महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १२ -राजा का आन्तरिक राज्य — काम, क्रोध और लोभ पर विजय

 महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १२ -राजा का आन्तरिक राज्य — काम, क्रोध और लोभ पर विजय

राजा बाहर के राज्य का स्वामी हो सकता है, लेकिन यदि वह अपने भीतर के राज्य पर शासन नहीं कर सकता, तो उसकी बाहरी सत्ता कितनी भी बड़ी हो, वह अन्ततः अस्थिर हो सकती है।

मनुष्य दूसरे मनुष्यों को नियंत्रित कर सकता है, कानून बना सकता है, सेना चला सकता है, कर ले सकता है और दण्ड दे सकता है; लेकिन यदि उसका अपना मन लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार से संचालित हो रहा हो, तो वही शक्तियाँ धीरे-धीरे उसके निर्णयों को प्रभावित करने लगती हैं।

इसलिए राजधर्म का एक सूक्ष्म प्रश्न है—

राजा पहले किस पर शासन करे—प्रजा पर या स्वयं पर?

शान्तिपर्व की दृष्टि में इसका उत्तर स्पष्ट है।

राजा का बाहरी शासन उसके आन्तरिक शासन से अलग नहीं हो सकता।

शत्रु बाहर से पहले भीतर

राजा के सामने बाहरी शत्रु दिखाई देता है। उसकी सेना दिखाई देती है।

उसका दुर्ग दिखाई देता है। उसकी रणनीति का अनुमान लगाया जा सकता है।

लेकिन भीतर के शत्रु अदृश्य होते हैं। काम निर्णय को निजी इच्छा की ओर मोड़ सकता है।

क्रोध न्याय को प्रतिशोध में बदल सकता है।

लोभ राजकोष को निजी सम्पत्ति समझने की प्रवृत्ति पैदा कर सकता है।

मोह योग्य और अयोग्य के बीच भेद को धुँधला कर सकता है।

अहंकार सलाह सुनने की क्षमता समाप्त कर सकता है।

इसलिए राजा के लिए सबसे कठिन विजय किसी बाहरी राज्य पर विजय नहीं, बल्कि अपने ही मन की प्रवृत्तियों पर विजय है।

काम — इच्छा और सत्ता

इच्छा स्वयं दोष नहीं है।

राजा को भी इच्छा होगी कि उसका राज्य समृद्ध हो, उसकी सेना सुरक्षित हो, उसकी प्रतिष्ठा बढ़े और उसके निर्णय सफल हों।

समस्या तब आरम्भ होती है जब इच्छा विवेक से ऊपर हो जाती है।

सत्ता के साथ इच्छा की शक्ति बढ़ जाती है।

सामान्य व्यक्ति जिस वस्तु को पाने के लिए प्रयास करता है, राजा उसे आदेश से प्राप्त कर सकता है।

यहीं आत्मसंयम की आवश्यकता कई गुना बढ़ जाती है।

यदि राजा अपनी प्रत्येक इच्छा को राजकीय अधिकार से पूरा करने लगे, तो राज्य धीरे-धीरे उसकी निजी इच्छाओं का विस्तार बन सकता है।

इसलिए राजधर्म का संकेत है—

जिसे प्राप्त करने की शक्ति हो, उसे प्राप्त करना आवश्यक नहीं।

संयम का अर्थ इच्छा का पूर्ण अभाव नहीं है।

संयम का अर्थ है—इच्छा और निर्णय के बीच विवेक का उपस्थित रहना।

क्रोध — न्याय का सबसे बड़ा शत्रु

राजा के लिए क्रोध विशेष रूप से खतरनाक है।

एक सामान्य व्यक्ति का क्रोध उसके व्यक्तिगत सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है।

राजा का क्रोध दण्ड बन सकता है।

और जब क्रोध को राजकीय शक्ति मिल जाती है, तब निजी भावना सार्वजनिक परिणाम पैदा करती है।

इसलिए न्याय करते समय राजा को स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या मैं अपराध के कारण दण्ड दे रहा हूँ या व्यक्ति के कारण?

क्या अपराध प्रमाणित है?

क्या मेरी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को चोट पहुँची है?

क्या मैं अपने अपमान का बदला राज्य की शक्ति से ले रहा हूँ?

