महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २० : आत्मा — शरीर से परे मनुष्य की वास्तविक पहचान
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २० : आत्मा — शरीर से परे मनुष्य की वास्तविक पहचान
वैराग्य की भूमि पर खड़े होकर युधिष्ठिर का प्रश्न अब और भीतर उतरता है। यदि वस्तुओं से आसक्ति दुःख का कारण है, यदि शरीर नश्वर है, यदि राज्य, संबंध, धन और यश सब परिवर्तनशील हैं, तो वह क्या है जो इन सबके परिवर्तन को देखता है?
यहीं से शान्तिपर्व का प्रश्न केवल जीवन के आचरण का नहीं रहता। वह मनुष्य की मूल पहचान तक पहुँच जाता है।
महाभारत के मोक्षधर्म में आत्मा के विषय में एक ही प्रकार की दार्शनिक भाषा नहीं मिलती। कहीं आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहा गया है, कहीं साक्षी, कहीं शरीर और इन्द्रियों से भिन्न चेतन सत्ता, तो कहीं उसे परमात्मा और ब्रह्म की ओर ले जाने वाली अन्तःस्थिति के रूप में समझाया गया है। इसलिए शान्तिपर्व को किसी एक बाद के दार्शनिक मत में पूरी तरह बाँध देना उचित नहीं होगा।
शरीर दिखाई देता है, आत्मा नहीं
महाभारत एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भेद करता है—इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को जानती हैं, मन उन अनुभवों में संशय करता है और बुद्धि उनका निश्चय करती है; लेकिन इन सबको जानने वाला कौन है?
मोक्षधर्म में कहा गया है— इन्द्रियाणि पञ्चैव मनः षष्ठमिह स्मृतम्। बुद्धिः सप्तमी प्रोक्ता क्षेत्रज्ञस्त्वष्टमः स्मृतः॥
अर्थात् मनुष्य में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, मन छठा है, बुद्धि सातवीं और क्षेत्रज्ञ आठवाँ कहा गया है। इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती हैं, मन संशय करता है और बुद्धि निश्चय करती है; क्षेत्रज्ञ इन सबका साक्षी है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
देखना और देखने वाले का होना एक ही बात नहीं है।
आँख दृश्य को देखती है, पर आँख स्वयं भी देखी जा सकती है। मन विचार करता है, लेकिन मन में उठते विचारों को भी मनुष्य जानता है। बुद्धि निर्णय करती है, लेकिन यह भी जाना जा सकता है कि बुद्धि ने क्या निर्णय किया।
इसलिए महाभारत की यह खोज धीरे-धीरे उस सत्ता की ओर जाती है जो इन्द्रिय, मन और बुद्धि के अनुभवों को जानती है।
आत्मा को इन्द्रियों से क्यों नहीं जाना जा सकता?
मनुष्य सामान्यतः जिस वस्तु को जानता है, उसे किसी न किसी इन्द्रिय के माध्यम से जानता है। रंग आँख से, ध्वनि कान से, गंध नाक से, स्वाद जिह्वा से और स्पर्श त्वचा से जाना जाता है।
लेकिन आत्मा इनमें से किसी का विषय नहीं बनती।
मोक्षधर्म में मनु आत्मा के विषय में कहते हैं कि उसे आँख से उसके रूप में नहीं देखा जा सकता, स्पर्श से नहीं पकड़ा जा सकता और कान से नहीं सुना जा सकता। उसका बोध श्रुति और ज्ञानी के उपदेश तथा ज्ञान के द्वारा होता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा कोई रहस्यमय पदार्थ है जिसे किसी विशेष स्थान पर खोजा जाना है।
अर्थ अधिक सूक्ष्म है—
जो स्वयं जानने की क्षमता का आधार है, उसे उसी ज्ञान के सामान्य विषयों की तरह नहीं जाना जा सकता।
आँख संसार को देखती है; लेकिन आँख को देखने वाला कौन है—यह प्रश्न आँख स्वयं हल नहीं कर सकती।
आत्मा और मन का भेद
शान्तिपर्व का यह विवेचन आधुनिक मनोवैज्ञानिक भाषा में भी विचारणीय है, यद्यपि दोनों को समान मानना उचित नहीं होगा।
विचार बदलते हैं। भावनाएँ बदलती हैं। स्मृतियाँ बदलती हैं। इच्छाएँ बदलती हैं। शरीर तो निरन्तर बदलता ही रहता है।
फिर भी मनुष्य कहता है—
यहाँ “मेरा” और “मन” के बीच एक सूक्ष्म दूरी दिखाई देती है। महाभारत इसी दूरी को दार्शनिक प्रश्न बनाता है।
एक स्थान पर कहा गया है— मनसः परमा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा परः स्मृतः।
अर्थात् मन से ऊपर बुद्धि और बुद्धि से ऊपर आत्मा को माना गया है।
यहाँ आत्मा को मन या बुद्धि की कोई अधिक विकसित अवस्था मात्र नहीं कहा गया। उसे उनसे भिन्न स्तर पर रखा गया है।
आत्मा — साक्षी
मोक्षधर्म की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण धारणा है—साक्षित्व।
महाभारत में आत्मा को ऐसी सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो इन्द्रियों और मन के कार्यों को जानती है, पर स्वयं उन कार्यों में उसी प्रकार लिप्त नहीं होती। एक स्थान पर स्पष्ट कहा गया है कि आत्मा इन सबकी साक्षी है। (I
