैं। इन स्थानों की आधुनिक भौगोलिक पहचान पूरी तरह निश्चित नहीं मानी जाती, इसलिए इन्हें किसी एक वर्तमान जिले या राज्य से जोड़ना उचित नहीं होगा।
उनके साथ अनेक ब्राह्मण भी हो जाते हैं।
राजमहल की सुविधाएँ समाप्त हो चुकी हैं।
अब भोजन, आश्रय, सुरक्षा और दैनिक जीवन स्वयं परीक्षा बन जाते हैं।
द्रौपदी के भीतर अपमान की अग्नि है।
भीम प्रतिशोध के लिए व्याकुल हैं।
अर्जुन भविष्य के युद्ध की तैयारी की ओर बढ़ते हैं।
और युधिष्ठिर के सामने प्रश्न है—
क्या धर्म का पालन उस समय भी किया जाए जब धर्म का पालन करने वाला स्वयं अन्याय का शिकार हो?
यही वनवास की मूल दार्शनिक भूमि है।
2. वन में कथा क्यों बढ़ती है?
वनवास के दौरान अनेक ऋषि पाण्डवों से मिलने आते हैं।
और उनके साथ आती हैं—पुरानी कथाएँ।
नल–दमयंती की कथा।
सावित्री–सत्यवान की कथा।
रामोपाख्यान।
प्राचीन राजाओं और ऋषियों के आख्यान।
तीर्थों की कथाएँ।
इन सबका हम यहाँ विस्तार नहीं करेंगे।
इनका मुख्य कार्य समझना पर्याप्त है—
पाण्डवों के वर्तमान दुःख को अतीत की विशाल मानवीय स्मृति में रख देना।
पाण्डव अकेले दुःख भोगने वाले मनुष्य नहीं हैं।
उनसे पहले भी राजा राज्य खो चुके हैं।
पति-पत्नी अलग हुए हैं।
मनुष्य मृत्यु से टकराया है।
राज्य और वैभव नष्ट हुए हैं।
इस प्रकार आख्यान पाण्डवों के दुःख को व्यक्तिगत घटना से सार्वभौम मानवीय अनुभव में बदल देते हैं।
3. नल–दमयंती : एक संक्षिप्त दर्पण
नल राज्य खोते हैं और दमयंती से उनका वियोग होता है।
भटकने, दुःख और अंततः पुनर्मिलन की कथा युधिष्ठिर को सुनाई जाती है।
यह पाण्डवों की अपनी परिस्थिति का एक प्रकार का कथात्मक दर्पण है।
संदेश सरल है—
राज्य खो देना मनुष्य का सम्पूर्ण विनाश नहीं है।
4. सावित्री–सत्यवान
सावित्री की कथा में मृत्यु के सामने मनुष्य की दृढ़ता सामने आती है।
वह यम के सामने अपने तर्क, धैर्य और संकल्प से सत्यवान के जीवन को पुनः प्राप्त करती है।
यह कथा आगे हमारे मृत्यु, आत्मा और पुनर्जन्म संबंधी शोध के लिए उपयोगी होगी; इसलिए अभी इसे विस्तार नहीं देते।
5. अर्जुन का प्रस्थान
वनवास के दौरान एक महत्वपूर्ण निर्णय होता है।
भविष्य में होने वाले संघर्ष के लिए पाण्डवों को दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता है।
अर्जुन तपस्या और अस्त्र-प्राप्ति के लिए निकलते हैं।
वे कठोर तप करते हैं।
इसी क्रम में उनका सामना एक अद्भुत शिकारी से होता है।
वह कोई सामान्य मनुष्य नहीं—
किरात रूप में स्वयं शिव हैं।
6. किरातार्जुनीय प्रसंग
वन में एक जंगली सूअर दिखाई देता है।
अर्जुन उस पर बाण चलाते हैं।
उसी समय एक अन्य शिकारी भी उस पर बाण चलाता है।
दोनों के बीच विवाद होता है और फिर युद्ध।
अर्जुन उस शिकारी की असाधारण शक्ति से चकित होते हैं।
अंततः उन्हें पता चलता है कि वह शिव हैं।
शिव उनकी तपस्या और वीरता से प्रसन्न होकर उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान करते हैं।
7. वन का दूसरा अर्थ
यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वन अब केवल—
निर्वासन और दुःख
का स्थान नहीं है।
वह बन जाता है—
तपस्या, ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने का स्थान।
राजमहल में अर्जुन योद्धा थे।
वन में वे साधक बनते हैं।
इन्द्रप्रस्थ ने उन्हें राजनीतिक शक्ति दी थी।