यदि उत्तर दूसरा है, तो दण्ड राजधर्म नहीं रह जाता।

वह राजकीय शक्ति के माध्यम से किया गया व्यक्तिगत प्रतिशोध बन जाता है।

लोभ — राजकोष का अदृश्य शत्रु

पिछले भागों में राजकोष और कर की चर्चा हुई।

अब उसका आन्तरिक पक्ष समझना आवश्यक है।

राजकोष जितना बड़ा होगा, राजा के पास उतने अधिक साधन होंगे।

लेकिन यदि राजा के भीतर लोभ बढ़ता जाए, तो वही कोष प्रजा पर अधिक भार डालने का कारण बन सकता है।

राजा सोच सकता है—

और धन चाहिए। और सेना चाहिए। और भवन चाहिए। और अधिक वैभव चाहिए।और अधिक विजय चाहिए।

यहाँ से राजकोष का उद्देश्य बदल जाता है। पहले धन राज्य के लिए था।

अब राज्य धन के लिए काम करने लगता है।

यही वह उलटाव है जिससे राजधर्म सावधान करता है।

धन साधन है; जब साधन स्वयं साध्य बन जाता है, तब व्यवस्था का संतुलन टूटने लगता है।

मोह — सम्बन्ध और शासन

राजा के लिए मोह का प्रश्न और कठिन है।

राजा भी मनुष्य है। उसके परिवार हैं, मित्र हैं, गुरु हैं, सम्बन्धी हैं।

लेकिन न्याय के समय निजी सम्बन्ध और राजकीय दायित्व में संघर्ष हो सकता है।

महाभारत की पूरी कथा इस समस्या का सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं प्रस्तुत करती है।

धृतराष्ट्र का पुत्रमोह केवल व्यक्तिगत भाव नहीं रहा।

उसका प्रभाव राज्य पर पड़ा।

दुर्योधन के प्रति मोह, विदुर की चेतावनियों की उपेक्षा और पाण्डवों के प्रति अन्याय—इन सबके परिणाम अन्ततः उस महायुद्ध तक पहुँचे जिसमें कुरुवंश का विनाश हुआ।

इसलिए शान्तिपर्व में राजधर्म की शिक्षा को महाभारत की पूर्वकथा से अलग नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

कथा स्वयं सिद्धान्त की प्रयोगशाला है।

धृतराष्ट्र के जीवन में हम देखते हैं कि निजी मोह जब राजकीय निर्णय पर अधिकार कर लेता है, तो उसका परिणाम निजी नहीं रहता।

अहंकार — परामर्श का अन्त

राजा के लिए अहंकार शायद सबसे सूक्ष्म संकट है।

लोभी राजा जान सकता है कि वह लोभी है।

क्रोधी राजा कभी-कभी अपने क्रोध को पहचान सकता है।

लेकिन अहंकारी राजा को यह भ्रम हो सकता है कि उसकी इच्छा ही सत्य है।

यहीं से परामर्श समाप्त होता है।

क्योंकि जो व्यक्ति पहले से मानता है कि वह सब जानता है, वह दूसरे की बात सुनने का प्रयोजन ही नहीं समझता।

ऐसे राजा के आसपास धीरे-धीरे दो प्रकार के लोग बचते हैं—

जो भय के कारण चुप हैं और जो लाभ के कारण प्रशंसा करते हैं।

दोनों स्थितियाँ राज्य के लिए खतरनाक हैं।

इसलिए राजा को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो उसके सामने सत्य रख सकें।

इन्द्रियनिग्रह का अर्थ

इन्द्रियों का संयम प्राचीन भारतीय चिन्तन में केवल तपस्वियों का विषय नहीं था।

राजा के लिए इसका राजनीतिक महत्व भी था।

यदि राजा स्वाद, मदिरा, शिकार, स्त्री, मनोरंजन, निद्रा या विलास में इतना डूब जाए कि शासन पीछे छूट जाए, तो उसका निजी जीवन राज्य की कार्यक्षमता को प्रभावित करेगा।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि राजा को मनुष्य होने का अधिकार नहीं।

राजधर्म का लक्ष्य जीवन का निषेध नहीं है।

लक्ष्य है— भोग राजा को संचालित न करे; राजा भोग का स्वामी रहे।

यही आत्मसंयम का व्यावहारिक अर्थ है।

राजा और समय

शासन में समय स्वयं एक संसाधन है।

राजा यदि अपना अधिकांश समय विलास, मनोरंजन या अनावश्यक उत्सवों में खर्च करता है, तो राज्य के वास्तविक प्रश्नों के लिए उसका समय कम हो जाता है।

इसलिए राजधर्म राजा के दैनिक अनुशासन पर भी ध्यान देता है।

कब उठना है। कब मंत्रणा करनी है। कब न्याय सुनना है।

कब सेना और सुरक्षा की समीक्षा करनी है। कब आर्थिक विषयों पर विचार करना है।

कब विद्वानों से संवाद करना है। यह सब केवल दिनचर्या नहीं है।

यह सत्ता को व्यक्तिगत मनोदशा से निकालकर संस्थागत अनुशासन में रखने का प्रयास है।

आत्मपरीक्षण का महत्व

राजा को समय-समय पर अपने निर्णयों की समीक्षा करनी चाहिए।

किसी निर्णय का परिणाम यदि अपेक्षा के विपरीत आया, तो केवल अधिकारी को दोष देना सरल है।

लेकिन राजा को यह भी पूछना चाहिए—

क्या मेरी सूचना गलत थी?

क्या मेरी सलाह गलत थी?

क्या मैंने विरोधी मत सुना था?

