महाभारत — सौप्तिकपर्व — भाग ६ : अश्वत्थामा का दण्ड — प्रतिशोध का अन्त
महाभारत — सौप्तिकपर्व — भाग ६ : अश्वत्थामा का दण्ड — प्रतिशोध का अन्त
अश्वत्थामा का ब्रह्मशिर अस्त्र अपना विनाशकारी प्रभाव दिखा चुका था।
लेकिन पाण्डव वंश समाप्त नहीं हुआ। उत्तरा के गर्भ में स्थित अभिमन्यु का पुत्र बच गया।
अब प्रश्न था—अश्वत्थामा के अपराध का दण्ड क्या हो?
उसने युद्धभूमि में नहीं, बल्कि रात्रि में सोए हुए योद्धाओं की हत्या की थी। उसने द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को मारा था और अन्ततः गर्भस्थ जीवन को भी नष्ट करने का प्रयास किया था।
अब उसके सामने पाण्डव खड़े थे।
भीम का आग्रह
भीम अश्वत्थामा को जीवित छोड़ने के पक्ष में नहीं थे।
उनकी दृष्टि में उसने ऐसी सीमा पार कर दी थी जहाँ सामान्य युद्ध का नियम लागू नहीं हो सकता था।
उसने सोते हुए योद्धाओं की हत्या की थी। इसलिए भीम उसके वध को उचित मानते थे।
लेकिन अर्जुन, कृष्ण और द्रौपदी के विचारों ने परिस्थिति को दूसरी दिशा दी।
द्रौपदी की करुणा
द्रौपदी के पाँच पुत्रों की हत्या अश्वत्थामा ने की थी।
फिर भी द्रौपदी ने कहा कि अश्वत्थामा की माता कृपी को उसी प्रकार पुत्र-वियोग का दुःख न दिया जाए जैसा दुःख उसे स्वयं मिला है।
यहाँ द्रौपदी अपराध को सही नहीं ठहराती। वह केवल यह कहती है कि—
एक माँ के दुःख को दूसरी माँ के दुःख से और बड़ा क्यों किया जाए?
यही वह क्षण है जहाँ प्रतिशोध की श्रृंखला टूटती है।
अर्जुन का धर्मसंकट
अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ने की प्रतिज्ञा की थी। लेकिन अब प्रश्न था कि उसे मारना चाहिए या नहीं।
एक ओर गुरु-पुत्र था। दूसरी ओर उसने घोर अपराध किया था।
कृष्ण ने अर्जुन को उस स्थिति का धर्म समझाया। अन्ततः अश्वत्थामा का वध नहीं किया गया।
लेकिन उसे बिना दण्ड के भी नहीं छोड़ा गया।
मणि का हरण
अश्वत्थामा के मस्तक में स्थित मणि उससे निकाल ली गई। उसकी प्रतिष्ठा और तेज उससे छीन लिया गया।
यह दण्ड केवल शारीरिक नहीं था। जिस शक्ति और गौरव के आधार पर वह स्वयं को अजेय समझ रहा था, वही उससे छीन लिया गया।
इस प्रकार— जीवन बचा, लेकिन सम्मान और सुरक्षा छिन गई।
कृष्ण का शाप
महाभारत की कथा में कृष्ण अश्वत्थामा को दीर्घकाल तक पृथ्वी पर भटकने का शाप देते हैं।
यह शाप उसकी मृत्यु नहीं है। बल्कि इसके विपरीत—
जीवित रहकर अपने कर्म का परिणाम भोगना ही उसका दण्ड बनता है।
यहाँ महाभारत दण्ड की एक अलग अवधारणा सामने रखता है।
मृत्यु कभी-कभी दण्ड का अन्त कर देती है।
लेकिन जीवित रहना और अपने कर्म के परिणाम को निरन्तर अनुभव करना अधिक कठोर दण्ड के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
सौप्तिकपर्व का समापन
सौप्तिकपर्व की शुरुआत हुई थी— युद्ध समाप्त होने के बाद अश्वत्थामा के प्रतिशोध से।
और उसका अन्त होता है— प्रतिशोध के परिणाम और पाण्डव वंश के बच जाने से।
कुरुक्षेत्र के युद्ध में असंख्य योद्धा मारे गए।
लेकिन युद्ध की अंतिम रात ने यह दिखा दिया कि युद्ध केवल रणभूमि पर नहीं लड़ा जाता।
उसकी आग मनुष्य के भीतर भी चलती रहती है। अश्वत्थामा उसी आंतरिक युद्ध का चरम रूप बन जाता है।
सौप्तिकपर्व का केंद्रीय प्रश्न
कर्णपर्व में प्रश्न था— निष्ठा और धर्म के बीच मनुष्य किसे चुनता है?
शल्यपर्व में— विजय और युद्ध-मर्यादा के बीच क्या संबंध है?
और सौप्तिकपर्व में प्रश्न और आगे बढ़ता है— क्या प्रतिशोध कभी न्याय बन सकता है?
महाभारत इसका कोई सरल सूत्र नहीं देता।
लेकिन घटनाओं का क्रम स्वयं एक उत्तर की ओर संकेत करता है— प्रतिशोध ने अश्वत्थामा को विजय नहीं दी।
उसने उसे और अधिक विनाश, अपराध और अन्ततः दण्ड तक पहुँचा दिया।
जबकि द्रौपदी ने अपने व्यक्तिगत दुःख के बीच भी प्रतिशोध की अगली कड़ी को रोक दिया।
यहीं सौप्तिकपर्व समाप्त होता है।
अब महाभारत की दृष्टि युद्धभूमि से हटकर विधवाओं, माताओं, पुत्रहीन परिवारों और शोकग्रस्त समाज की ओर जाएगी।
अगला पर्व होगा— स्त्रीपर्व
और वहाँ पहली बार कुरुक्षेत्र को विजेताओं की आँखों से नहीं, बल्कि युद्ध में सब कुछ खो चुकी स्त्रियों की आँखों से देखा जाएगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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