महाभारत — शल्यपर्व — भाग २ : दुर्योधन का अन्तिम आश्रय — सरोवर से गदायुद्ध तक

 महाभारत — शल्यपर्व — भाग २ : दुर्योधन का अन्तिम आश्रय — सरोवर से गदायुद्ध तक

शल्य के वध के बाद कौरव सेना का संगठित प्रतिरोध लगभग समाप्त हो चुका था।

दुर्योधन अब अकेला पड़ गया था।

जिस सेना के बल पर उसने युद्ध आरम्भ किया था, उसका अधिकांश भाग नष्ट हो चुका था। उसके प्रमुख सेनापति—भीष्म, द्रोण, कर्ण और शल्य—सभी मारे जा चुके थे।

अब दुर्योधन ने युद्धभूमि छोड़कर एक सरोवर में आश्रय लिया।

यह घटना महाभारत के युद्ध में एक असाधारण परिवर्तन का संकेत है।

अठारह दिनों तक युद्ध सेना बनाम सेना था; अब वह व्यक्ति बनाम व्यक्ति होने जा रहा था।

दुर्योधन का सरोवर में प्रवेश

महाभारत के वर्णन में दुर्योधन अपनी योगिक शक्ति से जल को नियंत्रित करके सरोवर के भीतर स्थित होता है।

यहाँ आधुनिक दृष्टि से सावधानी आवश्यक है।

इसे सीधे आधुनिक भौतिक विज्ञान की घटना मानना उचित नहीं होगा। यह महाभारत के आख्यान का वह स्तर है जहाँ वीर-चरित, असाधारण क्षमता और काव्यात्मक वर्णन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

लेकिन इसका कथात्मक अर्थ स्पष्ट है—

जो व्यक्ति पूरे युद्ध का केन्द्र था, वही अब युद्धभूमि से छिप गया है।

पाण्डवों को दुर्योधन का पता चलता है

कृष्ण और पाण्डव दुर्योधन को खोजते हुए उस सरोवर तक पहुँचते हैं।

दुर्योधन उन्हें देखकर भी बाहर आने के लिए तुरंत तैयार नहीं होता।

वह अपने कार्य को उचित ठहराता है और युद्ध की स्थिति को अपने पक्ष से देखने का प्रयास करता है।

लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं। कौरव सेना समाप्तप्राय थी।

दुर्योधन के पास अपने पक्ष में संगठित सेना नहीं थी। उसके सामने केवल पाण्डव थे।

यहीं से युद्ध का अंतिम निर्णय एक व्यक्तिगत द्वंद्व की दिशा में जाता है।

दुर्योधन की चुनौती

दुर्योधन अन्ततः सरोवर से बाहर आता है। वह युद्ध करने के लिए तैयार है।

पाण्डवों की ओर से कौन उसके साथ युद्ध करेगा—यह प्रश्न उठता है।

तब भीम आगे आते हैं।

यह चयन स्वाभाविक भी है और कथात्मक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण भी।

क्योंकि दुर्योधन और भीम के बीच संघर्ष केवल राजसत्ता का संघर्ष नहीं था।

यह वर्षों पुराने वैर का चरम था।

लाक्षागृह से लेकर द्यूतसभा तक, वनवास से लेकर कुरुक्षेत्र तक—दोनों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ता गया था।

और अब वही संघर्ष गदा के रूप में सामने आने वाला था।

गदा—सिर्फ अस्त्र नहीं

भीम और दुर्योधन दोनों गदायुद्ध में अत्यन्त कुशल थे।

यहाँ महाभारत युद्ध का स्वरूप फिर बदलता है।

अब धनुष नहीं। रथ नहीं। अक्षौहिणी सेना नहीं। अस्त्रों की विशाल व्यवस्था नहीं।

केवल— दो योद्धा, दो गदाएँ और एक निर्णायक द्वंद्व।

गदायुद्ध में शरीर का बल, संतुलन, गति, प्रहार की दिशा और प्रतिघात—सभी का महत्व था।

दुर्योधन इस कला में अत्यन्त दक्ष था।

भीम भी असाधारण शारीरिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।

इसलिए यह युद्ध केवल क्रोध का विस्फोट नहीं था; यह एक प्रशिक्षित युद्ध-कौशल की परीक्षा भी था।

बलराम का आगमन

इसी समय महाभारत के इस प्रसंग में एक और महत्वपूर्ण पात्र उपस्थित होता है—बलराम।

बलराम दोनों—भीम और दुर्योधन—के गदायुद्ध के गुरु थे।

इसलिए उनका आगमन इस द्वंद्व को एक अलग आयाम देता है।

अब यह केवल दो शत्रुओं का युद्ध नहीं रह जाता।

यह गुरु के सामने दो शिष्यों का अंतिम मुकाबला भी बन जाता है।

बलराम की उपस्थिति इस बात को और महत्वपूर्ण बनाती है कि गदायुद्ध के नियमों का पालन कैसे किया जाए।

युद्ध आरम्भ

भीम और दुर्योधन आमने-सामने खड़े होते हैं। दोनों की गदाएँ उठती हैं।

पहले प्रहार की प्रतीक्षा में दोनों योद्धा एक-दूसरे की गति को परखते हैं।

फिर संघर्ष आरम्भ होता है। गदा का प्रत्येक प्रहार अत्यन्त भारी था।

दोनों योद्धा कभी आगे बढ़ते, कभी पीछे हटते, कभी छलाँग लगाकर प्रहार करते और कभी दूसरे के प्रहार से बचते।

युद्ध लम्बा चलता है। किसी को तत्काल निर्णायक बढ़त नहीं मिलती।

यहीं महाभारत एक रोचक विरोधाभास सामने रखता है—

सत्रह दिनों के विशाल युद्ध के बाद भी अन्तिम निर्णय दो अत्यन्त प्रशिक्षित योद्धाओं के बीच व्यक्तिगत कौशल से होना था।

भीम की प्रतिज्ञा

लेकिन भीम के लिए यह केवल युद्ध-कौशल की परीक्षा नहीं थी।

द्यूतसभा में द्रौपदी के अपमान के समय भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ने की प्रतिज्ञा की थी।

वह प्रतिज्ञा अब उसके सामने थी।

दुर्योधन के शरीर का सबसे मजबूत भाग उसकी जंघाएँ थीं।

और गदायुद्ध के नियमों के अनुसार प्रतिद्वंद्वी की जंघा पर प्रहार करना अनुचित माना जाता था।

यहीं से आगामी प्रसंग केवल युद्ध नहीं रहता।

वह प्रतिज्ञा और युद्ध-नियम के संघर्ष में बदल जाता है।

और यही संघर्ष शल्यपर्व के सबसे विवादास्पद क्षण को जन्म देगा।

अगले भाग में—

भीम–दुर्योधन गदायुद्ध, जंघा पर प्रहार और कृष्ण का संकेत।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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