क्या मैंने जल्दी निर्णय लिया?

क्या मेरे निजी हित ने निर्णय को प्रभावित किया?

यही आत्मपरीक्षण राजा को सीखने वाला शासक बनाता है।

जो राजा अपनी भूल स्वीकार नहीं कर सकता, वह अपनी भूलों को दोहराने के लिए बाध्य हो सकता है।

राजा और भय

राजा के लिए भय भी एक सूक्ष्म मानसिक शत्रु है।

यदि राजा हर विरोध में षड्यंत्र देखे, तो वह संदेहशील हो जाएगा।

यदि हर आलोचना में उसे अपना अपमान दिखाई दे, तो वह असहमति को दबाने लगेगा।

यदि हर परिवर्तन उसे सत्ता के लिए खतरा लगे, तो वह समय के साथ बदलने की क्षमता खो सकता है।

इसलिए आत्मसंयम का एक अर्थ यह भी है कि राजा अपने भय को पहचान सके।

भय से लिया गया निर्णय अक्सर सुरक्षा खोजते-खोजते स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।

यहाँ फिर वही संतुलन सामने आता है—न अन्धविश्वास, न अन्धसंदेह।

शासक की निजी भूल और सार्वजनिक परिणाम

सामान्य मनुष्य की भूल प्रायः उसके निजी जीवन तक सीमित रहती है।

राजा की भूल का विस्तार बहुत बड़ा हो सकता है।

उसका एक आदेश युद्ध करा सकता है।

एक गलत कर नीति अकाल को बढ़ा सकती है।

एक अन्यायपूर्ण दण्ड समाज में भय पैदा कर सकता है।

एक योग्य व्यक्ति की उपेक्षा प्रशासन को कमजोर कर सकती है।

एक अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति पूरे राज्य को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए राजा का चरित्र निजी विषय नहीं रह जाता।

राजा का आत्मसंयम स्वयं राजधर्म का एक अंग बन जाता है।

महाभारत का धृतराष्ट्र-पाठ

महाभारत की कथा को पीछे मुड़कर देखने पर धृतराष्ट्र का प्रसंग यहाँ फिर महत्वपूर्ण हो जाता है।

धृतराष्ट्र के पास शक्ति थी। उसे बार-बार चेतावनी मिली। विदुर ने कहा।

भीष्म ने समझाया।

द्रोण, कृप और अन्य वरिष्ठ भी परिस्थितियों से परिचित थे।

फिर भी पुत्रमोह और राजकीय निर्णय के बीच वह आवश्यक दूरी नहीं बन सकी।

इसका परिणाम केवल एक परिवार का दुःख नहीं था।

उसने पूरे राज्य को युद्ध में धकेल दिया।

इसलिए शान्तिपर्व में युधिष्ठिर को दी जा रही शिक्षा केवल सैद्धान्तिक नहीं है।

उसके पीछे कुरुवंश के विनाश का जीवित अनुभव है।

भीष्म स्वयं उस युद्ध के साक्षी हैं।

इसलिए उनकी शिक्षा में राजधर्म का प्रत्येक सिद्धान्त अनुभव की अग्नि से निकला हुआ प्रतीत होता है।

आत्मविजय और राज्यविजय

अन्ततः प्रश्न फिर वहीं लौटता है जहाँ से हमने शुरुआत की थी।

राजा कितने प्रदेश जीत सकता है?

यह बाहरी विजय है। लेकिन क्या वह अपने क्रोध को जीत सकता है?

क्या वह अपने लोभ को रोक सकता है?

क्या वह अपने प्रिय व्यक्ति के अपराध को भी अपराध कह सकता है?

क्या वह अपने विरोधी की उचित बात स्वीकार कर सकता है?

क्या वह अपनी भूल मान सकता है?

क्या वह ऐसी शक्ति का उपयोग कर सकता है जो उसे स्वयं प्रिय न हो, लेकिन राज्य के लिए आवश्यक हो?

यदि हाँ, तो उसकी वास्तविक विजय बाहरी विजय से कहीं गहरी है।

शान्तिपर्व की राजधर्म-दृष्टि में राजा का पहला राज्य उसका अपना मन है।

जिसने स्वयं पर शासन नहीं किया, उसका दूसरों पर शासन कितना स्थायी होगा—यह प्रश्न महाभारत पाठक के सामने छोड़ देता है।

और अब राजधर्म का एक और व्यावहारिक पक्ष सामने आता है।

राजा अकेले शासन नहीं करता। उसके पास मंत्री, सेनापति, दूत, न्यायाधिकारी और अनेक अधिकारी होते हैं।

इसलिए अगला प्रश्न केवल राजा के चरित्र का नहीं, बल्कि राजकीय अधिकारियों के चरित्र और उत्तरदायित्व का होगा—क्योंकि राजा का अच्छा संकल्प भी भ्रष्ट या अयोग्य प्रशासन के हाथों अपना अर्थ खो सकता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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