महाभारत — भीष्मपर्व भाग — कुरुक्षेत्र का प्रथम दृश्य : धृतराष्ट्र का प्रश्न और संजय की दृष्टि

 महाभारत — भीष्मपर्व

भाग — कुरुक्षेत्र का प्रथम दृश्य : धृतराष्ट्र का प्रश्न और संजय की दृष्टि

तेरह वर्षों की यात्रा अब एक मैदान में आकर ठहरती है

महाभारत की कथा अब उस स्थान पर पहुँच चुकी है जिसकी ओर घटनाएँ लगातार बढ़ रही थीं।

वनवास समाप्त हुआ। अज्ञातवास समाप्त हुआ।

विराट में पाण्डवों की पहचान प्रकट हुई। 

उनका राजनीतिक आधार पुनः निर्मित हुआ।

शांति का प्रयास हुआ। कृष्ण स्वयं हस्तिनापुर गए।

न्यूनतम समझौते का प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिया गया।

कर्ण के जन्म का रहस्य सामने आया।

दोनों पक्षों ने अपनी सेनाएँ संगठित कर लीं।

अब— कुरुक्षेत्र सामने है। यह केवल युद्ध का मैदान नहीं है। 

महाभारत इसे पहले ही धर्मक्षेत्र कह चुका है।

यही दो शब्द आगे आने वाली पूरी भगवद्गीता की दार्शनिक भूमि तैयार करते हैं— धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

लेकिन यहाँ एक प्रश्न तुरंत उठता है—

धृतराष्ट्र युद्धभूमि में उपस्थित नहीं हैं, फिर भी गीता की शुरुआत उन्हीं से क्यों होती है?

पहला प्रश्न अर्जुन का नहीं, धृतराष्ट्र का है

भगवद्गीता का पहला श्लोक है— 

धृतराष्ट्र उवाच - 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १॥

धृतराष्ट्र पूछते हैं—

“हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?”

पहली दृष्टि में यह एक सामान्य प्रश्न लगता है।

लेकिन शब्दों को ध्यान से देखें— मामकाः। “मेरे लोग।” और दूसरी ओर— पाण्डवाः। “पाण्डु के पुत्र।”

धृतराष्ट्र दोनों पक्षों को एक ही परिवार के सदस्य के रूप में नहीं देखते।

वह पहले ही उन्हें दो समूहों में विभाजित कर चुके हैं— मेरे और उनके।

यहीं गीता के पहले ही श्लोक में एक गहरा मनोवैज्ञानिक संकेत मिलता है।

“मामकाः” केवल संबंधवाचक शब्द नहीं

धृतराष्ट्र के लिए दुर्योधन और उसके भाई केवल कुरुवंश के राजकुमार नहीं हैं।

वे— “मेरे पुत्र” हैं।  युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन आदि उनके भतीजे हैं।

यह जैविक संबंध का तथ्य है।

लेकिन नैतिक दृष्टि से यही विभाजन समस्या बन गया है।

राजा का निर्णय पूरे राज्य के लिए होना चाहिए।

लेकिन धृतराष्ट्र की दृष्टि में राज्य और पुत्र-हित अलग नहीं रह गए।

यही वह मानसिक स्थिति है जिसे महाभारत बार-बार मोह और आसक्ति के रूप में सामने लाता है।

इसलिए गीता की शुरुआत युद्धभूमि से होने पर भी उसका पहला प्रश्न वास्तव में मनुष्य के भीतर से आता है—

क्या मैं वस्तुस्थिति को निष्पक्ष होकर देख रहा हूँ, या “मेरा” और “पराया” मेरी दृष्टि को नियंत्रित कर रहे हैं?

यह प्रश्न आगे गीता में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएगा।

धृतराष्ट्र देख नहीं सकते—लेकिन समस्या केवल उनकी आँखों की नहीं

धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हैं। इसलिए वे युद्धभूमि को स्वयं देख नहीं सकते।

लेकिन महाभारत में उनका अंधत्व केवल शारीरिक परिस्थिति तक सीमित नहीं रहता।

उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि—

वे जानते हुए भी अपने पुत्र के अन्याय को रोक नहीं पाते।

उन्होंने अनेक बार दुर्योधन के व्यवहार को गलत माना।

विदुर ने उन्हें चेताया। भीष्म ने चेताया।

द्रोण, संजय और अन्य लोगों ने भी परिस्थिति की भयावहता समझी।

फिर भी धृतराष्ट्र अपने पुत्र-मोह से मुक्त नहीं हो सके।

इसलिए गीता का आरंभ एक अत्यंत महत्वपूर्ण विरोधाभास से होता है—

जिस व्यक्ति की आँखें नहीं हैं, वही युद्ध को “देखने” के लिए संजय से पूछ रहा है।

और आगे कथा हमें यह दिखाएगी कि केवल आँखें होना ही पर्याप्त नहीं।

देखना और सत्य को देख पाना अलग बातें हैं।

संजय कौन हैं?