वन उन्हें ऐसी शक्ति देता है जिसका उपयोग भविष्य के युद्ध में होना है।
इसलिए महाभारत में वन सभ्यता के बाहर का खाली स्थान नहीं है।
वह अपना अलग ज्ञान-संसार रखता है।
8. अर्जुन और देवताओं का संसार
अर्जुन आगे इन्द्रलोक जाते हैं और अनेक दिव्य अस्त्र प्राप्त करते हैं।
उर्वशी का प्रसंग भी इसी क्रम में आता है।
उर्वशी के प्रति अर्जुन का व्यवहार और उसके बाद प्राप्त शाप आगे अज्ञातवास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
इसलिए अभी इसे विस्तार नहीं देते।
9. जयद्रथ और द्रौपदी
वनवास के दौरान जयद्रथ द्रौपदी का हरण करने का प्रयास करता है।
पाण्डव उसका पीछा करके उसे पराजित करते हैं।
युधिष्ठिर के निर्णय से उसका जीवन बच जाता है।
आगे कुरुक्षेत्र में यही जयद्रथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अभी कथा आगे बढ़ती है।
10. वनवास का दार्शनिक शिखर — यक्षप्रश्न
वनवास के अंतिम चरण में पाण्डव एक सरोवर के पास पहुँचते हैं।
एक अदृश्य सत्ता उन्हें चेतावनी देती है कि उसके प्रश्नों का उत्तर दिए बिना जल न पिएँ।
पाण्डव उस चेतावनी की उपेक्षा करते हैं और एक-एक करके भूमि पर गिर जाते हैं।
अंततः युधिष्ठिर वहाँ पहुँचते हैं।
वह सत्ता उनसे प्रश्न करती है।
यह है—
यक्षप्रश्न।
11. यक्षप्रश्न : युद्ध नहीं, संवाद
यक्ष पूछता है—
धर्म क्या है?
मार्ग क्या है?
मनुष्य का आश्चर्य क्या है?
जीवन का आधार क्या है?
युधिष्ठिर उत्तर देते हैं।
उनका ज्ञान केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं है।
वह जीवन के अनुभव से निकला हुआ विवेक है।
मृत्यु के संबंध में उनका उत्तर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—
मनुष्य प्रतिदिन दूसरों को मरते देखता है, फिर भी स्वयं को अमर मानकर चलता है।
यक्ष प्रसन्न होता है।
पाण्डवों को जीवन वापस मिलता है।
12. यक्षप्रश्न का वास्तविक महत्व
वनवास का चरम किसी युद्ध में नहीं आता।
एक संवाद में आता है।
यह बहुत महत्वपूर्ण है।
राजसभा में युधिष्ठिर से धर्म छूट गया था।
वन में वही युधिष्ठिर धर्म के प्रश्नों के सामने खड़े होते हैं।
इसलिए वनवास केवल बाहरी दण्ड नहीं था।
वह एक प्रकार की आंतरिक परीक्षा भी था।
राजा से वनवासी और वनवासी से पुनः धर्मज्ञ—यह युधिष्ठिर की यात्रा है।
13. अब वनवास समाप्त होने वाला है
बारह वर्ष पूरे हो चुके हैं।
लेकिन अभी अंतिम परीक्षा बाकी है—
एक वर्ष का अज्ञातवास।
अब पाण्डवों को ऐसी जगह रहना है जहाँ कोई उन्हें पहचान न सके।
इसके लिए वे पहुँचते हैं—
मत्स्य देश के राजा विराट के राज्य में।
महाभारत की कथा अब वन से निकलकर फिर एक राजकीय संसार में लौटती है।
लेकिन इस बार पाण्डव राजा होकर नहीं आएँगे।
वे अपनी पहचान छिपाकर आएँगे—
युधिष्ठिर → कंक
भीम → बल्लव
अर्जुन → बृहन्नला
नकुल → ग्रन्थिक
सहदेव → तन्तिपाल
द्रौपदी → सैरन्ध्री
और यहाँ हमारे लिए एक नया प्रश्न जन्म लेगा—
यदि मनुष्य अपना नाम, पद और वेश बदल दे, तो उसकी वास्तविक पहचान क्या बचती है—उसका जन्म, उसका कर्म, उसका स्वभाव या उसकी चेतना?
अगला भाग :
विराटनगर : अज्ञातवास और पहचान की परीक्षा
यहाँ से कथा कीचक, गो-हरण और अर्जुन के पुनः प्रकट होने के माध्यम से सीधे आगे बढ़ेगी।
— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना
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