इसीलिए शरीर को एक नगर और उसके भीतर बुद्धि, मन तथा इन्द्रियों को विभिन्न भूमिकाओं में समझाने वाली उपमा भी मिलती है। शरीर नगर है, बुद्धि उसकी अधिष्ठात्री है, मन उसका प्रमुख सेवक है और इन्द्रियाँ उस व्यवस्था के कार्यकर्ता हैं।
यह उपमा केवल काव्यात्मक नहीं है। इसके भीतर एक दार्शनिक क्रम छिपा है—
शरीर → इन्द्रियाँ → मन → बुद्धि → साक्षी।
इस क्रम को समझने पर महाभारत का मोक्षमार्ग अधिक स्पष्ट होने लगता है।
समस्या शरीर होने में नहीं है। समस्या यह है कि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मान ले।
समस्या इन्द्रियों के होने में नहीं है। समस्या यह है कि मनुष्य अपनी पूरी पहचान इन्द्रिय-अनुभवों में खोजने लगे।
समस्या मन के होने में नहीं है। समस्या यह है कि मन में उठने वाले प्रत्येक विचार को “मैं” मान लिया जाए।
मृत्यु के प्रश्न पर आत्मा
अब यह विचार और गंभीर हो जाता है।
यदि शरीर ही सम्पूर्ण मनुष्य है, तो शरीर के समाप्त होते ही मनुष्य का भी पूर्ण अन्त हो जाना चाहिए। लेकिन महाभारत का मोक्षधर्म शरीर और आत्मा को अलग-अलग मानकर मृत्यु की व्याख्या करता है।
एक उपमा में कहा गया है कि जैसे स्वप्न में मनुष्य अपने शरीर को अपने से अलग देख सकता है, उसी प्रकार मृत्यु के बाद आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाती है। आत्मा को जन्म, वृद्धि, क्षय और विनाश से रहित बताया गया है।
यहाँ आधुनिक विज्ञान से सीधी समानता स्थापित करना उचित नहीं होगा। पुनर्जन्म महाभारत का आध्यात्मिक-दर्शनगत प्रतिपादन है, वैज्ञानिक प्रयोग से सिद्ध तथ्य नहीं।
लेकिन दार्शनिक प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है—
क्या चेतना को केवल शरीर की जैविक क्रियाओं तक सीमित कर देना पर्याप्त है?
महाभारत इस प्रश्न का उत्तर अपने आध्यात्मिक ढाँचे में देता है। आधुनिक विज्ञान इस प्रश्न को अलग पद्धतियों से देखता है। दोनों को मिलाकर एक ही निष्कर्ष निकालना उचित नहीं, लेकिन दोनों के बीच प्रश्न का यह साझा क्षेत्र अवश्य दिखाई देता है कि चेतना की वास्तविक प्रकृति क्या है?
आत्मा को जानना — अपने को जानना
आत्मा की खोज किसी बाहरी वस्तु की खोज नहीं है।
यदि आत्मा स्वयं जानने वाली सत्ता है, तो उसे किसी बाहरी उपकरण से वस्तु की तरह पकड़ना संभव नहीं होगा। इसलिए महाभारत का मार्ग भीतर की ओर जाता है—इन्द्रियों का संयम, मन की शान्ति, बुद्धि की निर्मलता और अन्ततः उस चेतन आधार की पहचान।
एक अन्य प्रसंग में कहा गया है कि जब इन्द्रियाँ विषयों से निवृत्त होती हैं और मन-बुद्धि निर्मल होते हैं, तब आत्मा का बोध सम्भव होता है; अशान्त और विक्षुब्ध मन में उसका प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं होता।
यहाँ आत्मज्ञान का अर्थ कोई नया ज्ञान-संग्रह नहीं है। यह दृष्टा की पहचान है।
मनुष्य संसार को जानता है—यह सामान्य ज्ञान है।
मनुष्य अपने मन को जानता है—यह आत्मनिरीक्षण है।
लेकिन “मैं कौन हूँ जो शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि—इन सबके अनुभव को जान रहा हूँ?”
यह प्रश्न आत्मज्ञान की दिशा खोलता है।
महाभारत की विशेषता
शान्तिपर्व का महत्व इसी जगह है कि वह आत्मा की चर्चा केवल पूजा या आस्था के स्तर पर नहीं छोड़ता। वह शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और चेतना के बीच संबंध को प्रश्नों के माध्यम से खोलता है।
कहीं उसका स्वर सांख्य के निकट दिखाई देता है, कहीं योग की साधना के निकट और कहीं उपनिषदों की आत्मविद्या के निकट। बाद के दर्शन इन धाराओं को व्यवस्थित सिद्धान्तों में विकसित करते हैं, लेकिन महाभारत में इनके अनेक प्रारम्भिक और परस्पर संवाद करते हुए रूप दिखाई देते हैं।
इसलिए शान्तिपर्व का आत्मा-विचार किसी एक सूत्र में समाप्त नहीं होता।
वह हमें एक और गहरे प्रश्न तक ले जाता है—
यदि आत्मा शरीर नहीं, इन्द्रियाँ नहीं, मन नहीं और बुद्धि भी नहीं, तो आत्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है?
यहीं से अगला चरण आरम्भ होता है—आत्मज्ञान।
क्योंकि आत्मा के अस्तित्व को मान लेना और आत्मा को जान लेना—महाभारत की दृष्टि में दोनों एक बात नहीं हैं।
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