यहाँ हमें संजय की भूमिका समझनी होगी।

संजय धृतराष्ट्र के विश्वस्त सारथी और मंत्री हैं।

वह युद्धभूमि में उपस्थित घटनाओं का वर्णन धृतराष्ट्र को करते हैं।

महाभारत की परंपरा के अनुसार व्यास उन्हें ऐसी दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे वे दूर घट रही घटनाओं को देख और सुन सकते हैं।

यही कारण है कि गीता केवल कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद नहीं रह जाती।

उस संवाद का एक द्रष्टा भी है— संजय। और एक श्रोता है— धृतराष्ट्र।

इस प्रकार गीता के आरंभ में ही चार स्तर बन जाते हैं—

कुरुक्षेत्र में अर्जुन और कृष्ण → संजय की दृष्टि → धृतराष्ट्र का श्रवण → और हमारे सामने गीता का पाठ।

संजय की दृष्टि को कैसे समझें?

यहाँ शोध की दृष्टि से हमें तीन स्तर अलग रखने चाहिए।

पहला — पाठ का प्रत्यक्ष स्तर

महाभारत स्पष्ट रूप से संजय को ऐसी विशेष दृष्टि प्राप्त होने का वर्णन करता है।

महाकाव्य की अपनी कथा-व्यवस्था में यह वास्तविक घटना है।

दूसरा — धार्मिक/परंपरागत स्तर

परंपरा इसे व्यास की कृपा और दिव्यदृष्टि के रूप में स्वीकार करती है।

तीसरा — आधुनिक व्याख्यात्मक स्तर

आधुनिक पाठक इसे कथा की ऐसी साहित्यिक तकनीक के रूप में भी देख सकता है जिसके माध्यम से लेखक युद्धभूमि की घटनाओं को एक दूर बैठे श्रोता तक पहुँचाता है।

लेकिन तीसरे स्तर को पहले का खंडन नहीं कहना चाहिए।

ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण के अभाव को कथा के धार्मिक अर्थ का खंडन मानना भी उचित नहीं है।

हमारा शोध यहाँ दोनों को अलग रखेगा।

व्यास की भूमिका भी यहीं महत्वपूर्ण हो जाती है

महाभारत की कथा में व्यास केवल एक पात्र नहीं हैं।

वे स्वयं इस महाकाव्य की संरचना से जुड़े हुए हैं।

यही कारण है कि संजय को दिव्यदृष्टि देने का प्रसंग केवल चमत्कारिक घटना के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

यह महाभारत की कथा-रचना की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

युद्धभूमि पर उपस्थित प्रत्येक घटना को स्वयं देखने वाला धृतराष्ट्र नहीं है।

संजय देखता है। धृतराष्ट्र सुनता है।

और पाठक संजय के वर्णन के माध्यम से युद्ध देखता है।

इस प्रकार महाभारत हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है—

इतिहास या आख्यान केवल घटना नहीं है; घटना को देखने और कहने वाला भी उसके अर्थ को प्रभावित करता है।

“धर्मक्षेत्र” क्यों? अब पहले श्लोक के दूसरे महत्वपूर्ण शब्द पर आएँ— धर्मक्षेत्र।

कुरुक्षेत्र केवल भौगोलिक स्थान नहीं है।

महाभारत परंपरा में कुरुक्षेत्र अत्यंत प्राचीन यज्ञभूमि और पवित्र क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित है।

इसलिए धृतराष्ट्र का प्रश्न केवल यह नहीं है— “कुरुक्षेत्र में क्या हुआ?”

बल्कि एक सूक्ष्म तनाव भी पैदा करता है— धर्मभूमि पर युद्ध होने जा रहा है।

लेकिन दोनों पक्षों में से धर्म किसके साथ है?

यही प्रश्न आगे पूरी गीता में विभिन्न रूपों में सामने आएगा।

धर्मक्षेत्र और युद्धक्षेत्र का विरोधाभास

यदि कोई स्थान धर्मक्षेत्र है तो वहाँ युद्ध क्यों?

