महाभारत — शान्तिपर्व - भाग–४ : राजा अकेला नहीं होता — मंत्री, परामर्श और निर्णय

 महाभारत — शान्तिपर्व  - भाग–४ : राजा अकेला नहीं होता — मंत्री, परामर्श और निर्णय

युधिष्ठिर के सामने अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि राजा स्वयं कैसा हो।

राज्य एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं चलता।

राजा के चारों ओर मंत्री, सेनापति, पुरोहित, दूत, अधिकारी और विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाले लोग होते हैं। इसलिए राजा की बुद्धि जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह किससे सलाह लेता है और सलाह को किस प्रकार परखता है।

भीष्म के राजधर्म में परामर्श की व्यवस्था इसी कारण महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

राजा सब कुछ स्वयं नहीं जान सकता।

वह हर गाँव की स्थिति नहीं देख सकता, हर व्यक्ति की समस्या नहीं सुन सकता और प्रत्येक निर्णय के सभी परिणामों को अकेले नहीं समझ सकता।

इसलिए योग्य और विश्वसनीय मंत्रियों का चयन राजधर्म का आवश्यक अंग है।

परामर्श का अर्थ

परामर्श केवल राजा की इच्छा की पुष्टि करने का माध्यम नहीं होना चाहिए।

यदि राजा के चारों ओर ऐसे लोग हों जो केवल उसकी प्रशंसा करें, तो राजा को अपनी भूल का पता ही नहीं चलेगा।

वास्तविक मंत्री वह है जो आवश्यक होने पर राजा को अप्रिय सत्य भी बता सके।

महाभारत के नीति-विचार में इसी कारण हितकारी वचन को विशेष महत्व मिलता है।

सुखद बात और हितकारी बात हमेशा एक नहीं होतीं।

जो बात सुनने में अच्छी लगे, वह आवश्यक नहीं कि राज्य के लिए अच्छी भी हो।

और जो बात कठोर लगे, वह आवश्यक नहीं कि अहितकारी ही हो।

राजा को इन दोनों के बीच अंतर करना सीखना पड़ता है।

गुप्त मंत्रणा

प्राचीन राजव्यवस्था में राज्य के अनेक निर्णय गुप्त परामर्श से लिए जाते थे। युद्ध, कूटनीति, शत्रु की गतिविधि, राजकोष और सुरक्षा से संबंधित विषयों को सार्वजनिक करना उचित नहीं माना जाता था।

लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म संतुलन था।

गोपनीयता का उद्देश्य राज्य की सुरक्षा था, राजा की मनमानी नहीं।

यह अन्तर आज भी राजनीतिक दर्शन में महत्वपूर्ण है।

राज्य के कुछ निर्णयों में गोपनीयता आवश्यक हो सकती है, लेकिन गोपनीयता यदि उत्तरदायित्व से बचने का साधन बन जाए तो वही व्यवस्था के लिए संकट बन सकती है।

इसलिए भीष्म का राजधर्म हमें दो अलग-अलग आवश्यकताओं के बीच संतुलन देखने को प्रेरित करता है—

राज्य की सुरक्षा और निर्णय की शुचिता।

योग्य व्यक्ति की पहचान

राजा के लिए मंत्री चुनना भी स्वयं में एक परीक्षा है। केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं।

केवल बहादुर होना पर्याप्त नहीं। केवल राजा का निकट व्यक्ति होना तो बिल्कुल पर्याप्त नहीं।

जिस व्यक्ति को राज्य का दायित्व दिया जाए, उसमें बुद्धि, अनुभव, सत्यनिष्ठा, परिस्थिति की समझ और राज्यहित की भावना आवश्यक है।

यहाँ महाभारत का एक व्यापक सिद्धान्त सामने आता है—

पद व्यक्ति को योग्य नहीं बनाता; योग्य व्यक्ति पद को सार्थक बनाता है।

यदि अयोग्य व्यक्ति को शक्ति दे दी जाए तो संस्था भी कमजोर होती है।

राजा और असहमति

यहाँ युधिष्ठिर की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

युधिष्ठिर का स्वभाव परामर्श स्वीकार करने वाला था। कृष्ण, विदुर, भीष्म और अन्य अनुभवी व्यक्तियों से उन्होंने अनेक अवसरों पर मार्गदर्शन लिया।

महाभारत का यह पक्ष बताता है कि ज्ञानवान शासक वह नहीं जो हर प्रश्न का उत्तर स्वयं जानता हो।

वह वह है जो यह पहचान सके कि किस प्रश्न का उत्तर किससे पूछना चाहिए।

यह बौद्धिक विनम्रता शासन की बड़ी शक्ति हो सकती है।

परामर्श लेने का अर्थ निर्णय की क्षमता खो देना नहीं है।

अंतिम निर्णय राजा को ही लेना होता है।

इसलिए अच्छे शासन में तीन अवस्थाएँ दिखाई देती हैं— श्रवण → विचार → निर्णय।

केवल श्रवण हो और निर्णय न हो तो शासन निष्क्रिय हो जाएगा।

केवल निर्णय हो और श्रवण न हो तो शासन अहंकारी हो सकता है।

और विचार के बिना दोनों अधूरे हैं।

युद्ध के बाद इसकी आवश्यकता

कुरुक्षेत्र के बाद युधिष्ठिर के सामने पहले से कहीं अधिक जटिल राज्य था।

पुराने मंत्री और योद्धा समाप्त हो चुके थे। कौरव-पाण्डव संघर्ष के कारण प्रशासनिक संरचना को पुनर्गठित करना था। राज्य के भीतर शोक था और बाहर अनेक राजनीतिक चुनौतियाँ।

ऐसी परिस्थिति में केवल व्यक्तिगत सदाचार पर्याप्त नहीं था।

व्यवस्थित शासन चाहिए था।

और व्यवस्थित शासन के लिए योग्य मनुष्य, स्पष्ट दायित्व और विवेकपूर्ण परामर्श आवश्यक थे।

यही कारण है कि भीष्म का राजधर्म केवल राजा के चरित्र पर समाप्त नहीं होता।

वह धीरे-धीरे एक सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था की ओर बढ़ता है।

अब अगला प्रश्न स्वाभाविक है—

राजा और मंत्री तो व्यवस्था का शीर्ष हैं, लेकिन राज्य की वास्तविक शक्ति कहाँ से आती है?

धन कहाँ से आएगा?

प्रजा से कर कितना लिया जाए?

राजकोष किस प्रकार संचालित हो?

राजा प्रजा से कितना ले और बदले में उसे क्या दे?

यहीं शान्तिपर्व का राजधर्म राजकोष और करव्यवस्था के प्रश्न में प्रवेश करता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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