यही महाभारत की शक्ति है।

यह धर्म को केवल शांतिपूर्ण परिस्थिति से नहीं जोड़ता।

कभी-कभी धर्म का प्रश्न संघर्ष के बीच उठता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि—

जहाँ युद्ध हो, वहाँ युद्ध करना ही धर्म है।

यही निष्कर्ष गीता के अध्ययन में सबसे अधिक सावधानी माँगता है।

अर्जुन का संकट इसी कारण वास्तविक है।

वह युद्धभूमि में खड़ा होकर पूछेगा—

यदि सामने मेरे गुरु, पितामह, भाई, पुत्र, मित्र और संबंधी हैं, तो क्या केवल युद्ध का आदेश पर्याप्त है?

यहीं से “कर्तव्य” और “धर्म” के बीच अंतर खुलना शुरू होता है।

सेनाएँ आमने-सामने

धृतराष्ट्र के प्रश्न के बाद संजय युद्धभूमि का दृश्य बताना आरंभ करते हैं।

दुर्योधन पाण्डवों की सेना को देखता है।

वह द्रोणाचार्य के पास जाता है और पाण्डव सेना की ओर संकेत करता है।

वह विशेष रूप से उन योद्धाओं का उल्लेख करता है जो पाण्डव पक्ष में खड़े हैं।

धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज आदि प्रमुख योद्धाओं का वर्णन आता है।

इसके बाद वह अपने पक्ष के महान योद्धाओं की ओर संकेत करता है—

भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण, भूरिश्रवा आदि। यह केवल सैनिकों की सूची नहीं है।

यह महाभारत के पिछले पूरे इतिहास का एक संक्षिप्त दृश्य है।

जो पात्र हमने वर्षों की कथा में अलग-अलग देखे थे— अब एक ही मैदान में आमने-सामने हैं।

दुर्योधन का मनोविज्ञान

दुर्योधन का द्रोण के पास जाना भी ध्यान देने योग्य है।

वह अपने सेनापति भीष्म के बजाय पहले द्रोण को संबोधित करता है।

और पाण्डव पक्ष की शक्ति की ओर ध्यान दिलाता है।

उसकी भाषा में आत्मविश्वास भी है और चिंता भी।

वह अपनी विशाल सेना का उल्लेख करता है, लेकिन पाण्डव सेना के संगठन को भी रेखांकित करता है।

यह युद्ध शुरू होने से पहले की मनःस्थिति है।

अभी कोई बाण नहीं चला।

लेकिन युद्ध का मनोवैज्ञानिक दबाव शुरू हो चुका है।

भीष्म का सिंहनाद

इसके बाद भीष्म अपना शंख बजाते हैं।

कौरव सेना में शंख, भेरी, नगाड़े और युद्धवाद्य बज उठते हैं।

फिर कृष्ण और अर्जुन अपने दिव्य शंख बजाते हैं।

यह दृश्य गीता के भीतर अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रमण है।

अब तक हम— राजनीति → कूटनीति → परिवार → प्रतिज्ञा → सेना-संगठन

के संसार में थे। अब हम— युद्धभूमि में हैं। लेकिन अभी भी अर्जुन ने अपना संकट व्यक्त नहीं किया है।

कृष्ण यहाँ केवल सारथी हैं—या कुछ और?

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण दृश्य सामने आता है।

कृष्ण युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएँगे।

उन्होंने स्वयं को अर्जुन के सारथी के रूप में चुना है।

याद करें— दुर्योधन ने कृष्ण की सेना चुनी थी।

अर्जुन ने कृष्ण को चुना था। अब उसका परिणाम हमारे सामने है।

कृष्ण रथ पर हैं।

उनके हाथ में शस्त्र नहीं है।

लेकिन वही कृष्ण कुछ क्षण बाद अर्जुन के जीवन के सबसे बड़े दार्शनिक प्रश्न का उत्तर देने वाले हैं।

इसलिए गीता में कृष्ण की भूमिका को केवल “भगवान ने उपदेश दिया” कहकर समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा।

वह पहले— सारथी हैं। 

फिर— संवादकर्ता हैं।

फिर— मार्गदर्शक हैं।

और धीरे-धीरे अर्जुन के लिए— आध्यात्मिक गुरु बनते हैं।

अब अर्जुन की बारी

अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हैं। लेकिन वह एक अनुरोध करते हैं।

वे कृष्ण से कहते हैं— सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत। 

“हे अच्युत! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए।”

यह साधारण सैन्य आदेश नहीं है।

अर्जुन अभी तक युद्ध को एक सामान्य युद्ध की तरह देख रहे थे।

अब वह चाहते हैं कि वह स्वयं देखें—

किन लोगों के साथ मुझे युद्ध करना है?

कृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाते हैं।

और यहीं— महाभारत का युद्ध एक मनुष्य के भीतर प्रवेश करता है।

यहाँ हमारी पिछली पूरी कथा अचानक अर्थवान हो जाती है

अब तक हमने जिन पात्रों को अलग-अलग देखा—

भीष्म। द्रोण। कृप। कर्ण। शल्य। दुर्योधन। युधिष्ठिर। भीम। अर्जुन। कृष्ण। द्रुपद। विराट। सात्यकि।

अब वे सभी एक साथ अर्जुन की आँखों के सामने हैं।

और अर्जुन केवल सैनिक नहीं देखता।

वह देखता है— पितामह। गुरु। भाई। मित्र। संबंधी। और यही अंतर निर्णायक है।

दुर्योधन ने युद्धभूमि में सेना देखी। अर्जुन युद्धभूमि में संबंध देखने लगता है।

यहीं दोनों की दृष्टि अलग हो जाती है।

यही गीता का वास्तविक प्रवेश-बिंदु है

अभी कृष्ण ने कोई उपदेश नहीं दिया है। अभी “कर्मयोग” नहीं आया।

अभी “आत्मा” का विवेचन नहीं हुआ। अभी “सांख्य” नहीं आया।

अभी “स्थितप्रज्ञ” नहीं आया। अभी “मोक्ष” नहीं आया।

पहले एक मनुष्य को अपनी वास्तविक परिस्थिति देखने दी गई है।

यही बहुत महत्वपूर्ण है। गीता उत्तर से शुरू नहीं होती।

गीता— संकट को स्पष्ट देखने से शुरू होती है।

अर्जुन को पहले अपनी समस्या दिखाई देती है।

फिर वह प्रश्न करता है।

फिर वह स्वीकार करता है कि वह स्वयं निर्णय नहीं कर पा रहा।

और तब वह कृष्ण से कहता है— शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।

“मैं आपका शिष्य हूँ; मुझे शिक्षा दीजिए।”  लेकिन यह अभी आगे आने वाला क्षण है।

हमारे शोध के लिए सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष

अब तक की महाभारत-यात्रा को यदि एक सूत्र में रखें तो दिखाई देता है—

गीता युद्ध शुरू होने से पहले नहीं, बल्कि युद्ध की नैतिक अपरिहार्यता के अंतिम बिंदु पर जन्म लेती है।

यह कोई अचानक उत्पन्न दार्शनिक भाषण नहीं है।

इसके पीछे एक विशाल ऐतिहासिक-कथात्मक पृष्ठभूमि है—

द्यूत → वनवास → अपमान → संघर्ष → अज्ञातवास → राज्य की माँग → शांति-प्रयास → कृष्ण का दूतत्व → समझौते का अस्वीकार → युद्ध की तैयारी → कुरुक्षेत्र → अर्जुन का सामना।

इसलिए आगे जब हम अर्जुन के विषाद को पढ़ेंगे, तो उसे केवल “कमजोरी” नहीं कह सकते।

हमें पूछना होगा— वह किस प्रकार का संकट है?

क्या यह भय है? क्या यह करुणा है?

क्या यह मोह है? क्या यह नैतिक विवेक है?

क्या यह कर्तव्य-संघर्ष है?

या इन सबका एक साथ उपस्थित होना?

यही प्रश्न अगले भाग का केंद्र होगा।

अब हमारी कथा कहाँ पहुँची?

वनवास → अज्ञातवास → विराट → उद्योगपर्व → शांति-प्रयास → कर्ण–कुन्ती → सेनाओं का संगठन → कुरुक्षेत्र → धृतराष्ट्र का प्रश्न → संजय की दृष्टि → दोनों सेनाओं का आमना-सामना → कृष्ण का सारथी बनना → अर्जुन का रथ दोनों सेनाओं के बीच रखने का आग्रह → अब अर्जुन अपने सामने अपने संबंधियों को देख रहा है

— मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
भगवद्गीता शोध परियोजना

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